Friday, September 13, 2019

गड़करी विवाद- नेक इरादा, ख़राब तरीका


इससे कौन इनकार करेगा कि हर जान बेशकीमती है। फिर भी अगर जान की कीमत रुपए-पैसों में लगानी हो तो आप जान कर हैरान होंगे कि भारत की 3 प्रतिशत जीडीपी सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए लोगों की वजह से कम हो जाती है। हैरानी की बात यह भी है कि सड़क दुर्घटनाओं के कारण हर साल भारत की आबादी से दार्जिलिंग या रुड़की जैसा एक शहर कम हो जाता है। प्रति वर्ष करीब डेढ़ लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। हर व्यक्ति की मौत के साथ ही एक परिवार का सपना-सहारा दम तोड़ जाता है। मरने वालों में युवाओं की संख्या ज़्यादा है जो और भी गंभीर बात है। मरने वालों में 65 प्रतिशत 18 से 35 वर्ष के लोग हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि परिवारों पर कितनी बड़ी विपत्ति लाती है सड़क दुर्घटनाएँ।

भारत ने 2015 में ब्रासीलिया घोषणापत्र पर दस्तखत कर यह तय किया था कि वह 2022 तक देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में पचास प्रतिशत की कमी लाएगा। इसके लिए नई सड़कें बनाना, मौजूदा सड़कों को ठीक करना, यातायात कानूनों को कड़ा करना, लोगों को जागरुक करना, वाहनों में चालकों और यात्रियों की सुरक्षा के अधिक कड़े प्रावधान करना जैसे कदम उठाने की बात कही गई थी। लेकिन क्या वाकई ऐसा हो पा रहा है?

आंकड़ें बताते हैं कि तमाम कदम उठाने के बावजूद भारत में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या पर नियंत्रण या कमी नहीं लाई जा सकी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में अक्तूबर 2018 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 की तुलना में 2017 में सड़क दुर्घटनाओं ेमें सिर्फ 3.27% की ही कमी आई है। 2016 में जहां देश भर में 4,80,652 सड़क दुर्घटनाएँ हुईं थीं वहीं 2017 में 4,64,919 सड़क दुर्घटनाएं हुईं। इन दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में भी मामूली अंतर ही आया और सिर्फ दो प्रतिशत की ही कमी आई।

तो ऐसा क्यों हो रहा है कि तमाम कदम उठाए जाने के बावजूद सड़क दुर्घटनाएं और उनसे होने वाली मौतों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है। बढ़ती आबादी और वाहनों की बढ़ती संख्या के अनुपात में आधारभूत ढांचा बनाने में कमी इसका एक बड़ा कारण है। पीआरएस के एक अध्ययन के अनुसार सन् 2000 से भारत में सड़कों के जाल में 39% की बढोत्तरी हुई जबकि इसी दौरान वाहन की संख्या में 158% की वृद्धि हुई है। सड़कों पर बढ़ती वाहनों की भीड़ और पर्याप्त सुरक्षा उपाय न होना सड़क दुर्घटनाओं के सबसे बड़े कारणो में से एक है। वैसे तो देश के राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजमार्ग सड़कों का सिर्फ पांच प्रतिशत हैं लेकिन भारत में होने वाली आधे से अधिक यानी करीब 52% सड़क दुर्घटनाएँ इन्हीं राजमार्गों पर होती हैं। इसका  प्रमुख कारण राजमार्गों पर तीव्र गति से वाहन चलाना और वहां वाहनों की संख्या अधिक होना है। इसके साथ ही गलत तरीके से ओवरटेक करना, शराब पीकर गाड़ी चलाना, उल्टी दिशा में गाड़ी चलाना, रेड लाइट जंप करना, गाडी चलाते समय मोबाइल का प्रयोग करना, हेलमेट और सीट बेल्ट का प्रयोग न करना जैसे कारणों से सड़क दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या में लोगों की मौत होती है।

चालकों और यात्रियों की सुरक्षा के लिए यातायात के नियमों को अधिक कड़ा करने की मांग लंबे समय की जाती रही है। यह तर्क दिया गया कि अगर नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने और सजा कड़े होंगे तो इससे लोग नियमों का पालन करेंगे और इससे सड़क सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिलेगी। यही वजह है  कि लंबे विरोध के बावजूद मोटर व्हीकल ऐक्ट संशोधन बिल को आखिरकार सत्रहवीं लोक सभा से पारित कराया गया और एक सितंबर से देश भर में यातायात कानून के नए नियम लागू किए गए। इसके पीछे मंशा सही है। खुद सड़क परिवहन यातायात मंत्री  नितिन गडकरी इस बिल को पेश करते समय भावुक हो गए थे। उन्होंने लोक सभा में जानकारी दी थी कि वे खुद सड़क दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं और उनके एक पैर में आई स्थाई चोट इसी कारण है। सूत्रों का यह भी कहना है कि नए प्रावधानों का इसलिए भी विरोध किया गया गया क्योंकि भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुके आरटीओ से लूट का एक हिस्सा राजनीतिक दलों को मिलता रहा है। लेकिन बिल पारित कराते समय यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि नए नियमों का इतना तीखा विरोध होगा और खुद बीजेपी शासित राज्य ही इनमें परिवर्तन कर जुर्माने की रकम कम करने की पहल करेंगे। इन राज्यों की दलील है कि नए जुर्माने जनता पर बोझ है। उनका मानना है कि जुर्माना बढ़ाना सड़क दुर्घटनाओं को रोकने का तरीका नहीं है बल्कि इसके लिए धीरे धीरे जनता को जागरुक करना चाहिए।

हकीकत तो यह भी है कि सड़क दुर्घटनाओं को रोकने में सरकारें भी कदम उठाने में नाकाम रही हैं। सड़कों की खराब हालत, ट्रैफिक लाइट न होना, नियमों के पालन कराने के लिए सख्ती न होना, राजमार्गों पर बने अंधे मोड़ आदि दुरुस्त कराने की जिम्मेदारी सरकारों की है जिसमें वे नाकाम रही हैं। सड़कों के गड्डों से भी बड़ी संख्या में सड़क दुर्घटनाएं और मौतें होती हैं।  सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सड़क सुरक्षा को लेकर बनी के एस राधाकृष्णन समिति ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 2013 से 2017 के बीच सड़कों पर बने गड्डों के कारण हुई दुर्घटनाओं के चलते 14,926 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि यह संख्या तो आतंकवादियों के हमले में मारे गए लोगों की संख्या से भी अधिक है। यह भी कष्टदायक है कि ऐसे मामलों में पीड़ितों के परिवारवालों को कोई मुआवजा नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि ऐसे मामलों में भी मुआवजा दिया जाए।

अगर सड़कों पर बने अंधे मोड़ या ब्लाइंड स्पॉट की बात की जाए तो ऐसा सड़कों की खराब डिज़ाइन या भूमि अधिग्रहण के विवाद को लेकर होता है। साथ ही राजमार्गों पर भी ऐसे स्थान हैं जहां दुर्घटनाएँ होती हैं। 2016 में ऐसे 726 स्थानों की पहचान कर उन्हें ठीक करने के लिए 11, 000 करोड़ रुपयों का आवंटन किया गया था। लेकिन सरकार दो साल में सिर्फ 189 स्थान ही ठीक करा सकी। इसके लिए मंत्रालय ने एक ऐप भी लांच किया था जिसमें लोगों से कहा गया था कि वे ऐसे ब्लाइंड या ब्लैक स्पॉट के फोटो खींच कर भेजें।

गडकरी के बनाए कानून की मंशा बिल्कुल ठीक है। अगर 2022 तक सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में कमी लाना है तो कड़े कानून के बिना ऐसा कर पाना संभव नहीं है। लेकिन लोगों को इस बात से दिक्कत हुई कि अचानक से जुर्माने की रकम बढ़ा दी गई। दरअसल, लोगों को कानून पर तो विश्वास है लेकिन कानून लागू करने वालों पर नहीं। सड़क पर खड़ा ट्रैफिक कांस्टेबल सरकार का चेहरा है। जब लोगों को लगता है कि जुर्माने के नाम पर उन्हें परेशान किया जाएगा या उनसे वसूली की जाएगी तो वे उखड़ जाते हैं। पिछले दिनों ऐसे कई वीडियो वायरल हुए जिनमें ट्रैफिक नियमों के नाम पर आम लोगों को परेशान किया जा रहा है या उन्हें पीटा तक जा रहा है। अगर नया कानून लागू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता कि इन्हें लागू कराने में मानवीय दखल कम होगा, तो शाय़द लोग इसे बेहतर ढंग से लेते। आखिर सड़कों पर मौजूद ट्रैफिक कांस्टेबल की वर्दी में कैमरा लगाने और उसका सीधा संपर्क कंट्रोल रूम से करने में कितना खर्च होगा? इससे पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार में कमी भी। इसी तरह ओवरस्पीडिंग के लिए स्पीड कैमरे लगाना एक बेहतरीन उपाय है जो सिस्टम में पारदर्शिता लाता है और सभी नागरिकों को कानून के सामने बराबर करता है। दिल्ली जैसे शहर जहां हर गाड़ी वाला ट्रैफिक कांस्टेबल पर यह कह कर धौंस जमाता है कि "तू जानता नहीं, मैं कौन हूं"; वहां कैमरों से चालान काटना नियमों को कड़ाई से लागू करने की दिशा में बड़ा कदम होगा।

इसी तरह एनएचएआई, राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन सड़कों के हालत दुरुस्त करने या रखने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकतीं। सड़कों पर गड्डे या ब्लाइंड स्पॉट ठीक किए बिना सिर्फ लोगों से ही कानून के पालन करने की अपेक्षा करना ठीक नहीं होगा। अगर रेड लाइट काम नहीं कर रही है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है, यह भी देखना जरूरी है।

नितिन गडकरी के लिए भी फिलहाल यही ठीक होगा कि वे इस कानून को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए बिना इसे चरणबद्ध ढंग से लागू कराने का प्रयास करें। जिस तरह से उन्होंने संसद में इसे लेकर आम राय बनाने का प्रयास किया, ठीक वैसे ही राज्यों से भी बात करनी होगी। यह हो सकता है कि शायद ब्रासीलिया घोषणापत्र के तहत 2022 तक सड़क दुर्घटनाओं में पचास प्रतिशत कमी लाने का हमारा लक्ष्य पूरा करने में कठिनाई आए लेकिन ऐसे कड़े प्रावधानों में सरकार को अपना मानवीय चेहरा भी जनता के सामने रखना चाहिए।

Wednesday, October 03, 2018

धार्मिक परंपराओं में अदालतों का दखल-एक ग़लत शुरुआत

हमारा लोकतंत्र संसदीय लोकतंत्र से बदल कर न्यायिक लोकतंत्र में तब्दील होता जा रहा है जो कि एक शुभ संकेत नहीं है। हमारे संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-समझ कर लोकतंत्र के सभी स्तंभों के लिए अपनी जवाबदेही और सीमाएं तय की थीं। वे नहीं चाहते थे कि कोई एक अंग किसी दूसरे अंग के कामकाज में हस्तक्षेप करे। इनमें आपसी संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था की गई थी। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में हुई कुछ घटनाएं बता रही हैं कि शायद यह संतुलन बिगड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल जजों की नियुक्ति को लेकर था। अभी की व्यवस्था में जजों की नियुक्ति जज ही करते हैं। इनमें कई बार पक्षपात के आरोप लगते हैं। भाई-भतीजावाद के भी कई मामले सामने आए हैं। क्षेत्रीय असंतुलन भी एक बड़ा विषय है। यही वजह है कि संसद ने जजों की नियुक्ति के लिए एक आयोग बनाने का बिल सर्वानुमति से पारित किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। आखिर क्यों हमारी अदालतें नहीं चाहती हैं कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेही हों।
हाल में आए कुछ निर्णय यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या अदालतें अनावश्यक रूप से धार्मिक मामलों में दखल नहीं दे रही हैं। दिल्ली के प्रदूषण को कम करने के लिए अचानक कह दिया गया कि पटाखों की बिक्री पर रोक लगा दीजिए। यह सब मानते हैं कि पटाखों से हवा जहरीली होती है। लेकिन हवा तो कारों से भी जहरीली होती है। पटाखे साल में एक बार चलते हैं लेकिन कारें रोज चलती हैं और उनकी संख्या रोज बढ़ती है। क्या बेहतर नहीं होगा कि लोगों को स्वयं ही इसके लिए जागरुक किया जाता। स्कूलों में बच्चों को अब पटाखों से होने वाले नुकसान के बारे में सिखाया जाता है। कई बच्चे खुद ही अपने अभिभावकों से कहने लगे हैं कि वे दीपावली पर पटाखे नहीं चलाएंगे। इस फैसले से एक बड़े वर्ग में यह संदेश चला गया कि अदालत उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा रही हैं। हालांकि यह एक अलग बहस है कि पटाखे किसी धर्म का हिस्सा नहीं हैं। बल्कि वे उत्सव मनाने का जरिया मात्र हैं। और यह तरीका समय के साथ जागरूकता आने पर बदल सकता है। यह फैसला करते वक्त यह भी नहीं सोचा गया कि जिन व्यापारियों ने पटाखे खरीद लिए थे उनका क्या होगा। उन्हें हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा। अदालत के इस फैसले के बावजूद दिल्ली में खूब पटाखे बिके और चले। इससे यह भी साफ हुआ कि अदालतों को ऐसे फैसले नहीं देने चाहिए जिन्हें लागू ही नहीं किया जा सके।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक और फैसला किया। यह केरल में सबरीमाल मंदिर में 10–50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने का था। इस मंदिर में यह रोक पिछले आठ सौ साल से चली आ रही थी। इसके पीछे मान्यता यह थी कि मंदिर के मुख्य देवता अयप्पा ब्रह्मचारी हैं और रजस्वला स्त्रियों के गर्भगृह में जाने से उनका ब्रह्मचर्य भंग होगा। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को वहां जाने की अनुमति देते हुए उनकी समानता की बात की। इससे किसी को विरोध नहीं है। भारत में विदेशी आक्रामणकारियों से स्त्रियों की सुरक्षा के उद्देश्य से कई कुरीतियों का जन्म पिछले आठ सौ साल में हुआ और यह कुरीतियां महिलाओं के दर्जे को नीचे कर देती हैं। लेकिन इससे पहले भारतीय समाज में महिलाओं का स्थान काफी ऊंचा रहा है। चाहे हमारा समाज पितृसत्तात्मक रहा लेकिन महिलाओं को आदर-सम्मान देने में कभी हिचक नहीं रही। यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता यानी जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है- इस सोच के साथ हमारा समाज चलता रहा है। जिन कुरीतियों का जिक्र मैंने किया उन्हें दूर करने के लिए समाज के भीतर से ही आवाजें उठीं। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती और ईश्वर चंद विद्यासागर जैसे महापुरुषों और समाजसुधारकों ने इनमें से कई कुरीतियों का खात्मा जनचेतना के जरिए कराया। सती प्रथा, बाल विवाह जैसी अमानवीय प्रथाओं को खत्म करने के लिए अंग्रेजों को कानून का सहारा भी लेना पड़ा।
लेकिन क्या मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी क्या एक कुप्रथा है। यह एक परंपरा है। यह सही है कि देश, काल और परिस्थिति के अनुसार परंपराएं भी बदती रहती हैं। सबरीमला के गर्भगृह में भी रजस्वला महिलाओं का प्रवेश देर-सवेर होता ही। इसके लिए समाज के भीतर से ही आवाजें उठने लगी थीं। लेकिन क्या धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किस तरह से किया जाए, इसमें अदालतों की कोई भूमिका होनी चाहिए या नहीं। मेरे विचार से नहीं। क्योंकि किसी भी धर्म के अनुयाइयों में यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। हैरानी नहीं है कि सबरीमाल का फैसला आते ही कुछ लोगों ने यह पूछना शुरू कर दिया कि मस्जिदों में औरतों को नमाज पढ़ने की अनुमति अदालतें कब दिलवाएंगी।
इस संदर्भ में जस्टिस इंदु मल्होत्रा के फैसले का जिक्र करना जरूरी है। पांच जजों की पीठ में वे ऐसे अकेली जज थीं जिन्होंने सबरीमाल मंदिर के गर्भगृह में रजस्वा महिलाओं को अनुमति देने के खिलाफ फैसला किया। उन्होंने कहा कि देश में पंथनिरपेक्ष माहौल बनाये रखने के लिये गहराई तक धार्मिक आस्थाओं से जुड़े विषयों के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। उनका मानना था कि 'सती' जैसी सामाजिक कुरीतियों के अलावा यह तय करना अदालत का काम नहीं है कि कौन सी धार्मिक परंपराएं खत्म की जाएं। उन्होंने कहा कि भगवान अय्यप्पा के श्रद्धालुओं के पूजा करने के अधिकार के साथ समानता के अधिकार का टकराव हो रहा है। इस मामले में मुद्दा सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है। इसका अन्य धार्मिक स्थलों पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
इसीलिए बेहतर होगा कि अदालतें स्वयं ही तय करें कि उनकी सक्रियता का क्या पैमाना हो और उन्हें किस हद तक हस्तक्षेप करना है। मंदिर-मस्जिद,चर्च या गुरुद्वारे के कामकाज में सरकारों और अदालतों का दखल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ है। सरकारें जिस तरह से मंदिरों के संचालन में दखल देती हैं वह भी एक बड़ा मुद्दा है जो देर-सवेर गंभीर रूप लेगा। इसी तरह से सरकारों की ओर से आम लोगों को तीर्थयात्रा कराने के लिए भेजना भी पंथनिरपेक्षता के अनुकूल नहीं है। यह सब बातें जितनी जल्दी हल हो जाएं उतना अच्छा है।

Sunday, March 11, 2018

सोनिया क्यों नहीं बनीं पीएम, जल्दी ही मिल सकता है इसका जवाब




रशीद किदवई राजनीतिक पत्रकारिता का जाना-माना स्तंभ हैं। कोलकाता से प्रकाशित द टेलीग्राफ के एसोसिएट एडीटर किदवई कॉंग्रेस पार्टी के अंदरूनी घटनाक्रमों पर बेहद नज़दीक से नज़र रखते हैं। 



अभी तक उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं जो राजनीतिक पत्रकारिता तथा घटनाक्रमों में दिलचस्पी रखने वालों के लिए किसी संदर्भ ग्रंथ से कम नहीं है। सोनिया- अ बायोग्राफी और 24, अकबर रोड- अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ द पीपुल बिहाइंड राइज़ एंड फॉल ऑफ़ कॉंग्रेस बेहद चर्चित पुस्तकें रही हैं। अब उनकी एक नई पुस्तक बैलट- टेन एपीसोड्स दैट हैव शेप्ड इंडियाज़ डेमोक्रेसी हाथों में आई है।

इस पुस्तक में भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया यानी चुनाव को दिलचस्प ढंग से पाठकों के सामने रखने का प्रयास किया गया है। पहले चुनाव के लिए की गईं व्यापक तैयारियों की तस्वीर रखी गई है। कई रोचक जानकारियां भी हैं। जैसे- पहले आम चुनाव में हर उम्मीदवार के लिए एक बैलेट बॉक्स था। इसके लिए गोदरेज के कारखाने में लोहे के 12 लाख बॉक्स बनाए गए। नौ इंच के इन बक्सों को अगर एक के ऊपर एक रख दिया जाता तो इनकी ऊंचाई माउंट एवरेस्ट तक पहुंच सकती थी।

पहले चुनाव के लिए जवाहरलाल नेहरु ने 40 हजार किलोमीटर की यात्रा की और करीब साढ़े तीन करोड़ लोगों को संबोधित किया। इस अभियान में उनकी बेटी इंदिरा गांधी उनके साथ रहीं और बाद में उन्होंने अपने पति फिरोज़ गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली का ज़िम्मा संभाला। हालांकि पुस्तक कहती है कि अगर फिरोज़ गांधी की इंदिरा से शादी नहीं भी नहीं हुई होती तो भी उन्हें कॉंग्रेस से टिकट मिल जाता।

मौजूदा लोक सभा में कोई भी नेता विपक्ष नहीं है। पहली लोक सभा में भी कोई नेता विपक्ष नहीं था। पुस्तक के अनुसार इसकी वजह पहली लोक सभा के अध्यक्ष जी वी मावलंकर का नियम था जिसमें कहा गया था कि नेता विपक्ष का पद प्राप्त करने के लिए सदन की कुल संख्या के दस फीसदी सांसद होने आवश्यक हैं। पुस्तक आगे कहती है कि इसी नियम के चलते 17 साल तक लोक सभा में कोई भी नेता विपक्ष नहीं रहा।

पुस्तक में ऐसे दिलचस्प उदाहरणों और घटनाक्रमों का सिलसिला पाठकों को बांधे रखता है। कहा जाता है कि पत्रकारिता जल्दबाज़ी में लिखा गया इतिहास है। लेकिन क़िदवई की पुस्तक पढ़कर लगता है कि प्रामाणिक इतिहास से रूबरू हो रहे हैं। सभी ऐतिहासिक तथ्यों को संदर्भों के साथ पिरोया गया है जो पाठकों को पूरी किताब एक ही सांस में पढ़ जाने के लिए प्रेरित करते हैं। 

जैसा कि नाम से स्पष्ट है, पुस्तक में पिछले सत्तर साल के उन दस महत्वपूर्ण घटनाक्रमों तथा शख्सियतों का ज़िक्र है जिनका चुनावों पर गहरा असर प़ड़ा। इसमें इंदिरा गांधी के गूंगी गुड़िया से गरीबी हटाओ तक की यात्रा का विस्तार से वर्णन किया गया है तो वहीं दक्षिणपंथी ताकतों के उभार का भी सिलसिलेवार ढंग से चित्रण किया गया। इंदिरा, राजीव गांधी के साथ ही राष्ट्रीय परिदृश्य पर अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी के छाने के कारणों का उल्लेख है तो वहीं क्षेत्रीय राजनीति में अपने दम से छा जाने वाले बाल ठाकरे, ममता बनर्जी और मायावती जैसे दिग्गजों का भी नज़दीकी से आकलन किया गया है।

2004 में कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन की जीत और सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार करने के घटनाक्रम पर भी किदवई ने विस्तार से लिखा है। सोनिया गांधी ने यह पद क्यों अस्वीकार किया, इसका जवाब अभी तक खोजा जा रहा है। हालांकि किदवई का अपना अलग आकलन है और वो इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करते हैं।

किदवई की यह महत्वपूर्ण पुस्तक जल्दी ही पाठकों के बीच होगी। इसे  हैचेट इंडिया ने प्रकाशित किया है।

Friday, November 24, 2017

चुनाव के वक्त संसद में काम नहीं सिर्फ शोर

संसद का शीतकालीन सत्र 15 दिसंबर को शुरू होगा यानी गुजरात में मतदान खत्म होने के ठीक एक दिन बाद। पिछले साल यह सत्र 16 नवंबर को शुरू हुआ था और 16 दिसंबर को समाप्त हुआ। यानी हम यह मान कर चल सकते हैं कि अगर इस साल गुजरात विधानसभा चुनाव नहीं होता तो शीत सत्र भी नवंबर के तीसरे सप्ताह में शुरू होकर दिसंबर के तीसरे सप्ताह में समाप्त होता। लेकिन विधानसभा चुनाव की वजह से संसद सत्र देर से शुरू हो रहा है और समाप्त 5 जनवरी को होगा यानी अगले वर्ष। सवाल पूछा जा रहा है क्या एक राज्य के चुनाव की वजह से संसद का कामकाज टाला जा सकता है। लेकिन सवाल ये भी है कि क्या एक राज्य के चुनाव की वजह से संसद में सामान्य कामकाज हो सकता था?

यह सवाल इसलिए क्योंकि इससे पहले भी संसद के कई सत्र विधानसभा चुनावों का अखाड़ा बन कर हंगामे की भेंट चढ़ चुके हैं। कई बार तो राजनीतिक दलों में आपसी सहमति से यह तय हो गया कि चूंकि राज्यों के चुनाव अधिक महत्वपूर्ण हैं इसलिए संसद का सत्र या तो छोटा कर दिया गया या फिर टाल दिया गया। सबसे ताजा उदहारण यूपीए सरकार के वक्त 2011 का है। तब राजनीतिक दलों में सहमति बनी कि संसद के कामकाज से ज्यादा जरूरी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं इसलिए बजट सत्र छोटा कर दिया गया। सांसदों ने पाया कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल राज्यों के चुनाव में प्रचार के लिए समय नहीं मिल सकेगा इसलिए बजट सत्र छोटा कर दिया गया।

यूपीए की एक और मिसाल बेहद दिलचस्प है। 2008 में मॉनसून सत्र दिसंबर तक बढ़ा दिया गया था। यानी ठंड में बारिश करा दी गई थी। इसके पीछे वजह यह थी कि मॉनसून सत्र में न्यूक्लियर डील के विरोध में यूपीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। नियमानुसार एक ही सत्र में दो बार अविश्वास प्रस्ताव नहीं आ सकता इसलिए दोबारा अविश्वास प्रस्ताव से बचने के लिए मॉनसून सत्र को दिसंबर तक खींच दिया गया था। इसी तरह तेलंगाना पर हो रहे लगातार हंगामे के चलते यूपीए सरकार ने 2013 में शीत सत्र को दो दिन पहले ही समाप्त कर दिया था।

हालांकि संसद सत्र बुलाने या उसकी निश्चित अवधि रखने का कोई नियम नहीं है। नियम सिर्फ यह है कि दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। सरकारें अपनी सुविधा के अनुसार सत्र कभी भी बुला सकती हैं और समय से पहले समाप्त भी कर सकती हैं। एनडीए सरकार ने इसी बात का फायदा पिछले साल उठाया था जब बजट सत्र को दो हिस्सों में बांट दिया था क्योंकि वो शत्रु परिसंपत्ति विधेयक को पारित नहीं करा पाई थी और दोबारा अध्यादेश लाना चाहती थी।

लेकिन चुनावों का असर सिर्फ संसद सत्र पड़ने पर ही सवाल क्यों उठाया जाता है। क्या हम यह नहीं देखते हैं कि किस तरह बार-बार होने वाले चुनावों का सरकारों के काम पर असर पड़ता है। खजाने पर बोझ पड़ता है और लोगों के कल्याण के लिए चल रही कई योजनाओं पर विपरीत असर होता है। देश में हर वक्त कोई न कोई चुनाव कहीं न कहीं पर हो रहा होता है। पंचायत से लेकर विधानसभाओं और लोक सभा के चुनाव तक। कहने के लिए विधानसभाओं और लोक सभा का कार्यकाल पांच साल के लिए है लेकिन बीच-बीच में होने वाले उपचुनाव भी सरकारों के हाथ बांधते हैं।

जाहिर है इसका सही समाधान पूरे देश में एक साथ सारे चुनाव कराना है। इससे हर दो-तीन महीने में चुनाव की वजह से होने वाली परेशानियों से छुटकारा पाया जा सकता है. परंतु इस समाधान को विचारधारा का मुद्दा बना कर एक बड़ा तबका विरोध करता है। ऐसा नहीं है कि इसे लागू करने में दिक्कतें नहीं हैं। इसका कम से कम अगले दस वर्ष का कैलेंडर बनाना होगा। कई विधानसभाओं का कार्यकाल छोटा करना होगा तो कुछ का बढ़ाना होगा। लेकिन कहीं न कहीं शुरुआत तो करनी होगी। अन्यथा चुनावों को लेकर संसद के कामकाज को लेकर शिकायतें करने से कुछ हासिल नहीं होगा।


इसी के साथ संसद के कामकाज का कैलेंडर बनाना और उसके कार्यदिवसों को तय करना होगा। संसद न सिर्फ कानून बनाने का मंच है बल्कि सरकार की जवाबदेही और उसके कामकाज की पारदर्शिता को कसौटी पर कसने का माध्यम भी है। न सिर्फ हर सत्र के शुरुआत और समापन की तारीखें तय हों बल्कि कितने दिन काम हो, यह भी तय होना चाहिए। सांसदों को हंगामे के बजाए अपनी बात तर्कों और तथ्यों से रखने के लिए भी प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। दिलचस्प बात यह है कि पिछले चार साल यानी 2011 से 2016 के शीतकालीन सत्र के कामकाज का अगर हिसाब लें तो पता चलता है कि सबसे कम काम शीत सत्रों में ही हुआ है। पिछले साल का शीत सत्र इस लोक सभा का सबसे कम उत्पादक सत्र रहा है। हालांकि यह बहुत कुछ मुद्दों पर भी निर्भर करता है परंतु सवाल यह भी है कि अगर संसद काम के बजाय सिर्फ शोर करने के लिए है तो फिर क्या उसकी गरिमा कम नहीं हो रही है?

Thursday, November 23, 2017

आरक्षण का झांसा कब तक

 पाटीदार अनामत (आरक्षण) आंदोलन समिति के नेता हार्दिक पटेल ने कहा है कि कांग्रेस गुजरात में पाटीदारों को आरक्षण देने पर सहमत हो गई है। इसके लिए फार्मूला तैयार हो गया है और विशेष कैटेगरी बनाकर आरक्षण दिया जाएगा। पटेल का कहना है कि इस फार्मूले के तहत राज्य में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग को मिल रहे मौजूदा 49% आरक्षण को नहीं छेड़ा जाएगा बल्कि पचास फीसदी से ऊपर आरक्षण मिलेगा। पटेल ये भी कहते हैं कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि पचास फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता। पटेल ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल से बातचीत के बाद ये ऐलान किया है। सिब्बल फार्मूले का खुलासा करने के बजाए सिर्फ इतना कहते हैं कि संविधान के दायरे में रह कर आरक्षण दिया जाएगा।

जब पटेल कहते हैं कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि पचास फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता और कानून तथा संविधान के जानकार कपिल सिब्बल इस पर खामोश रहते हैं तो समझ जाना चाहिए कि मामला इतना आसान नहीं है। क्योंकि शायद सिब्बल भी जानते हैं कि चुनाव में जाने से पहले पाटीदार मतदाताओं को भरोसा दिलाने के लिए चाहे आरक्षण का लॉलीपाप थमा दिया जाए लेकिन इसे लागू करना असंभव है। विशेष कैटेगरी बनाने के लिए आयोग का गठन ऐसा वादा है जो आरक्षण की दिशा में तो ले जाता है लेकिन उसे पूरा नहीं करते। पूरा कर भी नहीं सकते क्योंकि अदालतें ऐसा नहीं होने देंगी।

पचास फीसदी से अधिक आरक्षण करने के लिए तमिलनाडु का उदाहरण बार-बार दिया जाता है। यह कहा जाता है कि तमिलनाडु की ही तरह आरक्षण बढ़ा कर 69 फीसदी कर इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में रखा जा सकता है ताकि अदालतें इसकी पड़ताल न कर सकें। हालांकि इस पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी आना बाकी है। कांग्रेस गुजरात में संविधान के अनुच्छेद 31 सी की तहत आरक्षण देना चाह रही है। यह अनुच्छेद नौवीं अनुसूची का मुख्य हिस्सा है जिनके तहत बनाए गए कानूनों की वैधता को अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है। लेकिन आज टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक 11 जनवरी 2007 को आई आर कोइल्हो मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ऐसा हो पाना संभव नहीं है। इसमें कहा गया है कि अगर कोई कानून संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड करता पाया गया तो उसे नौवीं अनुसूची के तहत सुरक्षा प्रदान नहीं होगी।

लेकिन सिर्फ कॉंग्रेस ही नहीं, आरक्षण को चुनावी हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल करने में बीजेपी या अन्य राजनीतिक दल भी पीछे नहीं हैं। इससे बड़ी विडंबना नहीं हो सकती कि बीजेपी हार्दिक पटेल के दावों की पोल खोलने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जिस ताजा आदेश का हवाला दे रही है वो उसके अपने ही शासन वाले राज्य राजस्थान का है। वहां गुर्जरों को पांच फीसदी आरक्षण देने का राज्य सरकार का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने यह कहते हए रोक दिया कि ऐसा करने से आरक्षण की पचास फीसदी की सीमा पार हो जाएगी। गुजरात बीजेपी सरकार ने ही पिछले दरवाजे से पटेलों को आरक्षण देने की कोशिश की थी। तब छह लाख रुपए तक वार्षिक आमदनी पाने वाले गरीब सवर्णों को दाखिले में दस फीसदी आरक्षण के लिए अध्यादेश लाया गया था लेकिन ये अदालतों में नहीं टिक सका था।

आरक्षण को वोट पाने का राजनीतिक हथियार बनाने का यह खेल देश को पीछे ले जा रहा है। आरक्षण का झांसा देकर और झूठे वादे कर चुनावों में वोट तो हासिल हो सकते हैं लेकिन इससे आरक्षण की मूल सोच को बहुत गहरी ठेस पहुँचती है। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछडों को आरक्षण देने के विचार के पीछे भारतीय समाज की गहरी समझ और उसके अंतर्विरोधों को दूर करने की इच्छा रही है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में स्पष्ट किया कि आरक्षण देने का आधार आर्थिक रूप से पिछड़ा नहीं हो सकता लेकिन ओबीसी आरक्षण में भी क्रीमी लेयर का प्रावधान यही सोच कर किया गया कि आरक्षण हक के तौर पर नहीं बल्कि हक लेने के हथियार के तौर पर होना चाहिए। पचास फीसदी की सीमा भी इसी फैसले में बांधी गई थी। इसके पीछे सोच यह रही है कि पचास फीसदी से अधिक आरक्षण देने का मतलब होगा रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन। मतलब ये कि आरक्षण लोगों को ऊपर से नीचे लाने का जरिया बन जाएगा न कि नीचे से ऊपर ले जाने का।

चाहे गुजरात में पाटीदार आंदोलन हो या राजस्थान में गुर्जर या फिर महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन, शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण इन समस्याओं का न तो फौरी समाधान है और न ही दीर्घकालीन। खेती से जुड़ी इन जातियों की समस्या का मूल कारण खेती में देश भर में आया संकट है। परिवार बढ़ता गया है और खेत का आकार कम होता चला गया है। खेती से होने वाली आमदनी कम हो रही है। रोजगार के अवसर नहीं हैं। सरकारी नौकरियों में ही सुरक्षित भविष्य नजर आता है। देश के अलग-अलग राज्यों में आरक्षण के लिए नए सिरे से उठी मांग के पीछे यही कारण है।


पर ये ऐसी समस्या है जिसका हल तुरंत नहीं होने वाला है। शायद इसीलिए राजनीतिक दलों को लगता है कि समस्याओं के दीर्घकालीन हल के बारे में बात करने या उस दिशा में काम करने के बजाए चुनावों में वोट पाने का एक ही तरीका है- आरक्षण का झूठा वादा। यह जानते हुए भी कि अदालतों में यह नहीं टिक सकेगा, राजनीतिक दलों में ऐसे वादे करना आम बात हो गई है। पर सवाल ये है कि आम लोग हकीकत जानते हुए भी कब तक झांसों का शिकार होते रहेंगे?

Sunday, April 09, 2017

क्या ईवीएम में छेड़छाड़ हो सकती है? पढ़िए क्या कहता है चुनाव आयोग!!

पिछले दिनों भारतीय निर्वाचन आयोग की इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों को लेकर आमजनों के मस्तिष्क में कुछ सवाल उठे हैं। निर्वाचन आयोग बार-बार कहता रहा है कि ईसीआई-ईवीएम और उनसे संबंधित प्रणालियां सुदृढ़, सुरक्षित और छेड़खानी-मुक्त हैं।

 निम्नांकित बार बार पूछे जाने वाले प्रश्नों (एफएक्यूज़) के उत्तरों के जरिए ईवीएम की अद्यतन प्रौद्योगिकी संबंधी विशेषताओं सहित सुरक्षा विशेषताओं की विस्तृत जानकारी दी गई है। इनमें यह भी बताया गया है कि इन मशीनों के विनिर्माण से लेकर भंडारण तक इनके इस्तेमाल के प्रत्येक चरण में कड़े प्रशासनिक उपाय किए जाते हैं।


पत्र सूचना कार्यालय 
भारत सरकार
चुनाव आयोग 
09-अप्रैल-2017 09:52 IST 
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भारत निर्वाचन आयोग – ईवीएम की सुरक्षा विशेषताओं के बारे में बार बार पूछे जाने वाले प्रश्न  

पिछले दिनों भारतीय निर्वाचन आयोग की इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों को लेकर आमजनों के मस्तिष्क में कुछ सवाल उठे हैं। निर्वाचन आयोग बार-बार कहता रहा है कि ईसीआई-ईवीएम और उनसे संबंधित प्रणालियां सुदृढ़, सुरक्षित और छेड़खानी-मुक्त हैं।
 निम्नांकित बार बार पूछे जाने वाले प्रश्नों (एफएक्यूज़) के उत्तरों के जरिए ईवीएम की अद्यतन प्रौद्योगिकी संबंधी विशेषताओं सहित सुरक्षा विशेषताओं की विस्तृत जानकारी दी गई है। इनमें यह भी बताया गया है कि इन मशीनों के विनिर्माण से लेकर भंडारण तक इनके इस्तेमाल के प्रत्येक चरण में कड़े प्रशासनिक उपाय किए जाते हैं।
  1.  ईवीएम के साथ छेड़खानी करने का क्या अर्थ है ?  
 टैम्परिंग या छेड़खानी का अर्थ है, कंट्रोल यूनिट (सीयू) की मौजूदा माइक्रो चिप्स पर लिखित साफ्टवेयर प्रोग्राम में बदलाव करना या सीयू में नई माइक्रो चिप्स इंसर्ट करके दुर्भावनापूर्ण साफ्टवेयर प्रोग्राम शुरू करना और बैलेट यूनिट में प्रेस की जाने वाली ऐसी ‘कीज़’ बनाना, जो कंट्रोल यूनिट में वफादारी के साथ परिणाम दर्ज न करती हो।
  1. क्या ईसीआई-ईवीएम को हैक किया जा सकता है?
 नहीं।
ईवीएम मशीनों के एम 1 (माडल 1) का विनिर्माण 2006 तक पूरा कर लिया गया था और कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा किए जा रहे दावों के विपरीत एम 1 मशीनों की सभी अनिवार्य तकनीकी विशेषताओं को ऐसा बनाया गया था, कि उन्हें हैक न किया जा सके।
 2006 में तकनीकी मूल्यांकन समिति की सिफारिशों के आधार पर 2006 के बाद और 2012 तक विनिर्मित ईवीएम के एम 2 माडल में अतिरिक्त सुरक्षा विशेषता के रूप में एन्क्रिप्टिड फार्म यानी कूट रूप में प्रमुख कोड्स की डायनामिक कोडिंग शामिल की गई, जिसके फलस्वरूप बैलेट यूनिट से कंट्रोल यूनिट में की-प्रेस संदेश हस्तांतरित करना संभव हुआ। इसमें प्रत्येक की-प्रेस की रीयल टाइम सेटिंग भी शामिल है, ताकि तथाकथित दुर्भावनापूर्ण सीक्वेंस की गई की-प्रेस सहित की-प्रेस की सीक्वेंसिंग का पता लगाया जा सके और रैप्ड किया जा सके।
 इसके अतिरिक्त ईसीआई-ईवीएम कम्प्यूटर नियंत्रित नहीं है, वे स्टैंड अलोन यानी स्वतंत्र मशीनें हैं और वे इंटरनेट और/या किसी अन्य नेटवर्क के साथ किसी भी समय बिंदु पर कनेक्टिड नहीं हैं। अतः किसी रिमोट डिवाइस के जरिए उन्हें हैक करने की कोई गुंजाइश नहीं है।
 ईसीआई-ईवीएम में वायरलेस या किसी बाहरी हार्डवेयर पोर्ट के लिए किसी अन्य गैर-ईवीएम एक्सेसरी के साथ कनेक्शन के जरिए कोई फ्रीक्वेंसी रिसीवर या डेटा के लिए डीकार्डर नहीं है।  अतः हार्डवेयर पोर्ट या वायरलेस या वाईफाई या ब्लूटूथ डिवाइस के जरिए किसी प्रकार की टैम्परिंग या छेड़छाड़ संभव नहीं है, क्योंकि कंट्रोल यूनिट (सीयू) बैलेट यूनिट (बीयू) से केवल एन्क्रिप्टिड या डाइनामिकली कोडिड डेटा ही स्वीकार करती है। सीयू द्वारा किसी अन्य प्रकार का डेटा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
  1. क्या विनिर्माताओं द्वारा ईसीआई-ईवीएम में कोई हेराफेरी (मैनीपुलेशन) की जा सकती है?

संभव नहीं है।  
साफ्टवेयर की सुरक्षा के बारे में विनिर्माता के स्तर पर कड़ा सुरक्षा प्रोटोकोल लागू किया गया है। ये मशीनें 2006 से अलग अलग वर्षों में विनिर्मित की जा रही हैं। विनिर्माण के बाद ईवीएम को राज्य और किसी राज्य के भीतर जिले से जिले में भेजा जाता है। विनिर्माता इस स्थिति में नहीं हो सकते कि वे कई वर्ष पहले यह जान सकें कि कौन सा उम्मीदवार किस निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ेगा और बैलेट यूनिट में उम्मीदवारों की सीक्वेंस क्या होगी। इतना ही नहीं, प्रत्येक ईसीआई-ईवीएम का एक सीरियल नम्बर है और निर्वाचन आयोग ईवीएम-ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके अपने डेटा बेस से यह पता लगा सकता है कि कौन सी मशीन कहां पर है। अतः विनिर्माण के स्तर पर हेराफेरी की कोई गुंजाइश नहीं है।
  1. क्या सीयू में चिप के भीतर ट्रोजन होर्स को घुसाया जा सकता है?
 ईवीएम में वोटिंग की सीक्वेंस निम्नांकित अनुसार ट्रोजन होर्स के इंजेक्शन की आशंका को समाप्त करती है। निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए कड़े सुरक्षा उपाय फील्ड में ट्रोजन होर्स का प्रवेश असंभव बना देते हैं।
जब कंट्रोल यूनिट में कोई बैलेट की प्रेस की जाती है, तो सीयू, बीयू को वोट रजिस्टर करने की अनुमति देती है और बीयू में की-प्रेस होने का इंतजार करती है। इस अवधि के दौरान सीयू में सभी कीज़ उस वोट के कास्ट होने की समूची सीक्वेंस पूरा होने तक निष्क्रिय हो जाती हैं। किसी मतदाता द्वारा कीज़ (उम्मीदवारों के वोट बटन) में से कोई एक की दबाने के बाद बीयू उस की से संबंधित जानकारी सीयू को ट्रांसफर करती है। सीयू को डेटा प्राप्त होता है और वह तत्क्षण  बीयू में एलईडी लैंप की चमक के साथ उसकी प्राप्ति स्वीकार करती है। सीयू में बैलेट को सक्षम करने के बाद केवल ‘प्रथम प्रेस की गई की’ को सीयू द्वारा सेंस और स्वीकार किया जाता है। इसके बाद, भले ही कोई मतदाता अन्य बटनों को दबाता रहे, उसका कोई असर नहीं होता, क्योंकि बाद में दबाए गए बटनों के परिणामस्वरूप सीयू और बीयू के बीच कोई कम्युनिकेशन नहीं होता है और न ही बीयू किसी की-प्रेस को रजिस्टर करती है। इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि सीयू का इस्तेमाल करके सक्षम किए गए प्रत्येक बैलेट के लिए केवल एक वैध की-प्रेस (प्रथम की-प्रेस) होता है। एक बार वैध की प्रेस होने (वोटिंग प्रक्रिया पूरी होने) पर सीयू और बीयू के बीच कोई गतिविधि तब तक नहीं होती, जब तक कि सीयू द्वारा अन्य बैलेट सक्षम बनाने वाली की प्रेस की व्यवस्था नहीं कर दी जाती। अतः देश में इस्तेमाल की जा रही इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों में तथाकथित ‘सीक्वेंस्ड की प्रेसिज़’ यानी ‘सिलसिलेवार बटन दबाने’ के जरिए दुर्भावनापूर्ण संकेत भेजना संभव नहीं है।
  1. क्या ईसीआई-ईवीएम का पुराना मॉडल अभी भी चलन में है?
 ईवीएम मशीनों का एम 1 माडल 2006 में बनाया गया था और पिछली बार 2014 के आम चुनावों में इस्तेमाल किया गया था। 2014 में जिन ईवीएम मशीनों ने 15 वर्ष का जीवनकाल पूरा कर लिया था और एम 1 माडल की ऐसी मशीनें, जो वीवीपीएटी (वोटर-वेरिफाइड पेपर आडिट ट्रेल) के अनुकूल नहीं थीं, को देखते हुए निर्वाचन आयोग ने 2006 तक विनिर्मित सभी एम 1 ईवीएम को हटाने का फैसला किया। ईवीएम मशीनों को हटाने के लिए निर्वाचन आयोग ने एक मानक प्रचालन प्रक्रिया (एसओपी) निर्धारित की है। ईवीएम और उसके चिप को नष्ट करने की प्रक्रिया को विनिर्माताओं की फैक्टरी के भीतर राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी या उसके प्रतिनिधि की मौजूदगी में अंजाम दिया जाता है।
  1. क्या ईसीआई-ईवीएम के साथ भौतिक रूप से छेड़छाड़ की जा सकती है या बिना किसी के ध्यान में आए उनके संघटकों को बदला जा सकता है?
ईसीआई-ईवीएम के पुराने मॉडलों एम1 एवं एम2 में विद्यमान सुरक्षा विशेषताओं के अतिरिक्त 2013 के बाद बनाई गई नई एम3 ईवीएम में टेम्पर डिटेक्शन एवं सेल्फ डाइगनोस्टिक्स जैसी अतिरिक्त विशेषताएं हैं। टेम्पर डिटेक्शन विशेषता के कारण जैसे ही कोई व्यक्ति मशीन खोलने का प्रयास करता है, ईवीएम निष्क्रिय हो जाता है। सेल्फ डाइगनोस्टिक्स विशेषता के कारण जब भी ईवीएम मशीन को स्विच ऑन किया जाता है, यह पूरी तरह मशीन की जांच करता है। इसके हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर में किसी भी परिवर्तन का इससे पता लग जाएगा।
उपरोक्त विशेषताओं के साथ नये मॉडल एम3 का एक प्रोटोटाइप जल्द ही तैयार हो जाएगा। एक तकनीकी विशेषज्ञ समिति इसकी जांच करेगी और फिर निर्माण आरंभ हो जाएगा। उपरोक्त अतिरिक्त विशेषताओं एवं नई प्रौद्योगिकीय उन्नतियों के साथ एम3 ईवीएम की खरीद के लिए सरकार द्वारा लगभग 2000 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
  1. . ईसीआई-ईवीएम को छेड़खानी मुक्त बनाने के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकीय विशेषताएं क्या हैं?
ईसीआई-ईवीएम मशीन को 100 प्रतिशत छेड़खानी मुक्त बनाने के लिए कई अन्य कदमों के अलावा वन टाइम प्रोग्रामेबल (ओटीपी) माइक्रोकंट्रोलर्स, की कोड्स की गतिशील कोडिंग, प्रत्येक की प्रेस की तिथि एवं समय की स्टाम्पिंग, उन्नत इनक्रिप्शन प्रौद्योगिकी एवं ईवीएम लॉजिस्टिक्स के संचालन के लिए ईवीएम ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर जैसी सर्वाधिक परिष्कृत प्रौद्योगिकीय विशेषताओं का उपयोग करती है। इसके अतिरिक्त, नये मॉडल एम3 ईवीएम में टेम्पर डिटेक्शन एवं सेल्फ डाइगनोस्टिक्स जैसी अतिरिक्त विशेषताएं भी हैं। चूंकि, सॉफ्टवेयर ओटीपी पर आधारित है, प्रोग्राम को न तो बदला जा सकता है, न ही इसे रि-राइट या रि-रेड ही किया जा सकता है। इस प्रकार यह ईवीएम को छेड़खानी मुक्त बना देता है। अगर कोई इसकी कोशिश करता भी है तो मशीन निष्क्रिय बन जाएगी।   

  1. क्या इसीआई-ईवीएम विदेशी प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हैं?
इस प्रकार की गलत सूचना एवं जैसा कि कुछ लोग आरोप लगाते हैं, के विपरीत भारत विदेशों में बने किसी ईवीएम का उपयोग नहीं करता। ईवीएम का निर्माण स्वदेशी तरीके से सार्वजनिक क्षेत्र की दो कंपनियों यथा-भारत इलेक्ट्रोनिक्स लिमिटेड, बेंगलुरु एवं इलेक्ट्रोनिक्स कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद द्वारा किया जाता है। सॉफ्टवेयर प्रोग्राम कोड इन दोनों कंपनियों द्वारा आंतरिक तरीके से तैयार किया जाता है न कि उन्हें आउटसोर्स किया जाता है। ये सुरक्षा के सर्वोच्च मानकों का अनुपालन करने और उन्हें बनाए रखने के लिए फैक्ट्री स्तर पर सुरक्षा प्रक्रियाओं के विषय होते हैं। प्रोग्राम को मशीन कोड में रुपांतरित किया जाता है और उसके बाद ही विदेशों के चिप मैन्युफैक्चर्र को दिया जाता है, क्योंकि हमारे पास देश के भीतर सेमीकंडक्टर माइक्रोचिप निर्माण करने की क्षमता नहीं है।
प्रत्येक माइक्रोचिप के पास मेमोरी में सन्निहित एक पहचान संख्या होती है और उन पर निर्माताओं के डिजिटल हस्ताक्षर होते  हैं। इसलिए,उनके विस्थापन का कोई प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि माइक्रोचिप्स सॉफ्टवेयर से संबंधित क्रियात्मक परीक्षणों के के विषय होते हैं। माइक्रोचिप को विस्थापित करने की किसी भी कोशिश का पता लगाया जा सकता है और ईवीएम को निष्क्रिय बनाया जा सकता है। इस प्रकार, वर्तमान प्रोग्राम को परिवर्तित करने एवं नया प्रोग्राम लागू करने, दोनों का ही पता लगाया जा सकता है जिसके बाद ईवीएम को निष्क्रिय बनाया जा सकता है।
  1. भंडारण के स्थान पर हेरफेर किए जाने की कितनी आशंका हैं ?
जिला मुख्यालय में ईवीएम को उपयुक्त सुरक्षा के तहत एक दोहरे ताले वाली प्रणाली में रखा जाता है। उनकी सुरक्षा की समय-समय पर जांच की जाती है। अधिकारी स्ट्रॉंग रूम को नहीं खोलते हैं, लेकिन वे इसकी जांच करते हैं कि ये पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं और क्या ताला समुचित अवस्था में है या नहीं। किसी भी अनधिकृत व्यक्ति को किसी भी स्थिति में ईवीएम के पास जाने की अनुमति नहीं होती।  जब चुनाव का समय नहीं होता है, इस अवधि के दौरान, सभी ईवीएम का वार्षिक भौतिक सत्यापन डीईओ द्वारा किया जाता है और ईसीआई को रिपोर्ट भेजी जाती है। निरीक्षण एवं जांच का कार्य अभी हाल ही में संपन्न किया गया है।
  1. स्थानीय निकाय चुनावों में ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप किस हद तक सही हैंं?
न्यायाधिकार क्षेत्र के बारे में जानकारी  के अभाव के कारण इस संबंध में गलतफहमी है। नगरपालिका निकायों या पंचायत चुनावों जैसे ग्रामीण निकायों के चुनावों के मामले में उपयोग में लाए गए ईवीएम भारत के चुनाव आयोग के नहीं होते। स्थानीय निकाय चुनावों से ऊपर के चुनाव राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) के अधिकार क्षेत्र के तहत आते हैं, जो अपनी खुद की मशीने खरीदते हैं और उनकी अपनी संचालन प्रणाली होती है। भारत का चुनाव आयोग उपरोक्त चुनावों में एसईसी द्वारा उपयोग में लाए गए ईवीएम के कामकाज के लिए जिम्मेदार नहीं है।
  1. ईसीआई–ईवीएम के साथ छेड़छाड़ न हो सके, यह सुनिश्चित करने के लिए सतत जांच एवं निगरानी के विभिन्न स्तर कौन से हैं
  • प्रथम स्तर जांच : बीईएल/ ईसीआईएल के इंजीनियर प्रत्येक ईवीएम की तकनीकी एवं भौतिक जांच के बाद संघटकों की मौलिकता को प्रमाणित करते हैंजो कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के समक्ष किया जाता है। त्रुटिपूर्ण ईवीएम को वापस फैक्ट्री में भेज दिया जाता है। एफएलसी हॉल को साफ-सुथरा बनाया जाता है, प्रवेश को प्रबंधित किया जाता है एवं अंदर किसी भी कैमरा, मोबाइल फोन या स्पाई पेन लाने की अनुमति नहीं दी जाती है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के द्वारा औचक रूप से चुने गए 5 प्रतिशत ईवीएम पर न्यूनतम 1000 मतों का एक कृत्रिम मतदान किया जाता है और उनके सामने इसका परिणाम प्रदर्शित किया जाता है। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की जाती है।
  • यादृच्छिकीकरण (रैंडोमाइजेशन) : किसी विधान सभा और बाद में किसी मतदान केंद्र को आवंटित किए जाने के समय ईवीएम की दो बार बेतरतीब तरीके से (यादृच्छिक) जांच की जाती है जिससे किसी निर्धारित आवंटन की संभावना खत्म हो जाए। मतदान प्रारंभ होने से पहले, चुनाव वाले दिन उम्मीदवारों के मतदान एजेंटों के समक्ष मतदान केंद्रों पर कृत्रिम मतदान का संचालन किया जाता है। मतदान के बाद ईवीएम को सील किया जाता है और मतदान एजेंट सील पर अपने हस्ताक्षर करते हैं। मतदान एजेंट परिवहन के दौरान स्ट्रॉंग रूम तक जा सकते हैं।
  • स्ट्रॉंग रूम उम्मीदवार या उनके प्रतिनिधि स्ट्रॉंग रूम पर अपने खुद के सील लगा सकते हैं, जहां मतदान के बाद मतदान किए हुए ईवीएम का भंडारण किया जाता है और वे स्ट्रॉग रूम के सामने शिविर भी लगा सकते हैं। इन स्ट्रॉंग रूम की सुरक्षा 24 घंटे बहुस्तरीय तरीके से की जाती है।
  • मतगणना केंद्र मतदान किए हुए ईवीएम को मतगणना केंद्रों पर लाया जाता है और मतगणना आरंभ होने से पहले उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों के समक्ष सीलों और सीयू की विशिष्ट पहचान प्रदर्शित की जाती है।
  1. क्या हेरफेर किए गए किसी ईवीएम को बिना किसी की जानकारी के मतदान प्रक्रिया में पुनशामिल किया जा सकता है?
इसका प्रश्न ही नहीं उठता
ईसीआई द्वारा ईवीएम को छेड़छाड़ मुक्त बनाने के लिए उठाए गए सतत जांच एवं निगरानी  के ठोस कदमों की उपरोक्त श्रृंखला को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि न तो मशीनों के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है और न ही त्रृटिपूर्ण मशीनों को किसी भी समय मतदान प्रक्रिया में फिर से शामिल ही किया जा सकता है क्योंकि गैर ईसीआई-ईवीएम का उपरोक्त प्रक्रिया और बीयू एवं सीयू से बेमेल होने के कारण उनका पता लगा लिया जाएगा। कड़ी जांचों एवं परीक्षणों के विभिन्न स्तरों के कारण न तो ईसीआई-ईवीएम ईसीआई प्रणाली को छोड़ सकता है और न ही कोई बाहरी मशीन (गैर- ईसीआई-ईवीएम) को इस प्रणाली में शामिल किया जा सकता है।
  1. अमेरिका एवं यूरोपीय संघ जैसे विकसित देशों ने ईवीएम को क्यों नहीं अपनाया है और कुछ देशों ने यह प्रणाली क्यों त्याग दी है?
कुछ देशों ने अतीत में इलेक्ट्रोनिक मतदान के साथ प्रयोग किया है। इन देशों में मशीनों के साथ समस्या यह थी कि वे कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित थे एवं नेटवर्क से जुड़े थे, जिसके कारण उनमें हैकिंग किए जाने की आशंका थी जिससे इसका उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता था। इसके अतिरिक्त, उनकी सुरक्षा, हिफाजत एवं संरक्षण से संबंधित कानूनों एवं विनियमनों में पर्याप्त सुरक्षा के उपायों की कमी थी। कुछ देशों में अदालतों ने केवल इन्हीं कानूनी आधारों की वजह से ईवीएम के उपयोग को स्थगित कर दिया।
भारतीय ईवीएम एक स्वतंत्र प्रणाली है जबकि अमेरिका, नीदरलैंड, आयरलैंड एवं जर्मनी के पास प्रत्यक्ष रिकार्डिंग मशीने थीं। भारत ने हालांकि आंशिक रूप से ही सही, कागज लेखा परीक्षा निशान (पेपर ऑडिट ट्रेल) लागू किया है। दूसरे देशों के पास लेखा परीक्षण निशान नहीं थे। उपरोक्त सभी देशों में मतदान के दौरान सोर्स कोड को बंद कर दिया जाता है। भारत के पास भी मेमोरी से जुड़े क्लोज्ड सोर्स और ओटीपी है।
दूसरी तरफ, ईसीआई-ईवीएम स्वतंत्र उपकरण है, जो किसी भी नेटवर्क से नहीं जुड़े हैं और इसलिए भारत में व्यक्तिगत रूप से किसी के लिए भी 1.4 मिलियन मशीनों के साथ छेड़छाड़ करना असंभव है। मतदान के दौरान देश में पहले होने वाली चुनावी हिंसा एवं फर्जी मतदान, बूथ कैप्चरिंग आदि जैसी अन्य चुनाव संबंधी गलत प्रचलनों को देखते हुए ईवीएम भारत के लिए सर्वाधिक अनुकूल हैं।
उल्लेखनीय है कि जर्मनी, आयरलैंड एवं नीदरलैंड जैसे देशों के विपरीत भारतीय कानूनों एवं ईसीआई विनियमनों में ईवीएम की सुरक्षा एवं हिफाजत के लिए पर्याप्त अंतर्निहित सुरक्षोपाय हैं। इसके अतिरिक्त, सुरक्षित प्रौद्योगिकीय विशेषताओं के कारण भारतीय ईवीएम बहुत उत्कृष्ट श्रेणी के हैं। भारतीय ईवीएम इस वजह से भी विशिष्ट हैं क्योंकि मतदाताओं के लिए पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए चरणबद्ध तरीके से ईवीएम में वीवीपीएटी का भी उपयोग होने जा रहा है।
नीदरलैंड के मामले में, मशीनों के भंडारण, परिवहन एवं सुरक्षा को लेकर नियमों का अभाव था। नीदरलैंड में बनी मशीनों का उपयोग आयरलैंड एवं जर्मनी में भी किया जाता था। 2005 के एक फैसले में जर्मनी के न्यायालय ने चुनाव की सार्वजनिक प्रकृति एवं मूलभूत कानून के विशेषाधिकार के उल्लंघन के आधार पर मतदान उपकरण अध्यादेश को असंवैधानिक पाया। इसलिए इन देशों ने नीदरलैंड में बनी मशीनों के उपयोग को बंद कर दिया। आज भी अमेरिका समेत कई देश मतदान के लिए मशीनों का उपयोग कर रहे हैं।
ईसीआई-ईवीएम बुनियादी रूप से मतदान मशीनों एवं विदेशों में अपनाई गई प्रक्रियाओं से अलग है। किसी अन्य देश की कंप्यूटर नियंत्रित, ऑपरेटिंग सिस्टम आधारित मशीनों के साथ कोई भी तुलना गलत होगी और उसकी समानता ईसीआई-ईवीएम के साथ नहीं की जा सकती।
  1. वीवीपीएटी सक्षम मशीनों की क्या स्थिति है?
ईसीआई ने मतदाता सत्यापित कागज लेखा परीक्षा निशान (वीवीपीएटी) का उपयोग करते हुए 107 विधानसभा क्षेत्रों एवं 9 लोकसभा चुनाव क्षेत्रों में चुनावों का संचालन किया है। वीवीपीएटी के साथ-साथ एम2 एवं नई पीढ़ी एम3 ईवीएम का उपयोग मतदाताओं के भरोसे एवं पारदर्शिता को बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक योजना है।
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वि.लक्ष्मी/आर.भारद्वाज/ एसकेजे/ एनआर-

Tuesday, December 20, 2016

कैश लेस होने से डरना क्यों?

नोटबंदी के बाद से कैश लेस होने की बात चल रही है। मोदी सरकार का भी जोर अब कैश लेस या लेस कैश होने पर है। हालांकि सरकार से ये सवाल पूछा जा रहा है कि नोटबंदी का मकसद अगर लेस कैश भारत बनाना था तो सरकार ने इसकी ठीक से तैयारी क्यों नहीं की?सरकार ने बिना तैयारी के नोट बंदी की और वैसी ही हड़बड़ी लेस कैश या कैश लेस भारत बनाने में की जा रही है। इसी वजह से जो लोग नोट बंदी का विरोध कर रहे थे, धीरे-धीरे वो भी कैश लेस के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। हालांकि कैश लेस का विरोध करने वालों में एक तबका इसका सिर्फ विचारधारा के चलते विरोध कर रहा है। यानी सिर्फ इसलिए क्योंकि मोदी सरकार लेस कैश पर जोर दे रही है। 

जहां तक मेरे व्यक्तिगत अनुभव का प्रश्न है, मैं आठ नवंबर 2016 यानी नोट बंदी के पहले से ही कई साल से लेस कैश हूं। ऐसा नहीं है कि कैश का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करता। दफ्तर के बाहर झालमुड़ी खाकर चाय पीने से लेकर सब्जी खरीदने तक नकदी चाहिए होती थी। इसी तरह कार में सीएनजी डलवाने और ड्राइवर को तनख्वाह देने तक में नकद पैसा ही देता आया हूं। लेकिन इस तरह के छोटे-छोटे भुगतानों को छोड़ दें तो मेरा अधिकांश लेन-देन बिना नकदी के ही होता रहा है। बिजली, टेलीफोन के बिल, बच्चों के स्कूल की फीस, बीमा का प्रीमियम, राशन की खरीद, ट्रेन-हवाईजहाज के टिकट और यहां तक कि सिनेमा के टिकट भी या तो ऑनलाइन, क्रेडिट/डेबिट कार्ड या फिर चेक से करता आया हूँ। ऐसा करने की पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि ये बेहद सुविधाजनक है। घर बैठे ही लैपटॉप या पीसी पर माउस घुमाते हुए ये सारे काम आसानी से हो जाते हैं। 

लेकिन ऐसा नहीं है कि मैं लेसकैश रातों-रात हुआ। दरअसल, गाजियाबाद के जिस इलाके में रहता हूं वहां जरूरत की चीजें धीरे-धीरे बनी हैं। दक्षिण दिल्ली में रहने वालों के लिए यमुना पार के लोग दोयम दर्जे के हैं। मेरा घर तो यमुना से भी पार एक दूसरी नदी हिंडन के नजदीक है। इस लिहाज से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जब करीब तेरह साल पहले यहां रहने आया तो शुरुआत में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ा होगा। शुरू में घर के नजदीक कोई सब्जी की दुकान तक नहीं थी। सब्जी लेने के लिए मुझे करीब तीन किलोमीटर दूर या तो साहिबाबाद मंडी या फिर सेक्टर 16 के बाजार जाना होता था। बिजली का बिल जमा करने के लिए दो किलोमीटर दूर जाना होता था। नगर निगम का टैक्स हो या फिर कोई और भुगतान, हर बार घर से गाड़ी लेकर आना-जाना जिसमें समय और ईंधन दोनों की बर्बादी भी होती थी। दवाई खरीदनी हो या फिर राशन, हर चीज के लिए गाड़ी लेकर दौड़ लगानी होती थी। बीमे का प्रीमियम देने के लिए एजेंट के पास चेक लेकर जाना और ये याद रखना कि इसे कब देना है। घर में एलपीजी सिलिंडर के लिए भी भागना पड़ता था। ये सारे सिरदर्द होते थे। जाहिर है इनमें से अधिकांश काम के लिए नकदी चाहिए होती थी। घर पर कैश भी रखना पड़ता था। 

समय के साथ चीजें बदलती गईं। धीरे-धीरे ऑनलाइन पेमेंट की आदत डाली। बिजली का बिल ऑनलाइन देने लगा। बिजली देने वाली कंपनी यूपीपीसीएल की वेबसाइट पर ऑनलाइन पेमेंट करने में ट्रांजेक्शन चार्ज वगैरह लगता था। लेकिन बिजलीघर जाकर समय और ईंधन बरबाद करने की तुलना में मुझे ये ज्यादा ठीक लगा कि घर बैठ कर वेबसाइट पर क्रेडिट कार्ड से बिल चुकाया जाए। बीमे के प्रीमियम को क्रे़डिट कार्ड से भरते समय आज भी ट्रांजेक्शन चार्ज की नाम पर कई बार सौ-डेढ़ सौ रुपए तक लग जाते हैं। लेकिन इसकी तुलना अगर इस बात से करें कि क्रेडिट कार्ड पर उधार 50-55 दिन बाद चुकाना होता है और तब तक बैंक के बचत खाते में ही शायद ब्याज के रूप में उतना पैसा मिल जाता है तो बात बराबर ही होती है। बच्चों की फीस शुरू में चेक के जरिए देता था लेकिन नकद कभी नहीं दी। अब पेटीएम के जरिए बच्चों की फीस और बिजली का बिल चुका देता हूं। पेटीएम बिजली के बिल पर तो कभी-कभी कैशबैक भी देता है। सोसाइटी में पीएनजी आए काफी समय हो गया। आईजीएल की वेबसाइट पर बिल चुकाने में कभी परेशानी नहीं हुई। नगर निगम में हाऊस टैक्स हो या फिर नजदीक की किराना दुकान से राशन का सामान। कहीं पर ऑन लाइन पेमेंट होता है तो कहीं क्रेडिट कार्ड से। बीच में ग्रोफर से ऑन लाइन सब्जी भी मंगाई। लेकिन फिर ठीक नहीं लगा तो सामने के सब्जी वाले से ही नकद देकर ले आता हूं।

कैश लेस होने का एक अनुभव मेरे लिए बेहद अनूठा रहा। मुझे व्यक्तिगत काम से इंदौर जाना था। मैंने पेटीएम पर जेट एयरवेज की टिकट ली। उस पर मुझे कैश बैक मिला। ईटिकट मोबाइल पर आ गई। मोबाइल से ही ओला कैब बुक कराई जिसने एयरपोर्ट छोड़ा तो पहले से क्रेडिट कार्ड से डाली गई ओला मनी से उसका बिल अपने-आप चुका दिया गया। एयरपोर्ट पर क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर कॉफी ली। फिर इंदौर पहुँच कर भी ओला कैब ली। दिल्ली से इंदौर के पूरे सफर में वॉलेट सिर्फ एक बार निकाला। वो भी तब जब एयरपोर्ट पर मोबाइल पर ईटिकट दिखाते समय पहचान पत्र दिखाना होता है। दस साल पहले आप इस यात्रा की कल्पना कीजिए। तब नोटों की गड्डी लेकर पहले आप ट्रैवल एजेंट के पास जा कर टिकट लेते। फोन कर टैक्सी बुक कराते। एयरपोर्ट पर टैक्सी वाले को कैश देते। एयरपोर्ट पर कॉफी पीने के लिए बटुआ निकालते। इंदौर पहुंच कर फिर टैक्सी कर कैश देते। 

आठ नवंबर के बाद से मेरे लिए दुनिया बदल गई हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। कुछ साल पहले सोसाइटी में एक साथ कई फ्लैट में चोरी हुई थी। इसके बाद से घर में कैश रखना बिल्कुल बंद कर चुका था। आठ नवंबर को ऑफिस से घर आते समय कार में रेडियो पर प्रधानमंत्री का भाषण सुना और घर आते ही टटोला कि कितनी नकदी रखी है। पांच सौ और हजार के नोट में 8 हजार रुपए निकले। किराने वाले ने कहा कि चाहे तो नकदी उसके यहां जमा करा दें। मैंने थोड़े उसे दिए और बाकी इधर-उधर खर्च हो गए। दूध वाले ने कहा कि चेक से भुगतान कर सकते हैं। सब्जी वाले के साथ शुरुआत में दिक्कत आई। फिर कुछ समय उधार किया और बाद में नए नोट आने पर पुराना चुका कर सब्जी लेना शुरू कर दिया। आठ नवंबर के बाद से सिर्फ एक बार बैंक गया। चेक के एवज में 24 हजार रुपए निकाले। इसमें भी दो-दो हजार के दो नोट और बाकी सौ-सौ के नोट मिल गए तो काम चल गया। दफ्तर में खबर हो गई तो कई लोग सौ-सौ के नोट लेने आए। उन्हें खुल्ले देकर कुछ पुण्य भी कर लिया। नोट बंदी के बाद से सिर्फ दो बार एटीएम की लाइन में लगना पड़ा। वो भी सिर्फ असुरक्षा की भावना से ग्रसित हो कर कि अगर अचानक नकदी नहीं मिली तो क्या होगा। लेकिन बाद में एहसास हुआ कि ऐसा करने की जरूरत ही नहीं थी। दो शादियों में शगुन के लिए 500-500 रुपए के नए नोट भी देकर आया। चाहे इलाका हिंडन के नजदीक का हो लेकिन कैश लेस के मामले में दक्षिण दिल्ली से भी आगे है। अभी छुट्टी के दिन सोसाइटी के बाहर गोलगप्पे वाले ने भी पेटीएम से पैसे लिए और कुछ दिन पहले पेटीएम से भुगतान कर एलईडी बल्ब खरीदा।

हां ये जरूर है कि आठ नवंबर के बाद से खर्चों में थोड़ी कटौती हुई है। शुरू में नकदी खर्च करने से पहले कई बार सोचना पड़ता था। डर यही था कि अगर हाथ से नकदी चली गई तो फिर एटीएम की लाइन में लगना पड़ेगा। इस बीच मीडिया और सोशल मी़डिया पर कैश लेस और नकदी के बीच जोर शोर से बहस चल गई। कैश लेस के विरोधियों ने खूब डराया। कहा निजता का उल्लंघन होगा। उन मामलों की याद दिलाई जिनमें कई डेबिट कार्ड की सूचना हैक कर ली गई थी। कुछ ने यह कह कर उकसाया कि पेटीएम में चीनी कंपनी का पैसा लगा है और मास्टर-वीजा को मिलने वाला पैसा भी देश से बाहर चला जाता है। कुछ लोग क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर लगने वाले ट्रांजेक्शन शुल्क को ज्यादती मानते हैं। वहीं कुछ सिर्फ इसलिए विरोध करते हैं कि सरकार उन्हें कैश लेस या लेस कैश होने को क्यों कहती है। 

ऐसा नहीं है कि मुझे ऑनलाइन लेनदेन के खतरों का एहसास नहीं है। फिर ये सोचता हूं कि वैसे भी नौकरीपेशा लोगों की अधिकांश कमाई बैंकों में ही तो रखी जाती है। अगर अकाउंट हैक होने से किसी के पैसे गए तो घर से भी नकदी चोरी हुई है। बैंक से डिजीटल तरीके से पैसे चोरी होने पर तो फिर भी ट्रेल के जरिए चोर का पता लगने की संभावना होती है। मगर घर से चोरी गई नकदी कभी चोर या पुलिस से वापस मिली हो ऐसा कम ही होता है। करेंसी नोट भीग सकते हैं। होली के रंग में खराब हो सकते हैं। घर में आग लगने पर जल सकते हैं। बाढ़ आने पर बह सकते हैं। चोरों को सबसे पहले उन्हीं की तलाश होती है। 

फिर ये कोई नहीं कहता कि देश सौ फीसदी कैश लेस हो जाएगा। ऐसा होना असंभव है। भारत जैसे विविधिता वाले देश में जहां बड़ा तबका अब भी गरीबी रेखा के नीचे है और एक बड़ी आबादी ऐसे गांवों में रहती है जहां बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं, कैश लेस भारत की कल्पना बेमानी है। करोड़ों लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और अपनी रोजी-रोटी के लिए नकदी पर निर्भर है वहां लेस कैश का फार्मूला भी तब तक नहीं चल सकता जब तक इसके लिए बुनियादी ढांचा तैयार नहीं होता। इसीलिए नकदी कभी खत्म नहीं हो सकती। कम से कम निकट भविष्य में तो इसकी संभावना नहीं है। हां नकदी पर निर्भरता कम करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए तो अच्छा है ही। व्यक्तिगत तौर पर भी इसके फायदे ज्यादा हैं और नुकसान कम। इसलिए मैं तो लेस कैश के रास्ते पर काफी पहले ही निकल चुका हूं। नोट बंदी ने एक तरह से मेरे फैसले को मजबूती ही दी है। जो लोग इस रास्ते पर नहीं चलना चाहते उन्हें मेरी ओर से शुभकामनायें। 

Wednesday, December 14, 2016

नोट बंदी- लोहिया, इंदिरा और मोदी

"हम हिंदुस्तानी अपनी बरबादी से उतने दुखी नहीं हैं जितने कि दूसरे की बरबादी से खुश हैं।" संसद के गलियारों में एक अनुभवी सांसद ये सूत्र वाक्य नोट बंदी के संदर्भ में कहे गए। उनका ये मानना है कि चाहे गरीब और मजदूर तबका नोट बंदी के चलते बेरोजगारी, परेशानी और दूसरी दिक्कतों का सामना कर रहा हो मगर वो इस बात से खुश है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमीरों को न सिर्फ लाइन में लगा दिया बल्कि उनकी काली कमाई को दुनिया के सामने ला दिया। इन सांसद जैसे कई नेताओं का मानना है कि गरीब तबका इसी में खुश है कि कैसे पीएम ने अमीर-गरीब सबको एक ही लाइन में लगा दिया और जैसे एक-एक पैसे के लिए गरीब आदमी तरसता है, वैसे ही अमीर भी तरस रहे हैं।

इसे परपीड़ा से मिला आनंद कहा जा सकता है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या हमारा शोषित, दबा-कुचला वर्ग नोट बंदी को एक तरह का अघोषित अमीर-गरीब का वर्ग संघर्ष मान कर इसमें अपनी जीत देख रहा है। इसकी अधिक अच्छी व्याख्या तो समाजशास्त्री कर सकते हैं। लेकिन साठ के दशक में सोवियत संघ की जिन साम्यवादी नीतियों से प्रभावित होकर पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने वामपंथी समाजवाद के रास्ते पर ले जाने का प्रयास किया, क्या ये उसी दिशा में उठाया गया कदम है? कतई नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नजदीक से जानने का दावा करने वाले कुछ बीजेपी नेता उनके इस फैसले में प्रख्यात समाजवादी और नेहरु की नीतियों के विरोधी रहे राम मनोहर लोहिया की छाप जरूर देखते हैं। 

ये दूर की कौड़ी नहीं है। लोहिया के विचारों और मोदी के फैसलों में सामंजस्य के बारे में करीब से अध्ययन करने की आवश्यकता है अन्यथा नोटबंदी हो या फिर मोदी सरकार के गरीबों के हितों में लिए गए अन्य दूसरे फैसले, उनका निष्पक्ष और संतुलित विश्लेषण नहीं हो सकेगा। मिसाल के तौर पर देखें कि राम मनोहर लोहिया कहते थे- "सरकार को अमीरों की आय पर नहीं उनके खर्च पर टैक्स लगाना चाहिए। इससे जो पैसा बनेगा इससे एक सिंचाई योजना बना कर खेतों तक पानी पहुंचा दो। किसानों का विकास अपने-आप ही हो जाएगा।" कोई हैरानी नहीं है कि नोट बंदी के बाद आय कर कानून में संशोधन का जो बिल मोदी सरकार लाई है उसमें गरीब कल्याण कोष बनाने की बात कही गई है। इसमें काला धन छुपा कर रखने वालों को पचास फीसदी टैक्स देकर बाकी 25 फीसदी पैसा गरीब कल्याण कोष में चार साल सरकार के पास रखने का प्रस्ताव है। इस पर सरकार कोई ब्याज नहीं देगी और बिल में साफ कहा गया है कि इस रकम का इस्तेमाल गरीबों और किसानों की भलाई के लिए किया जाएगा। जबकि 25 फीसदी पैसा तुरंत लिया जा सकता है।

इसी तरह लोहिया संपत्ति के मोह के खिलाफ थे। उनका मानना था कि इससे देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढी है। वो अमीर और गरीब के बीच दीवार गिराने के पक्ष में रहे। उनका मानना था कि वंचितों की संख्या बहुत ज्यादा है और ऐसा करना उनके हक में होगा। लोहिया के समाजवाद को मानने वाले बीजेपी के हुकुम देव नारायण यादव जैसे खांटी नेता कहते हैं कि नोट बंदी का समर्थन देश के वो 85 फीसदी वंचित, गरीब, शोषित और पीड़ित और निम्न मध्य वर्ग के लोग कर रहे हैं जो अपना जीवन ईमानदारी की कमाई से गुजारते हैं। लेकिन पीएम मोदी की भ्रष्टाचार और काला धन विरोधी मुहिम के कामयाब होने के लिए ये जरूरी है कि पार्टी, सरकार और नौकरशाही का चेहरा बदले।

राजनीतिक हलकों में प्रधानमंत्री मोदी के नोट बंदी को इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ से जोड़ कर देखा जा रहा है। ये भी कहा जा रहा है कि चंद राजाओं के प्रिवीपर्स की मामूली रकम खत्म कर इंदिरा गांधी ने देश के एक बड़े हिस्से को ये संदेश देने में कामयाबी हासिल की थी कि राजे-रजवाड़े और जमींदारों के दिन देश में लद चुके हैं और अब गरीबों की भलाई के काम होंगे। इंदिरा ने इसे एक बड़े राजनीतिक नारे में बदल दिया। इसी तरह से बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला कर इंदिरा गांधी ने चुनावी कामयाबी हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाया था। तब कॉग्रेस ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के फैसले को गरीबों के हित में किया गया एक बड़ा फैसला बताया और वो जनता के बीच इसे लेकर गई। नोट बंदी के फैसले को भी इसी तरह गरीबों के हित में लिया गया फैसला परिभाषित करने और लोगों के बीच ले जाने में प्रधानमंत्री तो आगे हैं। मगर उनकी पार्टी पीछे रह गई। 

इसके पीछे एक और वजह मानी जा रही है। बीजेपी की पहचान मूल रूप से अगड़ी जातियों की पार्टी के रूप  में रही है। इनमें भी ब्राह्मण और बनिया जातियों की पार्टी के रूप में बीजेपी के विरोधी उसे पेश करते रहे हैं। लेकिन पिछड़े समाज से आने वाले नरेंद्र मोदी ने एक ही झटके में बीजेपी की इस पहचान को उखाड़ फेंका है। अब हालत ये है कि पारंपरिक समर्थक माने जाने वाला व्यापारी तबका नोट बंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित और नाराज है। जबकि बीजेपी के साथ अब तक सिर्फ हिंदुत्व के नाम पर जुड़ने वाला पिछड़ा वर्ग एक आर्थिक फैसले के चलते साथ खड़ा नजर आने लगा है। नरेंद्र मोदी सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के फैसलों की याद दिलाते दिख रहे हैं तो वहीं कुछ लोगों को उनमें लोहिया की समाजवादी सोच की झलक दिखने लगी है। एक समानता ये भी दिखती है कि जहां लोहिया देश में गैर कांग्रेसवाद के जनक माने जाते हैं वहीं नरेंद्र मोदी ने कॉग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया। 

Tuesday, December 13, 2016

नोट बंदी के सफर में आएंगे ये दो महत्वपूर्ण पड़ाव

नोट बंदी का एक महीना पूरा होने के बाद लोगो में इसके प्रति उत्साह और समर्थन में धीरे-धीरे कमी आने लगी है। इसकी बड़ी वजह लोगों के हाथ में नकदी न आना है। बैंकों के सामने लाइनें वैसी ही लगी हैं जैसी शुरुआत में थीं। एटीएम से नकदी निकालने की सीमा न हटना और बैंकों से लोगों को पैसा न मिल पाना लोगों की हताशा को बढ़ा रहा है। 

इस बीच, देश भर से नोट बंदी के छोटे उद्योग-धंधों, खेती-किसानी, रोजगार, व्यापार आदि पर विपरीत असर की खबरें तेजी से आने लगी हैं। शहरों से बड़ी संख्या में मजदूर और श्रमिक गांवों की ओर पलायन करने लगे हैं क्योंकि वो जहां काम करते हैं, वहां काम फिलहाल बंद कर दिया गया है। 

ऐसे छोटे व्यापारी जिनका कामकाज सिर्फ नकदी पर निर्भर है, बड़ी संख्या में बेरोजगार होने लगे हैं। इसी बीच, टेलीविजन पर करोड़ों की तादाद में 2000 रुपए के नए नोट की देश भर से बरामद होती तस्वीरों ने लोगों को विचलित कर दिया है। वो सोच रहे हैं कि जिस 2000 रुपए के सिर्फ एक नोट के लिए वो ठंड में ठिठुरते दिन-रात बैंकों और एटीएम के सामने लगे हैं, रसूखदार लोग इन नोटों की गड्डियों से खेल कर उनकी भावनाओं पर चोट कर रहे हैं। 

आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एलान के बाद लोगों की उम्मीदें बंधी थीं कि काले धन पर अंकुश लगेगा और जो लोग काले धंधे कर रहे हैं उन्हें सजा मिलेगी। इसी उम्मीद में लोगों ने तकलीफें झेलने के बावजूद पीएम का साथ दिया क्योंकि आज भी किसी दूसरे नेता की तुलना में उनकी साख लोगों के मन में बहुत ज्यादा है। लेकिन जैसा कहा जाता है कि आशा टूटने पर पहले निराशा होती है, जो जल्दी ही हताशा में बदल जाती है और इसकी परिणिति क्रोध में होती है। तो क्या नोट बंदी के नतीजों और असर से निराश और हताश लोग क्रोध की ओर बढ़ रहे हैं? 

फिलहाल तो इसका उत्तर न है। लेकिन अगर जल्दी ही नकदी का संकट दूर नहीं हुआ तो ये हताशा गुस्से का रूप भी ले सकती है। अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। खासतौर से उत्तर प्रदेश जैेसे बेहद महत्वपूर्ण राज्य में जहां अगले दो महीनों में चुनाव होने की संभावना है। साथ ही, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर मे भी चुनाव होने हैं। ऐसे में सबकी नजरें फिर प्रधानमंत्री पर टिक गई हैं कि वो लोगों के धैर्य और समर्थन का क्या जवाब देते हैं और उनकी आशा, हताशा में न बदले इसके लिए किन कदमों का एलान करते हैं। 

पहला पड़ाव

इस दृष्टिकोण से पहला पड़ाव बेहद महत्वपूर्ण है। संभावना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन या चार जनवरी को लखनऊ में एक बड़ी रैली करेंगे। पहले यह रैली 24 दिसंबर को परिवर्तन यात्राओं के समापन पर होनी थी। लेकिन नोटबंदी के बाद इसे टाल दिया गया। वजह ये है कि पुराने नोट बैंकों में जमा कराने की अंतिम तारीख 30 दिसंबर है। तब सरकार को ये अंदाजा लग जाएगा कि कितने पुराने नोट बैंकों में आए। इससे एक आकलन हो सकेगा कि सरकार के हाथ में कितना पैसा आएगा। 

इसी तरह काले धन को सफेद करने के लिए सरकार की नई गरीब कल्याण योजना के शुरुआती रुझान भी इस महीने के अंत तक मिल जाएंगे। यानी सरकार को औपचारिक रूप से ये पता चलेगा कि 8 नवंबर को जिस नोटबंदी का एलान किया गया था उसका जमीन पर क्या असर हुआ है। खुद प्रधानमंत्री ने भी लोगों से पचास दिन का समय मांगा था जिसकी मियाद इस महीने के अंत में पूरी हो जाएगी। ऐसे में माना जा रहा है कि जनवरी के पहले हफ्ते की रैली में प्रधानमंत्री कुछ महत्वपूर्ण एलान कर सकते हैं। 

ये किसानों के लिए बड़ी राहत के एलान भी हो सकते हैं। साथ ही मजदूरों के लिए भी जिन्हें कहा जा सकता है कि उनका वेतन सीधे बैंक खातों में पहुंचेगा ताकि बिचौलये उनकी गाढ़ी मेहनत की कमाई बीच में न खा सकें। नोट बंदी कर पीएम ने बीजेपी की पारंपरिक ब्राह्मण-बनिया पार्टी की छवि को हमेशा के लिए बदल दिया है। बीजेपी अब गरीबों की पार्टी बन कर उभर रही है। ऐसे में गरीबों के लिए पीएम के एलान पर सबकी नजरें रहेंगी। 

नोट बंदी को जबर्दस्त समर्थन देने वाले युवाओं के लिए भी प्रधानमंत्री कुछ घोषणाएं कर सकते हैं। ये माना जा रहा है कि पांच राज्यों में चुनाव फरवरी-मार्च में होंगे। ऐसे में पीएम की ये रैली बीजेपी के चुनावी भविष्य के लिए बेहद अहम होगी क्योंकि तब तक चुनाव कार्यक्रमों का एलान हो चुका होगा। 

दूसरा पड़ाव

प्रधानमंत्री के जो एलान लखनऊ में होंगे उन्हें कानूनी जामा पहनाने के लिए दूसरा पड़ाव भी बेहद महत्वपूर्ण है। ये है एक फरवरी जिस दिन वित्त मंत्री अरुण जेटली आम बजट पेश करेंगे। इस बार बजट फरवरी के अंतिम दिन के बजाए पहले दिन पेश किया जा रहा है। 

यह एक नई परंपरा है। इसके पीछे सोच ये है कि बजट को संसद की जल्दी मंजूरी मिले ताकि विकास कार्यों में तेजी आ सके। हालांकि नोट बंदी ने बजट के कार्यक्रम को झकझोर दिया है। सरकार को इस बजट में कई चीजों का ध्यान रखना है। जैसा शुरू में उल्लेख किया गया है कि नोट बंदी ने अर्थ व्यवस्था को चोट पहुँचाई है। आर्थिक विकास दर में मंदी, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, बेरोजगारी में बढोत्तरी, कृषि उत्पादन पर असर जैसे प्रभाव देखने को मिलेंगे।

 ऐसे में वित्त मंत्री के सामने बड़ी चुनौती देश को ये  विश्वास दिलाना होगा कि सब कुछ न सिर्फ ठीक है बल्कि भारत सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था का अपना स्थान बनाए रखेगा। उम्मीद है कि वित्त मंत्री मध्य वर्ग को भी आयकर में राहत दे सकते हैं। इसी तरह किसानों और मजदूरों के लिए भी वित्त मंत्री के बजट में कई सौगातें हो सकती हैं। ये ध्यान रहे कि बजट जिस समय पेश होगा तब आदर्श आचार संहिता लागू रहेगी। लेकिन अमूमन इसकी वजह से बजट घोषणाओं पर असर नहीं होता क्योंकि बजट पूरे देश के लिए होता है किसी एक या दो राज्य के लिए नहीं। किसी राज्य विशेष के लिए घोषणाओं से बचा जाता है।

अगले दो महीनों में पीएम और वित्त मंत्री के इन दो महत्वपूर्ण कदमों से नोट बंदी को लेकर अर्थ व्यवस्था पर पड़ने वाले असर को लेकर कई चीजें तय हो जाएंगी। जाहिर है इस बीच भी सरकार लोगों को राहत देने के लिए कदमों का एलान करती रहेगी। लेकिन बीजेपी नेताओं की उम्मीदें इन्हीं दो घटनाक्रमों पर टिकी हैं। इन्हीं से तय होगा कि लोगों का मूड कैसा रहेगा और नोट बंदी को लेकर चुनावों में ऊंट किस करवट बैठेगा। 

Saturday, April 02, 2016

क्या ऐसे सुधरेगी हिंदी?

दिल्ली में विदेश मंत्रालय कार्यालय में विदेश मंत्रालय के तत्वावधान में भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय ने अख़बारों में हिंदी की शुद्धता पर एक विमर्श का आयोजन किया। मुझे नहीं पता कि इसमें मुझे क्यों बुला लिया गया? शायद इसलिए कि मैं कभी-कभी सोशल मीडिया पर हिंदी की अशुद्धियों की चर्चा करता हूँ। कुछ अख़बारों की इसलिए भी आलोचना करता हूँ कि वो जानबूझकर अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करते हैं जबकि उनके लिए हिंदी के आसान शब्द उपलब्ध हैं। 

इस विषय पर सरकार को चिंता है ये अच्छी बात है। मगर इस चिंता को व्यक्त करने और उसे दूर करने का तरीक़ा भी सरकारी है। सरकार का हस्तक्षेप हो या न हो, इस पर भी बहस हो सकती है। आख़िर ये तो पूछा ही जा सकता है कि कौन सा अखबार क्या लिखेगा, कौन सी भाषा में लिखेगा, हिंदी में अंग्रेजी के शब्द घुसाएगा या नहीं, आख़िर ये सब जानने में और तय करने में सरकार की दिलचस्पी का क्या मतलब है?

एक हिंदीप्रेमी होने के नाते विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की चिंताएँ वाजिब हैं। ख़ासतौर से तब जबकि उनकी हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं पर पकड़ समय-समय पर सामने आती रही है। हिंदी अख़बारों में अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग पर उनका विरोध किसी आम पाठक जैसा ही विरोध है। वो पाठक जो हिंदी को जीता है, हिंदी से प्रेम करता है और उसके साथ हो रहे खिलवाड़ पर उसे खीज आती है। 

दरअसल, पिछले साल भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन में कई चर्चाओं में ये बात सामने आई कि हिंदी अखबार धड़ल्ले से अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। विदेश मंत्रालय ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। इसके बाद इस विश्वविद्यालय से कहा गया कि वो इसे ठीक करने के रास्ते सुझाए। विश्वविद्यालय ने शोध किया। आठ अख़बारों के अध्ययन के बाद अंग्रेजी के करीब १५ हज़ार ऐसे शब्दों की सूची बनाई जिन्हें हिंदी के इन बड़े अख़बारों ने अपनी ख़बरों में प्रयोग किया। इन शब्दों का श्रेणीवार बँटवारा किया गया। कुछ ऐसे शब्द जो अब हिंदी में मान लिए गए हैं। कुछ ऐसे जिन्हें इस्तेमाल न किया जाता तो ठीक होता और कुछ ऐसे जिन्हें ज़बरन ठूँसा गया। 

आज के विमर्श की योजना ये थी कि जो लोग इस काम से जुड़े हैं उनसे सीधे बात की जाए। कुछ पत्रकारों को बुलाया गया। इसमें टीवी के एंकर और रिपोर्टर भी थे। सुषमा स्वराज ने बताया कि उन्हें हिंदी अख़बारों का अंग्रेजी शब्दों में प्रयोग क्यों अखरता है। फिर उन्होंने कार्यक्रम के बारे में बताया और कहा कि सिर्फ पत्रकारों को ही नहीं अख़बारों और चैनलों के मालिकों और संपादकों को भी बुलाया गया है जो एक अलग कक्ष में हैं। उन्होंने कहा कि यही बातें उनसे भी की जाएंगी क्योंकि निर्णय उनके स्तर पर होते हैं।

इस बीच, संपादक और मालिक क़िस्म के कुछ लोग जो शायद ग़लती से इन पत्रकारों के कमरे में आ गए थे, उन्हें धीरे-धीरे दूसरे कक्ष में ले जाया गया। सुषमा स्वराज अपनी बात खत्म करते ही दूसरे कक्ष में चली गईं। पत्रकारों से कहा गया कि वो सुझाव देते रहें कि हिंदी का सुनहरा युग वापस कैसे लाया जाए। कुछ पत्रकार हिंदी को समृद्ध करने के नुस्ख़े बताते रहे। उन्हें सुनने के लिए हॉल में १५-२० लोग थे। इनमें विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस के कर्मचारी और वो पत्रकार भी शामिल थे जो अपनी बारी आने के इंतज़ार में थे। 

ये पूरी तरह सरकारी तरीक़ा है। पहली बात तो ये कि कोई सरकार अगर ये सोचती है कि उसके कहने से मीडिया अपनी भाषा बदल लेगा तो ये उसकी ग़लतफ़हमी है। न तो ये बताना सरकार का काम है और न ही सरकार की सुनना मीडिया का काम। मेरा मानना है कि जो हिंदी अखबार ऐसा करते हैं वो धीरे-धीरे खुद ही लाइन पर आ जाएँगे क्योंकि जनता उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर कर देगी। और अगर उनके अखबार की बिक्री में बढ़ोत्तरी होती रहेगी तो कल से वो खबरों को देवनागरी के बजाए रोमन में भी लिखना शुरू कर सकते हैं। अगर मीडिया बाजार की दुहाई देकर हिंदी पर अत्याचार कर रहा है तो उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि पाठक और दर्शक वर्ग ही ये बाजार तैयार कर रहा है। 

रही बात सरकार की तो ऐसे सरकारी कर्मकांडों से हिंदी की दशा सुधरना दूर की बात है। वर्ना हर साल चौदह सितंबर को क्या होता है, ये सब जानते हैं। हिंदी दिवस पर हिंदी की चिंदी उड़ाकर उसकी बिंदी पहन ली जाती है। एक दिन के लिए महारानी और बाकी ३६४ दिनों के लिए सरकारी दफ़्तरों में अंग्रेजी के सेविका। कुछ ऐसी है हमारी सरकारी हिंदी!! पर ऐसे विदेश मंत्रालय में जहाँ अंग्रेजी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता और अगर ग़लती से हिंदी घुस भी आए तो उसे दुत्कार दिया जाता है, वहाँ हिंदी पर ये चिंतन स्वागतयोग्य अवश्य है।