Saturday, March 08, 2014

मोदी बनाम सब


अब जबकि लोक सभा चुनाव के लिए ईवीएम पर पहला बटन दबने में सिर्फ़ एक महीना बचा है, एक बात साफ होती जा रही है। इस चुनाव को अमेरिका की तर्ज पर राष्ट्रपति चुनाव जैसा बनाने की बीजेपी की रणनीति काफी हद तक कामयाब हो गई है। चाहे कांग्रेस जैसा राष्ट्रीय दल हो, या फिर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल या फिर आम आदमी पार्टी जैसे नए दल, सबके निशाने पर नरेंद्र मोदी हैं। बीजेपी और नरेंद्र मोदी के लिए इससे बेहतर हालात नहीं बन सकते थे।
यूपीए सरकार के कामकाज का दस साल का लेखा-जोखा कहीं पीछे छूटता दिख रहा है। सूचना, खाद्य, शिक्षा के अधिकार या फिर भूमि अधिग्रहण को लेकर सरकार के ऐतिहासिक फैसले। सामाजिक सुरक्षा की कई योजनाओं पर उसकी कामयाबी। महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर उसकी नाकामी, बिगड़े आर्थिक हालात, गिरती विकास दर, बढ़ती बेरोजगारी, फैसले न ले पाने से पंगु सरकार की बनी छवि, पड़ोसी देशों से खट्टे रिश्ते जैसे तमाम महत्वपूर्ण मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए लगते हैं। ऐसा लग रहा है चुनाव यूपीए सरकार के दस साल के प्रदर्शन पर नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी के 12 साल के गुजरात में शासन के आधार पर हो रहा है।

करीब डेढ़ साल पहले जब बीजेपी में नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी पर चर्चा शुरु हुई थी तब पार्टी के रणनीतिकारों की सोच यही थी। उन्हें ये अंदाज़ा था कि नरेंद्र मोदी का नाम लेते ही एक विशेष किस्म का ध्रुवीकरण होने लगता है। चाहे पार्टी के विरोधी इसे सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण का नाम दें, लेकिन आम लोगों में उन्हें लेकर पसंद या नापसंद बिल्कुल साफ हो जाती है। जिन्हें फ्लोटिंग वोट कहा जाता है, वैसे मतों की संभावना मोदी के नाम पर समाप्त हो जाती है। लोग या तो उन्हें वोट देंगे या उनके खिलाफ देंगे। रणनीतिकारों का ये भी आकलन रहा था कि कुछ क्षेत्रीय दल जो अब तक गैरकांग्रेसवाद के नाम पर बीजेपी के साथ चले आते थे, कई नए कारणों से बीजेपी के साथ जुड़ने का रास्ता ढूंढेंगे। ऐसे क्षेत्रीय दल जिन्हें मोदी की हिंदुत्व के पोस्टर बॉय की छवि के कारण अपने मुस्लिम वोटों के छिटकने का डर रहेगा, वे चुनाव के बाद बीजेपी के साथ आने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाएंगे। लोक सभा चुनाव को राष्ट्रपति चुनाव जैसा बनाने से ये फायदा होगा कि बीजेपी मोदी की लोकप्रियता का सीधे-सीधे फायदा उठा सकेगी। मोदी के नाम से दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में बीजेपी के मत प्रतिशतों में संभावित वृद्धि के मद्देनज़र पार्टी को वहां नए सहयोगी बना कर अपना जनाधार बढ़ाने में आसानी होगी। सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील यूपी और बिहार जैसे राज्यों में मोदी के चेहरे को आगे रख हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सकेगा।

बीजेपी के रणनीतिकारों की ये योजना अभी कम से कम जनमत सर्वेक्षणों और विपक्षी दलों में मचे हडकंप से तो कामयाब होती दिख रही है। जैसे अगर यूपी की बात करें तो समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अपनी बड़ी रैली उसी दिन करते हैं जिस दिन मोदी की बड़ी रैली होती है। जबकि मायावती को मोदी पर व्यक्तिगत हमले करने में भी परहेज़ नहीं रहा। बिहार में रामविलास पासवान को साथ लेकर बीजेपी ने लालू और नीतीश दोनों के समीकरणों को बिगाड़ दिया है। लालू का हमला नीतीश के बजाए मोदी पर केंद्रित हो गया है तो वहीं नीतीश को अपनी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को सार्वजनिक करना पड़ा है ताकि लोक सभा चुनाव के लिए बिहार के लोगों से वोट मांगने को सही ठहरा सकें।

दक्षिण भारत में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। बीजेपी की ताकत वाले इकलौते राज्य कर्नाटक में मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर पार्टी से अलग हुए बी एस येदुरप्पा और बी श्रीरामुलु साथ आ गए हैं। वहीं तमिलनाडु में मोदी के नाम पर बीजेपी के वोटों में बढोतरी की संभावना के मद्देनज़र डीएमडीके, एमडीएमके, पीएमके और बीजेपी का एक बड़ा गठबंधन बनने जा रहा है जिसका लक्ष्य तीस फीसदी से अधिक वोट हासिल करना है। आंध्र प्रदेश में पूर्व केंद्रीय मंत्री और एन टी रामाराव की बेटी पुरुंदेश्वरी बीजेपी में शामिल हो गई हैं। टीडीपी के साथ बीजेपी के तालमेल की संभावना बनी हुई है और टीआरएस ने कांग्रेस में विलय न करने का फैसला कर बीजेपी के साथ आने का रास्ता खुला रखा है।

ममता बनर्जी, जयललिता, एम करुणानिधि, नवीन पटनायक जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों को छोड़ उत्तर भारत के सभी क्षेत्रीय नेता नरेंद्र मोदी के खिलाफ हमले करने में कांग्रेस के साथ हो गए हैं। राहुल गांधी खुद मोदी पर कुछ नहीं कहते हैं। लेकिन भिवंडी में एक सभा में जिस तरह से उन्होंने महात्मा गांधी हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार बताया है, उससे उनकी रणनीति का इशारा भी मिलता है। बीजेपी में मोदी विरोधी दलील देते थे कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से चुनाव में सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता मुद्दा बन जाएगा। राहुल के बयान से कुछ ऐसा ही इशारा मिला है।

इस बीच, आम आदमी पार्टी ने भी अपना पूरा ध्यान नरेंद्र मोदी पर केंद्रित कर दिया है। अरविंद केजरीवाल इन दिनों गुजरात के दौरे पर हैं और उन्होंने मोदी से कुछ कड़वे सवाल पूछ कर मोदी के विकास के दावों पर सवाल उठाए हैं। जिनका जवाब उन्हें नहीं मिला।

कामयाबी हासिल करने के लिए मोदी की रणनीति यही रही है कि सारे विरोधी इकट्ठे होकर उन पर हमले करें। अब ऐसा ही हो रहा है। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि अब ये लोक सभा चुनाव मोदी बनाम राहुल नहीं बल्कि मोदी बनाम सब का हो गया है और इसमें नाकामी का मतलब है उनकी व्यक्तिगत हार।


Friday, March 07, 2014

भारतीय राजनीति की आइटम गर्ल

जिस वक्त अरविंद केजरीवाल बतौर दिल्ली के मुख्यमंत्री रेल भवन पर धरने पर बैठे थे. तब मेरा वहां से गुजरना हुआ। वहां के अनुभव को मैंने ट्विटर पर 140 शब्दों में कैद किया था। वो ट्वीट कुछ इस प्रकार था।


Jan 20
इस पार्टी की ताक़त है टीवी कैमरे। शाम को धरना स्थल पर गया था। कैमरा देखते ही लोग शुरू हो जाते हैं। कैमरा हटा दीजिए, ये नौटंकी खत्म हो जाएगी!

ये ट्वीट अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के गठन से पहले की घटनाओं और गठन के बाद चुनावों में मिली शानदार कामयाबी के बाद बनी सरकारी के मेरे अनुभवों पर आधारित था। लेकिन अब ये स्पष्ट होता जा रहा है कि इस ट्वीट में लिखा एक-एक शब्द वाकई सच था।

बृहस्पतिवार को मैं बीजेपी मुख्यालय पर ही था जब आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने वहां प्रदर्शन किया। इससे पहले गुजरात दौरे पर गए अरविंद केजरीवाल को रोका गया था। जिसे आम आदमी पार्टी ने गिरफ्तारी का नाम दिया। अब चुनाव आयोग भी कह चुका है कि केजरीवाल ने आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया था।

बीजेपी मुख्यालय पर भी कैमरों को देख कर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की उत्तेजना देखते ही बनती थी। जैसे ही कैमरों को ध्यान उन पर जाता, उनके नारों का डेसीबल लेवल बढ़ जाता था। कैमरे देख कर उन्हें इतना जोश आया कि बीजेपी मुख्यालय पर लगे होर्डिंग फाड़ने लगे। वाटर कैनन की गाड़ी पर चढ़ गए और उसे नुकसान पहुँचाने की कोशिश करने लगे।

कहा जाता है- जहां न पहुँचे रवि, वहां पहुँचे कवि।

 मगर आम आदमी पार्टी के बारे में अब ये कहना पड़ेगा

 जहां पहुंचे कैमरे, वहां पहुंचे आम आदमी पार्टी

क्यों मचा है बीजेपी में घमासान?


लोक सभा में विपक्ष की नेता और बीजेपी की वरिष्ठतम नेताओं में से एक सुषमा स्वराज ने कुछ विवादास्पद लोगों को साथ जोड़ने की पार्टी की कोशिशों का सार्वजनिक रूप से विरोध किया है। सुषमा ने ट्विटर के ज़रिए अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा है कि वे कर्नाटक में श्रीरामुलु की पार्टी बीएसआर कांग्रेस के बीजेपी में विलय या गठबंधन के खिलाफ हैं। वहीं उन्होंने हरियाणा के कद्दावर कांग्रेसी नेता और मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुडा के बेहद खास विनोद शर्मा को बीजेपी की सहयोगी पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस में शामिल होने का भी विरोध किया है।
सुषमा स्वराज ने ये भी बताया है कि श्रीरामुलु की पार्टी के विलय के विरोध में उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र लिखा है। वे ये भी चाहती हैं कि अगर उनके विरोध को दरकिनार कर श्रीरामुलु की पार्टी का बीजेपी में विलय होता है तो उनके विरोध को भी सार्वजनिक किया जाए। जो कि अब खुद उन्होंने ही सार्वजनिक कर भी दिया है।
बीजेपी में सुषमा के इस कदम से हैरानी है। पार्टी नेताओं को ये समझ नहीं आया है कि सुषमा स्वराज ने अपनी बातें पार्टी की सर्वोच्च निर्णायक संस्था संसदीय बोर्ड में रखने के बजाए सार्वजनिक रूप से क्यों कहीं? ये कहा जा रहा है कि विनोद शर्मा को लेकर पार्टी के विरोध को हरियाणा जनहित कांग्रेस के नेता कुलदीप विश्नोई को बता दिया गया था। जिसके बाद उन्होंने बृहस्पतिवार को दिल्ली में विनोद शर्मा के साथ होने वाली साझा प्रेस कांफ्रेंस को रद्द कर दिया था। फिर उसके बाद सुषमा को विनोद शर्मा को लेकर अपने विरोध को सार्वजनिक करने की जरूरत क्यों पड़ी?
दरअसल, बीजेपी में सब कुछ सामान्य नहीं है। पिछले साल सितंबर में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के बाद माना गया था कि नेतृत्व का मसला अब हल हो गया है। तब इस फैसले को लेकर बीजेपी के शीर्षस्थ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने राजनाथ सिंह को लिखे अपने पत्र को सार्वजनिक कर नाराजगी जाहिर कर दी थी। लेकिन धीरे-धीरे उनके तेवरों में भी नर्मी आती दिखाई दी। हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान पर पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में उन्होंने उम्मीद जताई थी कि मोदी बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे। तब ये माना गया कि मोदी की उम्मीदवारी को लेकर उनकी नाराजगी दूर हो गई है और खुद प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा पर वास्तविकता को देख कर विराम लग गया है।
पर ऐसा है नहीं। चाहें आडवाणी हों, मुरली मनोहर जोशी हों या फिर सुषमा स्वराज। लोक सभा चुनावों की तारीखों के एलान के साथ ही इन नेताओं की नाराजगी अलग-अलग ढंग से बाहर आ रही है। जहां आडवाणी खुद अपने मुंह से ही गांधीनगर से लोक सभा चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुके हैं, वहीं मुरली मनोहर जोशी के समर्थकों ने नरेंद्र मोदी के बनारस से चुनाव लड़ने की खबरों के बीच उनके पोस्टर वहां लगवाने शुरू कर दिए हैं। और अब ट्विटर के माध्यम से सुषमा स्वराज ने अपने विरोध को सार्वजनिक कर दिया है।
विश्लेषकों का मानना है कि सुषमा की कोशिश दागी नेताओं से खुद को दूर दिखा कर अपनी छवि को दुरुस्त रखने की है। गौरतलब है कि श्रीरामुलु बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं के करीबी हैं। किसी वक्त ये रेड्डी बंधु सुषमा स्वराज के करीबी माने जाते थे। लेकिन जनार्दन रेड्डी पर अवैध खनन के आरोप लगने और सीबीआई द्वारा उनकी गिरफ्तारी के बाद से सुषमा ने इनसे दूरी बनाना शुरू कर दिया। ये माना जा रहा है कि श्रीरामुलु के बीजेपी में विलय का मतलब होगा रेड्डी बंधुओं की बीजेपी में वापसी। सुषमा स्वराज को लगता है कि अगर ऐसा होगा तो पार्टी में उनके विरोधी ये आरोप लगा सकते हैं कि उन्हीं की वजह से रेड्डी बधुओं की पार्टी में वापसी हुई है। इसीलिए श्रीरामुलु के विरोध को सार्वजनिक कर उन्होंने ये बात रिकार्ड पर रख दी है कि वे दागी रेडडी बंधुओं के खिलाफ हैं। यही किस्सा विनोद शर्मा का भी है जिनके बेटे मनु शर्मा को मॉडल जेसिका लाल की हत्या में उम्र कैद की सज़ा हुई है। विनोद शर्मा हरियाणा के ताकतवर ब्राह्रण नेता हैं और हुडा की अल्पमत की सरकार को बहुमत में बदलने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी। विनोद शर्मा के करीबी हरियाणा में प्रचार कर रहे थे कि सुषमा की वजह से विनोद शर्मा बीजेपी या उसकी सहयोगी पार्टी से जुड़ने जा रहे हैं और इसका पर्दाफाश करने के लिए ही सुषमा को अपना विरोध सार्वजनिक करना पड़ा।

 बीजेपी में अब भी एक धड़े को ये उम्मीद है कि अगर पार्टी लोक सभा चुनाव में मोदी की अगुवाई में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई तो मोदी की जगह किसी और के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो सकता है। इसी उम्मीद के चलते लाल कृष्ण आडवाणी आरएसएस के न चाहने के बावजूद लोक सभा चुनाव लड़ने के लिए न सिर्फ इच्छुक हैं बल्कि अपनी इच्छा सार्वजनिक कर पार्टी पर दबाव भी बना रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि 2009 के लोक सभा चुनाव में एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने से पहले तक आडवाणी कहते रहे थे कि ब्रिटिश संसद की परंपरा के मुताबिक लोक सभा में विपक्ष का नेता पीएम इन वेटिंग होता है। लेकिन दिसंबर 2009 में सुषमा स्वराज के लोक सभा में विपक्ष का नेता बनने के बाद से पिछले पाँच साल में आडवाणी ने एक बार भी ये बात नहीं कही है और न ही सार्वजनिक रूप से खुद को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर किया है। 

Thursday, March 06, 2014

बीजेपी बनाम आम आदमी पार्टी


बुधवार को नई दिल्ली के 11 अशोक रोड़ स्थित बीजेपी मुख्यालय पर आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच हिंसक मुठभेड़ हुई। लखनऊ और उत्तर प्रदेश के कुछ दूसरे हिस्सों से भी बीजेपी और आप के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पों की खबरें आईं। देर रात होते-होते दोनों ही पार्टी के नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे शांति बनाए रखें।
आम आदमी पार्टी की नई किस्म की राजनीति इस क्षेत्र के स्थापित खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी मगर सरकार कांग्रेस के सहयोग से अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने बनाई। धरने और आंदोलन के बूते दिल्ली की राजनीति में अपनी जगह बनाने वाली इस नई पार्टी ने बीजेपी के परंपरागत समर्थक मध्य वर्ग और कांग्रेस के गरीब और दलित वोट में सेंध लगाई। बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों ने भी इस पार्टी को वोट दिए। लेकिन 49 दिन की सरकार में केजरीवाल ने जहां एक ओर जनहित में ताबड़तोड़ फैसले किए वहीं उनके स्वयं के और कुछ मंत्रियों के रवैये के कारण सरकार की छवि कुछ इस तरह की बनी कि वो सरकार चलाने के लिए गंभीर नहीं हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि आम आदमी पार्टी की प्राथमिकता में लोक सभा चुनाव हैं। इसीलिए जब केजरीवाल को लगा कि दिल्ली में एक आधी-अधूरी सरकार बना कर वो यहां बंध गए हैं तो उन्होंने जनलोकपाल के नाम पर अपनी सरकार को कुर्बान कर दिया। इसके बाद से ही केजरीवाल लोकसभा चुनाव के लिए लगातार अपना एजेंडा स्पष्ट कर रहे हैं। उनका हमला उद्योगपति मुकेश अंबानी पर है और उनका नाम लेकर वो लगातार कांग्रेस और बीजेपी पर हमला कर रहे हैं। केजरीवाल सैकड़ों बार कह चुके हैं कि मुकेश अंबानी से राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी मिले हुए हैं।
लेकिन अब धीरे-धीरे उनका हमला राहुल पर कम और नरेंद्र मोदी पर ज्यादा होता जा रहा है। यूपी में केजरीवाल के रोड शो के दौरान ही उनकी पार्टी की ओर से संकेत दिया गया कि अगर नरेंद्र मोदी बनारस से चुनाव लड़ते हैं तो केजरीवाल उनके खिलाफ चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। कभी केजरीवाल देश में मोदी की हवा होने की बात कहते हैं तो कभी कहते हैं कि ये हवा टीवी चैनलवालों ने बनाई है। कानपुर में उन्होंने एलान किया कि गुजरात के विकास की हकीकत जानने के लिए वो वहां का दौरा करेंगे। इसी दौरान उन्हें कथित तौर पर हिरासत में लिए जाने की प्रतिक्रिया में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओँ ने दिल्ली समेत कई जगहों पर बीजेपी दफ्तरों पर हिंसक प्रदर्शन किए। बीजेपी की जवाबी प्रतिक्रिया भी ही उतनी ही तीखी और हिंसक रही। पार्टी ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया। लखनऊ में तो भारतीय जनता युवा मोर्चे के कार्यकर्ताओं ने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा।
दरअसल, 2009 के लोक सभा चुनाव में देश के उन बड़े शहरों से बीजेपी का सफाया हो गया जहां परंपरागत तौर पर बीजेपी को समर्थन मिलता रहा है। इन शहरों में मध्य वर्ग ने आर्थिक संकट का सफलतापूर्वक मुकाबला करने के लिए यूपीए और मनमोहन सिंह को अपना समर्थन दिया। लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में इस मध्य वर्ग ने अपनी आस्था नहीं जताई। लेकिन पिछले पाँच साल में हालात बदले हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार, गिरती विकास दर, बढ़ती बेरोज़गारी जैसे मुद्दों ने इसी मध्य वर्ग के भीतर कांग्रेस के खिलाफ जबर्दस्त गुस्सा पैदा किया है। भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जनलोकपाल को लेकर दिल्ली में हुए अण्णा हजारे और इंडिया अंगेस्ट करप्शन के जनआंदोलनों ने सरकार की चूलें हिला दीं और इसी से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ।
यही वजह थी कि नवंबर-दिसंबर 2013 में जब दिल्ली समेत पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए तो बीजेपी को इनसे भारी उम्मीदें थीं। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसकी ये उम्मीदें पूरी हुईं। मगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। दिल्ली के लोगों ने कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा तो दिखाया मगर इसका ज्यादा फायदा बीजेपी के बजाए आम आदमी पार्टी ले गई। बीजेपी को धक्का इसलिए भी लगा क्योंकि उसने विधानसभा चुनाव में अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का जमकर इस्तेमाल किया था।
अब जबकि लोक सभा के चुनावों की घोषणा हो चुकी है, आम आदमी पार्टी रूपी सिरदर्द फिर बीजेपी को परेशान कर रहा है। ये बात अलग है कि अभी तक के तमाम जनमत सर्वेक्षण मोदी के पक्ष में देश भर में भारी समर्थन की बात कर रहे हैं। लेकिन मीडिया के एक हिस्से में अरविंद केजरीवाल को प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के साथ दिखाया जा रहा है। मीडिया में मिल रहे इस समर्थन से केजरीवाल काफी उत्साहित हैं।
बीजेपी को लग रहा है कि कांग्रेस से नाराज वोट दिल्ली की ही तरह देश के दूसरे बड़े शहरों में भी आम आदमी पार्टी के पास न चला जाए। ऐसे में वोट बंटने पर नतीजे प्रभावित हो सकते हैं। बीजेपी और उसकी सहयोगी शिवसेना के साथ ऐसा पिछले लोक सभा चुनाव में मुंबई में हुआ था जहां राज ठाकरे की पार्टी ने उनके वोट काट कर कांग्रेस को फायदा पहुँचाया था। चूंकि केजरीवाल की पार्टी चुनावी खेल की नई खिलाड़ी है इसलिए उसके प्रदर्शन के बारे में कुछ भी अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है।

बहरहाल, नतीजे जो भी आएं, बुधवार को दोनों पार्टियों के बीच सड़कों पर जो युद्ध हुआ, वो लोकतंत्र के लिए किसी भी तरह से शुभ नहीं है। वोट की लड़ाई सड़कों पर लड़ना उस मध्य वर्ग को तो कतई पसंद नहीं आएगा जिसके वोटों की दरकार बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों को है।

Wednesday, March 05, 2014

एक या दो, मोदी की दुविधा


मंगलवार दिन भर दिल्ली में जुटे रहे यूपी बीजेपी के शीर्ष नेता। राज्य प्रभारी अमित शाह के साथ होती रही माथा पच्ची। राज्य की सभी 80 सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप देने के लिए। आठ मार्च और 13 मार्च को होने वाली केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में राज्य से ज्यादातर उम्मीदवार घोषित किए जाने की संभावना है। ये तय माना जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह गाजियाबाद के बजाए लखनऊ से चुनाव लड़ेंगे। लेकिन नरेंद्र मोदी की बनारस से उम्मीदवारी को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं हो पाई है।
राज्य बीजेपी के अधिकांश नेता चाहते हैं कि मोदी बनारस या लखनऊ से चुनाव मैदान में उतरें। राजनाथ के लखनऊ जाने की बात तय होने से अब बनारस की ही सीट मोदी के लिए बचती है। उधर, बिहार बीजेपी के नेता चाहते हैं कि मोदी पटना से चुनाव मैदान में उतरें। लेकिन उनका कहना है कि अगर मोदी बनारस से भी लड़ते हैं तो बिहार के कई हिस्सों में इसका असर होगा और बीजेपी को मजबूती मिलेगी।
बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि इस चुनाव में उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र सबसे महत्वपूर्ण राज्य हैं। यूपी-बिहार में बीजेपी का अच्छा प्रदर्शन हो, इसके लिए जरूरी है कि मोदी यूपी से चुनाव लड़ें। अमित शाह ये बात खुले तौर पर कह चुके हैं। बनारस से फिलहाल मुरली मनोहर जोशी पार्टी के सांसद हैं और वो अपनी सीट छोड़ने को तैयार नहीं हैं। लेकिन पार्टी का कहना है कि अगर मोदी के बनारस से चुनाव लड़ने का फैसला होता है, तो जोशी को कानपुर से चुनाव लड़ने के लिए मना लिया जाएगा।
वहीं, गुजरात बीजेपी साफ कर चुकी है कि मोदी को राज्य से लड़ना ही होगा। उसे लगता है कि उसके मिशन 26 के लिए ये बेहद जरूरी है। सूत्रों के मुताबिक खुद नरेंद्र मोदी भी चाहते हैं कि गुजरात से बीजेपी इस बार लोक सभा की सबसे ज्यादा सीटें जीतें। मोदी के लिए अहमदाबाद पूर्व या वडोदरा का नाम सुझाया गया है। बीजेपी सूत्रों का कहना है कि मोदी यूपी से लड़ें या न लड़ें, लेकिन गुजरात से हर हालत में लोक सभा का चुनाव लड़ेंगे।
तो सवाल यही खड़ा होता है कि मोदी एक सीट से लड़ेंगे या फिर दो सीटों से? दो सीटों से चुनाव लड़ना कोई नई बात नहीं है। खुद इंदिरा गांधी दो लोक सभा सीटों से चुनाव लड़ चुकी हैं। लेकिन संवैधानिक बाध्यता है कि कोई व्यक्ति एक ही सीट से लोक सभा का सदस्य रह सकता है। यानी अगर वो दोनों सीटें जीतता है तो उसे एक सीट से इस्तीफा देना पड़ेगा। इसीलिए पूछा जा रहा है कि मोदी अगर यूपी और गुजरात दोनों जगह से खड़े होते हैं तो वो दोनों जगह से जीतने की स्थिति में कौन सी सीट से इस्तीफा देंगे?
आम आदमी पार्टी की ओर से संकेत मिला है कि उसके नेता अरविंद केजरीवाल बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकते हैं। विश्लेषकों के मुताबिक ऐसा होने पर कांग्रेस, एसपी-बीएसपी जैसे विरोधी दल केजरीवाल को समर्थन देकर मोदी का मुकाबला कठिन बनाने की कोशिश कर सकते हैं। ये भी माना जा रहा है कि ऐसा होने पर केजरीवाल को जबरदस्त प्रचार मिलेगा और इसके बूते उनकी पार्टी देश के दूसरे हिस्सों में भी कई सीटों पर मुकाबले में आती दिख जाएगी।
लेकिन बीजेपी के रणनीतिकार केजरीवाल के चुनाव लड़ने की संभावना को ज्यादा तरजीह नहीं देते हैं। उनका मानना है कि अरविंद केजरीवाल सुर्खियां बटोरने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे और जरूरी नहीं है कि मोदी के सिर्फ गुजरात से ही चुनाव लड़ने पर वो वहां से उनके खिलाफ खड़े न हों। बल्कि मोदी कहीं से भी चुनाव लड़ें, केजरीवाल उनके खिलाफ मैदान में उतर सकते हैं। इसलिए केजरीवाल के चुनाव लड़ने की संभावना या उसके गणित के हिसाब से बीजेपी अपना फैसला नहीं कर सकती है।

आखिर में पार्टी में यही तय हुआ है कि इस बारे में अंतिम फैसला नरेंद्र मोदी खुद ही करें। वही तय करें कि वो एक सीट से लड़ेंगे या फिर दो से। या वो सिर्फ गुजरात से लड़ेंगे या फिर यूपी से भी। इतना तय है कि मोदी इस बारे में जो भी फैसला करेंगे, वो चुनावी लाभ और नुकसान को ध्यान में रख कर ही किया जाएगा न कि बीजेपी के अंदरूनी समीकरणों को दुरुस्त करने के लिए, जैसा कि पार्टी का एक धड़ा चाहता है। ये संभावना है कि मोदी की उम्मीदवारी का एलान पार्टी सबसे आखिरी में करे।

Tuesday, March 04, 2014

उद्धव-राज से आएगा बीजेपी राज?


महाराष्ट्र में बीजेपी अब भी उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच हिचकोले खा रही है। कल मुंबई की एक होटल में बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी और राज ठाकरे की मुलाकात से राज्य का सियासी माहौल इतना गरमा गया कि उद्धव ठाकरे ने राज्य बीजेपी अध्यक्ष देवेंद्र फड़नवीस को अपने घर बुला कर उनसे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के बारे में पार्टी का रुख स्पष्ट करने को कहा।
महाराष्ट्र की 48 सीटों में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन इस बार कम से कम 30 सीटें जीतना चाहता है। बीजेपी ने इसके लिए पहल की है। पार्टी ने राज्य में एक महायुति यानी बड़ा गठबंधन बनाने की कोशिश की है। इसमें पाँच पार्टियां शामिल हैं। ये हैं बीजेपी, शिवसेना, रामदास अठवले की आरपीआई (ए), राजू शेट्टी का स्वाभिमान शेटकारी संगठन और महादेव झंकार की आरएसपी। गठबंधन बनाने के लिए बीजेपी ने कई समझौते किए। उसने रामदास अठवले को राज्य सभा भी भेज दिया है, अपने जुझारू नेता प्रकाश जावड़ेकर की दावेदारी को नज़रअंदाज़ कर। लेकिन राज ठाकरे के बिना क्या ये वाकई महायुति कहला सकता है?
बीजेपी को लगता है कि जब तक राज ठाकरे उसके साथ नहीं आते, तब तक कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को धूल चटाने का उसका सपना पूरा नहीं हो सकता। लेकिन राज को साथ लेने में सबसे बड़ी दिक्कत उद्धव ठाकरे का विरोध है। बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के राज ठाकरे के साथ बेहद मित्रतापूर्ण संबंध हैं और ये शिवसेना को रास नहीं आता। मोदी की उम्मीदवारी को लेकर उद्धव ठाकरे असहज रहे हैं। शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने इसके लिए एक बार सुषमा स्वराज का नाम लिया था। वजह ये बताई गई थी कि वो नहीं चाहते थे कि महाराष्ट्र में हिंदुत्व के नाम पर चल रही उनकी राजनीति में मोदी दखल दे। वैसे अब मोदी की उम्मीदवारी को उद्धव का समर्थन है।
2009 के लोक सभा चुनाव में राज ठाकरे ने बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को नुकसान पहुँचा कर अपनी ताकत दिखाई थी। कम से कम दस लोक सभा सीटें ऐसी हैं जहां एमएनएस ने बीजेपी-शिवसेना के वोट काट कर कांग्रेस या एनसीपी को जीतने में मदद की। उदाहरण के लिए मुंबई दक्षिण लोक सभा सीट को ही लें। यहां से कांग्रेस-एनसीपी के उम्मीदवार मिलिंद देवड़ा को 272411 वोट मिले जबकि बीजेपी-शिवसेना के उम्मीदवार मोहन रावले को 146118 वोट। एमएनएस के उम्मीदवार बाला नंदगांवकर को 159729 वोट मिले। यानी अगर बीजेपी-शिवसेना-एमएनएस के वोट मिला दिए जाएं तो ये करीब तीन लाख होते हैं। इस लिहाज़ से मिलिंद देवड़ा ये सीट हार भी सकते थे। लोक सभा चुनाव में राज ठाकरे की पार्टी का असर मुंबई दक्षिण, मुंबई दक्षिण मध्य, मुंबई उत्तर मध्य, मुंबई उत्तर पश्चिम मुंबई उत्तर पश्चिम, मुंबई उत्तर, नासिक, भिवंडी, ठाणे और पुणे जैसी सीटों पर खासतौर से देखने को मिला था।
इन दस सीटों में एमएनएस को एक लाख से ज़्यादा वोट मिले और ये सारी सीटें बीजेपी-शिवसेना गठबंधन हार गया। इस लोक सभा चुनाव में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को 29 फीसदी वोट मिले। लेकिन अगर राज ठाकरे साथ होते तो ये गठबंधन 33 फीसदी तक पहुँच सकता था। छह महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में राज ठाकरे की पार्टी ने साढ़े चार फीसदी वोट लेकर 13 सीटें जीतीं।
अब 2009 एक बार फिर खुद को दोहराने के लिए तैयार दिख रहा है। इस बार बीजेपी-शिवसेना की दिक्कत ये है कि उनके वोटों में सेंध लगाने के लिए राज ठाकरे के साथ आम आदमी पार्टी भी चुनाव मैदान में है। संभावना व्यक्त की जा रही है कि मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे इलाकों में अरविंद केजरीवाल की पार्टी को ठीक-ठाक वोट मिल सकते हैं। ये वही सीटें हैं जिन्हें कांग्रेस-एनसीपी से छीने बिना बीजेपी-शिवसेना गठबंधन अपनी ताकत नहीं बढ़ा पाएगा।
इसीलिए अगर राज ठाकरे लोक सभा चुनाव न लड़ कर सिर्फ़ मोदी को समर्थन देते भी दिखते हैं, तो बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को फायदा हो सकता है। लेकिन इसकी कीमत बीजेपी को ही चुकानी पड़ेगी। विधानसभा चुनाव के लिए राज ठाकरे को 35 से 40 सीटें दी जा सकती हैं। लेकिन ज़ाहिर है शिवसेना अपने हिस्से से देने के लिए इसके लिए शायद ही तैयार हो। यानी इस पर भी बीजेपी को ही समझौता करना पड़ सकता है। सवाल ये भी है कि शिवसेना ऐसे किसी भी समझौते को हरी झंडी देगी या नहीं? उद्धव ने कल जैसे तीखे तेवर दिखाए हैं उसे देख कर तो यही लगता है कि बीजेपी को इस समझौते तक पहुँचने में काफी मुश्किलें आ सकती हैं।



Monday, March 03, 2014

बीजेपी यानी अटल


रविवार को लखनऊ के रमाबाई अंबेडकर मैदान पर इकट्ठा हुए लोगों को बीजेपी के मंच पर अटल बिहारी वाजपेयी की विशाल छवि नजर आई। नरेंद्र मोदी जिस वक्त रैली को संबोधित कर रहे थे, पृष्ठभूमि में अटल बिहारी वाजपेयी का विशालकाय फोटो उन्हें देख रहा था। नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में अटल बिहारी वाजपेयी को बार-बार याद किया और कहा कि उन्होंने वाजपेयी से काफी कुछ सीखा है। वाजपेयी के ही अंदाज़ में मोदी ने अपने भाषण में शेर भी सुनाए और समापन एक कविता सुनाकर किया।
बीजेपी ने काफी सोच-समझकर लखनऊ की मोदी की रैली में सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी का फोटो ही मंच पर लगाने का फैसला किया। लखनऊ लोक सभा सीट वाजपेयी 1991 से 2004 तक लगातार जीतते आए। इसी सीट का प्रतिनिधित्व करते हुए वो तीन बार प्रधानमंत्री बने। उन्हीं की अगुवाई में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में लोक सभा चुनावों में सबसे ज्यादा सीटें जीतीं। वाजपेयी का चेहरा आगे रख कर बीजेपी ने राज्य में सवर्णों खासतौर से ब्राह्मणों का भरपूर समर्थन हासिल किया। तब कल्याण सिंह के रूप में पार्टी के पास पिछ़ड़ी जातियों की नुमाइंदगी करने वाला बेहद मजबूत नेता भी था। विधानसभा चुनाव से पहले 25 अप्रैल 2007 को लखनऊ में उन्होंने अपनी आखिरी रैली को संबोधित किया। जिसमें उन्होंने फिर ये दोहराया था कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है।
मोदी और बीजेपी को वाजपेयी की ये सीख याद है। इसीलिए पार्टी ने पूरा जोर उत्तर प्रदेश पर लगाया है। हालांकि अभी उम्मीदवारों के नामों का एलान नहीं किया गया है। लेकिन ये तय है कि बीजेपी टिकट बंटवारे में सोशल इंजीनियरिंग का खास ध्यान रखेगी। पार्टी के सामने चुनौती है सवर्णों और पिछड़ी जातियों का समर्थन जुटाना। राज्य में ब्राह्मणों को फिर अपनी ओर खींचना भी एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया गया है। गौरतलब है कि बहुजन समाज पार्टी लोक सभा चुनाव के लिए अभी तक 22 ब्राह्मण उम्मीदवारों के नाम घोषित कर चुकी हैं। उसकी रणनीति एक बार फिर दलित, मुसलिम और ब्राह्मण गठजोड़ की है। यही रणनीति 2007 के विधानसभा चुनावों में अपना कर बीएसपी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी।
इसलिए बीजेपी को अटल बिहारी वाजपेयी याद आए हैं। लखनऊ की रैली मोदी की राज्य में आठवीं रैली थी। इससे पहले किसी रैली के मंच पर अकेले वाजपेयी का फोटो नहीं लगाया गया था और न ही इतनी शिद्दत से उन्हें याद किया गया था। वाजपेयी के सक्रिय राजनीति से हटने के बाद से बीजेपी को खासतौर से उत्तर प्रदेश में उनकी कमी बेहद महसूस होती है। पिछले कई चुनावों में बीजेपी बार-बार सवर्णों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है मगर उसे इसमें कामयाबी नहीं मिली है। राज्य में पार्टी का मत प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा है। पिछड़ी जातियों में उसका समर्थन सिमटता चला गया।
बीजेपी इस पतन को संभालने के लिए इस बार गंभीर प्रयास कर रही है। पार्टी ने नरेंद्र मोदी को आगे किया है। उसे उम्मीद है कि मोदी की हिंदुत्व और विकास की छवि और पिछड़े वर्ग से आने का फायदा उत्तर प्रदेश में मिलेगा। पार्टी की कोशिश है कि मोदी उत्तर प्रदेश से ही चुनाव भी लड़ें ताकि उनकी लोकप्रियता का फायदा मिल सके। संभावना है कि मोदी बनारस से चुनाव लड़ सकते हैं। कल्याण सिंह बीजेपी में वापस आ गए हैं। पार्टी एक या उससे अधिक पिछड़ी जातियों की राजनीति करने वाली कुछ छोटी-छोटी पार्टियों से भी तालमेल करने की कोशिश कर रही है ताकि गैर यादव पिछड़ी जातियां उसके साथ आ सकें।
हालांकि बीजेपी के लिए चुनौती बेहद कठिन है। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे उदारवादी नेता जो मुसलमानों को भी साथ लेने की कोशिश करते रहे और लखनऊ जैसी सीट से लगातार जीतने के पीछे ये भी एक बड़ी वजह रही। उनकी जगह आज मोदी जैसे नेता हैं जिनकी छवि कट्टर नेता की है। सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील राज्य उत्तर प्रदेश में मोदी की इसी छवि को उछाल कर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस तीनों ही मुसलमानों को अपने साथ लेने की कोशिश कर रही हैं। राज्य में सांप्रदायिक तौर पर ध्रुवीकरण करने का प्रयास सभी पार्टियों द्वारा किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी सरकार के दो साल के कार्यकाल में हुए सौ से भी ज्यादा दंगों के कारण माहौल में बेहद तल्खी भी है।

लेकिन क्या बीजेपी के लिए सिर्फ वाजपेयी का फोटो लगाना या उनका नाम लेना भर ही काफी है? या उनकी दी गई राजनीतिक सीख को जमीन पर लागू करना भी? बीजेपी को राज्य में 1996 और 1998 जैसी कामयाबी दोहराने के लिए अपने मत प्रतिशतों को कम से कम ढाई गुना करना होगा। इसके लिए खाली नारों से ही काम नहीं हो सकता और न ही किसी एक नुस्खे से। यही नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी चुनौती है।

Sunday, March 02, 2014

मोदी और जनरल


पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह शनिवार को बीजेपी में शामिल हो गए। उनके साथ विभिन्न वरिष्ठ पदों पर रहे करीब तीस पूर्व सैन्य अधिकारी भी बीजेपी में आ गए। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने बीजेपी मुख्यालय पर जनरल वी के सिंह और इन तमाम पूर्व सैन्य अधिकारियों को बीजेपी की सदस्यता दी।
बीजेपी ने 2014 का लोक सभा चुनाव जीतने के लिए अपने वोटों को पिछले लोक सभा चुनाव की तुलना में दस फीसदी बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। नरेंद्र मोदी के चेहरे और लोकप्रियता के बावजूद बीजेपी ज़मीनी स्तर पर एक-एक वोट को साथ लेने की कवायद कर रही है। पिछले एक सप्ताह उसने अपने दलित एजेंडे पर काम किया। उत्तर प्रदेश में उदित राज, महाराष्ट्र में रामदास अठवले, बिहार में रामविलास पासवान को साथ लिया है। अब उसने सैनिकों और पूर्व सैनिकों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।
अंदाज़ा है कि पूरे देश में करीब 14 लाख मौजूदा सैनिक और 26 लाख सेवानिवृत्त सैनिक हैं। उत्तरी भारत में जहां बीजेपी का सीधा कांग्रेस से मुकाबला है, इनकी संख्या काफी अधिक है। खासतौर से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में। परंपरागत रूप से बीजेपी को इनका समर्थन मिलता रहा है। 1999 में करगिल युद्ध के बाद बीजेपी ने इस वर्ग में अपनी पैठ और मजबूत की है।
लेकिन इन वोटों पर कांग्रेस की भी नज़रें हैं। ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस ने पूर्व सैनिकों की लंबे समय से चली आ रही वन रैंक वन पेंशन की मांग को पूरा किया है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इसके लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया। कांग्रेस ने इसका श्रेय पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को दिया है। इस फैसले के एलान के बाद कांग्रेस ने कई जगहों पर पूर्व सैनिकों के सम्मेलन कर उनका समर्थन हासिल करने का प्रयास भी किया है।
दिलचस्प बात ये है कि बीजेपी 2009 से ही इस मुद्दे को उठाती आ रही थी। पार्टी ने इसके लिए कई प्रदर्शन भी किए और संसद में भी ये मांग उठाई। लेकिन अब इसे अपने हाथ से निकलता देख बीजेपी ने सैनिकों को लुभाने के लिए ये दांव चला है। जनरल वीके सिंह को पार्टी में शामिल कराने के कार्यक्रम में राजनाथ सिंह ने कहा भी कि यूपीए ने आधे-अधूरे मन से वन रैंक वन पेंशन का फैसला किया है और इसे एनडीए की सरकार ही लागू करेगी। पार्टी नेताओं के मुताबिक 500 करोड़ रुपए की राशि ऊँट के मुँह में जीरा है और इसे वास्तविकता में लागू करने के लिए कम से कम ढाई हज़ार करोड़ रुपयों की ज़रूरत पड़ेगी।
वैसे बीजेपी में पूर्व सैन्य अधिकारियों के शामिल होने का सिलसिला कोई नई बात नहीं है। जसवंत सिंह से लेकर मेजर जनरल बी सी खंडूरी और ऐसे ही कई पूर्व सैनिक पार्टी और सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। लेकिन एक पूर्व सेना प्रमुख का राजनीति में सक्रिय होना और एक बड़े राजनीतिक दल में शामिल होना एक अनूठी घटना ज़रूर है। इस पर कई सवाल भी खड़े होते हैं।
इससे पहले पूर्व सेना प्रमुख जनरल शंकर रायचौधरी संसद में पहुँचे थे। वो 1999 में पश्चिम बंगाल से बतौर निर्दलीय राज्य सभा के लिए निर्वाचित हुए थे। बतौर सांसद उन्होंने सेना और रक्षा से जुड़े कई मामलों को राज्य सभा में उठाया था।
लेकिन जनरल वी के सिंह का मामला थोड़ा अलग है। देश के इतिहास में वो पहले सेना प्रमुख हैं जो इस पद पर रहते हुए अपनी जन्मतिथि को लेकर हुए विवाद के बाद सरकार को घसीट कर सुप्रीम कोर्ट ले गए। पद पर रहते हुए आरोप लगाया कि टैट्रा ट्रक सौदे को मंजूरी देने के लिए उन्हें सेना के एक अधिकारी ने घूस देने की कोशिश की और उन्होंने इसकी जानकारी रक्षा मंत्री ए के एंटनी को दे दी थी। उन्होंने रक्षा तैयारियों में कथित खामियों को लेकर प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा जो लीक हो गया। इससे यूपीए सरकार की खासी किरकिरी हुई। सेना प्रमुख पद से रिटायर होने के बाद वो अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल हो गए। मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा के बाद रेवाड़ी में हुई पूर्व सैनिकों की रैली में वो उनके मंच पर नज़र आए।
जनरल वी के सिंह ने खुद को सेना प्रमुख रहते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले और अपने मुद्दों को लेकर सरकार से टकराने वाले जनरल के रूप में पेश किया है। जिस अनुशासन की उम्मीद सैन्य प्रमुखों से रखी जाती है, वो शायद इसकी मिसाल तो नहीं हैं। लेकिन उनके समर्थकों का कहना है कि यूपीए सरकार ने ऐसा हालात पैदा कर दिए कि उन्हें अपनी आवाज़ उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
भारत में सेना का बेहद गौरवशाली इतिहास रहा है। देश में लोकतंत्र की कामयाबी के लिए सेना का योगदान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। पड़ोसी देश पाकिस्तान की तुलना में भारत में सेना ने कभी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया। ऐसे में एक पूर्व सेना प्रमुख के एक राजनीतिक दल में शामिल होने पर भौहें तनना स्वाभाविक है।

शनिवार को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की मौजूदगी में जनरल सिंह के समर्थकों के नारे थे- देश का रक्षा मंत्री कैसा हो, जनरल वी के सिंह जैसा हो।

Saturday, March 01, 2014

आडवाणी- सफल नेता, असफल बागी?


भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेता लाल कृष्ण आडवाणी शुक्रवार को गांधीनगर में थे। वो स्थानीय सांसद होने के नाते एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने वहां गए थे। पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने कहा कि वो गांधीनगर से ही चुनाव लड़ना चाहते हैं। उन्होंने ये जानकारी भी दी कि बृहस्पतिवार को जारी की गई लोक सभा उम्मीदवारों की पहली सूची में उनका नाम नहीं था। उन्होंने कहा कि पार्टी इस बारे में अंतिम फैसला करेगी। पत्रकारों के बार-बार कुरेदने पर आडवाणी ने कहा कि वो उन्हें खबर दे चुके हैं।
बीजेपी के सबसे बड़े नेता उस सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं जिसका प्रतिनिधित्व वो 1991 से करते आ रहे हैं, इसमें खबर क्या है? पार्टी के मार्गदर्शक के रूप में उन्हें अपनी इच्छा को सार्वजनिक रूप से प्रकट करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? उन्होंने इस सार्वजनिक रूप से जाहिर तथ्य को क्यों दोहराया कि बृहस्पतिवार को जारी पहली सूची में उनकी नाम नहीं है? गांधीनगर से लड़ने की अपनी इच्छा को सार्वजनिक करने के बाद उन्होंने क्यों कहा कि इस बारे में पार्टी अंतिम निर्णय करेगी?
इन सवालों के जवाब 2009 की हार के बाद से आडवाणी के क्रिया-कलापों और गतिविधियों से मिलते हैं। 16 मई 2009 की शाम को आडवाणी ने लोक सभा चुनावों में हार के बाद लोक सभा में विपक्ष के नेता पद से इस्तीफा दे दिया था। इसे इस रूप में लिया गया कि अब वो सक्रिय राजनीति से पीछे हट कर पार्टी के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाएंगे। लेकिन पार्टी के मनाने पर वो मान गए और दिसंबर 2009 तक नेता विपक्ष बने रहे। बीच में आरएसएस ने लगातार दबाव बनाया कि आडवाणी सक्रिय राजनीति से हटें। लेकिन आडवाणी समर्थकों ने ये सुनिश्चित किया कि सुषमा स्वराज को नेता विपक्ष की कमान सौंपने से पहले उनके लिए संसदीय पार्टी के अध्यक्ष का नया पद सृजित किया जाए ताकि पार्टी में उनका ओहदा और दखल बरकरार रहे।
नितिन गडकरी को बीजेपी अध्यक्ष बना कर आरएसएस ने पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने का संकेत दिया तो आडवाणी कई मुद्दों पर गडकरी से टकराते रहे। उन्हें दोबारा कार्यकाल न मिलने के पीछे भी आडवाणी का सख्त विरोध माना गया। बीच में अण्णा हजारे के आंदोलन के दौरान आडवाणी पार्टी के भीतर कहते रहे कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बीजेपी गंभीर नहीं दिखती। इसी दौरान उन्होंने काला धन वापस लेने के मुद्दे पर आरएसएस की अनिच्छा के बावजूद रथ यात्रा निकाली। मकसद था ये संदेश देना कि वो 2014 के चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद के दावेदार बने हुए हैं।
लेकिन आडवाणी की बगावत सतह पर तब आई जब गोवा में जून 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया। दस जून को उन्होंने सभी पार्टी पदों से इस्तीफा दे दिया। पार्टी ने फिर मान-मनौव्वल की। लेकिन वो आरएसएस से ये आश्वासन नहीं पा सके कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुनते समय उनकी बात सुनी जाएगी। बल्कि संघ ने उनकी इस दलील को भी अनसुना कर दिया कि बीजेपी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार दिसंबर 2013 में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद घोषित करना चाहिए। 13 सितंबर 2013 को जब मोदी को पीएम उम्मीदवार घोषित किया गया, आडवाणी घर पर ही रहे। उन्होंने बयान जारी कर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह पर हमला भी किया कि पार्टी ठीक नहीं चल रही।
आरएसएस ये मानता रहा है कि बीजेपी को इस मुकाम तक पहुँचाने में आडवाणी का योगदान बेहद अहम है। लेकिन साथ ही ये आकलन भी है कि 2004 की हार के बाद से बीजेपी अगर पटरी पर नहीं आ पाई है तो इसकी वजह आडवाणी का शीर्ष नेता के बजाए एक गुट के नेता के रूप में काम करना रहा है। ये कहा गया कि जिस आडवाणी को बतौर शीर्ष नेता दूसरी पीढ़ी के नेताओं के आपसी झगड़े सुलझाने चाहिए थे, वो एक गुट के नेता बन गए हैं। आरएसएस पार्टी की कमान पूरी तरह से दूसरी पीढ़ी के नेताओं को देना चाहता है। उसकी कोशिश थी कि लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेता बजाए लोक सभा का चुनाव लड़ने के, राज्य सभा में जाएं। ताकि ये संदेश दिया जा सके कि वो अब सक्रिय राजनीति में नहीं बल्कि पार्टी के मार्गदर्शक की भूमिका निभाएँगे। कोशिश ये भी है कि आडवाणी और जोशी की सीटें यानी गांधीनगर और बनारस से नरेंद्र मोदी ही चुनाव लड़े ताकि पीढ़ी परिवर्तन का संदेश भेजा जा सके। साथ ही, मोदी के बनारस से चुनाव लड़ने से यूपी के साथ बिहार के भी कुछ हिस्सों में फायदा मिले।
लेकिन आडवाणी और जोशी दोनों ने ही राज्य सभा जाने से इनकार कर आरएसएस की इस योजना को फिर नाकाम कर दिया। गांधीनगर से ही चुनाव लड़ने का बयान देकर आडवाणी ने गेंद फिर संघ के पाले में डाल दी है। आडवाणी ये भी चाहते थे कि बृहस्पतिवार को जारी पहली सूची में ही उनका नाम घोषित कर दिया जाए। लेकिन पार्टी ने ऐसा नहीं किया। मोदी के करीबी और उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि वो खुद और पार्टी की राज्य इकाई चाहते हैं कि मोदी यूपी से चुनाव लड़ें।
यानी इस विवाद पर अंतिम शब्द अभी कहा जाना बाकी है। पर इतना साफ दिखता है कि बतौर नेता बीजेपी को फर्श से अर्श तक पहुँचाने वाले आडवाणी बगावती तेवर दिखा कर पार्टी का कम और स्वयं की छवि का नुकसान ज्यादा कर रहे हैं।




Friday, February 28, 2014

पासवान के पास आकर पास या फेल बीजेपी?


लुटियन दिल्ली बड़ी बेरहम है। हर तरफ फैले बड़े बंगले। कभी बंगलों की नजदीकियां रायसीना हिल की लड़ाई के लिए नए साथी दे देती है तो कई बार इस लड़ाई के लिए बंगलों के नजदीकियों के बावजूद दिलों में दूरियां हो जाती हैं। एक जनवरी 2004 को सोनिया गांधी अपने बंगले दस जनपथ से निकल कर पैदल चल दी थीं अपने पड़ोसी और बारह जनपथ में रहने वाले रामविलास पासवान के घर। नए साल के पहले दिन पड़ोसी से हाथ मिला कर यूपीए की नींव रखी और पाँच महीने बाद अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज को सात रेसकोर्स रोड से छह ए कृष्णा मेनन मार्ग भेज दिया।
इसी लुटियन दिल्ली में बृहस्पतिवार का दिन रहा पासवान के नाम। जनपथ से अशोक रोड तक का सफर। नरेंद्र मोदी के लिए सीएम से पीएम तक का उम्मीद का सफर। पासवान के लिए सांप्रदायिकता से धर्मनिरपेक्षता और फिर सांप्रदायिकता तक का सफर। राजनीति का विचित्र संयोग देखिए। ये सब घटनाक्रम उस दिन हुआ जिसके ठीक बारह साल पहले गुजरात के गोधरा में साबरमती ट्रेन जलाई गई। जिसके बाद राज्य में दंगे हुए। जिसके मद्देनजर रामविलास पासवान ने कुछ महीनों बाद नरेंद्र मोदी को हटाने की मांग करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से इस्तीफा दिया। हालांकि जानकार कहते हैं कि पासवान इसलिए नाराज थे क्योंकि उनसे दूरसंचार मंत्रालय छीन लिया गया था।
बहरहाल बीजेपी ने पासवान से हाथ मिला कर एक तीर से दो शिकार किए हैं। बिहार में नीतीश कुमार के साथ सत्रह साल चला गठबंधन सामाजिक आधार पर काफी मजबूत था। लेकिन नीतीश के जाने के बाद एनडीए से कुछ पिछ़ड़ी और अतिपिछड़ी जातियां, महादलित और पसमांदा मुस्लिम छिटक गए। बीजेपी को इस बात का एहसास है कि अगर उसे राज्य में बड़ी संख्या में लोक सभा सीटें जीतनी हैं तो मोदी के नाम के अलावा सोशल इंजीनियरिंग का भी ध्यान रखना होगा। पार्टी नेताओं का दावा है कि राज्य में मोदी की हवा है। लेकिन खुद नरेंद्र मोदी कहते हैं कि अगर टायर को हवा में लेकर खड़े हो जाओ तो उसमें अपने-आप हवा नहीं भर जाती। टायर में हवा तभी भर पाएगी जब पोलिंग बूथ पर काम हो और लोगों को मतदान केंद्रों तक लाया जाए। यानी इशारा साफ है कि बीजेपी को अपने वोटों का प्रतिशत बढ़ाने के लिए सामाजिक दायरा बढ़ाना जरूरी है। पार्टी ने बिहार में पासवान से हाथ मिला कर यही किया है।
पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी को नीतीश के साथ रह कर 14 फीसदी वोट मिले थे। जबकि पासवान को लालू के साथ रह कर करीब सात फीसदी वोट। दिलचस्प बात ये है कि लालू के साथ गठबंधन में पासवान को 40 में से 12 सीटों पर लड़ने का मौका मिला था। लेकिन वो एक भी नहीं जीत पाए। बीजेपी के साथ गठबंधन की नींव रखने वाले पासवान के बेटे चिराग अनौपचारिक चर्चाओं में कहते हैं कि लालू प्रसाद ने पर्दे के पीछे खेल खेला और अपने यादव वोट को पासवान के पास नहीं जाने दिया। जबकि पासवान ने हर सीट पर अपने समर्थकों के वोट आरजेडी को दिलवाए। लालू से रिश्ते टूटने में ये आरोप भी हावी रहा है।
बीजेपी नेताओं का मानना है कि करीब 15 सीटें ऐसी हैं जहां पचास हजार से दो लाख तक पासवान वोट हैं। पासवान हों या मायावती, ये दोनों अपने दलित समर्थकों के वोट ट्रांसफर करवाने की हैसियत रखते हैं। लिहाज़ा पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के साथ बीजेपी तीस फीसदी का निर्णायक आंकड़ा पार कर सकती है। इसीलिए उसने बिहार में अब सामाजिक न्याय का एक बहुरंगी गठबंधन तैयार कर लिया है।
बीजेपी को दूसरा फायदा राष्ट्रीय स्तर पर होता दिख रहा है। उसे लग रहा है कि पासवान के साथ आने से नरेंद्र मोदी की सांप्रदायिक छवि को लेकर संभावित सहयोगियों की सोच बदलेगी और चुनाव से पहले और चुनाव के बाद इन दलों की बीजेपी से जुड़ने की झिझक दूर होगी। बीजेपी की नज़रें अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, उड़ीसा में नवीन पटनायक और असम में असम गण परिषद पर टिक गई हैं। असम में उसका एजीपी से चुनाव पूर्व गठबंधन संभव है तो वही टीएमसी और बीजेडी के साथ उसे चुनाव के बाद समर्थन की उम्मीद है। तमिलनाडु में एमडीएमके, पीएमके और डीएमडीके साथ बात चल ही रही है। और पासवान के साथ गठबंधन होने के बारह घंटों के भीतर ही डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि का बयान भी आ गया है जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की है। बीजेपी को लगता है कि पासवान के साथ गठबंधन से उसके पक्ष में बैंडवेगन प्रभाव काम करेगा। वैसे भी लुटियन दिल्ली में पासवान के बारे में कहा जाता है कि जिधर हवा बह रही होती है, पासवान वहीं होते हैं।