मेरी कही
सबकी सुनी अब अपनी कही
Tuesday, January 27, 2026
गोवा की गर्मी से पिघली भारत-कनाडा के रिश्तों की बर्फ़
Thursday, January 22, 2026
आर्कटिक डील या आर्ट ऑफ़ डील?
यूरोप और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर के बादल जितनी तेज़ी से उमड़े थे उतनी ही तेज़ी से गायब भी हो ग ए। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के दौरान, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को ख़रीदने की अपनी ज़िद अचानक छोड़ दी और अपने यूरोपीय सहयोगियों पर टैरिफ़ लगाने की धमकी भी वापस ले ली। इसके बजाय, उन्होंने नैटो के साथ एक नई "फ़्यूचर डील" या फ्रेमवर्क के एलान के साथ सब कुछ शांत कर दिया।
पिछले कुछ हफ़्तों से माहौल काफ़ी गर्म था। ट्रम्प लगातार डेनमार्क के इस स्वायत्त क्षेत्र पर अमेरिकी नियंत्रण की माँग कर रहे थे। उन्होंने इसे आर्कटिक सुरक्षा और रूस-चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए 'अस्तित्व की ज़रूरत' बताया था। अपनी बात मनवाने के लिए उन्होंने अमेरिका की आर्थिक ताकत का पूरा इस्तेमाल किया और धमकी दी थी कि अगर डेनमार्क और सात अन्य यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड के सौदे पर बात नहीं की, तो उन पर 10% से लेकर 25% तक का टैरिफ़ लगा दिया जाएगा।
यूरोप का जवाब भी बिल्कुल सख़्त था। यूरोपीय संसद की व्यापार समिति ने अमेरिका के साथ एक अहम व्यापार समझौते को रोक दिया और साफ़ संदेश दिया कि वे इस तरह की आर्थिक ज़ोर-ज़बरदस्ती के आगे नहीं झुकेंगे। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के अधिकारियों ने भी दो-टूक कह दिया कि उनकी संप्रभुता बिकाऊ नहीं है। लेकिन, नाटो महासचिव मार्क रट के साथ ट्रम्प की मुलाकात के कुछ ही घंटों बाद यह गतिरोध टूट गया। बैठक के बाद, राष्ट्रपति ने 'ट्रुथ सोशल' पर पोस्ट किया कि ग्रीनलैंड और पूरे आर्कटिक क्षेत्र को लेकर एक "फ़्रेमवर्क" या ढाँचा तैयार कर लिया गया है। उन्होंने तुरंत टैरिफ़ की धमकी वापस ले ली और इस नए समझौते को रक्षा, खनिजों और सुरक्षा पर सहयोग की एक नई शुरुआत बताया। अब शायद ग्रीनलैंड को ख़रीदने के बजाय वहाँ अमेरिकी सेना को बेस बनाने के ज़्यादा अधिकार मिल सकते हैं।
जो लोग ट्रम्प की राजनीति को नहीं समझते, उन्हें यह एक हताशा भरा यू-टर्न लग सकता है। उनके राजनीतिक विरोधी उनका मज़ाक उड़ाते हुए इसे TACO या Trump Always Chickens Out (ट्रंप हमेशा डर जाते हैं) कहते हैं, लेकिन मंझे हुए जानकार इसे ट्रम्प की 'आर्ट ऑफ़ डील' का ही एक हिस्सा मानते हैं। यह उनका पुराना तरीका है: पहले बहुत बड़ी माँग रखो (जैसे ग्रीनलैंड का पूरा मालिकाना हक़), फिर सामने वाले को डराने के लिए भारी धमकियाँ दो, और फिर बाद में ज़बरदस्त विरोध होने पर थोड़ा पीछे हट जाओ, ताकि समझौता किया जा सके। ट्रम्प ने संकट पैदा किया जिसे केवल वही सुलझा सकते थे। जब संस्थागत स्तर पर विरोध हुआ, तो उन्होंने एक धुँधले से "फ़्रेमवर्क" का सहारा लिया, जिससे वे अपनी जीत का दावा भी कर सकें और बिना ग्रीनलैंड खरीदे भी वहाँ अमेरिका का प्रभाव बढ़ा सकें।
हालाँकि, इस नाटकीयता के पीछे एक ठोस रणनीतिक सोच भी है। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प की दीवानगी बेवजह नहीं है। यह द्वीप अमेरिकी मिसाइल सुरक्षा के लिए बहुत अहम है। इसके अलावा, ग्रीनलैंड में छिपे 'रेयर अर्थ मिनरल्स' (दुर्लभ खनिज) अमेरिका को चीन की सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकते हैं, जो आज की तकनीक और हथियारों के लिए बेहद ज़रूरी है। जैसे-जैसे बर्फ़ पिघल रही है, वहाँ नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और यह इलाका वैश्विक प्रतिस्पर्धा का नया अखाड़ा बनता जा रहा है।
कुल मिलाकर, यह पूरा किस्सा ट्रम्प की विदेश नीति का एक बेहतरीन उदाहरण है। वे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आर्थिक दबाव का इस्तेमाल करते हैं और अस्थिरता को एक हथियार की तरह प्रयोग करते हैं ताकि उनके विरोधी और दोस्त, दोनों ही हमेशा उलझन में रहें। भले ही फ़िलहाल टैरिफ़ का ख़तरा टल गया हो और ग्रीनलैंड बिका न हो, लेकिन इस घटना ने साफ़ कर दिया है कि आर्कटिक पर वर्चस्व की असली लड़ाई तो अब शुरू हुई है। ट्रम्प ने भले ही सीधे तौर पर द्वीप नहीं खरीदा, लेकिन उन्होंने यूरोप को अपनी शर्तों पर बातचीत करने के लिए मजबूर ज़रूर कर दिया।
Sunday, February 02, 2025
मध्यम वर्ग- पहचानी गई अहमियत
₹1 लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं, सरकार का ये ऐलान मध्यम वर्ग के लिए एक बड़ी राहत की तरह है। ये सिर्फ एक आर्थिक कदम नहीं है, बल्कि एक भरोसे का पैगाम भी है, खासकर उस तबके के लिए जो देश की तरक्की में अहम भूमिका निभाता है। हालाँकि 2014 के बाद से इस वर्ग ने काफी तरक्की देखी है, लेकिन हाल की आर्थिक चुनौतियों ने इनकी उम्मीदों को थोड़ा कम कर दिया था। ये नई टैक्स लिमिट एक नई उम्मीद जगाती है, एक साफ़ लक्ष्य देती है जिसे हासिल करने के लिए वो और मेहनत कर सकते हैं।
एक लाख सालाना आमदनी, कई पीढ़ियों से, एक बहुत बड़ी कामयाबी मानी जाती रही है – पैसों की तंगी से मुक्ति, बेहतर भविष्य की उम्मीद। हमारे माँ-बाप के ज़माने में तो ये एक सपना ही था। अब ये सपना हकीकत के करीब है, और इससे नई पीढ़ी में एक नया जोश, एक नई उमंग पैदा होगी। खासकर उन लोगों के लिए जो महंगाई और आर्थिक अनिश्चितता से परेशान थे, ये एक बहुत बड़ा सहारा है।
ये कदम हमारी अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद साबित होगा। मध्यम वर्ग, अपनी खर्च करने की आदतों के लिए जाना जाता है। उनके हाथ में ज़्यादा पैसा आने से बाज़ार में चीज़ों की मांग बढ़ेगी, जिससे विकास को बढ़ावा मिलेगा और नए रोज़गार के अवसर पैदा होंगे।
सिर्फ पैसों की बात नहीं है, ये कदम दिखाता है कि सरकार मध्यम वर्ग को कितना अहम समझती है। ये इस बात को और पुख्ता करता है कि मेहनत और लगन से कामयाबी ज़रूर मिलती है, और इससे इस तबके का हौसला और बढ़ेगा। कोविड के दौरान भी मध्यम वर्ग ने अर्थव्यवस्था को संभालने में बड़ी भूमिका निभाई थी। लेकिन उसके बाद भी, महंगाई, टैक्स और मुफ्त की योजनाओं की राजनीति के बीच उनकी अनदेखी सी महसूस हो रही थी। कई योजनाओं और सब्सिडी का फ़ायदा आम तौर पर कम आय वाले लोगों को मिलता है, जबकि अमीर लोगों को टैक्स में छूट और निवेश के मौके मिलते हैं। ऐसे में मध्यम वर्ग खुद को भूला हुआ महसूस करने लगा था।
ये बजट मानता है कि वो एक बड़ा वोट बैंक हैं, जाति-धर्म से ऊपर, और किसी भी पार्टी के लिए उन्हें नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। सरकार ने ये फैसला लेते वक़्त दिल्ली के चुनावों को भी ध्यान में रखा होगा, देखना है कि इसका फ़ायदा उन्हें मिलता है या नहीं।
कुल मिलाकर, ₹1 लाख की टैक्स छूट सिर्फ पैसों के बारे में नहीं है; ये भारतीय मध्यम वर्ग की उम्मीदों और उनके योगदान को पहचानने, उन्हें एक बेहतर भविष्य का सपना देखने और देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के बारे में है।
Thursday, August 31, 2023
क्यों बुलाया जा रहा है संसद का विशेष सत्र?
संसद के विशेष सत्र के बारे में कुछ बातें समझना जरूरी हैं
Friday, September 13, 2019
गड़करी विवाद- नेक इरादा, ख़राब तरीका
इससे कौन इनकार करेगा कि हर जान बेशकीमती है। फिर भी अगर जान की कीमत रुपए-पैसों में लगानी हो तो आप जान कर हैरान होंगे कि भारत की 3 प्रतिशत जीडीपी सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए लोगों की वजह से कम हो जाती है। हैरानी की बात यह भी है कि सड़क दुर्घटनाओं के कारण हर साल भारत की आबादी से दार्जिलिंग या रुड़की जैसा एक शहर कम हो जाता है। प्रति वर्ष करीब डेढ़ लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। हर व्यक्ति की मौत के साथ ही एक परिवार का सपना-सहारा दम तोड़ जाता है। मरने वालों में युवाओं की संख्या ज़्यादा है जो और भी गंभीर बात है। मरने वालों में 65 प्रतिशत 18 से 35 वर्ष के लोग हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि परिवारों पर कितनी बड़ी विपत्ति लाती है सड़क दुर्घटनाएँ।
भारत ने 2015 में ब्रासीलिया घोषणापत्र पर दस्तखत कर यह तय किया था कि वह 2022 तक देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में पचास प्रतिशत की कमी लाएगा। इसके लिए नई सड़कें बनाना, मौजूदा सड़कों को ठीक करना, यातायात कानूनों को कड़ा करना, लोगों को जागरुक करना, वाहनों में चालकों और यात्रियों की सुरक्षा के अधिक कड़े प्रावधान करना जैसे कदम उठाने की बात कही गई थी। लेकिन क्या वाकई ऐसा हो पा रहा है?
आंकड़ें बताते हैं कि तमाम कदम उठाने के बावजूद भारत में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या पर नियंत्रण या कमी नहीं लाई जा सकी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में अक्तूबर 2018 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 की तुलना में 2017 में सड़क दुर्घटनाओं ेमें सिर्फ 3.27% की ही कमी आई है। 2016 में जहां देश भर में 4,80,652 सड़क दुर्घटनाएँ हुईं थीं वहीं 2017 में 4,64,919 सड़क दुर्घटनाएं हुईं। इन दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में भी मामूली अंतर ही आया और सिर्फ दो प्रतिशत की ही कमी आई।
तो ऐसा क्यों हो रहा है कि तमाम कदम उठाए जाने के बावजूद सड़क दुर्घटनाएं और उनसे होने वाली मौतों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है। बढ़ती आबादी और वाहनों की बढ़ती संख्या के अनुपात में आधारभूत ढांचा बनाने में कमी इसका एक बड़ा कारण है। पीआरएस के एक अध्ययन के अनुसार सन् 2000 से भारत में सड़कों के जाल में 39% की बढोत्तरी हुई जबकि इसी दौरान वाहन की संख्या में 158% की वृद्धि हुई है। सड़कों पर बढ़ती वाहनों की भीड़ और पर्याप्त सुरक्षा उपाय न होना सड़क दुर्घटनाओं के सबसे बड़े कारणो में से एक है। वैसे तो देश के राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजमार्ग सड़कों का सिर्फ पांच प्रतिशत हैं लेकिन भारत में होने वाली आधे से अधिक यानी करीब 52% सड़क दुर्घटनाएँ इन्हीं राजमार्गों पर होती हैं। इसका प्रमुख कारण राजमार्गों पर तीव्र गति से वाहन चलाना और वहां वाहनों की संख्या अधिक होना है। इसके साथ ही गलत तरीके से ओवरटेक करना, शराब पीकर गाड़ी चलाना, उल्टी दिशा में गाड़ी चलाना, रेड लाइट जंप करना, गाडी चलाते समय मोबाइल का प्रयोग करना, हेलमेट और सीट बेल्ट का प्रयोग न करना जैसे कारणों से सड़क दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या में लोगों की मौत होती है।
चालकों और यात्रियों की सुरक्षा के लिए यातायात के नियमों को अधिक कड़ा करने की मांग लंबे समय की जाती रही है। यह तर्क दिया गया कि अगर नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने और सजा कड़े होंगे तो इससे लोग नियमों का पालन करेंगे और इससे सड़क सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिलेगी। यही वजह है कि लंबे विरोध के बावजूद मोटर व्हीकल ऐक्ट संशोधन बिल को आखिरकार सत्रहवीं लोक सभा से पारित कराया गया और एक सितंबर से देश भर में यातायात कानून के नए नियम लागू किए गए। इसके पीछे मंशा सही है। खुद सड़क परिवहन यातायात मंत्री नितिन गडकरी इस बिल को पेश करते समय भावुक हो गए थे। उन्होंने लोक सभा में जानकारी दी थी कि वे खुद सड़क दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं और उनके एक पैर में आई स्थाई चोट इसी कारण है। सूत्रों का यह भी कहना है कि नए प्रावधानों का इसलिए भी विरोध किया गया गया क्योंकि भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुके आरटीओ से लूट का एक हिस्सा राजनीतिक दलों को मिलता रहा है। लेकिन बिल पारित कराते समय यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि नए नियमों का इतना तीखा विरोध होगा और खुद बीजेपी शासित राज्य ही इनमें परिवर्तन कर जुर्माने की रकम कम करने की पहल करेंगे। इन राज्यों की दलील है कि नए जुर्माने जनता पर बोझ है। उनका मानना है कि जुर्माना बढ़ाना सड़क दुर्घटनाओं को रोकने का तरीका नहीं है बल्कि इसके लिए धीरे धीरे जनता को जागरुक करना चाहिए।
हकीकत तो यह भी है कि सड़क दुर्घटनाओं को रोकने में सरकारें भी कदम उठाने में नाकाम रही हैं। सड़कों की खराब हालत, ट्रैफिक लाइट न होना, नियमों के पालन कराने के लिए सख्ती न होना, राजमार्गों पर बने अंधे मोड़ आदि दुरुस्त कराने की जिम्मेदारी सरकारों की है जिसमें वे नाकाम रही हैं। सड़कों के गड्डों से भी बड़ी संख्या में सड़क दुर्घटनाएं और मौतें होती हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सड़क सुरक्षा को लेकर बनी के एस राधाकृष्णन समिति ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 2013 से 2017 के बीच सड़कों पर बने गड्डों के कारण हुई दुर्घटनाओं के चलते 14,926 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि यह संख्या तो आतंकवादियों के हमले में मारे गए लोगों की संख्या से भी अधिक है। यह भी कष्टदायक है कि ऐसे मामलों में पीड़ितों के परिवारवालों को कोई मुआवजा नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि ऐसे मामलों में भी मुआवजा दिया जाए।
अगर सड़कों पर बने अंधे मोड़ या ब्लाइंड स्पॉट की बात की जाए तो ऐसा सड़कों की खराब डिज़ाइन या भूमि अधिग्रहण के विवाद को लेकर होता है। साथ ही राजमार्गों पर भी ऐसे स्थान हैं जहां दुर्घटनाएँ होती हैं। 2016 में ऐसे 726 स्थानों की पहचान कर उन्हें ठीक करने के लिए 11, 000 करोड़ रुपयों का आवंटन किया गया था। लेकिन सरकार दो साल में सिर्फ 189 स्थान ही ठीक करा सकी। इसके लिए मंत्रालय ने एक ऐप भी लांच किया था जिसमें लोगों से कहा गया था कि वे ऐसे ब्लाइंड या ब्लैक स्पॉट के फोटो खींच कर भेजें।
गडकरी के बनाए कानून की मंशा बिल्कुल ठीक है। अगर 2022 तक सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में कमी लाना है तो कड़े कानून के बिना ऐसा कर पाना संभव नहीं है। लेकिन लोगों को इस बात से दिक्कत हुई कि अचानक से जुर्माने की रकम बढ़ा दी गई। दरअसल, लोगों को कानून पर तो विश्वास है लेकिन कानून लागू करने वालों पर नहीं। सड़क पर खड़ा ट्रैफिक कांस्टेबल सरकार का चेहरा है। जब लोगों को लगता है कि जुर्माने के नाम पर उन्हें परेशान किया जाएगा या उनसे वसूली की जाएगी तो वे उखड़ जाते हैं। पिछले दिनों ऐसे कई वीडियो वायरल हुए जिनमें ट्रैफिक नियमों के नाम पर आम लोगों को परेशान किया जा रहा है या उन्हें पीटा तक जा रहा है। अगर नया कानून लागू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता कि इन्हें लागू कराने में मानवीय दखल कम होगा, तो शाय़द लोग इसे बेहतर ढंग से लेते। आखिर सड़कों पर मौजूद ट्रैफिक कांस्टेबल की वर्दी में कैमरा लगाने और उसका सीधा संपर्क कंट्रोल रूम से करने में कितना खर्च होगा? इससे पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार में कमी भी। इसी तरह ओवरस्पीडिंग के लिए स्पीड कैमरे लगाना एक बेहतरीन उपाय है जो सिस्टम में पारदर्शिता लाता है और सभी नागरिकों को कानून के सामने बराबर करता है। दिल्ली जैसे शहर जहां हर गाड़ी वाला ट्रैफिक कांस्टेबल पर यह कह कर धौंस जमाता है कि "तू जानता नहीं, मैं कौन हूं"; वहां कैमरों से चालान काटना नियमों को कड़ाई से लागू करने की दिशा में बड़ा कदम होगा।
इसी तरह एनएचएआई, राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन सड़कों के हालत दुरुस्त करने या रखने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकतीं। सड़कों पर गड्डे या ब्लाइंड स्पॉट ठीक किए बिना सिर्फ लोगों से ही कानून के पालन करने की अपेक्षा करना ठीक नहीं होगा। अगर रेड लाइट काम नहीं कर रही है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है, यह भी देखना जरूरी है।
नितिन गडकरी के लिए भी फिलहाल यही ठीक होगा कि वे इस कानून को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए बिना इसे चरणबद्ध ढंग से लागू कराने का प्रयास करें। जिस तरह से उन्होंने संसद में इसे लेकर आम राय बनाने का प्रयास किया, ठीक वैसे ही राज्यों से भी बात करनी होगी। यह हो सकता है कि शायद ब्रासीलिया घोषणापत्र के तहत 2022 तक सड़क दुर्घटनाओं में पचास प्रतिशत कमी लाने का हमारा लक्ष्य पूरा करने में कठिनाई आए लेकिन ऐसे कड़े प्रावधानों में सरकार को अपना मानवीय चेहरा भी जनता के सामने रखना चाहिए।
Wednesday, October 03, 2018
धार्मिक परंपराओं में अदालतों का दखल-एक ग़लत शुरुआत
Sunday, March 11, 2018
सोनिया क्यों नहीं बनीं पीएम, जल्दी ही मिल सकता है इसका जवाब
Friday, November 24, 2017
चुनाव के वक्त संसद में काम नहीं सिर्फ शोर
Thursday, November 23, 2017
आरक्षण का झांसा कब तक
Sunday, April 09, 2017
क्या ईवीएम में छेड़छाड़ हो सकती है? पढ़िए क्या कहता है चुनाव आयोग!!
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- ईवीएम के साथ छेड़खानी करने का क्या अर्थ है ?
- क्या ईसीआई-ईवीएम को हैक किया जा सकता है?
- क्या विनिर्माताओं द्वारा ईसीआई-ईवीएम में कोई हेराफेरी (मैनीपुलेशन) की जा सकती है?
- क्या सीयू में चिप के भीतर ट्रोजन होर्स को घुसाया जा सकता है?
- क्या ईसीआई-ईवीएम का पुराना मॉडल अभी भी चलन में है?
- क्या ईसीआई-ईवीएम के साथ भौतिक रूप से छेड़छाड़ की जा सकती है या बिना किसी के ध्यान में आए उनके संघटकों को बदला जा सकता है?
- . ईसीआई-ईवीएम को छेड़खानी मुक्त बनाने के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकीय विशेषताएं क्या हैं?
- क्या इसीआई-ईवीएम विदेशी प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हैं?
- भंडारण के स्थान पर हेरफेर किए जाने की कितनी आशंका हैं ?
- स्थानीय निकाय चुनावों में ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप किस हद तक सही हैंं?
- ईसीआई–ईवीएम के साथ छेड़छाड़ न हो सके, यह सुनिश्चित करने के लिए सतत जांच एवं निगरानी के विभिन्न स्तर कौन से हैं?
- प्रथम स्तर जांच : बीईएल/ ईसीआईएल के इंजीनियर प्रत्येक ईवीएम की तकनीकी एवं भौतिक जांच के बाद संघटकों की मौलिकता को प्रमाणित करते हैं, जो कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के समक्ष किया जाता है। त्रुटिपूर्ण ईवीएम को वापस फैक्ट्री में भेज दिया जाता है। एफएलसी हॉल को साफ-सुथरा बनाया जाता है, प्रवेश को प्रबंधित किया जाता है एवं अंदर किसी भी कैमरा, मोबाइल फोन या स्पाई पेन लाने की अनुमति नहीं दी जाती है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के द्वारा औचक रूप से चुने गए 5 प्रतिशत ईवीएम पर न्यूनतम 1000 मतों का एक कृत्रिम मतदान किया जाता है और उनके सामने इसका परिणाम प्रदर्शित किया जाता है। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की जाती है।
- यादृच्छिकीकरण (रैंडोमाइजेशन) : किसी विधान सभा और बाद में किसी मतदान केंद्र को आवंटित किए जाने के समय ईवीएम की दो बार बेतरतीब तरीके से (यादृच्छिक) जांच की जाती है जिससे किसी निर्धारित आवंटन की संभावना खत्म हो जाए। मतदान प्रारंभ होने से पहले, चुनाव वाले दिन उम्मीदवारों के मतदान एजेंटों के समक्ष मतदान केंद्रों पर कृत्रिम मतदान का संचालन किया जाता है। मतदान के बाद ईवीएम को सील किया जाता है और मतदान एजेंट सील पर अपने हस्ताक्षर करते हैं। मतदान एजेंट परिवहन के दौरान स्ट्रॉंग रूम तक जा सकते हैं।
- स्ट्रॉंग रूम : उम्मीदवार या उनके प्रतिनिधि स्ट्रॉंग रूम पर अपने खुद के सील लगा सकते हैं, जहां मतदान के बाद मतदान किए हुए ईवीएम का भंडारण किया जाता है और वे स्ट्रॉग रूम के सामने शिविर भी लगा सकते हैं। इन स्ट्रॉंग रूम की सुरक्षा 24 घंटे बहुस्तरीय तरीके से की जाती है।
- मतगणना केंद्र : मतदान किए हुए ईवीएम को मतगणना केंद्रों पर लाया जाता है और मतगणना आरंभ होने से पहले उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों के समक्ष सीलों और सीयू की विशिष्ट पहचान प्रदर्शित की जाती है।
- क्या हेरफेर किए गए किसी ईवीएम को बिना किसी की जानकारी के मतदान प्रक्रिया में पुन: शामिल किया जा सकता है?
- अमेरिका एवं यूरोपीय संघ जैसे विकसित देशों ने ईवीएम को क्यों नहीं अपनाया है और कुछ देशों ने यह प्रणाली क्यों त्याग दी है?
- वीवीपीएटी सक्षम मशीनों की क्या स्थिति है?

