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Wednesday, December 14, 2016

नोट बंदी- लोहिया, इंदिरा और मोदी

"हम हिंदुस्तानी अपनी बरबादी से उतने दुखी नहीं हैं जितने कि दूसरे की बरबादी से खुश हैं।" संसद के गलियारों में एक अनुभवी सांसद ये सूत्र वाक्य नोट बंदी के संदर्भ में कहे गए। उनका ये मानना है कि चाहे गरीब और मजदूर तबका नोट बंदी के चलते बेरोजगारी, परेशानी और दूसरी दिक्कतों का सामना कर रहा हो मगर वो इस बात से खुश है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमीरों को न सिर्फ लाइन में लगा दिया बल्कि उनकी काली कमाई को दुनिया के सामने ला दिया। इन सांसद जैसे कई नेताओं का मानना है कि गरीब तबका इसी में खुश है कि कैसे पीएम ने अमीर-गरीब सबको एक ही लाइन में लगा दिया और जैसे एक-एक पैसे के लिए गरीब आदमी तरसता है, वैसे ही अमीर भी तरस रहे हैं।

इसे परपीड़ा से मिला आनंद कहा जा सकता है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या हमारा शोषित, दबा-कुचला वर्ग नोट बंदी को एक तरह का अघोषित अमीर-गरीब का वर्ग संघर्ष मान कर इसमें अपनी जीत देख रहा है। इसकी अधिक अच्छी व्याख्या तो समाजशास्त्री कर सकते हैं। लेकिन साठ के दशक में सोवियत संघ की जिन साम्यवादी नीतियों से प्रभावित होकर पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने वामपंथी समाजवाद के रास्ते पर ले जाने का प्रयास किया, क्या ये उसी दिशा में उठाया गया कदम है? कतई नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नजदीक से जानने का दावा करने वाले कुछ बीजेपी नेता उनके इस फैसले में प्रख्यात समाजवादी और नेहरु की नीतियों के विरोधी रहे राम मनोहर लोहिया की छाप जरूर देखते हैं। 

ये दूर की कौड़ी नहीं है। लोहिया के विचारों और मोदी के फैसलों में सामंजस्य के बारे में करीब से अध्ययन करने की आवश्यकता है अन्यथा नोटबंदी हो या फिर मोदी सरकार के गरीबों के हितों में लिए गए अन्य दूसरे फैसले, उनका निष्पक्ष और संतुलित विश्लेषण नहीं हो सकेगा। मिसाल के तौर पर देखें कि राम मनोहर लोहिया कहते थे- "सरकार को अमीरों की आय पर नहीं उनके खर्च पर टैक्स लगाना चाहिए। इससे जो पैसा बनेगा इससे एक सिंचाई योजना बना कर खेतों तक पानी पहुंचा दो। किसानों का विकास अपने-आप ही हो जाएगा।" कोई हैरानी नहीं है कि नोट बंदी के बाद आय कर कानून में संशोधन का जो बिल मोदी सरकार लाई है उसमें गरीब कल्याण कोष बनाने की बात कही गई है। इसमें काला धन छुपा कर रखने वालों को पचास फीसदी टैक्स देकर बाकी 25 फीसदी पैसा गरीब कल्याण कोष में चार साल सरकार के पास रखने का प्रस्ताव है। इस पर सरकार कोई ब्याज नहीं देगी और बिल में साफ कहा गया है कि इस रकम का इस्तेमाल गरीबों और किसानों की भलाई के लिए किया जाएगा। जबकि 25 फीसदी पैसा तुरंत लिया जा सकता है।

इसी तरह लोहिया संपत्ति के मोह के खिलाफ थे। उनका मानना था कि इससे देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढी है। वो अमीर और गरीब के बीच दीवार गिराने के पक्ष में रहे। उनका मानना था कि वंचितों की संख्या बहुत ज्यादा है और ऐसा करना उनके हक में होगा। लोहिया के समाजवाद को मानने वाले बीजेपी के हुकुम देव नारायण यादव जैसे खांटी नेता कहते हैं कि नोट बंदी का समर्थन देश के वो 85 फीसदी वंचित, गरीब, शोषित और पीड़ित और निम्न मध्य वर्ग के लोग कर रहे हैं जो अपना जीवन ईमानदारी की कमाई से गुजारते हैं। लेकिन पीएम मोदी की भ्रष्टाचार और काला धन विरोधी मुहिम के कामयाब होने के लिए ये जरूरी है कि पार्टी, सरकार और नौकरशाही का चेहरा बदले।

राजनीतिक हलकों में प्रधानमंत्री मोदी के नोट बंदी को इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ से जोड़ कर देखा जा रहा है। ये भी कहा जा रहा है कि चंद राजाओं के प्रिवीपर्स की मामूली रकम खत्म कर इंदिरा गांधी ने देश के एक बड़े हिस्से को ये संदेश देने में कामयाबी हासिल की थी कि राजे-रजवाड़े और जमींदारों के दिन देश में लद चुके हैं और अब गरीबों की भलाई के काम होंगे। इंदिरा ने इसे एक बड़े राजनीतिक नारे में बदल दिया। इसी तरह से बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला कर इंदिरा गांधी ने चुनावी कामयाबी हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाया था। तब कॉग्रेस ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के फैसले को गरीबों के हित में किया गया एक बड़ा फैसला बताया और वो जनता के बीच इसे लेकर गई। नोट बंदी के फैसले को भी इसी तरह गरीबों के हित में लिया गया फैसला परिभाषित करने और लोगों के बीच ले जाने में प्रधानमंत्री तो आगे हैं। मगर उनकी पार्टी पीछे रह गई। 

इसके पीछे एक और वजह मानी जा रही है। बीजेपी की पहचान मूल रूप से अगड़ी जातियों की पार्टी के रूप  में रही है। इनमें भी ब्राह्मण और बनिया जातियों की पार्टी के रूप में बीजेपी के विरोधी उसे पेश करते रहे हैं। लेकिन पिछड़े समाज से आने वाले नरेंद्र मोदी ने एक ही झटके में बीजेपी की इस पहचान को उखाड़ फेंका है। अब हालत ये है कि पारंपरिक समर्थक माने जाने वाला व्यापारी तबका नोट बंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित और नाराज है। जबकि बीजेपी के साथ अब तक सिर्फ हिंदुत्व के नाम पर जुड़ने वाला पिछड़ा वर्ग एक आर्थिक फैसले के चलते साथ खड़ा नजर आने लगा है। नरेंद्र मोदी सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के फैसलों की याद दिलाते दिख रहे हैं तो वहीं कुछ लोगों को उनमें लोहिया की समाजवादी सोच की झलक दिखने लगी है। एक समानता ये भी दिखती है कि जहां लोहिया देश में गैर कांग्रेसवाद के जनक माने जाते हैं वहीं नरेंद्र मोदी ने कॉग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया। 

Tuesday, December 13, 2016

नोट बंदी के सफर में आएंगे ये दो महत्वपूर्ण पड़ाव

नोट बंदी का एक महीना पूरा होने के बाद लोगो में इसके प्रति उत्साह और समर्थन में धीरे-धीरे कमी आने लगी है। इसकी बड़ी वजह लोगों के हाथ में नकदी न आना है। बैंकों के सामने लाइनें वैसी ही लगी हैं जैसी शुरुआत में थीं। एटीएम से नकदी निकालने की सीमा न हटना और बैंकों से लोगों को पैसा न मिल पाना लोगों की हताशा को बढ़ा रहा है। 

इस बीच, देश भर से नोट बंदी के छोटे उद्योग-धंधों, खेती-किसानी, रोजगार, व्यापार आदि पर विपरीत असर की खबरें तेजी से आने लगी हैं। शहरों से बड़ी संख्या में मजदूर और श्रमिक गांवों की ओर पलायन करने लगे हैं क्योंकि वो जहां काम करते हैं, वहां काम फिलहाल बंद कर दिया गया है। 

ऐसे छोटे व्यापारी जिनका कामकाज सिर्फ नकदी पर निर्भर है, बड़ी संख्या में बेरोजगार होने लगे हैं। इसी बीच, टेलीविजन पर करोड़ों की तादाद में 2000 रुपए के नए नोट की देश भर से बरामद होती तस्वीरों ने लोगों को विचलित कर दिया है। वो सोच रहे हैं कि जिस 2000 रुपए के सिर्फ एक नोट के लिए वो ठंड में ठिठुरते दिन-रात बैंकों और एटीएम के सामने लगे हैं, रसूखदार लोग इन नोटों की गड्डियों से खेल कर उनकी भावनाओं पर चोट कर रहे हैं। 

आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एलान के बाद लोगों की उम्मीदें बंधी थीं कि काले धन पर अंकुश लगेगा और जो लोग काले धंधे कर रहे हैं उन्हें सजा मिलेगी। इसी उम्मीद में लोगों ने तकलीफें झेलने के बावजूद पीएम का साथ दिया क्योंकि आज भी किसी दूसरे नेता की तुलना में उनकी साख लोगों के मन में बहुत ज्यादा है। लेकिन जैसा कहा जाता है कि आशा टूटने पर पहले निराशा होती है, जो जल्दी ही हताशा में बदल जाती है और इसकी परिणिति क्रोध में होती है। तो क्या नोट बंदी के नतीजों और असर से निराश और हताश लोग क्रोध की ओर बढ़ रहे हैं? 

फिलहाल तो इसका उत्तर न है। लेकिन अगर जल्दी ही नकदी का संकट दूर नहीं हुआ तो ये हताशा गुस्से का रूप भी ले सकती है। अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। खासतौर से उत्तर प्रदेश जैेसे बेहद महत्वपूर्ण राज्य में जहां अगले दो महीनों में चुनाव होने की संभावना है। साथ ही, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर मे भी चुनाव होने हैं। ऐसे में सबकी नजरें फिर प्रधानमंत्री पर टिक गई हैं कि वो लोगों के धैर्य और समर्थन का क्या जवाब देते हैं और उनकी आशा, हताशा में न बदले इसके लिए किन कदमों का एलान करते हैं। 

पहला पड़ाव

इस दृष्टिकोण से पहला पड़ाव बेहद महत्वपूर्ण है। संभावना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन या चार जनवरी को लखनऊ में एक बड़ी रैली करेंगे। पहले यह रैली 24 दिसंबर को परिवर्तन यात्राओं के समापन पर होनी थी। लेकिन नोटबंदी के बाद इसे टाल दिया गया। वजह ये है कि पुराने नोट बैंकों में जमा कराने की अंतिम तारीख 30 दिसंबर है। तब सरकार को ये अंदाजा लग जाएगा कि कितने पुराने नोट बैंकों में आए। इससे एक आकलन हो सकेगा कि सरकार के हाथ में कितना पैसा आएगा। 

इसी तरह काले धन को सफेद करने के लिए सरकार की नई गरीब कल्याण योजना के शुरुआती रुझान भी इस महीने के अंत तक मिल जाएंगे। यानी सरकार को औपचारिक रूप से ये पता चलेगा कि 8 नवंबर को जिस नोटबंदी का एलान किया गया था उसका जमीन पर क्या असर हुआ है। खुद प्रधानमंत्री ने भी लोगों से पचास दिन का समय मांगा था जिसकी मियाद इस महीने के अंत में पूरी हो जाएगी। ऐसे में माना जा रहा है कि जनवरी के पहले हफ्ते की रैली में प्रधानमंत्री कुछ महत्वपूर्ण एलान कर सकते हैं। 

ये किसानों के लिए बड़ी राहत के एलान भी हो सकते हैं। साथ ही मजदूरों के लिए भी जिन्हें कहा जा सकता है कि उनका वेतन सीधे बैंक खातों में पहुंचेगा ताकि बिचौलये उनकी गाढ़ी मेहनत की कमाई बीच में न खा सकें। नोट बंदी कर पीएम ने बीजेपी की पारंपरिक ब्राह्मण-बनिया पार्टी की छवि को हमेशा के लिए बदल दिया है। बीजेपी अब गरीबों की पार्टी बन कर उभर रही है। ऐसे में गरीबों के लिए पीएम के एलान पर सबकी नजरें रहेंगी। 

नोट बंदी को जबर्दस्त समर्थन देने वाले युवाओं के लिए भी प्रधानमंत्री कुछ घोषणाएं कर सकते हैं। ये माना जा रहा है कि पांच राज्यों में चुनाव फरवरी-मार्च में होंगे। ऐसे में पीएम की ये रैली बीजेपी के चुनावी भविष्य के लिए बेहद अहम होगी क्योंकि तब तक चुनाव कार्यक्रमों का एलान हो चुका होगा। 

दूसरा पड़ाव

प्रधानमंत्री के जो एलान लखनऊ में होंगे उन्हें कानूनी जामा पहनाने के लिए दूसरा पड़ाव भी बेहद महत्वपूर्ण है। ये है एक फरवरी जिस दिन वित्त मंत्री अरुण जेटली आम बजट पेश करेंगे। इस बार बजट फरवरी के अंतिम दिन के बजाए पहले दिन पेश किया जा रहा है। 

यह एक नई परंपरा है। इसके पीछे सोच ये है कि बजट को संसद की जल्दी मंजूरी मिले ताकि विकास कार्यों में तेजी आ सके। हालांकि नोट बंदी ने बजट के कार्यक्रम को झकझोर दिया है। सरकार को इस बजट में कई चीजों का ध्यान रखना है। जैसा शुरू में उल्लेख किया गया है कि नोट बंदी ने अर्थ व्यवस्था को चोट पहुँचाई है। आर्थिक विकास दर में मंदी, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, बेरोजगारी में बढोत्तरी, कृषि उत्पादन पर असर जैसे प्रभाव देखने को मिलेंगे।

 ऐसे में वित्त मंत्री के सामने बड़ी चुनौती देश को ये  विश्वास दिलाना होगा कि सब कुछ न सिर्फ ठीक है बल्कि भारत सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था का अपना स्थान बनाए रखेगा। उम्मीद है कि वित्त मंत्री मध्य वर्ग को भी आयकर में राहत दे सकते हैं। इसी तरह किसानों और मजदूरों के लिए भी वित्त मंत्री के बजट में कई सौगातें हो सकती हैं। ये ध्यान रहे कि बजट जिस समय पेश होगा तब आदर्श आचार संहिता लागू रहेगी। लेकिन अमूमन इसकी वजह से बजट घोषणाओं पर असर नहीं होता क्योंकि बजट पूरे देश के लिए होता है किसी एक या दो राज्य के लिए नहीं। किसी राज्य विशेष के लिए घोषणाओं से बचा जाता है।

अगले दो महीनों में पीएम और वित्त मंत्री के इन दो महत्वपूर्ण कदमों से नोट बंदी को लेकर अर्थ व्यवस्था पर पड़ने वाले असर को लेकर कई चीजें तय हो जाएंगी। जाहिर है इस बीच भी सरकार लोगों को राहत देने के लिए कदमों का एलान करती रहेगी। लेकिन बीजेपी नेताओं की उम्मीदें इन्हीं दो घटनाक्रमों पर टिकी हैं। इन्हीं से तय होगा कि लोगों का मूड कैसा रहेगा और नोट बंदी को लेकर चुनावों में ऊंट किस करवट बैठेगा। 

Saturday, June 13, 2015

कैसे गिरी थी वाजपेयी की 13 महीने की सरकार?

(ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। इसी पर ये ब्लॉग कल ndtvkhabar.com पर लिखा था। मेरी कही पर भी लगा रहा हूं)

राजनीति में कोई भी स्थाई मित्र या शत्रु नहीं होता है, अगर होता तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह आज बाँहें फैलाकर उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग का स्वागत नहीं कर रहे होते। शाह से मुलाक़ात के साथ ही गमांग का बीजेपी आने का रास्ता साफ हो गया है। जल्दी ही ये औपचारिकता पूरी हो जाएगी। लेकिन गमांग के बहाने १७ साल पुराने उस विश्वास प्रस्ताव पर मतदान की याद ज़रूर ताज़ा हो गई जो वाजपेयी सरकार सिर्फ एक वोट से हार गई थी।

बात है १७ अप्रैल १९९९ की। एआईएडीएमके के समर्थन वापस लेने के बाद वाजपेयी सरकार को विश्वास प्रस्ताव रखना पड़ा। सुबह से ही संसद के गलियारों में गहमागहमी थी। लोक सभा की कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही देर पहले बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने कहा कि उनकी पार्टी मतदान में हिस्सा नहीं लेगी। प्रमोद महाजन समेत सरकार के रणनीतिकारों ने राहत की साँस ली।

सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सबकी नज़रें विपक्षी बेंच पर गई जहाँ उड़ीसा के मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग बैठे मुस्करा रहे थे। वो ठीक दो महीनों पहले यानी १८ फ़रवरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके थे मगर उन्होंने लोकसभा से इस्तीफ़ा नहीं दिया था। वो कोरापुट संसदीय क्षेत्र की नुमांइदगी कर रहे थे। सत्तापक्ष के कुछ सांसदों की ओर से लोकसभा अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी का इस ओर ध्यान दिलाया गया। लेकिन नियमानुसार मुख्यमंत्री बनने के छह महीने के भीतर विधानसभा का सदस्य बनना जरूरी है। तब तक तकनीकी तौर पर सांसद रह सकते हैं। हालाँकि नैतिक तौर पर ये कितना सही है इस पर आज भी बहस हो रही है।

जब मायावती के बोलने की बारी आई तो उन्होंने यू टर्न ले लिया। उन्होंने विश्वास मत के विरोध में वोट डालने का फैसला सुनाया और लोक सभा में हड़कंप मच गया। सरकार की स्थिति पहले ही नाज़ुक थी। प्रमोद महाजन आखिरी वक्त तक मोर्चाबंदी करते देखे जा रहे थे। पत्रकार दीर्घा खचाखच भरी हुई थी। मुझे सीढ़ियों पर बैठने की जगह मिल गई थी और वहाँ से स्पीकर की टेबल साफ देखी जा सकती है।

मतदान हुआ। गमांग ने सरकार के खिलाफ वोट दिया। तब नेशनल कांफ्रेंस के सांसद सैफ़ुद्दीन सोज़ मे पार्टी लाइन के खिलाफ जा कर सरकार के खिलाफ वोट दिया। वोटों की गिनती हुई। मैंने देखा कि बालयोगी बार-बार अपनी तर्जनी उंगुली उठा कर वाजपेयी को इशारा करने लगे। उनके चेहरे के भाव से स्पष्ट था कि वो इशारा कर रहे हैं कि सरकार एक वोट से हार गई। थोड़ी देर बाद स्पीकर ने एलान किया कि विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में २६९ और विरोध में २७० वोट पड़े। तेरह महीने पुरानी वाजपेयी सरकार गिर चुकी थी।

पूरा सदन अचानक ख़ामोश हो गया। फिर विपक्षी पार्टियों का उत्साह फूट पड़ा। शरद पवार उठ कर मायावती के पास गए और गर्मजोशी से उनका शुक्रिया अदा किया। कांग्रेसी सांसद गमांग और सोज़ से लगातार हाथ मिला रहे थे। वाजपेयी ने हाथ सिर से लगा कर सलाम कर सदन का फैसला माना। बाद में पता चला कि उनके चैंबर में राजमाता विजयाराजे सिंधिया भावुक हो गईं थी और उन्हें ढाँढस बँधाते हुए वाजपेयी भी विचलित हो गए थे। उसके बाद राजनीति का चक्र जिस तरह घूमा वो अब इतिहास का हिस्सा है।

अगर सरकार को एक वोट और मिला होता तो टाई हो जाता और स्पीकर वोट डाल कर सरकार को बचा सकते थे।

गमांग अब सफाई देते घूम रहे हैं कि उनके वोट से वाजपेयी सरकार नहीं गिरी। उनका कहना है कि चीफ़ व्हिप ने उनसे मतदान करने को कहा था। उनके मुताबिक़ वाजपेयी सरकार तो सोज़ के वोट से गिरी थी। उड़ीसा की राजनीति में गमांग एक बड़ा नाम है। वो कोरापुट सीट से १९७२ से लगातार आठ बार सांसद रहे और २००४ में फिर इसी सीट से जीते। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पी वी नरसिम्हाराव की सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे। १८ फ़रवरी १९९९ से ६ दिसंबर १९९९ तक उड़ीसा के मुख्यमंत्री रहे। बीजेपी का कहना है कि ७२ साल के गमांग के रूप में एक बड़ा आदिवासी नेता मिला है। राज्य में नवीन पटनायक का जादू तोड़ने में कांग्रेस और बीजेपी दोनों नाकाम रहे हैं और बीजेपी का यही कहना है कि गमांग के आने से उसे अपनी ताकत बढ़ाने में मदद मिलेगी।

गमांग के एक वोट से वाजपेयी सरकार के गिरने के सवाल को बीजेपी भी अब ज्यादा तूल नहीं देना चाहती है। गमांग की ही तरह उसका भी अब कहना है कि इसके लिए सोज़ ज़िम्मेदार थे। यही सियासत का मिज़ाज है जहाँ बनती-बिगड़ती, दोस्ती-दुश्मनी में पिछली बातों को भुलाकर ही आगे बढ़ा जाता है।