Wednesday, 30 April 2014

मोदी, सेल्फी और सोशल मीडिया


 अहमदाबाद में वोट देने के बाद नरेंद्र मोदी ने लाखों युवाओं की ही तर्ज पर सेल्फी ली। सेल्फी यानी मोबाइल से अपनी ही फोटो खींचना और फिर इसे सोशल मीडिया जैसे ट्विटर या फेसबुक पर डालना। इस चुनाव में ये सबसे अधिक प्रचलन में आया है। मतदान के प्रति लोगों में जागरूकता और उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए कुछ बड़े अख़बारों और मीडिया चैनलों ने भी वोट डालने के बाद सेल्फी लेने के लिए अभियान चलाया। वोट डालने के बाद हज़ारों लोगों के खुद के खींचे ऐसे फोटोग्राफ भी मुख्य धारा की मीडिया में दिखाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो ऐसी सेल्फी की बाढ़ आई हुई है।

सोशल मीडिया पर तो बहुत सारे नेता हैं। लेकिन ऐसा कोई नेता याद नहीं आ रहा जिसने इस तरह से वोट डालने के बाद अमिट स्याही लगी अपनी उंगुली और चुनाव चिन्ह दिखाते हुए न सिर्फ सेल्फी ली बल्कि उसे तुरंत ही ट्वीट भी कर दिया। देखते ही देखते #selfiewithmodi ट्विटर पर टॉप ट्रेंड बन गया। इसी हैश टैग के साथ हज़ारों लोग लगातार ट्वीट कर रहे हैं और मोदी के इस कदम का स्वागत कर रहे हैं। खुद मोदी ने जिस ट्वीट के ज़रिए अपना सेल्फी डाला उसे ये लेख लिखते वक्त तक 1500 बार रिट्वीट किया जा चुका है और 1000 लोगों ने फेवरिट किया है।  

इस चुनाव में नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया को प्रचार के एक बहुत बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। बल्कि वो संभवतः ऐसे पहले नेता हैं जिन्होंने प्रचार अभियान में सोशल मीडिया के महत्व को समझा। 2011 में अपने सद्भावना मिशन के दौरान उन्होंने फेसबुक और ट्विटर के ज़रिए अलग से प्रचार किया। पार्टी की अंदरूनी बैठकों में भी वो पार्टी नेताओं को सोशल मीडिया के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल के लिए कहते रहे। गुजरात में पिछले दो विधानसभा चुनावों में मोदी ने सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। लोक सभा चुनावों में सोशल मीडिया के लिए उनकी अपनी एक अलग टीम है। जो टॉप ट्रेंड से लेकर विरोधियों के खिलाफ चलने वाले ट्रेंड और ट्वीट्स पर नज़र रखती है। इनकी हर रोज़ समीक्षा की जाती है और बड़े मुद्दों के हिसाब से रणनीति तैयार की जाती है। आए-दिन विरोधियों से ट्वीटर पर युद्ध छिड़ता है और मुकाबला इस बात पर होता है कि कौन सा ट्रेंड टॉप पर रहेगा।

मोदी की ही तर्ज़ पर बीजेपी के कई बड़े नेता अब खुल कर सोशल मीडिया पर आ गए हैं। ट्विटर पर नरेंद्र मोदी को 38 लाख से ज़्यादा लोग फॉलो कर रहे हैं जो भारत में किसी भी शख्सियत में सबसे ज्यादा है। जबकि फेसबुक पर उनके पेज को एक करोड़ से अधिक लोगों ने लाइक किया है। इसके अलावा गूगल हैंगआउट और फेसबुक के साथ कार्यक्रम कर भी मोदी सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों तक पहुंचे हैं। इसके अलावा मोदी नियमित रूप से ब्लॉगिंग भी करते हैं। यूट्यूब पर भी नरेंद्र मोदी के भाषणों के वीडियो बड़ी संख्या में देखे जाते हैं।

जबकि इसके उलट राहुल गांधी न तो ट्विटर पर हैं और न ही फेसबुक पर। कांग्रेस पार्टी सोशल मीडिया पर देर से सक्रिय हुई। आज पार्टी का अपना खुद का ट्विटर एकाउंट है। साथ ही कांग्रेस के कई बड़े नेता भी ट्विटर और फेसबुक के ज़रिए सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। जबकि मोदी की ही तरह सोशल मीडिया का बेहतरीन इस्तेमाल अगर किसी ने किया है तो वो है आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल। सोशल मीड़िया पर केजरीवाल बेहद सक्रिय हैं और ये उनके लिए अपने कार्यकर्ताओं से जुड़ने का सशक्त माध्यम है। सोशल मीडिया के ट्रेंड में केजरीवाल मोदी और राहुल गांधी से टक्कर लेते नज़र आते हैं।


लोक सभा का ये चुनाव देश का पहला ऐसा बड़ा चुनाव होने जा रहा है जिसमें सोशल मीडिया ने एक बड़ी भूमिका निभाई है। हाल ही में हुए एक अध्ययन में कहा गया कि करीब 160 लोक सभा सीटें ऐसी हैं जहां सोशल मीडिया नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में है। इस बार दस करोड़ नए मतदाता जुड़े हैं। इनमें एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर सक्रिय है। ज़ाहिर है मोदी समेत सभी राजनीतिक दलों की नज़रें इन्हीं पर लगी हैं।

Tuesday, 29 April 2014

कितने करोड़ का है बीजेपी का अभियान?

  
बीजेपी का प्रचार अभियान इस बार जितना बड़ा है शायद उतना पहले कभी नहीं रहा है। इसका विस्तार टेलीविज़न, अख़बार, रेडियो और सड़कों पर लगे होर्डिंग में दिख रहा है। पहली बार सोशल मीडिया को भी बीजेपी ने प्रचार के लिए ज़बर्दस्त ढंग से इस्तेमाल किया है। पहली बार प्रचार के लिए 3 डी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि बीजेपी ने प्रचार पर पानी की तरह पैसा बहाया है। कांग्रेस के मुताबिक बीजेपी ने चुनाव अभियान पर दस हज़ार करोड़ रुपए से भी ज़्यादा खर्च किया है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है?

प्रचार अभियान से जुड़े कई नेता बातचीत में दावा करते हैं कि कांग्रेस ने जो आंकड़ा दिया है, बीजेपी ने अभी तक इसका दसवां हिस्सा यानी एक हज़ार करोड़ रुपया भी खर्च नहीं किया है। शायद मतदान के अंतिम दिन यानी 12 मई तक खर्च की गई रकम हज़ार करोड़ के आसपास पहुँचे। पिछले हफ्ते तक प्रचार अभियान और नेताओं के हवाई दौरों पर खर्च की गई रकम साढ़े छह सौ करोड़ रुपए के आसपास आ रही थी। इसमें चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों को पार्टी की ओर से दी गई रकम भी शामिल है।

बीजेपी नेताओं के मुताबिक इस बार पार्टी ने प्रचार में सबसे ज़्यादा खर्चा आउटडोर विज्ञापन यानी सड़कों पर लगे होर्डिंग पर किया है। देश के छोटे-बड़े हर शहर में नरेंद्र मोदी के फोटो वाले होर्डिंग लगाए गए हैं जिनमें पार्टी के अलग-अलग नारे होते हैं। ऐसा कम ही होता है कि किसी शहर या कस्बे की सड़कों पर गुजरते वक्त अबकी बार, मोदी सरकार की टैग लाइन वाले इन होर्डिंग पर नज़र न पड़े। एक अंदाज़े के मुताबिक़ बीजेपी ने करीब सौ करोड़ रुपए इन होर्डिंग पर खर्च किए हैं। बीजेपी ने महत्वपूर्ण जगहों पर लगे ज़्यादातर होर्डिंग की बुकिंग पहले ही करा ली थी। इसीलिए कांग्रेस समेत दूसरे दलों को ऐन चुनाव के वक्त अपने विज्ञापनों के लिए ये होर्डिंग नहीं मिल सके। दिल्ली जैसे शहर में तो ये आलम था कि बीजेपी के दस से पंद्रह होर्डिंग एक ही सड़क पर लगे हुए थे। साथ ही शहर के बस स्टाप को भी मोदी के फोटो वाले विज्ञापनों से पाट दिया गया था।

प्रचार के पारंपरिक साधन जैसे टीवी, अख़बार और रेडियो पर बीजेपी ने दिल खोल कर खर्चा किया है। क्रिकेट मैच के प्रसारण के दौरान खेल चैनलों और मनोरंजन चैनलों पर सबसे ज़्यादा विज्ञापन दिए गए। समाचार चैनलों में सबसे बड़ा हिस्सा हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के चैनलों को मिला। जबकि अंग्रेजी चैनलों पर रस्म अदाइगी की गई। रेडियो पर आई एफएम क्रांति का बीजेपी का बखूबी इस्तेमाल किया है। बड़े और छोटे शहरों में गाड़ियों और दुकानों में बज रहे एफएम रेडियो पर भी बीजेपी के विज्ञापन सुनाई दे रहे हैं। अखबारों को भी बीजेपी के विज्ञापन का एक बड़ा हिस्सा मिला है। प्रचार खत्म होने के बाद बड़े अखबारों में पार्टी ने पूरे पेज के विज्ञापन दिए हैं। बीजेपी नेताओं के मुताबिक पारंपरिक मीडिया में विज्ञापनों पर पार्टी ने 60-70 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

विज्ञापन के बजट का सबसे कम हिस्सा सोशल मीडिया पर खर्च किया गया है। फेसबुक और ट्विटर पर बीजेपी और नरेंद्र मोदी के अलावा कई दूसरे बड़े नेताओं की पोस्ट और ट्वीट को प्रमोट किया गया। कई बड़ी वेबसाइटों पर भी बीजेपी के डिजीटल विज्ञापन देखने में आए हैं। पार्टी नेताओं के मुताबिक सोशल मीडिया पर विज्ञापन की रकम दस करोड़ के आसपास होगी।

सबसे ज़्यादा खर्चा नरेंद्र मोदी की 3 डी सभाओं पर आ रहा है। नरेंद्र मोदी एक ही दिन में करीब सौ जगह पर इन सभाओं को संबोधित करते हैं। अब तक 3 डी सभाओं के छह दौर हो चुके हैं। आज शाम सातवां दौर है जिसमें नरेंद्र मोदी कई राज्यों में सौ से भी ज़्यादा जगहों पर प्रचार करेंगे। पार्टी नेताओं के मुताबिक़ गुजरात विधानसभा चुनाव में पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल प्रचार के लिए किया गया था। तब ये ज़्यादा महंगी थी। अब थोड़ी सस्ती हुई है। इसके बावजूद अंदाजे के मुताबिक 12 मई तक पार्टी इन सभाओं पर करीब 200 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी होगी।

नेताओं के हवाई दौरों के लिए हवाई जहाज़ और हेलीकाप्टरों पर भी काफी पैसा खर्च हो रहा है। रैलीगेयर, अडानी जैसी कई कंपनियों से ये किराए पर लिए जाते हैं। पार्टी इनका किराया चेक के माध्यम से चुकाती है। नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी जैसे बड़े नेताओं के लिए चार्टर प्लेन का इंतज़ाम किया गया है। दिलचस्प बात ये है कि पार्टी के कई बड़े नेता सिंगल इंजिन वाले हेलीकॉप्टर में उड़ान भरने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उनके मुताबिक दो इंजिन वाले कई हेलीकॉप्टर कांग्रेस ने बुक करा लिए हैं। लेकिन उन्हें उड़ाया नहीं जा रहा है।


Monday, 28 April 2014

कांग्रेस को मिला प्रियंका का सहारा


पिछले एक हफ्ते से प्रियंका वाड्रा ने लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के प्रचार का ज़िम्मा संभाल लिया है। मीडिया की सुर्खियों में सोनिया गांधी-राहुल गांधी पीछे चले गए हैं। जबकि प्रियंका नरेंद्र मोदी से दो-दो हाथ करती दिख रही हैं। उन्होंने अभी खुद को अपने भाई और मां के चुनाव क्षेत्र अमेठी-रायबरेली में ही सीमित रखा हुआ है। मोदी पर प्रियंका के हमलों में राहुल की तुलना में ज़्यादा पैनापन है और उनके हमले नरेंद्र मोदी और बीजेपी को ज़्यादा चुभ रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने प्रियंका के हमलों का अपने अंदाज़ में जवाब दिया है। तो वहीं बीजेपी ने उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के कथित ज़मीन घोटालों को लेकर पहली बार औपचारिक रूप से प्रेस कांफ्रेंस कर हमला किया है।

नेहरू-गांधी परिवार पर बीजेपी के इतने तीखे हमले इससे पहले शायद ही कभी हुए हों। कांग्रेस और बीजेपी में एक तरह का अघोषित समझौता रहा है जिसमें नेताओं के व्यक्तिगत मामलों और परिवार के सदस्यों पर छींटा-कशी नहीं की जाती है। सबसे पहले जब रॉबर्ट वाड्रा के ज़मीन सौदों और उन्हें डीएलएफ से मिले फायदे के बारे में खबरें आईं तो इन्हें संसद में उठाने को लेकर बीजेपी में एक राय नहीं बन सकी। पार्टी के बड़े नेताओं में इसे लेकर मतभेद थे। ये दलील दी गई कि कांग्रेस वाजपेयी के दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य का मुद्दा उठा सकती है। एक बड़े नेता जो इस मामले को संसद में उठाना चाहते थे, उन्हें जब ऐसा करने से रोक गया तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने की धमकी भी दी थी। इसके बावजूद बीजेपी ने वाड्रा के मामलों पर चुप्पी साधे रखी।

लेकिन अब ये चुप्पी टूट गई है। इसके पीछे बड़ी वजह कांग्रेसी नेताओं द्वारा नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत मामलों को चुनाव में उछालना हो सकता है। खुद राहुल गांधी ने मोदी की वैवाहिक स्थिति का सवाल चुनाव में उठाया है। कानून मंत्री कपिल सिब्बल इसे लेकर चुनाव आयोग भी पहुंच गए। राहुल और प्रियंका बार-बार अपनी चुनावी सभाओं में कथित महिला जासूसी कांड को उठा कर महिला सुरक्षा के बारे में मोदी के दावों पर सवाल उठाते हैं। मोदी समर्थक नेता मानते हैं कि पिछले बारह साल में कांग्रेस ने जिस तरह से उन्हें घेरने की कोशिश की है, उसके बाद से उनसे नेहरू-गांधी परिवार पर हमला न करने की अपेक्षा करना बेमानी होगा। चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी लगातार जीजाजी की बात कह कर वाड्रा पर निशाना साधते रहे हैं। बीजेपी का कहना है कि ये व्यक्तिगत हमले नहीं हैं बल्कि भ्रष्टाचार के मुद्दे हैं।

इसीलिए प्रियंका वाड्रा का पलटवार बेहद दिलचस्पी से देखा जा रहा है। ये कोई छिपी बात नहीं है कि कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं में राहुल की तुलना में प्रियंका के प्रति अधिक आकर्षण है। प्रियंका में उन्हें इंदिरा गांधी की छवि दिखती है। उनका आक्रामक अंदाज़ भी इंदिरा गांधी से मिलता-जुलता है। चुनाव अभियान की शुरुआत से पहले ऐसी खबरें भी आईं थीं कि प्रियंका अधिक सक्रिय हो कर अमेठी-रायबरेली के बाहर भी कांग्रेस के लिए प्रचार करेंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रियंका ने वाराणसी में प्रचार करने की अटकलों को भी खारिज कर दिया है। कार्यकर्ताओं की मांग के बावजूद प्रियंका को औपचारिक रूप से पार्टी में कोई ज़िम्मेदारी नहीं दी गई है। माना जाता है कि अगर ऐसा होता है तो फोकस राहुल से हट कर प्रियंका पर आ जाएगा जबकि सोनिया गांधी ऐसा नहीं चाहती हैं।

प्रियंका ने भी अपने-आप को सक्रिय राजनीति से दूर रखा है। वो पर्दे के पीछे रह कर ही अपने भाई और मां की मदद करती हैं। चुनावों के वक्त वो ज़रूर अपने भाई और मां के संसदीय क्षेत्रों में प्रचार करती हैं। अपने पति रॉबर्ट वाड्रा के ज़मीन सौदों को लेकर उठे विवाद पर इससे पहले उन्होंने कभी चुप्पी नहीं तोड़ी थी। यहां तक कि अपने उपनाम को लेकर भी वो बेहद सतर्क रहती हैं। वो नहीं चाहती हैं कि उनके नाम के साथ गांधी जोड़ा जाए। 2007 के विधानसभा चुनावों में सुल्तानपुर में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा भी था कि उन्हें प्रियंका वाड्रा कहा जाए न कि प्रियंका गांधी।

चुनाव में अभी मतदान के तीन दौर बाकी है लेकिन कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की बात कह कर एक तरह से हथियार डालने शुरू कर दिए हैं। ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने में राहुल गांधी प्रभावी साबित नहीं हुए हैं। ऐसे में कांग्रेस ने अपने सबसे असरदार हथियार के रूप में प्रियंका को आगे किया है। लेकिन लगता है कि इसमें भी बहुत देरी हो चुकी है। अपने पति पर लगे आरोपों का उन्होंने भावनात्मक ढंग से जवाब देने की कोशिश की है। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी चुनावों में भावनात्मक मुद्दों को उठा दिया करती थीं। पर बीजेपी जिस अंदाज में वाड्रा मुद्दे पर आक्रामक हुई है उससे प्रियंका को भी हमलावर होना पड़ा है। यहां तक कि वाड्रा के मामले को एक नागरिक का निजी मुद्दा बता कर खारिज करने वाली कांग्रेस को भी सफाई देनी पड़ी है। ज़ाहिर है रॉबर्ट वाड्रा के मुद्दे पर आखिरी शब्द कहा जाना अभी बाकी है।


Sunday, 27 April 2014

बासी कढ़ी में आया उबाल


लोक सभा चुनाव में अभी तीन दौर का मतदान बाकी है। मतों की गिनती 16 मई को होगी। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यूपीए की सरकार फिर बनने का दावा कर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के भीतर से ही आवाज़ें उठना शुरु हो गई हैं कि लेफ्ट फ्रंट को साथ लेकर सरकार बनाई जानी चाहिए। इसी के साथ तीसरे मोर्चे, वैकल्पिक मोर्चे या सेक्यूलर सरकार बनाने के लिए खिचड़ी पकाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है।

ऐसी कोई भी सरकार बिना कांग्रेस या बीजेपी के समर्थन के नहीं बन सकती। जहां तक बीजेपी का प्रश्न है, उसकी रणनीति स्पष्ट है- अगर उसे सरकार बनानी है तो नरेंद्र मोदी के ही नेतृत्व में बनानी है नहीं तो नहीं बनानी है। जबकि नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार दिख रही है। वरना कोई कारण नहीं कि ऐन चुनावों के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तीसरे मोर्चे या सेक्यूलर सरकार के गीत गाने लगे।

पहला बयान महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण का आया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अगली सरकार बनाने के लिए तीसरे मोर्चे के साथ हाथ मिलाएगी। फिर बयान आया विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार बनाने के लिए या तो तीसरे मोर्चे का समर्थन ले सकती है या फिर उसे समर्थन दे सकती है। शनिवार को ही सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने मिलती-जुलती बात कही। उन्होंने ये इशारा तक दे दिया कि उनकी पार्टी ऐसी किसी सरकार में शामिल भी हो सकती है।

जिस तीसरे मोर्चे की बात बार-बार कही जा रही है उसमें मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, एम करुणानिधि, लेफ्ट फ्रंट, जगनमोहन रेड्डी, के सी चंद्रशेखर राव, शरद पवार जैसों के नाम लिए जाते हैं। जयललिता, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक का क्षेत्रीय फ्रंट या वैकल्पिक मोर्चा भी बीच-बीच में ज़ोर मारता दिखता है। जबकि मायावती के बारे कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता।

जाहिर है जब तक लोक सभा चुनाव के परिणाम नहीं आते, ये सब बातें सिर्फ काल्पनिक ही हैं। लेकिन अभी तक के जनमत सर्वेक्षण अगर सच होते हैं तो ऐसे में तीसरे मोर्चे की या तीसरे मोर्चे की मदद से कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना बहुत कम दिखाई देती है। एनडीए और यूपीए की सीटों में करीब सौ सीटों के अंतर की संभावना व्यक्त की जा रही है और एनडीए को 272 के जादुई आंकड़े के नज़दीक पहुँचता दिखाया जा रहा है। ऐसे में यूपीए के लिए तीसरे मोर्चे की पार्टियों को साथ लेकर भी सरकार बनाने की बात दूर की कौड़ी लगती है।

इसकी बड़ी वजह ये है कि ऐसी कोई सरकार बनने की संभावना कम है जिसमें ममता बनर्जी और लेफ्ट फ्रंट या जयललिता-करुणानिधि एक साथ हों। इसी तरह लालू-नीतीश या मुलायम-मायावती का साथ आना राजनीतिक रूप से असंभव ही लगता है। ये ज़रूर है कि मुलायम और मायावती दोनों ही यूपीए – दो को बाहर से समर्थन दे रहे हैं। लेकिन उसकी वजह ये है कि दोनों ही एक-दूसरे को सरकार से बाहर रखना चाहते हैं। ये मानना कि जिस सरकार में उनमें से कोई एक शामिल हो, उसे दूसरा समर्थन देगा, वास्तविकता से परे है।

महत्वपूर्ण बात ये है कि तीसरे या वैकल्पिक मोर्चे की संभावित पार्टियों में सिर्फ जयललिता, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक के ही अच्छे प्रदर्शन की संभावना व्यक्त की जा रही है। जबकि मुलायम सिंह यादव और मायावती दोनों ही उत्तर प्रदेश में बीजेपी से पीछे बताए जा रहे हैं। हर चुनाव में तीसरे मोर्चे की सरकार की बात करने वाले और उसकी धुरी बनने वाले लेफ्ट फ्रंट की अपनी हालत पतली है। ऐसे में सवाल ये है कि यूपीए का साथ लेकर भी ये मोर्चा बहुमत के आंकड़े तक किस तरह पहुँच पाएगा?


जिस सीपीएम ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर यूपीए एक सरकार से समर्थन वापस लिया था वो न सिर्फ कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के लिए इच्छुक दिख रही है बल्कि सरकार में शामिल होने का संकेत भी दे रही है। इसी तरह, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को चुनाव के बाद बनने वाली तस्वीर डराने लगी है और वो चुनावों के बीच ही तीसरे मोर्चे की बात करने लगे हैं। इसमें शक नहीं है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए कई ऐसी पार्टियां साथ आ सकती हैं जो एक-दूसरे के खिलाफ ही चुनाव लड़ रही हैं। ऐसी किसी भी सरकार के स्थायित्व को लेकर सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। पर ये भी तय है कि अगर एनडीए बहुमत से दूर रहकर ममता, जयललिता, मायावती या नवीन पटनायक के समर्थन का मोहताज रहता है तो उसकी सरकार की उम्र पाँच साल होगी या नहीं, ये कह पाना मुश्किल होगा। वैसे इस चुनाव में मतदान का बढ़ा प्रतिशत शायद ये गवाही दे रहा है कि जनता स्थायी सरकार के पक्ष में ही है। 

Saturday, 26 April 2014

दिल्ली वाया पूर्वांचल


भीड़ पचास हज़ार थी, एक लाख या तीन लाख? लोग स्थानीय थे या बाहरी? लोग आए थे या लाए गए थे? इन तमाम सवालों पर लोग अपनी-अपनी आस्था, विश्वास और विचारधारा के हिसाब से चाहे बहस करते रहें। लेकिन भीड़ के मिजाज़ को समझना ज़्यादा ज़रूरी है। बनारस की सड़कों पर गुरुवार को उमड़ा भगवा सैलाब देश के सबसे बड़े राज्य में बने एक अलग किस्म के चुनावी माहौल की ओर इशारा कर रहा है। इसे नज़रअंदाज़ कर राज्य की चुनावी तस्वीर की समीक्षा करना बेमानी होगा।

इससे दो दिन पहले मुलायम सिंह यादव भी आज़मगढ़ में पर्चा भरने पहुँचे थे। शहर में घुसने के बाद उनकी रैली तक पहुँचने में दो घंटे लग गए थे क्योंकि सड़कें गाड़ियों से भरी हुई थीं। उसी दिन बीजेपी के उम्मीदवार रमाकांत यादव भी पर्चा भर रहे थे। सड़कों पर जितनी संख्या मुलायम सिंह यादव के समर्थकों की थी करीब उतनी ही बीजेपी के समर्थकों की भी थी और सड़कों पर रेंगती गाड़ियां सपा और भाजपा के झंडों से पटी हुई थीं। स्थानीय आईटीआई कॉलेज में हुई मुलायम की सभा में मैदान भरा हुआ था। सभा खत्म होने के बाद शहर से निकलने में काफी वक्त लगा क्योंकि सभा में आए लोगों के छंटने का सिलसिला काफी देर तक चलता रहा।

इसके उलट बनारस में मोदी का रोड शो खत्म होने के साथ ही सड़कों पर उमड़ी भीड़ छंटती चली गई। चिलचिलाती धूप में सड़कों पर निकले और घंटों से मोदी का इंतज़ार कर रहे लोग उनके निकलते ही अपने-अपने ठिकानों की ओर निकल लिए और सड़कें खाली होती चली गईं। ऐसा तभी होता है जब शहर के बाहर से बसों-ट्रैक्टरों में भीड़ न लाई जाए क्योंकि आस-पास से आई भीड़ के वापस जाने पर सड़कों पर वैसी ही रेलमपेल होती है जैसी उनके शहर में घुसने के वक्त दिखती है।

मोदी के रोड शो में आए लोगों के उन्माद और मोदी के प्रति उनके आकर्षण को समझना बेहद ज़रूरी है। जिस पूर्वांचल में बनारस, गोरखपुर, बांसगांव और आज़मगढ़ को छोड़ बीजेपी बाकी 29 सीटों में सब दूर साफ है, वहां मोदी के प्रति इस तरह का उत्साह यहां बदली हवा का एहसास करा रहा है। ऐसा लग रहा है कि बनारस से मोदी को उतार पूर्वी उत्तर प्रदेश और सटी हुई बिहार की सीटों पर बीजेपी के पक्ष में माहौल खड़ा करने की पार्टी की रणनीति काम करती हुई दिखाई दे रही है। निश्चित तौर पर गुरुवार को हुए मोदी के रोड शो और टेलीविज़न पर इसके लगातार प्रसारण ने इस माहौल को बनाने में और ज़्यादा मदद की है।

ये वही इलाका है जहां उम्मीदवारों के चयन में बीजेपी ने सबसे ज़्यादा ग़लतियां की हैं और उसे तगड़ा विरोध झेलना पड़ा है जबकि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह इसी इलाके से आते हैं। यहां उस तरह का ध्रुवीकरण देखने को नहीं मिला है जैसा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिखा। हालांकि मुलायम सिंह यादव के आज़मगढ़ और नरेंद्र मोदी के बनारस से चुनाव मैदान में उतरने से कुछ-कुछ वैसा ही माहौल बनता दिख रहा है। मोदी ने पर्चा भरने के साथ ही गंगा मां का जिक्र किया तो वहीं मुलायम मुसलमानों के लिए उठाए गए कदमों का ही हवाला देते रहे।

बीजेपी इस इलाके में कमज़ोर है। जबकि यहां मजबूत हुए बिना उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में सीटें जीतने का उसका मंसूबा पूरा नहीं हो सकता। पार्टी को उम्मीद थी कि मोदी के करिश्मे का फायदा उसे पूर्वांचल में मिलेगा। लेकिन फिलहाल बनारस और गोरखपुर को छोड़ किसी सीट पर वो मजबूत स्थिति में नहीं दिखती। पास की चंदौली, भदोही, जौनपुर, मछलीशहर, आज़मगढ़, रॉबर्ट्सगंज, बलिया और घोसी सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार कांटे की टक्कर में उलझे हैं। इनमें से कुछ सीटों पर तो बीजेपी उम्मीदवार पहले तीन स्थानों पर भी नहीं दिखाई देते। जबकि सपा-बसपा फिलहाल मजबूत स्थिति बनाए हुए हैं और कांग्रेस मुकाबले से बाहर होती जा रही है।

बाकी उत्तर प्रदेश की ही तरह यहां भी जातिगत समीकरणों को साधे बिना चुनावी कामयाबी की कल्पना नहीं की जा सकती है। बीजेपी को उम्मीद है कि मोदी के नाम से जाति की दीवारें टूटेंगी। पार्टी के रणनीतिकार अमित शाह की कोशिश गैर यादव पिछड़े और अगड़े वोटों को पार्टी के पाले में लाने की है। बीजेपी जातिगत समीकरणों को दुरुस्त करने में पीछे नहीं है। अपना दल से समझौता इसी रणनीति के तहत किया गया है।


गुरुवार को बनारस में हुए मोदी के रोड शो के बाद से हालात तेज़ी से बदले हैं। बीजेपी अब लोक सभा चुनाव के अंतिम दौर में सात और 12 मई को होने वाले मतदान के लिए इस इलाके पर पूरा ज़ोर लगाएगी। नरेंद्र मोदी पूरे वक्त इसी इलाके में घूमते नज़र आएंगे। अमित शाह कहते भी हैं कि दिल्ली का रास्ता पूर्वांचल हो कर जाता है। और मोदी दिल्ली पहुँचेगे या नहीं, ये तय करने में ये इलाका एक बड़ी भूमिका निभाएगा।

Tuesday, 22 April 2014

'बेटा बन गया, मुझे भी कुछ बनाओ'

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने आज आज़मगढ़ से भी पर्चा भर दिया। वो मैनपुरी से भी चुनाव लड़ रहे हैं। मुलायम ने लोगों से कहा कि उनके बेटे को तो मुख्यमंत्री बना दिया अब उन्हें भी दिल्ली में कुछ बना दिया जाए। लोगों के हुजूम के साथ मुलायम सिंह यादव ने पहले पर्चा भरा, फिर सड़क पर निकले और बाद में बड़ी सभा को संबोधित किया।


पूर्वी उत्तर प्रदेश में बनारस से सटे आज़मगढ़ में मुलायम मोदी के असर को काटने के लिए मैदान में उतरे हैं। बनारस से लड़ रहेे मोदी पर उनके तीखे हमले हैं। लोगों से अपील कर रहे हैं कि उन्हें भी कुछ बना दिया जाए। वो अपना भाषण खत्म कर चुके थे। अचानक फिर माइक सम्भाला और अपने लिए लोगों से माँगा। वो कहते हैं युवा को सीएम बना दिया। मुझे भी कुछ बना दो। दिल्ली में बना दो। बिना समाजवादी पार्टी के सरकार न बन सके।

यानी मुलायम अब भी इस उम्मीद में हैं कि जोड़-तोड़ से तीसरे मोर्चे की सरकार बन सके और प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना पूरा हो सके। दिलचस्प बात ये है कि अपने भाषण में उन्होंने कई बार नरेंद्र मोदी का नाम लेकर उन पर तीखे हमले किए। मुलायम के भाषण से पहले बोलने वाले हर नेता भी मोदी का ही नाम लेते रहे।


बीजेपी के रमाकांत यादव ने भी पर्चा भर दिया है। वो सपा-बसपा और बीजेपी तीनों ही दलों से यहाँ से सांसद रह चुके हैं। रमाकांत यादव कहते हैं कि पर्चा भरते वक़्त उनकी मुलाक़ात मुलायम से नहीं हुई। अगर मिलते को पैर छूकर वो उनका आशीर्वाद लेते। वो उन्हें पक्का आशीर्वाद भी देते कि विजयी भव:। मैं ज़रूर जीतूँगा।

आज़मगढ़ सीट पर मुस्लिम, यादव और दलित वोटों का दबदबा है। यादव वोट मुलायम और रमाकांत में बंट रहे हैं तो वहीं मुस्लिम वोटों पर मुलायम के अलावा बीएसपी और उलेमा कौंसिल के मुस्लिम उम्मीदवारों की नज़रें हैं। ऐसे में ग़ैर यादव पिछड़े और अगड़े वोटों की भूमिका अहम हो गई है जिन पर बीजेपी नरेंद्र मोदी का जादू चलाना चाहती है। ये पक्का है कि मुलायम सिंह यादव के लिए ये सीट आसान नहीं है और हार-जीत के अंतर पर सबकी नज़रें लगी हैं। 


Sunday, 20 April 2014

बिहटा 7.86



पटना पीछे छूट गया है। गाड़ी तेज़ी से बनारस की ओर भाग रही है। सड़क के दोनों ओर खेतों की हरियाली अब सोने में बदल चुकी है। गेहूं कटने लगा है। कई खेतों में कटाई के बाद ढेर लगा है। कुछ जगह अब भी कटाई का इंतज़ार है। सड़कों पर खाद के बोरों से लदे ट्रैक्टर-ट्राली दिखते हैं। ड्राइवर मंटू कुमार बताते हैं अब धान की तैयारी है। 

पहले बीज तैयार होंगे। एक कठ्ठा में दो बीघा खेत के लिए बीज लगाए जाएँगे। क़रीब पंद्रह दिन में तैयार हो जाएगी एक फ़ीट की पौध। उखाड़ कर खेत में रोपे जाएँगे। क़रीब एक फ़ीट पानी चाहिए। अभी ट्यूबवेल से काम चलेगा। फिर रहेगा बारिश का इंतज़ार जो जून के अंत में आएगी। 

बिहटा अभी दूर है। ठीक-ठीक कहें तो 7.86 किलोमीटर दूर। महमूदपुर में लगा ये मील पत्थर बरबस अपनी ओर ध्यान खींच लेता है। दूरी का इतना सटीक आँकड़ा शायद ही किसी दूसरे राज्य में सड़कों पर लिखा हो। बिहार में सड़कों पर दूरियाँ दशमलव के दाईं ओर भी दो अंकों में लिखने का प्रचलन है।

इसी मील पत्थर के सामने अजित अपनी झोंपड़ी के बाहर लकड़ी के पलंग पर लगी प्लस्टिक की चादर को पानी से साफ़ कर रहे हैं। पूछने पर बताते हैं मुशहर जाति के हैं। कमर के ऊपर कुछ नहीं पहना है। कहते हैं नीतीश, लालू, मोदी सबका नाम सुना है। कौन ज़्यादा पसंद है? इस पर चुप हो जाते हैं। पीछे चौखट पर दूधमुंहे बच्चे को गोदी में लिए बैठी उनकी पत्नी मुस्कुराती रहती हैं।

गाड़ी आगे निकलती है। गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज करने का दावा कर रहे हैं हकीम एस समीर। दीवार पर ही धातु रोग का भी इलाज हो रहा है। उनसे टक्कर लेता सीमेंट का इश्तिहार। पढ़ना शुरू ही करते हैं कि कोक पीने का निमंत्रण भी मिल जाता है। खेतों में पसरी काग़ज़ मिल चिमनी से धुँआँ उगल रही है। ये शायद नीतीश कुमार के नए बिहार का इश्तिहार है।

सियासत की बात शुरू होते ही बिहटा 7.86 मील पत्थर फिर ज़हन में आ जाता है। 786- भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों के लिए एक पवित्र अंक बिसमिल्ला ए रहमान ए रहीम। 


ध्यान जाता है बिहार में मुस्लिम वोटों  के लिए मची होड़ की तरफ़। बगल में पड़े अख़बार में मोदी के हवाले से सुर्खी है- बिहार में बीजेपी विरोधी नापाक गठबंधन। किशनगंज में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार के समर्थन में जेडीयू के मुस्लिम उम्मीदवार का मैदान से हटना। मोदी इस पर निशाना साध रहे हैं। बगल में गिरिराज सिंह का विवादास्पद बयान उनका मुँह चिढ़ा रहा है जिसमें वो कहते हैं जो मोदी का विरोध कर रहे हैं वो पाकिस्तान चले जाएँ।

राज्य में तीसरे दौर के मतदान से पहले मुस्लिम वोटों का लालू प्रसाद के पीछे लामबंद होना बीजेपी के लिए परेशानी पैदा कर रहा है। जिस जवाबी हिंदू ध्रुवीकरण के उसे उम्मीद थी, वैसा नहीं हो पा रहा क्योंकि जहाँ यादव लालू के पीछे चट्टान की तरह खड़े हैं वहीं कई ग़ैर यादव पिछड़े उम्मीदवार की जाति देख कर पसंद तय कर रहे हैं। अगड़े पूरी तरह से मोदी के पक्ष में आ गए हैं। रामविलास पासवान से हुए गठबंधन का फ़ायदा बीजेपी-एलजेपी दोनों को मिल रहा है। नरेंद्र मोदी के नाम का फ़ायदा पहले दो दौर के मतदान में बीजेपी को मिला है।

नीतीश कुमार का डिब्बा गोल हो गया है। मोदी को रोकने की कोशिश में शायद स्थानीय स्तर पर कोशिश है कि मुस्लिम वोट न बंटे। सारण में जेडीयू का मुस्लिम उम्मीदवार निष्क्रिय है ताकि क़रीब एक लाख मुस्लिम न बँटे और राबड़ी देवी को मिल सकें। लेकिन मोदी को रोकने के चक्कर में नीतीश अपने पुराने विरोधी लालू प्रसाद को दोबारा मज़बूत करते दिख रहे हैं। शायद इस उम्मीद में कि लालू के उभार से आशंकित अगड़े विधानसभा चुनाव में बीजेपी को छोड़ उनके साथ आ सकें। 

राजनीति में जो दिखता है, वैसा होता नहीं। जो होता है, वो होने के बाद दिखता है। बिहार में कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा है। नीतीश पीछे हैं इस पर सब सहमत हैं। बीजेपी-पासवान आगे हैं, ये भी कई लोग मानते हैं। पर लालू कहाँ से शुरू करेंगे और कहाँ रुकेंगे, इस पर अभी आम राय नहीं है। 

Friday, 18 April 2014

तीन देवियों से मोदी की टक्कर


वो अगर तूफान के पहले की खामोशी थी तो तूफान आने के बाद एहसास हुआ कि उस खामोशी के पीछे क्या राज़ था। बात तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता की हो रही है जिन्होंने आखिरकार नरेंद्र मोदी और गुजरात के विकास मॉडल पर अपनी चुप्पी तोड़ ही दी। इसी तरह, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी मोदी पर तीखे हमले बोलने शुरू कर दिए हैं। राजनीति की तीन देवियों के नाम से मशहूर इन तीनों ही कद्दावर महिला नेताओं ने मोदी पर निशाना साध कर इन अटकलों को विराम देने की कोशिश की है कि चुनाव के बाद वो बीजेपी के साथ जा सकती हैं। लेकिन क्या वाकई ऐसा है?

एआईएडीएमके सुप्रीमो, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता और नरेंद्र मोदी की मित्रता जगजाहिर है। बल्कि गुजरात दंगों के बाद से राजनीति में अलग-थलग पड़े और विपक्षी पार्टियों के हमले झेलते रहे नरेंद्र मोदी की तरफ शिवसेना और अकाली दल के अलावा अगर किसी ने हाथ बढ़ाया तो वो जयललिता ही थीं। हिंदुत्व के मुद्दों पर जयललिता बीजेपी के बेहद करीब हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि हिंदुत्व के पोस्टर बॉय नरेंद्र मोदी और जयललिता के संबंध मधुर हों। ये नज़दीकियां तब भी स्पष्ट होती रहीं जब दोनों ही नेता एक-दूसरे को चुनावी जीत पर बधाई देते रहे। 2011 में जयललिता के शपथ ग्रहण समारोह में मोदी ने हिस्सा लिया। जबकि 2012 में मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में जयललिता ने अपना नुमाइंदा भेजा। ये माना गया कि एनडीए के विस्तार में सबसे पहले कोई अगर बीजेपी के साथ आएगा तो वो जयललिता ही होंगी। पर ऐसा हुआ नहीं।

अब नरेंद्र मोदी तमिलनाडु में घूम-घूम कर प्रचार कर रहे हैं। मोदी के प्रति राज्य में समर्थन बढ़ रहा है। बीजेपी ने पाँच पार्टियों के साथ तीसरा मोर्चा बना कर राज्य में एआईएडीएमके-डीएमके की परंपरागत लड़ाई में अपनी जगह बनाने की कोशिश की है। डीएमडीके के विजयकांत जैसे मजबूत सहयोगी के साथ बीजेपी गठबंधन राज्य में तीसरे विकल्प के रूप में उभरता दिख रहा है। इसीलिए जयललिता ने मोदी पर हमला बोला है। ऐसा कर वो मुस्लिम वोटों को अपने साथ लेना चाहती हैं। इसी के लिए शायद उन्होंने न तो बीजेपी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया और न ही इस बारे में कोई संकेत दिया। ये ज़रूर है कि लेफ्ट पार्टियों के साथ गठबंधन तोड़ कर उन्होंने भविष्य के लिए अपने विकल्प खुले रखे हैं। ममता बनर्जी के साथ उनकी दोस्ती मजबूत हो रही है। शायद किसी एक गठबंधन को बहुमत न मिलने की सूरत में वैकल्पिक मोर्चे के नेता के रूप में प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को बल देने के लिए भी ये उनके लिए जरूरी है।

पश्चिम बंगाल में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। ममता बनर्जी वाजपेयी सरकार में शामिल रह चुकी हैं। राज्य में उनकी विरोधी लेफ्ट पार्टियां कहती हैं कि चुनाव के बाद ममता मोदी के साथ जा सकती हैं। जयललिता की ही तरह ममता को भी मुस्लिम वोटों की चिंता है। राज्य के मतदाताओं में मोदी के प्रति उत्सुकता देखने को मिली है। एक आकलन के मुताबिक अगर बीजेपी को मिले वोटों का प्रतिशत 20 से ऊपर जाता है तो ऐसे में वो तृणमूल कांग्रेस को जबर्दस्त नुकसान पहुँचा सकती है। शायद यही वजह है कि ममता को मोदी पर खुल कर हमला बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

जबकि मायावती की रणनीति बेहद दिलचस्प और रहस्यात्मक है। राजनीतिक जानकार हैरान हैं कि उत्तर प्रदेश में मायावती मोदी पर उस तीखे अंदाज़ में हमले क्यों नहीं कर रही हैं जिसके लिए वो जानी जाती हैं। कांग्रेस के साथ बीएसपी का गठबंधन न होना, उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए सबसे अच्छी खबर रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए मतदान के बाद बीजेपी ये दावा भी कर रही है कि वहां परंपरागत रूप से मायावती का समर्थन करने वाले जाटव वोट बैंक में भी उसे सेंध लगाने में कामयाबी मिली है। मायावती का खुद लोक सभा चुनाव न लड़ना भी कई सवाल खड़े कर रहा है। बीजेपी चाहे सार्वजनिक रूप से कहे कि राज्य में उसका प्रमुख मुकाबला समाजवादी पार्टी नहीं बल्कि बीएसपी से है, लेकिन ज़मीन पर ऐसा होता दिख नहीं रहा है। जमीन पर सपा ही बीजेपी का मुकाबला करती दिख रही है और इसीलिए मुस्लिम वोट ध्रुवीकृत होने के बजाए बंटते दिख रहे हैं। हालांकि मुस्लिम मतदाताओं को आश्वस्त करने के लिए मायावती कहती रही हैं कि चुनाव के बाद बीजेपी के साथ गठबंधन करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

ममता, मायावती और जयललिता के ये तेवर चुनाव से पहले के हैं। राजनीति में न तो कोई स्थाई शत्रु होता है और न ही मित्र। ये मानने का कोई कारण नहीं है कि अगर एनडीए बहुमत से दूर रहता है और इसे 272 के जादुई आंकड़े तक पहुँचने के लिए समर्थन की दरकार होगी तो वो इन्हीं तीन ताकतवर महिला नेताओं की ओर देखेगा। पर शायद सरकार के स्थायित्व को सुनिश्चित करने की ये कवायद कारगर साबित न हो। खासतौर से वाजपेयी सरकार के दौरान इन तीनों ही नेताओं के रवैये को देखते हुए। लेकिन ये तय है कि ऐसे हालात बनने पर इनकी एक बड़ी भूमिका जरूर होगी।


Thursday, 17 April 2014

राज (नाथ) की टोपी, मोदी का राज (तिलक)?


चुनावी चर्चा में इन दिनों एक शब्द जो उछल-उछल कर जुबान पर आ रहा है वो है टोपी। बात परंपरागत मुस्लिम टोपी की हो रही है। सितंबर 2011 में अपने सद्भावना मिशन के दौरान नरेंद्र मोदी ने इसे पहनने से इनकार कर दिया था। अब एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने फिर कहा है कि तुष्टिकरण के प्रतीकों के प्रचलन में उन्हें विश्वास नहीं है। जबकि बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह की ऐसी ही टोपी पहने एक तस्वीर इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। बीजेपी से रिश्ते तोड़ने से पहले नीतीश कुमार ने ये कह कर मोदी पर हमला किया था कि देश की परंपरा ऐसी है कि इसमें टोपी भी पहननी पड़ती है और टीका भी लगाना पड़ता है।

देश की राजनीति का जैसा स्वरूप हो गया है उसमें टोपी, तिलक, पगड़ी या हैट सब पहनने या न पहनने के अपने सांकेतिक महत्व बनाए जा रहे हैं। इफ्तार की राजनीति से चला ये प्रचलन धीरे-धीरे तुष्टिकरण के प्रतीकों में शामिल होता जा रहा है। नब्बे के दशक में अचानक दिल्ली के लुटियन ज़ोन में आई इफ्तार पार्टियों की बाढ़ ने देश की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक और सियासत में उनकी भूमिका को फिर सेंटर स्टेज पर ला दिया। किस नेता के घर इफ्तार पार्टी है और कौन-कौन इसमें शामिल हो रहा है, ये सियासी गलियारों में चर्चा का बड़ा विषय बनने लगा। टोपी लगा कर फोटो खिंचाने और फिर इसे छपवाने की परंपरा भी ऐसी इफ्तार पार्टियों से ही ज़्यादा प्रचलन में आई है। इसमें कोई नेता न तो पीछे रहा और न ही रहना चाहता है।

बीजेपी में शुरू से ही उदार छवि के नेता माने जाते रहे अटल बिहारी वाजपेयी भी इसमें कभी पीछे नहीं रहे। बतौर प्रधानमंत्री वाजपेयी हमेशा ऐसी इफ्तार पार्टियों में गए और टोपियां लगा कर फोटो खिंचवाए। ये अलग बात है कि तत्कालीन मंत्री शहनवाज़ हुसैन की एक ऐसी ही इफ्तार पार्टी में उन्होंने अयोध्या में जन्मभूमि पर राम मंदिर और बाबरी मस्जिद कहीं और बनाने की बात कह कर सियासी हंगामा खड़ा कर दिया था। 2004 के लोक सभा चुनाव में फील गुड और इंडिया शाइनिंग पर सवार बीजेपी ने इसी प्रतीकात्मक और जिसे कि मोदी तुष्टिकरण की राजनीति कहते हैं, को आगे बढ़ाते हुए वाजपेयी की प्रचार सामग्री में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ से मिलते हुए उनके फोटो भी लगा दिए थे। जिसे लेकर आरएसएस के कई नेताओं ने मुंह बनाए थे।

लेकिन आरएसएस राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के ज़रिए मुसलमानों को अपने करीब लाने की कोशिश भी करती रही है। ये 2004 चुनाव के पहले से चला आ रहा है। इसका जिम्मा संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश को दिया गया है जिन पर अजमेर धमाकों में शामिल होने के आरोप लगाए गए और पूछताछ भी की गई। इसी राष्ट्रीय मुसलिम मंच के हाल ही में दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम में बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मुस्लिमों से माफी मांगने की बात कही थी। इसे 2002 के गुजरात दंगों से जोड़ कर देखा गया और ये भी माना गया कि राजनाथ खुद को उदारवादी नेता के रूप में पेश करने के लिए ये बात कर रहे हैं। बाद में पार्टी ने सफाई दे कर राजनाथ के बयान को रफा-दफा किया।

वही राजनाथ अब टोपी लगा कर फोटो खिंचवा रहे हैं। लखनऊ में शिया संप्रदाय के धर्मगुरुओं से मिल रहे हैं। इसके बाद शिया नेताओं के बयानों में राजनाथ को वाजपेयी के साथ खड़ा किया जाता है और कहा जाता है कि मुसलमानों को मोदी से डर लगता है। ये महज संयोग नहीं है कि राजनाथ सिंह ने गाजियाबाद सीट छोड़ कर लखनऊ सीट चुनी। वो लखनऊ सीट जो अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान बन गई है और बीजेपी में उनकी विरासत का प्रतीक। पर्चा भरने से पहले राजनाथ वाजपेयी का आशीर्वाद लेते हैं और उनका दिया अंग वस्त्र पहन कर पर्चा भरते हैं। जबकि गाजियाबाद सीट पर बीजेपी की हालत उतनी खराब नहीं थी जितनी कि राजनाथ सिंह के समर्थक बताते हैं।

जाहिर है राजनाथ का वाजपेयी की सीट से चुनाव लड़ना, शिया धर्म गुरुओं का राजनाथ को वाजपेयी जैसा बताना और इससे पहले राजनाथ का गलतियों के लिए मुसलमानों से माफी मांगने की बात करना, इस बात की ओर इशारा करता है कि किस तरह राजनाथ खुद की अटल बिहारी वाजपेयी जैसी उदारवादी छवि पेश करने की कोशिश में लगे हैं। दिलचस्प बात ये है कि जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जामा मस्जिद के शाही इमाम से मुलाकात की थी तब राजनाथ सिंह ने उन पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया था।

लाल कृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति में एक बात के लिए हमेशा याद रखे जाएंगे। राम मंदिर के लिए उनकी रथ यात्रा से बीजेपी को ज़बर्दस्त समर्थन मिला और पार्टी की ताकत में अभूतपूर्व इज़ाफ़ा हुआ। लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए अपने बजाए अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आगे बढ़ाया क्योंकि वाजपेयी ने राम मंदिर आंदोलन से दूर रह कर अपनी उदारवादी छवि को बनाए रखा था और उन्हीं के नाम पर बीजेपी नए सहयोगियों को जोड़ सत्ता में आ सकती थी। क्या फिर ऐसा ही हो सकता है?


चाहे जनमत सर्वेक्षणों में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलने की बात कही जा रही हो लेकिन बीजेपी में कई नेताओं को अब भी उम्मीद है कि अगर ऐसा न हो पाए तो शायद मोदी के बजाए किसी दूसरे नेता के नाम पर नए सहयोगियों को साथ लेकर सरकार बनाई जा सकती है। लेकिन वो शायद भूल जाते हैं कि हिंदुत्व के पोस्टर बॉय की अपनी छवि पर मोदी ने अब विकास का चोला भी ओढ़ लिया है। मोदी चाहे वाजपेयी जैसी छवि अभी न बना पाए हों लेकिन उनके रहते किसी दूसरे नेता को मौका मिल सके, इसकी संभावना न के बराबर है। इसलिए अभी चाहे कोई टोपी लगाए या फिर टीका, 16 मई को किसका राज तिलक होगा, ये देखना अभी बाकी है।

Wednesday, 16 April 2014

गुरु की नगरी में कांटे की टक्कर


 बीजेपी के शीर्ष नेताओं में से एक और पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी अरुण जेटली अमृतसर में अपने पहले लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से कांटे की टक्कर में उलझे हुए हैं। राजनीति के इन दो महारथियों की टक्कर पर सबकी नज़रें लगी हैं और इस चुनाव में बनारस, लखनऊ, अमेठी की ही तरह अमृतसर सीट पर लड़ाई भी बेहद दिलचस्प हो गई है।

वैसे अमृतसर सीट पारंपरिक रूप से कांग्रेस के पाले में रही है। लेकिन 2004 से बीजेपी के नवजोत सिंह सिद्धू लगातार यहां से जीतते आ रहे हैं। पर राज्य में बीजेपी की सहयोगी पार्टी अकाली दल से उनकी पटरी नहीं बैठ पा रही है। लिहाज़ा इस बार बीजेपी ने सिद्धू के बजाए अरुण जेटली को चुनाव मैदान में उतारा है। अकालियों से नाराज़ सिदधू अपने चुनाव क्षेत्र में प्रचार भी नहीं कर रहे हैं। जबकि जेटली से उनके बेहद अच्छे व्यक्तिगत संबंध हैं। हालांकि अमृतसर से ही बीजेपी की विधायक उनकी पत्नी नवजोत कौर ज़रूर जेटली के लिए वोट मांग रही हैं।

वैसे जेटली को चुनाव लड़ने के लिए कई सीटों का सुझाव दिया गया था जिनमें जम्मू, नई दिल्ली और जयपुर जैसी सीटें शामिल हैं। मगर अकाली दल के मुखिया सरदार प्रकाश सिंह बादल के व्यक्तिगत अनुरोध के चलते जेटली ने अमृतसर से चुनाव लड़ने का फैसला किया। उनकी जड़ें पंजाब में ही हैं और इसीलिए वो खुद को बाहरी उम्मीदवार बताने वाले कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हैं। जेटली के लिए अमृतसर सीट पर जीत तय मानी जा रही थी लेकिन तभी कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को यहां से चुनाव मैदान में उतार दिया।

खुद कैप्टन अमृतसर से चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे। वो ज़्यादा वक्त अपने क्षेत्र पटियाला में देना चाहते थे। जहां से उनकी पत्नी लोक सभा का चुनाव लड़ रही हैं। लेकिन कांग्रेस की रणनीति जेटली को अमृतसर में ही घेरने के रही इसलिए खुद सोनिया गांधी के कहने पर कैप्टन वहां से चुनाव लड़ने को तैयार हुए हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुकाबले में उतरने से अमृतसर की लड़ाई कांटे की हो गई क्योंकि वो जेटली के साथ-साथ अपने परंपरागत विरोधी अकाली दल पर भी निशाना साध रहे हैं।

इसीलिए अमृतसर का चुनाव जेटली के साथ ही अकाली दल की प्रतिष्ठा से भी जुड़ गया है। इस लोक सभा सीट की नौ विधानसभा सीटों में से छह बीजेपी-अकाली गठबंधन के पास है। ग्रामीण इलाकों पर अकाली दल की जबर्दस्त पकड़ है। वहां की चार विधानसभा सीटों में से तीन अकाली दल के पास है। जबकि शहर की छह में से दो बीजेपी और एक अकाली दल के पास है। अकाली दल का समर्थन मिलने से ग्रामीण इलाकों में जेटली को बढ़त मिलने की संभावना है। जबकि शहरी इलाकों में इस बढ़त को बनाए रखना उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती है। शहरों में अकाली दल के प्रति नाराजगी साफ दिखाई दे रही है क्योंकि लोग बुनियादी सुविधाएं न मिलने और टैक्स बढ़ाए जाने से नाराज हैं।

जबकि जेटली की ही तरह कैप्टन अमरिंदर सिंह भी बाहरी होने के आरोपों को झेल रहे हैं। शहरों में अकाली दल के प्रति गुस्से का फायदा चाहे उन्हें मिल रहा है लेकिन महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर यूपीए सरकार के प्रति नाराजगी भी उन्हें भारी पड़ रही है। कैप्टन पर ये भी आरोप लगता है कि राजा-महाराजा वाली उनकी पृष्ठभूमि उन्हें आम लोगों से घुलने-मिलने से दूर रखती है। उम्मीदवार घोषित होने के बाद से कैप्टन ज़्यादा वक्त अमृतसर में नहीं गुजारा है जबकि जेटली ने बाहरी उम्मीदवार का ठप्पा मिटाने के लिए अमृतसर में ही घर भी खरीद लिया है और वो यहां खूँटा गाड़ कर बैठ गए हैं।

बीजेपी नरेंद्र मोदी के करिश्मे का फायदा भी अमृतसर के शहरी इलाकों में उठाना चाह रही है। अभी तक मोदी ने पंजाब में सिर्फ एक ही चुनावी रैली की है। 24 अप्रैल को वो अमृतसर में जेटली के समर्थन में रैली करेंगे। बीजेपी को भरोसा है कि उसके बाद शहरी इलाकों में मतदाता जेटली के समर्थन में जुटेंगे। संभावित एनडीए सरकार में जेटली को बड़ी जिम्मेदारी मिलने की बात कह कर भी अकाली दल और बीजेपी के नेता उनके पक्ष में वोट मांग रहे हैं। बीजेपी में जेटली का बड़ा कद उनके पक्ष में जा रहा है। जबकि गुजरात में सिख किसानों के विस्थापन का मुद्दा उठा कर कैप्टन अमरिंदर इस लोक सभा सीट के पैंसठ फीसदी सिख मतदाताओं को अपने पाले में लाने में जुटे हैं।

इस तरह अमृतसर सीट पर दो सरकारों के विरोध का रुझान दिख रहा है। केंद्र की कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और राज्य की अकाली दल-बीजेपी सरकार के कामकाज के खिलाफ। यही रुझान जेटली और कैप्टन दोनों की चुनौतियां बढ़ा रहा है क्योंकि इसके चलते मतदाताओं का मूड भांपने में दिक्कत हो रही है। आम आदमी पार्टी ने जाने-माने स्थानीय नेत्र चिकित्सक डॉक्टर दलजीत सिंह को मैदान में खड़ा कर दिया है जो कांग्रेस और बीजेपी दोनों के वोटों में सेंध लगा रहे हैं। इसीलिए अमृतसर में दो दिग्गजों की ये लड़ाई बेहद दिलचस्प हो गई है।


Monday, 14 April 2014

एक और किताब बम

प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब से उठा विवाद अभी थमा भी नहीं है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाती एक और किताब बाज़ार में आ गई है। ये किताब कोयला मंत्रालय में सचिव रहे पी सी परख ने लिखी है। इस किताब में परख ने अरबों रुपए के कोयला घोटाले में कई गंभीर सवाल उठाए हैं। ऐन चुनाव के बीच आई ये दूसरी किताब यूपीए सरकार और कांग्रेस की परेशानियां बढ़ा सकती है क्योंकि बीजेपी बारू की किताब को लेकर पहले ही सोनिया गांधी पर हमलावर है।

परख की पुस्तक का नाम है क्रूसेडर ऑर कांस्पिरेटर? कोलगेट एंड अदर ट्रूथ्स। परख ने इस किताब में लिखा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कोयला खदानों का आवंटन नीलामी के ज़रिए करना चाहते थे। लेकिन इसे प्रधानमंत्री कार्यालय के ही कुछ अफसरों ने रोका। इसे रोकने में तत्कालीन कोयला मंत्री दसारी नारायण राव और शिबू सोरेन की भी भूमिका रही। इस बारे में फैसला तब तक रोक कर रखा गया जब तक परख रिटायर नहीं हो गए। और उसके बाद नीलामी के विचार को ही छोड़ दिया गया।

बारू की किताब की ही तरह परख की किताब भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर उनकी लाचारी के लिए निशाना साधती है। परख ने कहा है कि जब मंत्री ही प्रधानमंत्री को फैसला लेने से रोके तब ऐसे में प्रधानमंत्री को तय करना चाहिए था कि वो अपने पद पर बने रहें या फिर इस जिल्लत को बर्दाश्त न करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दे। परख के मुताबिक जिस सरकार में उनका कोई राजनीतिक दखल नहीं था उसके मुखिया बने रहने से मनमोहन सिंह की न सिर्फ टूजी और कोयला घोटाले से छवि खराब हुई बल्कि व्यक्तिगत ईमानदारी का उनका रिकार्ड भी दागदार हो गया।

परख की किताब भी मनमोहन सिंह के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाती है। बारू की किताब की ही तरह इसमें भी कहा गया है कि मनमोहन सिंह के पास अधिकार नहीं था बल्कि सत्ता के सूत्र कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों में रहे। ये वही आरोप हैं जो प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी पिछले कई साल से लगा रही है। 2009 के लोक सभा चुनाव में लाल कृष्ण आडवाणी ने मनमोहन सिंह के कमज़ोर प्रधानमंत्री होने का मुद्दा चुनाव में प्रमुखता से उठाया था। लेकिन तब इसे ज़्यादा तरज़ीह नहीं मिली थी और तब यूपीए की जीत का सेहरा मनमोहन सिंह के सिर ही बांधा गया था।

कांग्रेस की परेशानी ये है कि बारू और परख दोनों की किताबों में मनमोहन सिंह की छवि को बचाने और यूपीए की तमाम विफलताओं से उन्हें दूर करने की कोशिश की गई है। जबकि कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की कोशिश है कि यूपीए दो की असफलताओं की ज़िम्मेदारी मनमोहन सिंह पर डाल दी जाए। बदहाल अर्थ व्यवस्था, बेलगाम महंगाई और बेकाबू भ्रष्टाचार यूपीए के दूसरे कार्यकाल को सबसे ज्यादा परेशान करता रहा है। इस लोक सभा चुनाव में ये सब बड़े चुनावी मुद्दे बन कर उभरे भी हैं।

कांग्रेस ने अभी तक बारू के आरोपों को खारिज किया है। पार्टी का आरोप है कि बारू बीजेपी के इशारों पर खेल रहे हैं। पार्टी के प्रवक्ता तो यहां तक कह रहे हैं कि बारू की किताब के पीछे एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी हैं। लेकिन अब परख की किताब भी एक तरह से बारू के लगाए आरोपों को ही और आगे लेकर जा रही है। ऐसे में कांग्रेस के लिए इन आरोपों को सिरे से खारिज करना आसान नहीं होगा।

Sunday, 13 April 2014

‘कम बोला, काम बोला’, पर ये कौन बोला?


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके संजय बारू की किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर ने इन दिनों तहलका मचा रखा है। बारू ने प्रधानमंत्री कार्यालय में अपने संस्मरणों का ज़िक्र इस किताब में किया है। ये पुस्तक एक तरह से बीजेपी के उन आरोपों की पुष्टि करती है कि मनमोहन सिंह बेहद कमज़ोर प्रधानमंत्री थे और सत्ता का संचालन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों में था।

बारू इस पुस्तक में लिखते हैं कि मनमोहन सिंह ने खुद माना था कि सत्ता के दो केंद्र नहीं हो सकते। इसीलिए उन्होंने सारे फैसले लेने के अधिकार सोनिया गांधी को दे दिए। किताब में ये भी दावा किया गया है कि फैसले लेने से पहले कई महत्वपूर्ण फाइलें सोनिया गांधी को दिखाई जाती थीं। हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय और कांग्रेस ने बारू के दावों को खारिज कर दिया है। कांग्रेस का कहना है कि बारू ने अपनी किताब की बिक्री बढ़ाने के लिए ऐन चुनावों के बीच ये सनसनीखेज दावे किए हैं।
इससे पहले भी प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे पत्रकार अपने अनुभवों को किताबों के ज़रिए सामने रखते रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के मीडिया सलाहकार रहे एच वाय शारदा प्रसाद और लाल बहादुर शास्त्री के मीडिया सलाहकार रहे कुलदीप नैय्यर की पुस्तकें भी सामने आई हैं। लेकिन शायद इतना विवाद पहले कभी नहीं हुआ। बारू की पुस्तक में किए गए रहस्योद्घाटनों को एनडीए के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने हाथों-हाथ लिया है। उन्होंने इसके हवाले से सोनिया गांधी की चुप्पी पर सवाल उठाया है और बारू के दावे पर सफाई मांगी है कि वो सरकारी फाइलें देखती रही हैं।

सियासी गलियारों में बारू की किताब को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि इस किताब के ज़रिए बारू ने मनमोहन सिंह को यूपीए के दूसरे कार्यकाल की नाकामियों से दूर रखने की कोशिश की है। अभी तक होता यही आया है कि कांग्रेस पार्टी ने हर विवाद का ठीकरा मनमोहन सिंह के सिर फोड़ा तो वहीं हर कामयाबी का सेहरा सोनिया गांधी और राहुल गांधी के सिर बांधा। बारू के ये किताब ये साबित करने की कोशिश करती है कि तमाम विवादों में मनमोहन सिंह की सीधे तौर पर कोई भूमिका नहीं रही है। विवादास्पद नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल करने से लेकर अमेरिका के साथ परमाणु करार को लेकर कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह के बीच मतभेदों को भी इस पुस्तक में प्रमुखता से उठाया गया है।

दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह सत्ता के दो केंद्रों के प्रयोग के असफल होने की बात कह कर विवाद खड़ा कर चुके हैं। लेकिन बारू की ये किताब इस बात को सिरे से खारिज करती है। बारू साफ-साफ कहते हैं कि सत्ता का एक ही केंद्र है और वो है सोनिया गांधी। इस तरह से प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार और उनके बेहद करीबी रहे संजय बारू ने लोक सभा चुनावों के संभावित परिणामों के लिए राहुल गांधी-सोनिया गांधी के बजाए मनमोहन सिंह को ज़िम्मेदार ठहराने की कांग्रेस की कोशिशों पर अभी से पानी फेर दिया है।

बारू के किताब ऐसे वक्त आई है जब कोयला घोटाले की जांच की आंच प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुँच रही है। सीबीआई ने प्रधानमंत्री कार्यालय में पूर्व प्रमुख सचिव रहे और फिलहाल बतौर सलाहकार काम कर रहे टी के ए नायर से पूछताछ की है। मनमोहन सिंह के करीबियों को अंदेशा है कि अगर यूपीए की सत्ता में वापसी नहीं होती है तो कहीं ऐसा न हो कि मनमोहन सिंह को भी इस जांच के लपेटे में ले लिया जाए। शायद यही वजह है कि बारू की ये किताब कई महत्वपूर्ण और विवादास्पद फैसलों से मनमोहन सिंह की दूरी को रेखांकित करती है। इनमें 2009 में सरकार बनने पर टी आर बालू और ए राजा को मंत्रिमंडल में लेने के बारे में मनमोहन सिंह के विरोध का भी ज़िक्र है। जिसमें कहा गया है कि कैसे बालू को तो मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रिमंडल में आने से रोक लिया मगर कांग्रेस पार्टी के दबाव में ए राजा को मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा।

2009 में यूपीए की सत्ता में वापसी का श्रेय मनमोहन सिंह को दिया गया था। लेकिन यूपीए के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार, महंगाई, बिगड़ी अर्थ व्यवस्था का ठीकरा मनमोहन सिंह के सिर फोड़ने की तैयारी है। हालांकि मनमोहन सिंह कहते हैं कि उन्हें ये पूरी उम्मीद है कि इतिहास उनके साथ ज़्यादा सहानुभूतिपूर्वक ढंग से बर्ताव करेगा। लेकिन कई मंत्री खुले आम कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुल कर अपनी बात जनता तक पहुँचाने में नाकाम रहे हैं। इसके जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय ने नारा दिया था कम बोला, काम बोला। प्रधानमंत्री तो अब भी चुप हैं। मगर संजय बारू बोल रहे हैं और उनका बोलना कांग्रेस के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है।



Saturday, 12 April 2014

पटरी से उतरता कांग्रेस का अभियान?


कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी ही खींची लक्ष्मण रेखा शुक्रवार को पार कर ली। जम्मू के डोडा में एक चुनावी सभा में उन्होंने एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर पहली बार व्यक्तिगत हमला किया। राहुल ने मोदी का नाम लिए बगैर कहा कि उन्होंने बहुत से चुनाव लड़े हैं। लेकिन पहली बार लिखा है कि शादीशुदा हैं। पत्नी का नाम छिपाते हैं। लेकिन अपना पूरा जोर एक महिला की जासूसी में लगा देते हैं। जबकि खुद राहुल कुछ समय पहले तक अपनी पार्टी के लोगों से कहते रहे हैं कि विपक्षी नेताओं पर व्यक्तिगत हमले नहीं करने चाहिए।

शाम होते-होते कांग्रेस पार्टी ने इसी मुद्दे पर चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटा दिया। कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने आयोग से कहा कि मोदी ने अपने पुराने हलफनामों में वैवाहिक स्थिति छिपाई। इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए। इससे पहले कांग्रेस की वेबसाइट पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का फोटो लगा कर उनके मोदी को राज धर्म का पालन करने की नसीहत देने वाले बयान की याद दिलाई गई।

आखिर क्या वजह है कि हर चुनावी सभा में सूचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन का अधिकार देने की बात करने वाले राहुल के भाषणों का ज्यादातर हिस्सा अब मोदी पर हमलों में केंद्रित होने लगा है। क्या वजह है कि कांग्रेसी नेताओं की ज़्यादा दिलचस्पी मनरेगा और भूमि अधिग्रहण कानून के बजाय नरेंद्र मोदी के वैवाहिक जीवन में दिखाई देने लगी है। कांग्रेस के नेता यूपीए के दस साल के शासन की उपलब्धियों का बखान करने के बजाए इस बात पर ज़्यादा चिंता क्यों कर रहे हैं कि बीजेपी में लाल कृष्ण आडवाणी और जसवंत सिंह को उनका हक क्यों नहीं मिला?

लगता है कि इसके पीछे बड़ी वजह गुरुवार को हुए तीसरे दौर का मतदान है। जिन 91 सीटों पर गुरुवार को वोट पड़े उनमें 45 सीटें कांग्रेस के पास हैं जबकि बीजेपी के पास सिर्फ 13 और मतदान के बाद मिले फीडबैक ने सभी राजनीतिक दलों को हैरान कर दिया है। ऐसा लग रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार आदि राज्यों की जिन सीटों पर मतदान हुआ वहां ज़्यादातर लोगों ने कांग्रेस के खिलाफ और मोदी के समर्थन में वोट डाले हैं। कई सीटों पर लोगों ने ये जाने बिना कि बीजेपी का उम्मीदवार कौन है, सिर्फ उसके चुनाव चिन्ह पर यह कहते हुए वोट दिया है कि वो सीधे मोदी को वोट देना चाहते हैं। यानी इन सीटों पर 2009 के परिणाम उलटने की संभावना व्यक्त की जा रही है। यहां तक कि पश्चिमी उड़ीसा में भी बीजेपी को समर्थन मिलने की खबरें हैं। वहाँ बीजेपी ने कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए खुद को बीजेडी के बाद दूसरे नंबर पर खड़ा कर लिया है।

चुनाव से पहले आए तमाम जनमत सर्वेक्षणों में इस ओर इशारा किया जाता रहा लेकिन कांग्रेस इन्हें खारिज करती रही। मगर तीसरे दौर के मतदान के बाद ये संभावना ज़ोर पकड़ रही है कि कहीं कांग्रेस वाकई अपने अभी तक के सबसे खराब प्रदर्शन की तरफ तो नहीं बढ़ रही है। इससे पहले कांग्रेस को 1999 में सबसे कम 114 लोक सभा सीटें आई थीं। इससे भी कम होने का मतलब होगा उसकी प्रासंगिकता पर सवालिया निशाना लगना। ये व्यक्तिगत तौर पर राहुल गांधी के लिए भी एक बहुत बड़ा झटका होगा क्योंकि कांग्रेस ये चुनाव उन्हें ही आगे रख कर लड़ रही है। 2009 के चुनाव में मनमोहन सिंह कांग्रेस का चेहरा थे। लेकिन इस बार राहुल गांधी ही कांग्रेस का चेहरा हैं और ये स्पष्ट है कि कांग्रेस की नाकामी का ठीकरा उन्हीं के सिर फूटेगा। शायद यही वजह है कि कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि उसकी सीटें किसी भी तरह 1999 के आंकड़ें से नीचे न जा सके।

पर इसके लिए मोदी पर व्यक्तिगत हमले शुरू करने की कांग्रेस की रणनीति कितनी कारगर हो पाएगी ये अभी पक्के तौर पर कह पाना मुश्किल है। इससे पहले जब भी कांग्रेस ने मोदी पर व्यक्तिगत हमले किए, मोदी ने उन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर लिया। मोदी अपनी पत्नी के साथ रहे हैं या नहीं रहे, उन्होंने अपनी वैवाहिक स्थिति बताई या नहीं बताई, ये वो व्यक्तिगत बातें हैं जिनसे आम भारतीय मतदाता का कोई सरोकार नहीं होता और न ही वोट डालते वक्त उसे इन बातों से फर्क पड़ता है। खुद मोदी भी ऐसी व्यक्तिगत टिप्पणियां करने में पीछे नहीं रहे हैं। कुछ महीनों पहले सोनिया गांधी की बीमारी और शशि थरूर की गर्लफ्रेंड के बारे में टिप्पणी करने के लिए उनकी तीखी आलोचना हुई थी।

ये ज़रूर है कि मतदाता को किसी भी नेता के व्यक्तिगत जीवन पर कीचड़ उछाले जाना कभी पसंद नहीं आता और वो ऐसा करने वालों को मुंहतोड़ जवाब देता है। 2004 में सोनिया गांधी का विदेशी मूल का मुद्दा उछालने वाली बीजेपी और उनके बारे में बेहद भद्दी टिप्पणी करने वाले प्रमोद महाजन को मुंह की खानी पड़ी थी और जनता ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया बोलने वालों के मुंह भी जनता ने बंद कराए थे और मनमोहन सिंह को सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री बताने वाले आडवाणी को भी जनता ने ही जवाब दिया था। सवाल ये है कि अगर कांग्रेस इस सबसे सीख न लेते हुए भी अगर अपने प्रचार अभियान को पटरी से उतारने पर तुल गई है तो क्या ये उसकी हताशा का प्रदर्शन नहीं है?


Thursday, 10 April 2014

मोदी पर राहुल के हमले के मायने


 आखिर राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी पर गुस्सा आया। नरेंद्र मोदी पर निशाना साधना तो दूर अब तक वो चुनावी भाषणों में मोदी का नाम तक नहीं लेते थे। अभी तक उनके निशाने पर बीजेपी और उसकी विचारधारा होती थी। मोदी का नाम लिए बगैर जरूर राहुल गांधी ने कई बार उन पर बांटने और नफरत की राजनीति करने का आरोप लगाया। पिछले एक हफ्ते से राहुल और सोनिया गांधी ने मोदी पर सीधे हमले बोलने शुरू किए हैं। इसमें स्नूपगेट का जिक्र कर महिलाओं की जासूसी और उनकी सुरक्षा के सवाल उठाना शामिल रहा है।

लेकिन राहुल गांधी ने मोदी पर अब तक का सबसे तीखा हमला बुधवार को बोला। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक बुधवार को छत्तीसगढ़ के बालोद में राहुल गांधी ने एक रैली को संबोधन में कहा कि मोदी पीएम बनना चाहता है। उसके लिए वो कुछ भी कर देगा। वो टुकड़े-टुकड़े कर देगा.... वो एक को दूसरे से लड़ा देगा। राहुल गांधी यहीं नहीं रुके। उन्होंने बीजेपी के अंदरूनी मामलों पर भी टिप्पणी की। मोदी पर आडवाणी और जसवंत सिंह जैसे नेताओं को किनारे करने का आरोप लगाया। राहुल ने ये भी कहा कि बीजेपी में एक ही व्यक्ति के हाथों में सब कुछ दिया जा रहा है। राहुल गांधी ने गुजरात और मुजफ्फरनगर दंगों के लिए बीजेपी को जिम्मेदार भी ठहराया।

राहुल के ये तेवर मोदी को लेकर कांग्रेस की बदली रणनीति की झलक दे रहे हैं। अभी तक राहुल गांधी अपने भाषणों में खुद की छवि एक जिम्मेदार और गंभीर नेता के तौर पर पेश करने की करते रहे हैं। सिस्टम में रह कर सिस्टम से लड़ रहे एक नाराज़ युवा के तौर पर खुद को पेश करने की उनकी कोशिश पार्टी को उलटी पड़ी। दागी नेताओं को बचाने के लिए जारी किए गए अध्यादेश को फाड़ कर फेंकने के अपने बयान पर बाद में उन्हें खुद ही खेद जताना पड़ा। जबकि अपने एकमात्र टीवी इंटरव्यू में वो मोदी का नाम लेने से बचते रहे। इस बारे में बार-बार पूछने पर भी उन्होंने इसका कोई सीधा जवाब नहीं दिया।

दरअसल, कांग्रेस को समझ में आया है कि उसके पास मोदी का मुकाबला करने के लिए कोई रणनीति ही नहीं है। कभी पार्टी में मोदी के बारे में चुप रहने के बारे में फैसला होता है। कभी दूसरी या तीसरी कतार के नेता उन पर हमला करते हैं। कांग्रेस को लगता है कि मोदी अपने पर हुए हर हमले को पलटवार करने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। ऐसा गुजरात के विधानसभा चुनावों में हो चुका है। खासतौर से 2007 के चुनाव में जब मोदी ने खुद को मौत का सौदागर बताने वाले सोनिया गांधी के बयान का अपने ही पक्ष में जमकर इस्तेमाल किया था।

कांग्रेस को लगता था कि मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद चुनाव में एकमात्र मुद्दा सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता हो जाएगा और इसके ज़रिए वो मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कर सकेगी। लेकिन मोदी ने चुनाव प्रचार में हिंदुत्व से जुड़े किसी मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दी और उन्होंने विकास, शासन, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर यूपीए सरकार पर एक के बाद एक तीखे हमले बोले हैं। ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर कांग्रेस अपना बचाव नहीं कर पाती।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की जामा मस्जिद के इमाम से मुलाकात और उसके बाद जारी हुई सेक्यूलर वोट न बंटने की अपील से इस पूरे चुनाव प्रचार ने एक नया मोड़ ले लिया। ऐसा लगा कि कांग्रेस अब इस चुनाव में मोदी के आने का डर दिखा कर मुस्लिम मतदाताओं पर खुल कर डोरे डाल रही है ताकि अपने पक्ष में उनका ध्रुवीकरण किया जा सके। उत्तर प्रदेश में समाजवाद पार्टी और बहुजन समाज पार्टी और बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद भी इसी रणनीति के तहत बार-बार मोदी पर सांप्रदायिकता फैलाने के आरोप लगा रहे हैं। बीजेपी ने भी इसका जवाब दिया। ध्रुवीकरण की राजनीति में उसने भी अपने पत्ते खोल दिए। मुजफ्फरनगर में बीजेपी महासचिव अमित शाह का बदला लेने वाला बयान इसी रणनीति का हिस्सा है जिसमें बीजेपी हिंदुओं का ध्रुवीकरण करना चाह रही है। पार्टी के रणनीतिकार इसे रिवर्स पोलेराइज़ेशन या जवाबी ध्रुवीकरण कहते हैं। पार्टी के घोषणापत्र में राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को फिर जगह दे दी गई।

छत्तीसगढ़ की रैली में राहुल गांधी ने मोदी के बारे में जो भी कहा है उससे कांग्रेस की यही रणनीति साफ होती है। टुकड़े-टुकड़े करने की बात, एक को दूसरे से लड़ाने के बात ये वही आरोप हैं जो मोदी पर गुजरात के 2002 के दंगों के बाद से लगते रहे हैं। विडंबना ये है कि जब-जब मोदी की सांप्रदायिक छवि को लेकर सवाल उठाए गए, गुजरात में उन्होंने इसका फायदा उठाया। अब सवाल ये है कि राहुल के ताज़ा हमलों के बाद क्या होगा? मोदी इसका किस तरह से जवाब देते हैं? और असली मुद्दों से भटके इस चुनाव में क्या प्रचार फिर पटरी पर वापस आ पाएगा?