Tuesday, December 31, 2013

मुफ़्त पानी पर उठे सवाल

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने चुनाव से पहले किए अपने वादे के मुताबिक मुफ्त पानी देने का फैसला कर दिया। अब जल्दी ही बिजली के बिलों में पचास फीसदी कटौती करने के अपने दूसरे वादे को भी पूरा करने जा रहे हैं। 

मैंने फेसबुक और ट्विटर पर पहले वादे यानी हर घर को सात सौ लीटर पानी देने के फैसले पर कुछ सवाल उठाए। ज़ाहिर है आम आदमी पार्टी के प्रति सहानुभूति रखने वाले कुछ लोगों को ये पसंद नहीं आया। 

मैंने आम आदमी पार्टी की वेबसाइट पर जाकर दिल्ली विधानसभा के लिए उसके संकल्प पत्र को भी खंगाला। इसमें कहा गया है कि "सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वह सात सौ लीटर प्रतिदिन तक पानी इस्तेमाल करने वाले जलमित्र परिवारों को पानी मुफ्त उपलब्ध कराएगी। जो परिवार इससे ज्यादा पानी इस्तेमाल करेगा उससे पूरा बिल लिया जाएगा। हर रोज़ एक हजार लीटर से ज्यादा पानी का इस्तेमाल करने वाले परिवारों पर महंगी दरें लागू की जाएंगी।"

अंग्रेजी में कहा जाता है कि "The Devil is in the Detail". आम आदमी से ये अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वो राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों के एक-एक बिंदुओं को पढ़ कर मत देने के बारे में निर्णय करें। बल्कि अधिकांश लोग अपना फैसला इस आधार पर भी तय करते हैं कि उनके बीच आकर नेता क्या वादा करते हैं।

दिल्ली में करीब बीस लाख परिवार ऐसे हैं जो अनधिकृत कालोनियों और झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहते हैं। मोटे तौर पर ये दिल्ली की करीब आधी आबादी है। इन इलाकों में पानी की सप्लाई के लिए पाइप लाइनें नहीं हैं। अधिकांश इलाकों में टैंकरों से पानी की सप्लाई होती है। और ये अपने पानी के लिए टैंकर माफिया पर निर्भर हैं। 

दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को इन इलाकों से भारी समर्थन मिला। पारंपरिक रूप से कांग्रेस के समर्थक माने जाने वाले इन इलाकों ने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को नहीं देखा बल्कि उसके चुनाव चिन्ह झाड़ू पर मुहर लगाई। इसके पीछे एक बड़ी वजह ये उम्मीद भी थी कि दिल्ली में अगर आप की सरकार बनी तो उन्हें सात सौ लीटर पानी हर रोज मुफ्त मिलेगा।

माना जा रहा है कि कल के फैसले का फायदा सिर्फ दस लाख परिवारों को ही होगा। जिन घरों में पानी के मीटर चालू हालत में उन्हें इसका फायदा मिलेगा। यानी ऐसे घर जहां पानी की मीटर तो लगे हैं मगर चालू हालत में नहीं हैं, वो इसका फायदा नहीं उठा पाएंगे। उनके लिए जरूरी है कि वो मीटरों को चालू करवाएं। साथ ही, अगर इस योजना का फायदा लेना है तो घरों में मीटर लगवाने होंगे। पर उसके लिए जरूरी है कि उन मोहल्लों में पाइप लाइनें बिछी हों और दिल्ली के बड़े हिस्से में ऐसा नहीं है।

इसमें भी अगर नई दिल्ली नगर पालिका और दिल्ली कैंट में रहने वाले परिवारों को हटा दें तो ये संख्या और कम हो जाएगी। हाउसिंग सोसाइटियों में रहने वाले परिवारों को भी इसका फायदा नहीं मिलेगा। 

उस पर तुर्रा ये कि यही परिवार अगर महीने में बीस हज़ार लीटर से ऊपर खर्च करने पर इन्हें न सिर्फ पूरे पानी का पैसा चुकाना पड़ेगा बल्कि दस फीसदी बढ़ी दर के हिसाब से भी पैसा देना होगा। 

तो ऐसे में सवाल उठता है कि मुफ्त पानी के फैसले से आखिर फायदा किसे मिला? 

Wednesday, April 17, 2013


Mobile journalism: the future is here

For Thomson Foundation alumnus Akhilesh Sharma a smartphone is indispensable. Ahead of this year’s summer course which covers smartphone reporting, he explains how he uses mobile technology in his work as a television journalist in India.
For a journalist, a smartphone is not a luxury but necessity. I recall earlier days of mobile telephony in India. In the early 1990s I was given a Nokia handset, which looked like a brick and must have weighed around 400g.
I used to cover local courts then and I remember that before the advent of the mobile phone, I used to rush out of the courtroom to look for a landline to contact the office about breaking news.

Call costs

At that time in India, mobile services were very costly: an outgoing call was about 18INR (US$0.33) per minute and incoming calls was half of that. So my seniors told me that I couldn’t use the phone unless the news was really big. But gone are those days. In India today the mobile call rates possibly lowest in the world.
My life with the smartphone began with a Blackberry. Initially it was mainly to access the office email. I used to send updates and file my stories. Then came Blackberry messenger, but the app world was still unknown to us.
There were some legal issues between Blackberry and the government of India, mainly over the access to the server. In the meanwhile, I was given an iPhone by the office and I completely forgot I had ever used a Blackberry.
My journalistic world now revolves around the iPhone. I use it to send emails and write my stories in Hindi.
Apps on the iPhone are a great help. I have dictionary and apps like Qik allow me to record video and send it to the office. It can be used to do live reporting too.
The iPhone camera is excellent. A colleague of mine recorded a small interview with the Prime Minister inside the Parliament on iPhone - normal TV cameras are not allowed in certain locations but mobile phones are - and sent it to the office. It was our exclusive and a scoop!

Social media

Social media apps like Facebook, Twitter and You Tube are an essential part of my reporting kit. Being a political reporter, it helps me a lot because many politicians these days are using social media to keep in touch.
Also, I have the apps of local broadcasters and newspapers that alert me with breaking news as and when it happens.
Apps like Google maps have made my navigation much easier. Then, there is voice recorder. On many occasions I have recorded my voiceover on it and mailed it to the office. The sound quality is excellent.
Smartphones like the iPhone come with in-built memory of 16GB and more. So one should not worry too much about the number of contacts or the video or photographs stored in the phone. Another thing is that contacts are synchronised with your mailbox. So if you were to lose the phone, your contacts are safe.
And, of course, there is Angry Birds and Temple Run. But, these two apps mean that as soon as I reach home, my kids take away the phone from me and the fight starts between them to capture it. So much for the smartphone!
Akhilesh Sharma is a senior political editor with NDTV India, a 24 hour Hindi news channel. A graduate of the Thomson Foundation’s 2000 summer course, he has spent the past 19 years working at various national and international news organisations including the BBC in London.

Sunday, May 15, 2011

शून्य काया और घास-फूस

ये पढ़ कर बहुत मज़ा आया कि करीना कपूर ने छह करोड़ रुपए का एक विज्ञापन इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उसमें उन्हें एक ख़ास ब्रांड के चिकन का गुणगान करना था.

मज़ा तब दो गुना हो गया जब ये पढ़ा कि करीना दरअसल अब पूर्ण रूप से शाकाहारी हो गई हैं. उन्होंने माँसाहारी आहार का त्याग कर दिया.

 उन्हें जिस व्यक्ति ने माँसाहारी भोजन की आदत छुड़वाई वो उसका भी त्याग कर चुकी हैं. यानी शाहिद कपूर.

लेकिन मज़ा जहाँ ख़त्म हुआ वहीं से सोच शुरू हो गई. ऊपर की पंक्तियां लिख कर भी मैंने दोबारा पढ़ी कि आखिर इस खबर में ऐसा क्या है कि मुझे झुलसाती गर्मी की एक दोपहर में ओरिएंट के पंखे की राहत देती ज़्यादा ठंडी नहीं फिर भी ठीक-ठाक हवाओं के नीचे बैठ कर अपने रविवार को खराब करने की सूझी कि मैं ब्लॉग लिखने बैठ गया.

वो भी तब कि जब मैंने कई महीनों से अपने ब्लॉग को खुद ही देखना छोड़ दिया था लिखने की बात तो दूर है और खासतौर से तब जब देश में पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आए हैं और मेरे जैसे राजनीतिक जीव को सबसे पहली टिप्पणी इन नतीजों पर करनी चाहिए.

लेकिन मुझे इस खबर में ज़बर्दस्त अपील लगी.

शायद इसलिए कि किसी सेलेब्रेटी का किसी इश्यू के चलते करोड़ों का विज्ञापन हाथ से जाने देना वाकई बड़ी बात है. आज बड़े से बड़ा सेलेब्रेटी चड्ढी बनियान से लेकर तेल-कंघे पाउडर वगैरह बेचता नज़र आता है. जो वो बेचता है वो खुद उसे इस्तेमाल करता है या नहीं इसमें शक की कोई बात नहीं. क्योंकि मैं नहीं समझता कि अमिताभ बच्चन घर जाकर किसी ब्रांड का च्वयनप्राश खाकर बालों में किसी ऐसे तेल से मालिश कराते होंगे जिससे उनकी दिन भर की गर्मी काफूर हो जाती है.

या फिर शाहरुख खान या सलमान खान जो फिल्मी पर्दे पर शर्ट तक तो पहनते नहीं, घर जा कर इत्मिनान से अपनी शर्ट उतार कर अपने घरवालों को बताते होंगे कि देखो हमने फलां ब्रांड की बनियान और चड्ढी पहनी है.

ये बाज़ार के उसूल के खिलाफ है. और इस तरह के सवाल पूछना भी बेवकूफी है. कोई ये नहीं कहता कि जो सेलेब्रेटी जिस ब्रांड का प्रचार करता हो उसके लिए लाज़िमी है कि वो उनका इस्तेमाल भी करे. दरअसल, बाज़ार ऐसी भावनात्मक और दकियानूसी बातों से नहीं चलता. और अगर मैं भी यही सब बातें करने लगूं तो लगेगा मुझे तो बाज़ार की रत्ती भर भी समझ नहीं.

फिर, ये सारी बातें मैं क्यों लिख रहा हूं. आखिर करीना के चिकन का विज्ञापन न करने में क्या तुक है. वो भला चिकन न खाती हों लेकिन हाथ में चिकन लेग पकड़ कर दो लाइनों पर होंठ हिला देने में क्या परेशानी है कि "ये चिकन खाओ और मेरी तरह मस्त हो जाओ..." या फिर कोई इसी तरह की कुछ अलग लाइनें. ये दो लाइनें बोल दो और छह करोड़ रुपए घर बैठे-बिठाए मिल जाएंगे.

पर अचानक याद आया कुछ दिन पहले महेंद्र सिंह धौनी का शराब के एक ब्रांड का सरोगेट विज्ञापन करना. उसमें तो उनकी बहुत कमाई भी हुई. पर तभी आई एक दूसरी खबर से शायद धौनी का नशा उतर गया होगा जिसमें कहा गया था कि सचिन तेंदुलकर ने अपने जीवन में कभी भी शराब के किसी ब्रांड का विज्ञापन नहीं किया. सरोगेट विज्ञापन करना तो दूर की बात.

ये उन दिनों की बात है जब शराब, सिगरेट वगैरह के इश्तहारों पर इतनी सख्त पाबंदी नहीं थी कि इन कंपनियों को सरोगेट यानी फर्जी नामों से अपने विज्ञापन देने पड़े. सचिन उस ज़माने से खेल रहे हैं लेकिन उऩ्हें ये कभी ठीक नहीं लगा कि वो अपना नाम ऐसे किसी उत्पाद से न जुड़ने दें जो खासतौर से युवाओं के लिए गलत संदेश देता हो.

अब चिकन शराब या तंबाकू की तरह स्वास्थ्य के लिए खराब चीज़ तो है नहीं. बल्कि चिकन तो देश की बड़ी आबादी का मुख्य भोजन है. फिर करीना को क्या सूझी कि उसने ये विज्ञापन करने से मना कर दिया.

उसी खबर में ये रा़ज़ भी छिपा है. उसमें आगे लिखा है कि करीना ने जब से मांसाहारी भोजन छोड़ा उनकी काया सुडौल रहने लगी है. बल्कि ये भी लिख दिया कि करीना जब बीच में साइज़ ज़ीरो या शून्य काया हुईं तो उसके पीछे भी उनके शाकाहारी आहार का ही बड़ा रोल है.

यानी ये करीना की सोच है. उन्हें लगता है कि उनके शरीर में हुए बदलाव के पीछे उनके खान-पान के तौर-तरीके में बदलाव का बड़ा हाथ है. और वो नहीं चाहती हैं कि आज की लड़कियां चिकन-मटन खा कर फूल-कुप्पा हो कर घूमें.

लेकिन उन्होंने ये कैसे मान लिया कि जो लड़कियां या लड़के अपने "खाते-पीते घर के" बदन के साथ दिखते हैं वो सब मांसाहारी ही हैं. और कुपोषित नज़र आने वाले सारे लोग शाकाहारी हैं.

पर करीना ने जितना सोचा उतना ठीक सोचा. कम से कम दोहरे मापदंड तो नहीं अपनाए. जो चीज़ खुद इस्तेमाल नहीं करतीं उसके लिए विज्ञापन करना भी ठीक नहीं समझा.

बाकी जनता जाने और बाज़ार.



Monday, August 23, 2010

इ-मीडिया: नया विलन

80 के दशक की यादें ताज़ा हो गईं.
तब गांव में एक बड़े हॉल में एक टीवी पर वीडियो फिल्में देखने जाता था.
चाहे शक्ति कपूर हो, अमरीश पुरी या फिर कोई दूसरा ऐसा ही विलन.
पंद्रह रील तक हीरो पिटता था और आखिरी रील में जैसे ही हीरो के हाथ चलने लगते थे तब हॉल में लोग सीटियां और तालियाँ बजाते थे.
आज पीपली लाइव देखी तो फिर वो पुराने दिन सामने आ गए.
इस फिल्म में न कोई हीरो है न कोई हीरोइन. कोई है तो वो है विलन जो कई शक्लों में दर्शकों के सामने आता है.
लेकिन हाल की फिल्मों में विलन के किरदार निभाते रहे नेता, अफसर और पुलिस इस फिल्म में हाशिए पर दिखाए देते हैं.
विलन नंबर 1 है इलैक्ट्रॉनिक मीडिया. 24 घंटे के न्यूज़ चैनल. नाक फुलाते, गुस्से में गुर्राते उनके संपादक और दुनिया भर की बकवास कर 24 घंटे के न्यूज़ चैनलों का पेट भरते रिपोर्टर.
हॉल में जब-जब तालियां बजीं वो तब बजीं जब कुमार दीपक ने बकवास की.
यानी दर्शकों को भी समझ में आने लगा है कि वो टीवी पर जो देखते हैं उसके पीछे किस तरह टीआरपी बढ़ाने का षडयंत्र है, कैसे विरोधी चैनल की स्टोरीज़ से होड़ लगी है और न्यूज़रूम में आखिर क्या होता है.
गिरती टीआरपी के बीच एक चालू पुर्ज़ा रिपोर्टर आइडिया लेकर आता है.... सैफ अली खान ने एक छोटी बच्ची को किस किया.
फिर देखिए न्यूज़ रूम में कैसे इस खबर को तानने के लिए एक के बाद एक आइडियाज़ सामने आते जाते हैं.
करीना कपूर से शुरू हो कर बात शर्मिला टैगोर तक पहुँच जाती है. लेकिन इससे पहले कि इस ऐतिहासिक ख़बर पर काम शुरू हो, पीपली गांव में नत्थे का ड्रामा शुरू हो जाता है.
मुख्यमंत्री के इलाके में पड़ता है पीपली गांव और वहां उप चुनाव की तैयारियां हैं.
मुख्यमंत्री के दिल्ली आने पर उसकी बाइट के लिए स्टार रिपोर्टर कुमार दीपक की पेशकश... मुख्यमंत्री के गाड़ी से निकलते ही रिपोर्टर का उनका पैर छूना और फिर एक बाइट के लिए पहला सवाल ही प्रायोजित सा.
दूसरी तरफ़, अंग्रेज़ी चैनलों के भीतर चल रहा ड्रामा भी बेहद सटीक ढंग से पेश किया गया है.
पहली हेडलाइन शिल्पा शेट्टी की... दूसरी कोई और और तीसरी किसानों की आत्महत्या की.
स्टुडियो में ब्रेक में कृषि मंत्री का आना. एंकर से अपने घर पार्टी में न आने की बात पूछना. एंकर का मुंह बना कर कहना कि तबीयत खराब थी और मंत्री का ये कहना कि तुम दूसरे की पार्टी में तो गई थी. फिर एंकर का कहना उसी के बाद हुई तबीयत खराब.
अनुषा रिज़वी टीवी में कई साल तक काम कर चुकी हैं. आज के इलैक्ट्रॉनिक मी़डिया की बिल्कुल सटीक तस्वीर खींची है.
इसीलिए इस फिल्म में विलन नंबर 1 है खबरिया चैनल.
याद कीजिए वो दृश्य. नत्था गायब है. कुमार दीपक जबरन अपने कैमरामैन को टॉवर पर चढ़ाता है. देश भर के दर्शकों को ये दिखाने के लिए कैसे आज भी देश की 70 फीसदी आबादी पखाने के लिए खेतों में जाती है.
आज के चैनलों में ऐसे रिपोर्टरों की भरमार है. खुद गांव से आते हैं. लेकिन गांव को शहरी दर्शकों को बेचने की कला में माहिर हो गए हैं.
फिर, कैमरामैन को दिखता है नत्था पखाना करते हुए. वो हकबकाते हुए नीचे उतारा जाता है और फिर सारे कैमरे भागते हैं खेतों की ओर. दिशा मैदान के लिए नहीं बल्कि दिशा मैदान करते हुए नत्था को कैमरे में कैप्चर करने के लिए.
और नत्था के गायब होने के बाद कुमार दीपक ने नत्थे के पखाने का जो मनोविश्लेषण किया है उसे देख कर शायद बड़े से बड़ा मनोचिकित्सक भी शर्म से डूब कर मर जाए.
कुमार दीपक कहता है पखाना देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मरीज़ के दिल में क्या चल रहा है. अगर एक ही रंग का हो तो समझ सकते हैं कि मन में एक ही भाव है. लेकिन नत्था का पखाना कई रंगों का है.
पूरा हॉल रिपोर्टर के इस विश्लेषण से पहले तो चकित सा दिखा. फिर ज़ोर की हँसी जिसमें हास्य रस से अधिक वीभत्स रस का भाव और रिपोर्टर के इस अनूठे विश्लेषण के प्रति अवज्ञा और व्यंग्य दिखा.
इस फिल्म में लोग तालियां तब नहीं बजाते हैं जब जिलाधिकारी या बीडीओ मूर्खों जैसी बात करते हैं. या फिर नेता अपनी रोटियां सेंकने के लिए नत्था का अपने-अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं. हाँ एक बार तब सारे लोग ज़ोर से ज़रूर हँसे जब कृषि सचिव बार-बार यही रट लगता है कि हमें हाई कोर्ट के निर्देश का इंतज़ार है.
लेकिन तालियाँ तब बजती हैं जब चैनलों के रिपोर्टर पीपली गाँव से लाइव रिपोर्टिंग करते हैं. जब नत्था के पड़ोसी, उसके दोस्तों यहाँ तक की बकरियों से बाइट लेने की कोशिश करते हैं. इन तालियों में गूंज वही है जो मैं बचपन में गाँव में वीसीआर पर फिल्में देखते वक्त शक्ति कपूर, अमरीश पुरी या प्राण को पिटते वक्त सुना करता था.

और, इंग्लिश चैनल की रिपोर्टर स्ट्रिंगर विजय के बारे में पूछती है कि वो दिख नहीं रहा. फिर जब आखिर में उसकी गाड़ी रवाना होती है तब नत्था के घर के बाहर मेला उठ चुका होता है. इधर-उधर बिखऱी मिनरल वॉटर की बोतलें, पेप्पी, कॉफी के खाली ग्लास ये कहानी कह चुके होते हैं कि पीपली की त्रासदी सिर्फ एक मनोरंजन का ज़रिया था. वो भी उस हिंदुस्तान के लिए जिसे अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर एक किसान की आत्महत्या की कहानी में उतनी ही दिलचस्पी थी जितनी की किसी सीरियल में कि आगे क्या होगा.

तो क्या इलैक्ट्रॉनिक मीडिया नया विलन है? इससे पहले रामगोपाल वर्मा की फिल्म देखी थी रण. तब भी हॉल में कुछ ऐसा ही नज़ारा था.
प्रजातंत्र में जनता का भरोसा पहले नौकरशाहों से उठा तो नेताओं पर टिक गया. नेताओं से उठा तो न्यायपालिका पर टिक गया. और न्यायपालिका से भरोसा उठने के बाद ताकतवर मीडिया में लोगों को उम्मीद की किरण नज़र आई. पर अब मी़डिया भी विलन बनता जा रहा है. प्रजातंत्र के चारों खंबे अगर हिल गए तो आगे क्या होगा... मैं इस पर कुछ नहीं कह सकता... आप क्या कहते हैं....

Thursday, August 05, 2010

इस खेल को कामयाब करो!

तो क्या भारत की नाक कटनी तय है?
अगर ऐसा हुआ तो कम से कम एक इंसान तो बहुत खुश होगा. उसका नाम है मणिशंकर अय्यर.
आखिर वो सार्वजनिक रूप से बोल भी चुके हैं कि अगर कॉमनवेल्थ गेम्स नाकाम होते हैं तो इससे उन्हें बहुत खुशी होगी.
लगता है हालात उसी दिशा में जा रहे हैं. सिर्फ साठ दिन बचे हैं कॉमनवेल्थ गेम्स होने में. अखबार-टीवी भ्रष्टाचार, घपलों और घोटालों की ख़बरों से भरे पड़े हैं.
अय्यर की बददुआयें रंग ला रही हैं. अय्यर का श्राप पूरा होता दिख रहा है.
लेकिन इससे फायदा किसे है.
आप पूछ सकते हैं गेम करवाने से किसे फायदा है. क्यों करोड़ों रुपए खर्च कर कॉमनवेल्थ गेम कराये जा रहे हैं जबकि भारत की आधी आबादी अब भी भूखी सोती है.
क्यों बदसूरत दिल्ली की प्लास्टिक सर्जरी कर उसकी शक्ल बदली जा रही है. वो भी ऐसी सर्जरी जिसका प्लास्टर कुछ दिनों बाद उखड़ जाएगा और दिल्ली पहले से भी ज्यादा बदसूरत नज़र आएगी.
मुझे तो लगता है कि गेम्स होने चाहिएं और बिल्कुल कामयाब भी होने चाहिएं.
मैं अय्यर की बातों से इत्तफाक नहीं रखता. बल्कि मुझे तो लगता है कि यूपीए-1 में बतौर खेल मंत्री खुद अय्यर ने गेम्स को कामयाब बनाने के लिेए कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और इसी का नतीजा है कि आज सबके मन में शंका है कि आखिर ये गेम्स कामयाब हो पाएंगे या नहीं.
सुरेश कलमाड़ी और उनके गुर्गों के भ्रष्टाचार की कहानियां तो गेम्स खत्म होने के बाद भी चलती रहेंगी.
लेकिन अभी सबकी जिम्मेदारी ये है कि गेम्स को कामयाब बनाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करें.
प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी की चुप्पी से मुझे हैरानी है. ये कोई नीतिगत फैसला नहीं है कि अगर सब तरफ आलोचना हो तो बाद में कांग्रेस पार्टी कह दे कि सोनियाजी की ये राय नहीं थी और उससे उन्हें अलग कर ले.
गेम्स अगर नाकाम होते हैं तो सबकी नाक कटेगी. आखिर पश्चिमी देशों के मीडिया में तो अब भी यही बात होती है कि भारत चाहे विकसित देश बनने की दिशा में कदम आगे बढ़ा रहा हो लेकिन उसके पैरों में वो ताकत नहीं है जो उसे इस मैराथन को पूरा करने के लायक बना सके.
मुझे नहीं लगता है कि गेम्स कामयाब हो भी गए तो पश्चिमी मीडिया की भारत के बारे में ये सोच बदलेगी.
लेकिन अगर नाकाम रहे तो समझ लें कि ये हमला और तेज़ होगा.
तो अब तो नाक का सवाल है. चाहे आपको ये गेम्स पसंद हों या न हों, लेकिन अब इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि इन्हें हर हाल में कामयाब बनाया जाए.

Monday, July 19, 2010

खुल गई, खुल गई पत्रकारिता की नई दुकान!

मित्रों,
मुझे यह बताते हुये बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी जानकारी में पत्रकार बनाने की एक नई दुकान आई है. यह दुकान रातों-रात किसी को भी इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का पत्रकार बना सकती है. दुकानदारों ने मुझे इस संस्था की जानकारी डाक से भेजी थी. मैं आपसे इस जानकारी को बाँटना चाहता हूँ.

चिरकुट मीडिया संस्थान
  •  देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में से एक.
  •  हमारे यहाँ रातों-रात पत्रकार बनाने की गारंटी दी जाती है.
  •  संस्थान में भर्ती होने के लिये किसी भी तरह की शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं.
  • अगर संभव हो तो अपना या फिर अपने माता-पिता का पिछले तीन साल का आयकर रिटर्न, बैंक अकाउंट, क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट जमा करायें.  अगर आपके माता-पिता की आमदनी एक लाख रुपये से कम है तो कृपया हमारे संस्थान के लिये एप्लाई न करें.
  • अपना पुलिस रिकॉर्ड ज़रूर दें. ध्यान रहे अगर आप पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं तो आपका चिरकुट मीडिया संस्थान में भर्ती होना बिल्कुल तय माना जायेगा.
  • अपने दोस्तों, सहयोगियों से एक चरित्र प्रमाणपत्र ले कर आयें. ये ज़रूर लिखवायें कि वो आपको चमचई की कला में निपुण मानते हैं या नहीं. अगर हाँ, तो समझिये चिरकुट मीडिया संस्थान आपके लिये ही बना है.
  • संस्थान में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा होगी.
  • इसकी तैयारी के लिए आपसे यह अपेक्षा है कि आप सत्य कथा, कच्ची कलियां, बेशर्म आबरू, मैं सबका बाप- मेरा कोई बेटा नहीं, नाजुक जवानी, सच्ची कहानियां और फुटपाथ पर मिलने वाली दूसरी इसी तरह की उत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिकाओं का गहन अध्ययन करें. ध्यान रहे आपके कुछ मित्र आपको यह कह कर बहका सकते हैं कि ये बाजारू पत्रिकायें हैं. लेकिन आप बहकावे में न आयें. आज की टीवी पत्रकारिता की असली कसौटी यही है कि आप इन पत्रिकाओं से कितना ज्ञान आत्मसात कर सकते हैं.
  • इन साहित्यिक पत्रिकाओं की लेखन शैली और खासतौर से शीर्षकों पर खास ध्यान दें. जैसे मैंने अपना ही खून किया, मेरी बीवी को वो ले भागा, मेरा दोस्त बना मेरी सौतन, स्वर्ग यहां, नर्क पड़ोसी के वहां, ये किसकी औलाद, बेटा बना बाप का बाप आदि. याद रहे चिरकुट मीडिया संस्थान में इस तरह के अनोखे, बिल्कुल अलग तरह के और समाज से सरोकार रखने वाले शीर्षक देने वालों को वरीयता दी जाएगी.
  • फिल्मी पत्रिकाओं का भी रट्टा लगा लें. ध्यान रहे प्रवेश परीक्षा में नकल करने की अनुमति नहीं है. इसलिए यह जरूर पता कर लें कि धोनी की शादी होने का बाद अब दीपिका पादुकोण किसके साथ पींगे लड़ा रही हैं, बिपाशा बसु के अंग वस्त्रों की साइज़ क्या है, वो जो चुंबन करते हुए दृश्य छपा है, उसमें हीरो-हीरोइन कौन हैं वगैरह. ध्यान रहे न सिर्फ चिरकुट मीडिया संस्थान में भर्ती के लिए ये सब जानकारी आपके लिए अति आवश्यक है बल्कि संस्थान से निकलने के बाद जब देश के प्रतिष्ठित न्यूज चैनलों में जाएँगे तब वहां की प्रवेश परीक्षाओं में भी आपसे यही सारे सवाल पूछे जाएँगे.
  • चिरकुट मीडिया संस्थान में भर्ती के लिए एक अहम आवश्यकता है - विज्ञान का ज्ञान. आपसे यह अपेक्षित है कि आप उड़नतश्तरियों के मूवमेंट पर नज़र रखें. आपके इलाके में कौन सी गाय या भैंस को एलीयंस उठा कर ले गए थे. उस घटना के बाद से उनके दूध देने की क्षमता में क्या तब्दीली आई.  क्या एलीयंस ने आपके किसी जान-पहचान वाले के साथ यौन दुराचार तो नहीं किया है. आपके इलाके या उसके आसपास कौन सा पेड़ है जो दूध पीकर खून उगलने की ताकत रखता है आदि.
  • आपसे यह भी अपेक्षित है कि आपकी धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र में न सिर्फ आस्था हो बल्कि उनका गहन ज्ञान भी हो. स्वर्ग की सीढ़ियां कहां से जाती हैं इस प्रश्न का उत्तर आपके जुबां पर हमेशा रहना चाहिए. कौन सा बाबा किस कन्या की इज्जत लूट रहा है. अगर शनि शुक्र में घुस जाए और उसके सिर पर राहु-केतु डिस्को करें तो जातक के भविष्य पर क्या असर होगा, ये सामान्य ज्ञान आपसे अपेक्षित है.
  • क्रिकेट को आप पूरी तरह से चाट लें. डरिए मत. आपसे ये नहीं पूछा जाए कि फील्डिंग पोजीशन क्या होती है या फिर गुगली या दूसरा क्या बला है. लेकिन आपको ये पता होना चाहिए कि किस क्रिकेटर का किस हीरोइन के साथ टांका भिड़ा है, कौन सा क्रिकेटर मैच फिक्सिंग में फंसा है, या कल रात नाइट क्लब में किस क्रिकेटर ने टल्ली होकर अपने दोस्त की बीवी के गालों पर चुम्मी ले ली थी.
हर प्रवेश परीक्षा के कोचिंग संस्थान की तरह हमारा भी यह फर्ज है कि हम अपने यहां प्रवेश लेने के इच्छुक नौजवानों की मदद करें. चिरकुट मीडिया संस्थान की प्रवेश परीक्षा में सफल होने के लिये कोई गाइड या कुंजी उपलब्ध नहीं है. अगर कोई बाजार में ऐसा कहता है तो ऐसे फर्जी लोगों से सावधान रहें.  लेकिन चूंकि आपने हमारे संस्थान में प्रवेश लेने में दिलचस्पी दिखाई है इसलिए हम आपको बता रहे हैं कि आप प्रवेश परीक्षा की तैयारी कैसे करें.

हर सप्ताह कुछ अखबारों में न्यूज चैनलों का टीआरपी चार्ट छपता है. आप उनमें से कुछ आला चैनलों का चुनाव करें. अगले एक महीने तक इन चैनलों को देखने का बीड़ा उठाएँ. हम पक्के तौर पर आपसे वादा करते हैं कि हमने ऊपर जिन भी विषयों का जिक्र किया है वे सब आपको इन चैनलों में देखने को मिल जाएँगे. तो बस हो गई तैयारी पूरी.

बस तो अब देर किस बात की है. हो जाइए शुरू. चिरकुट मीडिया संस्थान आपका स्वागत करता है. ध्यान रहे आप आज हमारे काम आएँगे कल हम आपके काम आएंगे.

Saturday, July 17, 2010

हो गई बात!!!

बड़ी धूम धाम से हमारे विदेश मंत्री पाकिस्तान गए थे.
अमन की आशा में.
मुंबई के ज़ख्म अब भी हरे हैं.
पाकिस्तान ने मुंबई के गुनहगारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. उल्टे वो समय-समय पर सबूत मांगता रहता है.
फिर भी, सैम अंकल के कहने पर हमारी सरकार हर बार घुटने टेकती है. हर बार बातचीत की पहल करती है.
अब हो गई तसल्ली. कैसे-कैसे झूठ बोले पाकिस्तान ने. जैसे बातचीत को सार्थक और सफल बनाने का जिम्मा सिर्फ भारत का है पाकिस्तान की शर्तों पर ही होगी बातचीत.
क्या बहाना बनाया है. कहा कृष्णा इस्लामाबाद में जितने वक्त रहे, पूरे वक्त भारत में अपने हुक्मरानों से फोन पर बतियाते रहे कि क्या करना है, क्या कहना है वगैरह-वगैरह.
शुक्र है, कुरैशी ने ये नहीं कहा कि कृष्णा नई दिल्ली के साथ-साथ वॉशिंगटन से भी फोन पर निर्देश लेते रहे. वो शायद इसलिए नहीं कहा क्योंकि वॉशिंगटन की लाइन व्यस्त रही होगी उनके फोन से. बीच-बीच में आईएसआई और पाकिस्तानी सेना के मिस्ड कॉल भी आते रहे होंगे. इन्हीं मिस्ड कॉल में से किसी एक का जवाब दिया होगा तो सेना ने बोला होगा बहुत हो गई बातचीत. सुना नहीं गृह सचिव जी के पिल्लई ने क्या कहा है. वो कहते हैं मुंबई हमलों के पीछे आईएसआई का हाथ है. फिर भी, बात कर रहे हो विदेश मंत्री से... छोड़ो ये बातचीत और उन्हें खाली हाथ दिल्ली रवाना करो.
यहां दिल्ली में तो लोग बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे थे. अमन की आशा में बड़ी-बड़ी बातें भी हो गईं. हर बार बातचीत शुरू होने पर इ्न्हें लगता है बस साठ साल का रंजिश भरा इतिहास अब दफ्न हो चुका है. अब तो अमन की नई इबारत लिखी जानी है. इस बार तो पक्का ही पाकिस्तान अपना रवैया बदल देगा. रही बात भारत की.... तो वो तो हम वाघा बॉर्डर पर इतनी मोमबत्तियां जलाएंगे कि उनकी लौ की आँच दिल्ली की कुर्सी तक पहुँच जाएगी. आखिर यही हमारा दबाव तो है असली वजह. जिसके चलते बार-बार दुत्कारे जाने के बाद भी भारत हर बार शांति का हाथ बढ़ा कर पहुँच जाता है इस्लामाबाद.

मुंबई हमले के गुनहगारों को पूरी पनाह दो. कश्मीर में पत्थर फेंको गैंग को पूरा समर्थन दो. माओवादियों को भी असला-बारूद पहुँचाओ. फिर हमारी कनपटी पर पिस्तौल लगा कर कहो चलो करो बातचीत... हर बार की तरह पहले कश्मीर और बलूचिस्तान पर कर लो बात.. आतंकवाद-आतंकवाद क्या होता है. हम भी तो हैं आतंकवाद को भुक्तभोगी. ये है पाकिस्तान का रवैया.

तो हमारी क्या मति मारी गई है. क्यों बार-बार पहुँच जाते हैं हमारी सरकार के आला लोग पाकिस्तान. देख लो चिदंबरम भी तो गए थे. लेकिन उनका विवेक शायद फिर भी ठीक रहा. दो टूक सुना आए पाकिस्तान को. कृष्णा के सामने भी कुरैशी की बकवास के बाद ज्यादा विकल्प नहीं बचे. वर्ना तो शायद फिर से कोई साझा बयान जारी कर देते बलूचिस्तान के ज़िक्र वाला जैसे शर्म अल शेख में करवाया था.

तो कब तक करेंगे हम ये अमन की पहल. क्या इस इलाके में शांति बनाए रखने का ठेका भारत ने ही ले रखा है. क्यों हम कमजोर दिखते हैं. अगर पाकिस्तान जैसे पिद्दी से मुल्क के सामने हमारी हवा खिसकती है तो किस बूते पर हम दुनिया का सरताज बनने का सपना पाल रहे हैं.

दस साल सोच कर देखो कि पाकिस्तान नाम का मुल्क इस दुनिया में है ही नहीं. सब बंद कर दो. बातचीत भी. और ज़रा पूरब की तरफ नज़र उठा कर देखो जहाँ बैठा है असली चुनौती देने वाला. सारी नीतियां चीन के बारे में हों, दोस्ती हो दोस्ती, दुश्मनी हो तो दुश्मनी.. लेकिन असली खेल वहीं से शुरू होगा.. या शायद हो भी चुका है.

Friday, May 14, 2010

कुत्ते की पाती गडकरी के नाम

आदरणीय श्री गड़करीजी.

सादर प्रणाम. आशा है आप प्रसन्न होंगे.

सबसे पहले आपका धन्यवाद कि आपने मेरी प्रजाति के सदस्यों को भारत के महान लोगों के दिलो-दिमाग पर दोबारा ला दिया. वर्ना तो लोग हमें भूल ही चुके थे. आज से पहले टेलीविज़न और अखबारों में हमारा नाम शायद इतनी बार पहले कभी नहीं लिया गया था.

अब हर चैनल पर बार-बार कुत्ता-कुत्ता चल रहा है. एक नहीं दस-दस बार चैनलवाले हमारा नाम ले रहे हैं. जिस चैनल पर देखिए कुत्ता पुराण के नए-नए अध्याय सुनाए जा रहे हैं. कुछ दूसरे जानवरों के नाम भी मनुष्यों के मुँह से सुनने में आए हैं. जैसे शेर, छछूंदर, गधा आदि.

लेकिन इस पत्र के माध्यम से मैं अपनी समस्त प्रजाति की ओर से विरोध दर्ज कराना चाहता हूं. सबसे पहली बात तो ये है कि आपने हमें तलवे चाटने वाला कहा. आपने कहा कि लालू-मुलायम कुत्ते की तरह तलवे चाटने लगे. फिर अपनी सफाई में कह डाला कि आप तो सिर्फ हिंदी का मुहावरा प्रयोग कर रहे थे.

माफ कीजिएगा सर. लेकिन हिंदी में मुहावरा कुत्ते की तरह तलवे चाटना नहीं बल्कि सिर्फ तलवे चाटना है. आपने कुत्ते अपनी ओर से घुसा दिया. शायद आपको लगा होगा कि लोग कुत्ते का नाम सुन कर तालियां बजाएंगे. ऐसा हुआ भी. लेकिन आपने जबरन बखेड़ा खड़ा कर दिया.

लालू-मुलायम की पार्टी ने जबर्दस्त विरोध किया. आपके पुतले जलाए गए. समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहन सिंह ने कहा कि आप आरएसएस के स्वयंसेवक हैं. आरएसएस कहता है कि वो भारतीय संस्कारों की शिक्षा देता है. तो ऐसे में आपको क्या संस्कार दिए गए हैं. उन्होंने ये भी पूछा कि झारखंड में शिबू सोरेन से समर्थन वापस लेने का बावजूद अभी तक कौन कुत्ते की तरह उनके तलवे चाट रहा है.

मुझे इस बात पर घोर आपत्ति है कि आपने मनुष्यों का अपमान करने के लिए हमारी प्रजाति का नाम लिया. मुझे लगता है कि इससे उन दो मनुष्यों का नहीं बल्कि हमारी पूरी प्रजाति का अपमान हुआ है क्योंकि हम सबसे वफादार जानवरों में माने जाते हैं. आपको उन प्राणियों से जो भी शिकायत रही हो लेकिन उन्हें अपशब्द कहने के लिए आपको कोई दूसरा जानवर ढूंढना चाहिए था. मैं आपको इस  बारे में कोई सुझाव नहीं दूंगा क्योंकि आप स्वयं दादा कोंडके से प्रभावित हैं. आपका मराठी शब्दकोष अपरिमित है. आप हिंदी और मराठी दोनों के शब्दों में आपस में घालमेल करने में माहिर हैं. लिहाज़ा आपको जो ठीक लगे आप उस जानवर का प्रयोग अपनी शब्दावली में कर सकते हैं. लेकिन सर प्लीज़ हम कुत्तों को बख्श दीजिए.

आपने कहा कि वो हमारी तलवे चाटने लगे. आपको शायद पता नहीं कि हमें जब कोई प्यार से आवाज़ दे तो हम दुम भी हिलाने लगते हैं. इसलिए एक मुहावरा कुत्ते की तरह दुम हिलाना भी है. आप चाहें तो अगली बार इसका इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन मौजूदा संदर्भ में हमारी प्रजाति को घसीटना बेहद आपत्तिजनक है.

वैसे लगता है कि आपको हम कुत्तों से कुछ खासी ही समस्या है. इससे पहले आप अपने भाषणों में ये कहते रहे हैं कि चिदंबरम जब वित्त मंत्री थे तब उन्होंने कुत्तों के बिस्किट पर टैक्स कम कर दिया था. महंगाई पर आपके भाषण में आप इस बात का बार-बार जिक्र करते हैं. अब अगर हम कुत्ते बिस्किट नहीं खाएंगे तो क्या खाएंगे.. आपको क्या समस्या है अगर हम कुत्तों को खाने के लिए बिस्किट कुछ सस्ते दामों पर मिल जाएं.

कृपया कुत्तों को अकेला छोड़ दीजिए. उन्हें राजनीति में मत घसीटिए. क्योंकि वैसे भी पहले से ही कई किस्म के जानवर राजनीति कर रहे हैं. हमें शांति से घरों की चौकीदारी करने दीजिए.

आपके उत्तर की प्रतीक्षा में

आपका प्रिय
कुत्ता

Friday, May 07, 2010

अब तो लाइन पर आ जाओ

गृह मंत्री पी चिदंबरम ने राज्य सभा में अपने मंत्रालय के कामकाज के बारे में चर्चा के जवाब में कहा गृह मंत्रालय का मतलब सिर्फ नक्सलवाद की समस्या से निबटने वाला मंत्रालय नहीं है. वैसे भी नक्सलवाद पर अलग से चर्चा हो चुकी है लिहाजा उन्होंने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा.

इससे पहले दिन में गृह मंत्रालय की ओर से एक प्रेस नोट जारी हुआ. इसमें नक्सलवादियों के लिए सहानुभूति रखने वाले भोपुओं को आगाह किया गया कि वे लाइन पर आ जाएं. मुट्ठी बाँध कर हवा में लहराने और टेलीविज़न पर आदिवासी-आदिवासी चिल्लाने से कुछ नहीं होगा. इस चेतावनी में कहा गया है कि अगर इन्होंने नक्सलवादियों को अपना मूक और कभी-कभी मुखर समर्थन जारी रखा तो उनके खिलाफ अनलॉफुल एक्टीविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट 1967 के सेक्शन 39 के तहत कड़ी कार्रवाई हो सकती है. इसमें अधिकतम दस साल की सजा या जुर्माना या दोनों एक साथ का प्रावधान है. गृह मंत्रालय के नोट में यह भी कहा गया है कि सीपीआई माओवादी एक आतंकवादी संगठन है. ये बात अलग है कि गृह मंत्रालय की अपनी वेबसाइट पर प्रतिबंधित संगठनों की सूची में अब भी एमसीसी और सीपीआईएमएल का ही नाम है. जबकि इन दोनों संगठनों का 2004 में विलय हो चुका है और अब ये सीपीआईमाओवादी के नाम से अपनी आतंकवादी गतिविधियाँ चलाते हैं.

कुछ लोगों ने तुरंत ही इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ दिया. इन्होंने पूछा कि क्या अब इस मुल्क में सरकार का ही हुक्म बजाना होगा. जो सरकार कहेगी वही करना होगा. क्या गरीब आदिवासियों की समस्याओं के बारे में बात करना आतंकवादियों का समर्थन करना है. सरकार पूंजीपतियों का प्रतिनिधित्व करती है और आदिवासियों का पिछले साठ साल से शोषण किया जा रहा है. सलवा जुड़ूम जैसे असंवैधानिक कदम का समर्थन क्यों करती है सरकार.

कितना खूबसूरत जाल बुनते हैं आतंकवादियों के ये समर्थक. गरीब और मासूम आदिवासियों को आड़ बना कर वैचारिक दृष्टि से अपने करीब माओवादियों के समर्थन में कैसे तर्क गढ़ते हैं. आदिवासियों के शोषण को मुद्दा बना कर बंदूक से अपने ही मुल्क के दूसरे लोगों को मारने को जायज ठहराते हैं ये लोग.

परेशानी मुझे भी है. मुझे ट्रैफिक जाम में फंसने के बाद ट्रैफिक पुलिस वाले से लेकर दिल्ली सरकार पर बहुत गुस्सा आता है फिर ये गुस्सा गृह मंत्रालय तक पहुंच जाता है क्योंकि दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के तहत है. मेरे घर पर सात-सात आठ-आठ घंटे बिजली नहीं होती तब भी बहुत गुस्सा आता है. बिजली विभाग से शुरू हो कर मायावती सरकार तक पहुँच जाता है ये गुस्सा और फिर केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय  तक. स्ट्रीट लाइट नहीं जलती है तो नगर निगम के कर्मचारी से लेकर राष्ट्रपति तक पर गुस्सा आता है. मुझे लगता है मैं देश के कानून का पालन करने वाला एक सीधा-साधा नागरिक हूँ. मैं अपने कर सही समय पर जमा करवाता हूँ. फिर मुझे अपने जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी बुनियादी सुविधायें पाने का हक क्यों नहीं है.

क्या मुझे बंदूक उठा लेनी चाहिए. क्या नीचे से लेकर ऊपर तक सरकार के हर कारिंदे को लाइन में खड़ा कर उड़ा देना चाहिए. नहीं. क्योंकि ये मेरी विचारधारा नहीं है. मुझे अपने मुल्क से प्यार है. जो देश चलाते हैं उनसे भी क्योंकि वो एक व्यवस्था का अंग हैं और यह व्यवस्था हमारे बुजुर्गों ने लिखित संविधान के जरिए तय की है. इस व्यवस्था में ढेरों खामियाँ हैं. उनका कोई हिसाब नहीं है. लेकिन इसके लिए दोषी कौन ये बहस करने का वक्त नहीं है. बल्कि इन्हें कैसे दूर किया जाए बात इस पर होनी चाहिए.

लेकिन ये ढोंगी आदिवासियों के हक की बात करते हैं. भोले-भाले आदिवासियों के हक को मारा जा रहा है क्योंकि उनके इलाकों में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ प्लांट्स लगा रही हैं. एमओयू साइन किए जा रहे हैं. आदिवासियों को उनके घरों से बेदखल किया जा रहा है. विकास में आदिवासियों की हिस्सेदारी नहीं है. विकास की रोशनी साठ साल में भी किसी आदिवासी के घर के आंगन में उजाला नहीं भर सकी है. वगैरह वगैरह.

विकास के काम में संतुलन हो अब इतनी समझ तो पिछले साठ साल में हमारे देश के हुक्मरानों को आ चुकी है. वैसे भी अगर जयराम रमेश जैसे लोग पर्यावरण मंत्रालय में बैठे हो तो समझ लेना चाहिए कि प्राकृतिक संपदा को उजाड़ कर विकास की राह पर बढ़ना कितना कठिन होगा जब तक कि राहत और पुनर्वास का काम पक्के तौर पर न कर लिया जाए. जैसे अभी रमेश ने मध्य प्रदेश के महेश्वर बाँध परियोजना के काम पर रोक लगा दी क्योंकि उन्हें लगता है कि आरएंडआर का कम ठीक से नहीं हुआ है. ये एक नए किस्म का एक्टीविज़्म है जो अब मंत्रियों के जरिए सरकारी कामकाज में भी दिखने लगा है क्योंकि इस बांध का काम करीब 90 फीसदी पूरा हो चुका है.

इसी तरह उड़ीसा में वेदांता के प्रोजेक्ट से उजड़ने वाले आदिवासियों के एक देवस्थल का जिक्र भी एक मशहूर पत्रिका में हुआ है. इस किस्से की तुलना हॉलीवुड फिल्म अवतार से की गई है कैसे आदिवासियों की परंपरा को नष्ट करने के लिए घुसपैठिए आते हैं और आखिर में जीत आदिवासियों की ही होती है.

हक सबका है दोस्तों. आदिवासियों का भी इस देश पर उतना ही हक है जितना आपका या मेरा. लेकिन आदिवासियों के नाम पर बंदूक उठा कर देश के संविधान के खिलाफ काम करने का हक माओवादियों को किसने दिया. दरअसल, आदिवासी तो बहाना हैं. इनका मकसद देश का संविधान पलट कर पीपुल्स आर्मी के जरिए भारत की सत्ता संचालन का सूत्र अपने हाथों में लेना है.

भोपुओं ये तो बता दो. अगर माओवादी सत्ता में आ गए तो क्या भारत में मानवाधिकार आयोग बना रहेगा या नहीं. वैसे तुम्हें क्या फर्क पड़ता है. तुम्हें तो मौजूदा व्यवस्था का हिस्सा बने रह कर इसी के खिलाफ बोलना है. तुम इसी व्यवस्था से फायदा उठाते हो. और इस व्यवस्था से लड़ रहे आतंकवादियों के हक में भी बोलते हो. लेकिन अब जरा गृह मंत्रालय की तथाकथित सलाह पर भी नजर मार लेना. शायद तुम्हारे हक में अच्छा हो.

Monday, April 26, 2010

कॉर्बेट में कुछ पल




वैसे गए तो बाघ देखने. लेकिन उसके पदचिन्ह देख कर वापस आ गए. रास्ते में हिरण, मोर, जंगली मुर्गा, हाथी वगैरह ज़रूर दिखे. आप भी देखें कुछ रंग जिम कॉर्बेट के.