Saturday, March 15, 2014

फटीचर पत्रकार की चिट्ठी, केजरीवाल के नाम


प्रिय श्री अरविंद केजरीवाल

मैं आपको ये पत्र तिहाड़ जेल की बैरक नंबर पाँच के कमरा नंबर 420 से लिख रहा हूं। ये पत्र आपको तिहाड़ जेल की शोचनीय स्थिति से अवगत कराने के लिए लिखा जा रहा है। उम्मीद है कि बतौर प्रधानमंत्री आप इस जेल की समस्याओं को दुरुस्त करने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश देंगे।

जैसा कि आप जानते हैं कि आपके शपथ लेने के तुरंत बाद देश भर के अखबारों-टीवी चैनलों में काम करने वाले तमाम पत्रकारों को देश की अलग-अलग जेलों में डाल दिया गया। यहां तक कि आपके शपथ ग्रहण समारोह का लाइव टेलीकास्ट करने वाले रिपोर्टरों और कैमरामैनों को भी रामलीला मैदान में आपके शपथ ग्रहण कार्यक्रम के समाप्त होते ही धर-दबोचा गया। जैसा कि आप जानते ही हैं कि आपके आदेशानुसार दिल्ली के कानून-व्यवस्था भ्रष्ट दिल्ली पुलिस के हाथों से लेकर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को दे दी गई है। लेकिन समस्या तब आई जब गिरफ्तार किए गए पत्रकारों को हाथ में झाडू लेकर और सिर पर मैं भी आम पत्रकार की टोपी पहना कर राम लीला मैदान से तिहाड़ जेल तक पहले वैगन आर, फिर मैट्रो और बाद में आटो से ले जाया गया। इस जुलुस को रास्ते में आईटीओ पर रोक कर वहां से भी सारे पत्रकारों के साथ यही सलूक किया गया। चूंकि ज्यादातर टीवी चैनल नोएडा में हैं इसलिए वहां के पत्रकारों को घसीटने के लिए आपने उत्तर प्रदेश सरकार से विशेष अनुरोध किया और उसे न माने जाने पर आपने वहां की सरकार को बर्खास्त कर वहां की कानून-व्यवस्था गुलाबी गैंग के हवाले की। तब जाकर नोएडा के पत्रकार आपको मिल पाए।

महोदय, अब स्थिति ये है कि तिहाड़ में पैर रखने की भी जगह नहीं है। यहां पहले से ही बंद नेता, नौकरशाह और जज इस बात से खासे नाराज हैं कि उनके साथ पत्रकारों को भी तिहाड़ में ठूंस दिया गया है। आप जानते हैं कि चाहे आप पत्रकारों को बिका हुआ समझें, लेकिन आप जिन्हें इनका खरीददार समझते हैं, वो नेता हमें फूंटी आँख भी नहीं देखना चाहते हैं। उन्हें इस बात से दिक्कत है कि उनके नीचे काम करने वाले नौकरशाह पहले ही उनके साथ बंद हैं। पर वो ये नहीं समझ पा रहे कि जब लोकतंत्र का पहला, दूसरा और तीसरा खंभा अंदर है तो चौथा बाहर रह कर क्या करेगा। बाहर बहुत अकेलापन महसूस हो रहा था। अच्छा किया आपने हमें भी अंदर कर दिया। पर यहाँ जगह नहीं है। आपसे अनुरोध है कि सोमनाथ भारतीजी को बोल कर नौकरशाहों को नाइजेरिया की जेलों में भिजवा दें। अदाणी और अंबानी की फैक्ट्रियां तोड़ कर जो जगह मिली है वहां जेल बना कर नेताओं को शिफ्ट कर दें। और हम पत्रकारों को तिहाड़ में ही रहने दें।

आखिर आप कहते भी तो हैं न कि हमारी जगह यही है।

आपका


एक फटीचर मगर आम पत्रकार

एनडीए- पास फिर भी दूर?


एनडीटीवी हंसा रिसर्च ग्रुप के जनमत सर्वेक्षण में संभावना व्यक्त की गई है कि भारतीय जनता पार्टी 195 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभर सकती है। जबकि सहयोगी पार्टियों के साथ वह 229 सीटें पा सकती है। वहीं कांग्रेस को इतिहास में सबसे कम 106 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है और सहयोगियों के साथ 129 तक पहुंच सकती है। इस जनमत सर्वेक्षण की खास बात ये है कि इसमें दो लाख लोगों की राय पूछी गई है। इसमें सीटों की संख्या की भविष्यवाणी की गई है न की सीटों की रेंज के बारे में अनुमान लगाया गया है।

अगर इस सर्वेक्षण की भविष्यवाणी सच साबित होती है तो ये बीजेपी का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन होगा। एनडीए 229 सीट पा कर सबसे बड़े चुनाव पूर्व गठबंधन के रूप में उभर सकता है। परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति सबसे बड़े दल या सबसे बड़े चुनाव पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते रहे हैं। ऐसे में एनडीए को तरज़ीह दी जा सकती है। लेकिन बहुमत के आंकड़े से एनडीए के 43 सीटें दूर रहने की संभावना इस सर्वेक्षण में बताई गई है। ऐसे में सरकार के स्थायित्व को लेकर राष्ट्रपति प्रश्न पूछ सकते हैं।

इस सर्वेक्षण का एक और दिलचस्प निष्कर्ष है। एनडीए और यूपीए में सौ सीटों का फासला। इसी तरह बीजेपी और कांग्रेस में करीब 90 सीटों का अंतर बताया गया है। ये अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस को सौ के आसपास सीटें मिलना का मतलब होगा कांग्रेस के बाहर से समर्थन के जरिए तीसरे मोर्चे या वैकल्पिक मोर्चे की सरकार की संभावना का समाप्त होना।

सवाल ये उठता है कि अगर सर्वेक्षण सही साबित होता है तो एनडीए सरकार बनाने के लिए जरूरी चालीस सीटों की व्यवस्था कैसे करेगा? बीजेपी के रणनीतिकार वैसे भी एनडीए के बहुमत से दूर रहने पर संभावित सहयोगियों के रूप में ऐसे दलों को साथ लेना पसंद करेंगे जो सरकार में शामिल हो कर उसे स्थायित्व दे सकें। पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी जयललिता की एआईएडीएमके और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से समर्थन लेने के लिए बहुत इच्छुक नहीं होगी क्योंकि इन दोनों ही नेताओं ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के लिए कई मुश्किलें खड़ी की थीं। हालांकि जयललिता के साथ नरेंद्र मोदी की मित्रता है। शुरुआत में तीसरे मोर्चे के साथ खड़े होने बाद जयललिता ने अपनी ओर से संबंध तोड़ कर बीजेपी को चुनाव के बाद के संभावित गठबंधन के लिए संकेत दिया है। जबकि ममता बनर्जी और जयललिता दोनों के बीच बर्फ पिघली है और बातचीत का सिलसिला शुरु हुआ है। लेकिन ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में जाना है। मुस्लिम मतदाताओं को ध्यान में रख कर वे शायद ही सरकार में शामिल हों। हां, सरकार को बाहर से रणनीतिक समर्थन दे कर राज्य के लिए मोटी कीमत जरूर वसूल सकती हैं।

संभावित सहयोगियों के लिए ये एक बड़ा फैक्टर होगा। राज्यों में सरकार चला रहे क्षेत्रीय दल केंद्र की सरकार से दोस्ताना रवैया रखना चाहते हैं। उन्हें अपने राज्य के विकास के लिए केंद्र की मदद की दरकार होती है। ओड़ीशा में नवीन पटनायक एक ऐसे ही संभावित सहयोगी हो सकते हैं। गैरकांग्रेसवाद के नाम पर बीजेपी पटनायक को साथ ला सकती है। वहीं आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद सीमांध्रा और तेलंगाना दोनों ही राज्यों में बनने वाली सरकारों को भी विकास के लिए केंद्र सरकार की मदद चाहिए। वायएसआर कांग्रेस या फिर टीआरएस। दोनों ही बीजेपी के संभावित सहयोगी हो सकते हैं।


जाहिर है ये बातें इसी आधार पर लिखी गई हैं कि जनमत सर्वेक्षण में की गई भविष्यवाणी सच साबित हो। 16 मई को क्या तस्वीर बनती है सारा दारोमदार इसी पर रहेगा। लेकिन जनमत सर्वेक्षण के आकलन को अगर हवा का इशारा भी माने तो ये अंदाज़ा लगाना गलत नहीं होगा कि हवा एनडीए के पक्ष में बह रही है। इसीलिए कोई हैरानी नहीं है कि हवा का रुख पहले से ही भांपने वाले क्षेत्रीय दलों ने चुनाव बाद की संभावनाओं के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं।

(आप ये ब्लाग एनडीटीवी इंडिया की वेबसाइट http://khabar.ndtv.com/news/election/election-diary-nda-close-yet-far-from-majority-382989 पर भी पढ़ सकते हैं।)

Friday, March 14, 2014

मोदी की चुप्पी से उपजे सवाल


देश भर में हो रही रैलियों में घंटे-घंटे भर बोलने वाले नरेंद्र मोदी पार्टी की अहम बैठकों में चुप रहते हैं। लोक सभा चुनावों में उम्मीदवार चुनने के लिए भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति की अब तक तीन बैठकें हो चुकी हैं। मगर अधिकांश सीटों पर उम्मीदवारों के चयन में मोदी न तो अपनी राय रखते हैं और न ही फैसले में दखल देते हैं। पार्टी के उम्मीदवारों के चयन में राज्य इकाइयों की राय को सबसे ज़्यादा तवज्जोह दी जा रही है। ऐसा कम ही हुआ है जब मोदी ने किसी विशेष सीट या विशेष उम्मीदवार के बारे में कुछ कहा हो। दिन-दिन भर चलने वाली इन बैठकों में मोदी के अलावा लाल कृष्ण आडवाणी और अरुण जेटली भी ज़्यादा समय चुप ही रहते हैं।

नरेंद्र मोदी को करीब से जानने वाले पार्टी नेता कहते हैं कि मोदी पार्टी के अंदरूनी फैसलों की प्रक्रिया में कम बोलने में ही विश्वास रखते हैं। समय से पहले अपने पत्ते न खोलना, मोदी की कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। न ही वे अपनी सोच के बारे में किसी को अंदाज़ा लगाने का मौका देते हैं। उनके चुनाव लड़ने का फैसला भी ऐसा ही एक बड़ा कदम है, जिसके बारे में वो खुद ही फैसला करेंगे और इसका एलान भी आखिरी वक्त तक रोक कर रखेंगे। वो चाहे पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हों और उम्मीदवारों के चयन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया उनकी इस महत्वाकांक्षा के पूरे होने के रास्ते का एक बड़ा पड़ाव हो, मगर मोदी इसमें दखल देते हुए नहीं दिखना चाह रहे हैं। कहा जा रहा है कि ये सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व में बीजेपी के केंद्रीय नेताओं के प्रति एक विशेष किस्म का अविश्वास घऱ कर गया है। 2004 के चुनाव में बीजेपी की करारी हार के बाद से पिछले दस साल में पार्टी अधिकांश समय आपसी झगड़ों में ही व्यस्त रही है। दूसरी पीढ़ी के नेताओं को आपस में झगड़ने से फुर्सत नहीं मिली और पार्टी के सबसे बड़े नेता होने के बावजूद लाल कृष्ण आडवाणी बजाए इन झगड़ों को सुलझाने के, इनमें एक खेमे के साथ नज़र आने लगे। यही वजह रही है कि पार्टी से इन नेताओं का असर कम करने के लिए आरएसएस ने पहले एक बाहरी व्यक्ति नितिन गडकरी को पार्टी की कमान सौंपी और अब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है।

मोदी दिल्ली की सत्ता के गलियारों से अपरिचित नहीं हैं। संगठन महामंत्री रहते हुए उन्होंने हस्तिनापुर की दुरुभिसंधियों को नजदीक से देखा है। वो इस बात से भी अंजान नहीं हैं कि उनकी उम्मीदवारी से पार्टी के कई नेता खुश नहीं हैं। वे ये भी जानते हैं कि कई नेता अब भी इस उम्मीद में हैं कि अगर बीजेपी को 170 के करीब सीटें आईं तो मोदी के बजाए कोई और प्रधानमंत्री बन सकता है। मोदी को ये अंदाज़ा भी है कि गठबंधन और उम्मीदवारों के फैसलों में किस तरह से जान-बूझकर पार्टी के भीतर ही टाँग अड़ाई जा रही है ताकि दो सौ सीटें पार करने के बीजेपी का मकसद पूरा न हो सके।

मुरली मनोहर जोशी को ये नाराज़गी है कि उन्हें किसी ने ये क्यों नहीं कहा कि नरेंद्र मोदी बनारस से चुनाव लड़ना चाहते हैं और वो उनके लिए सीट खाली कर कानपुर चले जाएँ। लालजी टंडन इस बात से नाराज़ हैं कि उन्हें कोई ये कहने नहीं आया कि राजनाथ सिंह लखनऊ आना चाहते हैं। कैलाश जोशी अपनी भोपाल सीट बचाने के लिए आडवाणी को वहां से लड़ने का आमंत्रण दे रहे हैं। सबको उम्मीद थी कि मोदी उनसे कहेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मोदी चुप रहे।

दरअसल, नरेंद्र मोदी सोची समझी रणनीति के तहत खुद को दिल्ली के नेताओं से दूर रख रहे हैं। मोदी का मानना है कि बीजेपी को बेहतरीन कामयाबी दिलाने का एक ही नुस्खा है और वो है जनता से सीधा संवाद। 11 अशोक रोड पर बैठे रहने से ये कामयाबी नहीं मिल सकती। मोदी का कहना है कि उनके और लोगों के बीच कोई और नहीं आएगा। महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे अपनी राय पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को बता देते हैं। लेकिन सब कुछ उनकी इच्छा के मुताबिक ही हो, या हो रहा है, ऐसा संदेश वो नहीं देना चाहते। बतौर प्रधानमंत्री उम्मीदवार चाहे उन्हें बराबरी के लोगों में पहला (फर्स्ट अमंग इक्वलस) माना जा रहा हो, लेकिन अगर वो प्रधानमंत्री बनते हैं तो पार्टी के सर्वोच्च नेता बन जाएंगे। तब ये देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी के अंदरूनी मामलों पर भी चुप ही रहेंगे या पार्टी फोरम पर खुल कर अपनी बात रखेंगे।


Thursday, March 13, 2014

फिर खुलता दक्षिण का द्वार


उत्तर भारत की पार्टी कही जाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने कर्नाटक में सरकार बना कर इस मिथक को तोड़ा था वो व्यापक जनाधार वाली पार्टी नहीं है। लेकिन केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में संगठन होने के बावजूद बीजेपी चुनावी कामयाबी नहीं मिली हैं।

इस बार कर्नाटक में बी एस येदुरप्पा को वापस लाकर बीजेपी ने खोई ताकत पाने की कोशिश की है। तमिलनाडु में एमडीएमके और डीएमडीके के साथ बातचीत पूरी हो चुकी है। पीएमके के साथ सीटों के बंटवारे पर बात हो रही है। वहां एआईएडीएमके और डीएमके के मुकाबले बीजेपी एक मजबूत तीसरे मोर्चे की नींव रखने जा रही है। जबकि आँध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) से उसके गठबंधन की घोषणा अब सिर्फ एक औपचारिकता है।

पिछले लोक सभा चुनाव में आँध्र प्रदेश की वजह से ही कांग्रेस ने दो सौ का आंकड़ा पार किया। वाईएसआर रेड्डी के रूप में मिले एक ताकतवर नेता ने कांग्रेस को ये कामयाबी दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन अब हालात बदले हुए हैं। वाईएसआर की मृत्यु के बाद उनके बेटे जगनमोहन कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बना चुके हैं। आँध्र प्रदेश का विभाजन हो गया है। दो जून को अलग तेलंगाना और सीमांध्रा राज्य अस्तित्व में आ जाएंगे।

बीजेपी और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के बीच गठबंधन होना करीब-करीब तय माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि सीमांध्रा में नरेंद्र मोदी की 25 मार्च के आसपास संभावित रैली के दौरान दोनों ही पार्टियों में गठबंधन की घोषणा की जा सकती है। 11 मार्च को अपनी हैदराबाद यात्रा के दौरान पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने राज्य नेताओं को यह कह भी दिया है कि वे टीडीपी के साथ गठबंधन को तैयार रहें। दोनों ही पार्टियों के नेताओं में सीटों के बंटवारे के लिए बातचीत चल रही है। टीडीपी को उम्मीद है कि तेलंगाना और सीमांध्रा दोनों जगहों पर बीजेपी से तालमेल करने से मोदी के नाम पर बीजेपी को मिल रहे वोट उसे ट्रांसफर हो सकेंगे। जबकि बीजेपी को लगता है कि टीडीपी के व्यापक जमीनी आधार और संगठन का फायदा लेकर वो दोनों हिस्सों के कुछ बड़े शहरों में चुनावी कामयाबी हासिल कर सकती है।

ऐसा होना बीजेपी के लिए एक बड़ी कामयाबी मानी जाएगी। न सिर्फ एनडीए को टीडीपी के रूप में एक मजबूत सहयोगी दल मिलेगा बल्कि दक्षिण भारत में कर्नाटक के बाद आँध्र प्रदेश में भी उसे पैर पसारने का एक बड़ा मौका फिर मिलेगा। बीजेपी ने टीडीपी के साथ गठबंधन में 1999 में लोक सभा की सात सीटें जीती थीं और विधानसभा में उसे चार फीसदी वोट मिले थे। जबकि 1998 के लोक सभा चुनाव में बीजेपी ने टीडीपी के साथ गठबंधन में चार लोक सभा सीटें जीती थीं।

दिक्कत ये है कि बीजेपी ने जिस तरह से संसद में तेलंगाना बिल का समर्थन किया उससे सीमांध्रा में उसके खिलाफ माहौल बना हुआ है। टीडीपी को इस बात का एहसास है और इसीलिए अभी तक गठबंधन का एलान नहीं हो सका है। बल्कि बीच में टीडीपी की नाराजगी इस हद तक थी कि उसने गठबंधन की बातचीत भी बंद कर दी थी। कोशिश ये की जा रही है कि नरेंद्र मोदी की सीमांध्रा में एक के बाद एक ताबड़तोड़ रैलियां कराई जाएं और इनमें वे ये आश्वासन दें कि एनडीए की सरकार आने के बाद सीमांध्रा के लिए विशेष पैकेज देंगे। बीजेपी इसके लिए तैयार भी है।
राम विलास पासवान की ही तरह चंद्रबाबू नायडू का भी साथ आना व्यक्तिगत तौर पर नरेंद्र मोदी के लिए बेहद सुकून देने वाला होगा। पासवान की ही तरह चंद्रबाबू भी अपने मुस्लिम वोटों को नाराज़ नहीं करना चाहते थे। दोनों ही नेता खुद को सेक्यूलर बताते हैं और ये तीसरे मोर्चे के साथ रहे हैं। चंद्रबाबू गैर कांग्रेसवाद के नाम पर बीजेपी के साथ जुड़े थे। लेकिन 2002 के दंगों के बाद भी बीजेपी के साथ बने रहे क्योंकि पार्टी ने अलग तेलंगाना न बनने देने का वादा किया था।

वैसे अटल बिहारी वाजपेयी के समय बीजेपी के पास दक्षिण भारत से टीडीपी के अलावा तमिलनाडु में पीएमके, एमडीएमके, डीएमके या एआईएडीएमके, कर्नाटक में राम कृष्ण हेगड़े जैसे सहयोगी रहे हैं। लेकिन वाजपेयी और मोदी की छवि का अंतर्विरोध सामने ला कर मोदी के बारे में हमेशा ये कहा जाता रहा कि बीजेपी को सरकार बनाने के लिए नए सहयोगी नहीं मिल पाएंगे। मगर पहले पासवान और अब चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं से चुनाव पूर्व गठबंधन कर मोदी ने इस मिथक को तोड़ने की कोशिश की है। जाहिर है इस उम्मीद में कि इन्हें देखते हुए चुनाव के बाद ममता बनर्जी, जयललिता या नवीन पटनायक जैसे सहयोगी साथ आने से नहीं घबराएंगे।



Wednesday, March 12, 2014

क्यों हो रहा है नमो-नमो?


राष्ट्रीय स्वयंसेवक प्रमुख मोहन भागवत के राष्ट्रीय प्रतिनिधि सभा में दिए गए एक बयान से भारतीय जनता पार्टी सकते में है। दरअसल, भागवत से पूछा गया कि बीजेपी में नमो-नमो हो रहा है ऐसे में संघ को क्या करना चाहिए। इस पर भागवत ने कहा कि नमो-नमो हमारा मुद्दा नहीं है। हम राजनीतिक दल नहीं हैं और हमारी सीमा है। हमें संघ-संघ और डा हेडगेवार करना चाहिए।

संघ प्रमुख के इस बयान का यही मतलब निकाला गया कि नरेंद्र मोदी को लेकर बीजेपी जिस तरह से प्रचार कर रही है उससे पार्टी पर व्यक्तिवाद हावी हो रहा है जिससे आरएसएस खुश नहीं है। संघ प्रमुख की बातों से ये भी लगा कि वो बीजेपी में नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव से प्रसन्न नहीं हैं। ये कह कर एक तरह से भागवत ने बीजेपी में मोदी विरोधियों उन नेताओं का पक्ष लिया है जो पार्टी में नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव से खुश नहीं हैं और खुद को धीरे-धीरे हाशिये पर जाता महसूस कर रहे हैं।

लेकिन वास्तविकता इसके उलट है।

मोहन भागवत कई बार हल्की-फुल्की और तुरत-फुरत प्रतिक्रियाएं देने के लिए जाने जाते हैं। भागवत के इस बयान में भी ऐसा ही हुआ। वरना कोई कारण नहीं है कि जिन भागवत के संघ प्रमुख रहते हुए बीजेपी में पीढ़ी का बदलाव हुआ, आडवाणी जैसे कद्दावर नेता के रहते हुए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया, वो अपनी ही पसंद के खिलाफ हज़ार से ज़्यादा प्रचारकों के सामने कोई बात कहें।

ये कोई छिपी बात नहीं है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार आरएसएस की पसंद से ही बनाया गया है। मोदी को ये जिम्मेदारी देने से पहले मोहन भागवत के कम से कम तीन बड़े बयान उनके पक्ष में हुए। पहला नासिक में जहां नीतीश कुमार के इंटरव्यू के बाद उन्होंने कहा कि कोई हिंदुत्ववादी प्रधानमंत्री क्यों नहीं हो सकता। दूसरा मेरठ में जहां उन्होंने कहा कि मोदी को प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता। और तीसरा इलाहाबाद कुंभ में जहां उन्होंने सार्वजनिक रूप से बीजेपी से देश की भावनाओं पर ध्यान देने को कहा।

दिलचस्प बात ये है कि बैंगलुरू में इसी प्रतिनिधि सभा की बैठक में तीन दिन पहले सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि मोदी स्वयंसेवक रहे चुके हैं और संघ को उन पर गर्व है। जबकि बनारस और गांधीनगर की लोक सभा सीटों पर हुए विवादों से मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी पर संघ सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी ने उम्मीद जताई थी कि बीजेपी इसका हल कर लेगी।

बीजेपी नेताओं का कहना है कि 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनावों के बाद ये पहली बार है जब कांग्रेस को हराने के लिए संघ सक्रिय हुआ है। कथित हिंदू आतंकवाद को लेकर कांग्रेस और संघ आमने-सामने है। शायद इसीलिए भागवत ने ये कहा भी कि इस समय ये सवाल नहीं है कि कौन आना चाहिए, बल्कि बड़ा सवाल ये है कि कौन नहीं आना चाहिए। आरएसएस का ये मानना है कि नरेंद्र मोदी के नाम पर बीजेपी कार्यकर्ताओँ में जोश आया है और उनके नेतृत्व में बीजेपी कांग्रेस को हरा सकती है। इस लोक सभा चुनाव में संघ ने अपने कार्यकर्ताओं से सौ फीसदी मतदान सुनिश्चित करने के लिए पूरा जोर लगाने को भी कहा है। 2004 और 2009 के लोक सभा चुनावों में बीजेपी की ये शिकायत रही थी कि संघ का कैडर घरों से बाहर नहीं निकला। लेकिन इस बार ऐसा होने की संभावना कम है।
ये ज़रूर है कि संघ व्यक्तिवाद के खिलाफ है। लेकिन उसके नेता ये मानते हैं कि चुनावी राजनीति में किसी चेहरे को आगे करना एक रणनीति का हिस्सा है। 

खासतौर से तब जबकि बीजेपी चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर इन्हें राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर बनाने की कोशिश करती रही है। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के पीएम उम्मीदवार रहते हुए भी बीजेपी ने व्यक्ति केंद्रित प्रचार किया था। मोदी के नाम को घर-घर तक पहुँचाने के लिए बीजेपी को नमो-नमो करना पड़ रहा है। लेकिन जहां तक पार्टी में फैसले लेने का सवाल है, अभी तक ऐसा कोई मामला नहीं आया है जब मोदी ने अकेले ही कोई फैसला किया हो। बल्कि मोदी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नितिन गडकरी, रामलाल जैसे कई नेता मिल कर ही बड़े फैसले कर रहे हैं।


Tuesday, March 11, 2014

भगत सिंह का निजीकरण


निजीकरण का विरोध करने से मिडिल क्लास नाराज़ हो सकता है। भगत सिंह का नाम बेचने से युवा वर्ग साथ आ सकता है। इसीलिए सबसे अच्छा होगा कि भगत सिंह का निजीकरण कर दिया जाए ताकि मध्य वर्ग भी साथ रहे और युवाओं के भी वोट मिल सके।

ये सुझाव आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल तक शायद पहुँचे। इस सुझाव का उन तक पहुँचना ज़रूरी है क्योंकि देश में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जरूरी है कि उनकी पार्टी सभी 545 सीटों पर जीत हासिल करे। ऐसा होने के लिए ये भी जरूरी है कि उनके हर इंटरव्यू में भगत सिंह की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर बैकग्राउंड में नज़र आए।

भगत सिंह के निजीकरण का प्रस्ताव इसलिए भी दिया जाना चाहिए क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी वाले आपस में मिले हुए हैं। इन्होंने मिल कर भगत सिंह को शहीद का दर्जा नहीं दिया है। लोग चाहे भगत सिंह को शहीद बोलते हों लेकिन केजरीवाल कहते हैं कांग्रेस-बीजेपी वालों ने ऐसा नहीं होने दिया। चौदह फरवरी को केजरीवाल ने अपनी सरकार को शहीद कर दिया। उन्हें जिसने इतिहास पढ़ाया, उसने ये समझाया कि चौदह फरवरी को ही भगत सिंह को भी फांसी लगाई गई थी। इसलिए भगत सिंह और उनकी सरकार का शहादत का दिन एक ही मुकर्रर कर दिया गया। लोग क्यों कहते हैं कि भगत सिंह पैदा होना चाहिए। पर मेरे घर में नहीं पड़ोसी के घऱ में।


निजीकरण की बात न करने से मिडिल क्लास नाराज़ हो जाएगा। इसलिए कैपिटलिज्म का समर्थन करो। क्रोनी कैपिटलिज्म का नहीं। जनता अपने-आप समझ जाएगी। आखिर जनता को ही तो बेवकूफ बनाना है। वो भी कुछ दिन के लिए। सरकार न चला पाओ तो क्या है, जनता के सामने दिन में पचास बार कांग्रेस-बीजेपी, राहुल-मोदी, अंबानी-अदानी बोलते रहो। सब सेट हो जाएगा। 

ब्राह्मण वोटों पर नज़रें


उत्तर प्रदेश में बीजेपी नरेंद्र मोदी के पिछड़े वर्ग की पहचान को सामने रख एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग करने की कोशिश में है। पिछड़े-अगड़ों के गठजोड़ से पार्टी ने 90 के दशक में राज्य में बेहतरीन प्रदर्शन किया था। लेकिन धीरे-धीरे पिछड़ी जातियां उससे दूर होती गईं। कमजोर होती बीजेपी का अगड़े भी धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगे। शुरुआत ब्राह्मणों ने की। 2007 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मणों को अपने साथ ले लिया। 2012 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों ने समाजवादी पार्टी का साथ दिया।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण भूमिका है।  राज्य में करीब दस फीसदी आबादी ब्राह्मणों की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 18 फीसदी मुसलमानों की तुलना में दस फीसदी ब्राह्मण अधिक रणनीतिक ढंग से मतदान करते हैं। पिछले दो विधानसभा चुनाव इसके सबूत हैं। जब बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने अधिक ब्राह्मणों को उम्मीदवार बना कर इस वर्ग को लुभाने की कोशिश की और उन्हें साथ मिला।

एक बार फिर लोक सभा चुनाव में इन्हीं दो पार्टियों की कोशिश इस वर्ग को अपने साथ लेने की है। बहुजन समाज पार्टी ने अभी तक 22 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया है। मायावती अपनी ओर से एक बार फिर ब्राह्मणों के साथ रिश्ते सुधारने में जुट गई हैं। 2009 को लोक सभा चुनाव में इच्छानुसार कामयाबी न मिलने के बाद से उन्होंने भाईचारा कमेटियों को भंग कर दिया था। जबकि समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण सम्मेलन करने शुरू किए थे और प्रमोशन में आरक्षण करने के बीएसपी के कदम का विरोध किया। पारंपरिक रूप से राज्य के ब्राह्मण कांग्रेस का समर्थन करते आए। मगर जैसे-जैसे कांग्रेस की ताकत कमजोर हुई, ये वोट पहले बीजेपी और बाद में एसपी-बीएसपी के साथ चला गया। कमलापति त्रिपाठी के साथ कांग्रेस की पहचान ब्राह्मणों से जुड़ी थी।

वहीं, अटल बिहारी वाजपेयी के बाद से बीजेपी राज्य में मजूबत ब्राह्मण चेहरा नहीं तलाश पाई है। वाजपेयी और कल्याण सिंह के रूप में राज्य में बीजेपी के पास अगड़े-पिछड़े समाज के दो ताकतवर चेहरे थे और इन्हीं के दम पर पार्टी ने 90 के दशक में शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन कल्याण सिंह की बगावत से बीजेपी को राज्य में जो नुकसान हुआ वो उसकी भरपाई अभी तक नहीं कर पाई है। अब कल्याण सिंह एक बार फिर बीजेपी में हैं। राज्य में हुई नरेंद्र मोदी की सभी रैलियों में उन्हें मंच पर खास जगह मिलती है। लेकिन उनमें अब वो करिश्मा नहीं बचा है।
जबकि अटल बिहारी वाजपेयी के साथ राज्य के ब्राह्मण नेतृत्व में गिने जाने वाले मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र और केसरीनाथ त्रिपाठी जैसे नेता अब उम्रदराज माने जाते हैं और राज्य की राजनीति में उनकी पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होती गई है। ये बात अलग है कि अब बीजेपी में ब्राह्मण नेतृत्व की नई पौध तैयार हो गई है। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के बाद से पैदा हुआ शून्य बरकरार है।

ब्राह्मणों को अपने साथ लेने की बीजेपी की कोशिशों को मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र और केसरीनाथ त्रिपाठी जैसे नेताओं की नाराजगी से झटका लगा है। ये तीनों ही नेता क्रमशः बनारस, कानपुर और इलाहाबाद से चुनाव लड़ना चाह रहे हैं। जबकि बीजेपी बनारस से नरेंद्र मोदी, जोशी को कानपुर से और कलराज मिश्र को श्रावस्ती से टिकट देना चाह रही है। केसरीनाथ त्रिपाठी दो विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। ऐसे में पार्टी उन्हें टिकट देने के मूड में नहीं हैं। बीजेपी कई सीटों से नए ब्राह्मण चेहरों को उतारना चाह रही है। नरेंद्र मोदी के करीबी इन चेहरों के जरिए पार्टी राज्य में ब्राह्मण नेतृत्व की नई पौध को मजबूत करना चाहती है।


कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी को फिर मजूबत करने के लिए इस बार जितना अनुकूल माहौल है उतना 1998 के बाद से कभी नहीं रहा है। तमाम जनमत सर्वेक्षणों में कहा जा रहा है कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर सकती है। कुछ सर्वेक्षणों में ये भी कहा गया है कि अगड़ी जातियां बीजेपी के पक्ष में गोलबंद हो रही हैं। लेकिन वास्तविकता में ऐसा तभी हो पाएगा जब पार्टी उम्मीदवारों के चयन में सावधानी रखे। यूपी-बिहार के बारे में कहा जाता है कि चुनाव से पहले चाहे जिस पार्टी की हवा हो, लेकिन नतीजों के बारे में अंदाज़ा तभी लगाना ठीक होता है जब सभी पार्टियों के उम्मीदवारों के नामों का एलान हो जाए।    

Monday, March 10, 2014

ओल्ड इज़ गोल्ड?


परिवर्तन संसार का नियम है। पेड़ों पर पुराने पत्ते झरते हैं, नए पत्ते आते हैं। जो पुराना हुआ, नया उसकी जगह लेता है। नया पुराना होता है और फिर कोई नया उसकी जगह लेने आ जाता है। यही सृष्टि चक्र है। जीवन का सिद्धांत है। परिवर्तन आसान नहीं होता, न ही आसानी से होता है। परिवर्तन की प्रक्रिया में प्रतिरोध होता है। पुराना आसानी से अपनी जगह नहीं छोड़ता, नए को आसानी से पुराने की जगह नहीं मिल पाती। इस प्रक्रिया को संक्रमण काल कह सकते हैं।


भारतीय जनता पार्टी इसी संक्रमण काल से गुजर रही है। बरसों से अटल-आडवाणी की छाया में रही पार्टी अब परिवर्तन के लिए तैयार है। पार्टी की कमान दूसरी पीढ़ी के हाथों में देने की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना सिरे चढ़ने लगी है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का मतलब है पार्टी में उनका नंबर एक के पद पर पहुँचना। राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज जैसे नेता अब मोदी के साथ के पहले पायदान पर पहुँच गए हैं। लेकिन इस परिवर्तन का भी विरोध हुआ है और अब भी हो रहा है।


आरएसएस की कोशिश थी कि इस लोक सभा चुनाव में बुजुर्ग नेता मैदान खाली करें ताकि नए लोगों को हाथ आज़माने का मौका मिल सके। संघ चाहता था कि पार्टी के वरिष्ठ नेता नेतृत्व देने के बजाए मार्गदर्शक की भूमिका निभाएं। इसी लिए प्रस्ताव दिया गया था कि लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी लोक सभा के बजाए राज्य सभा जाएं। पचहत्तर पार कर चुके सभी नेताओं को ये प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन शायद संघ को ये कल्पना नहीं रही होगी कि इस प्रस्ताव का इतना तीखा विरोध होगा।


86 साल के लाल कृष्ण आडवाणी, 80 साल के मुरली मनोहर जोशी, 79 साल के शांता कुमार, 79 साल के बी सी खंडूरी, 78 साल के लालजी टंडन। ये तमाम नेता खम ठोक कर मैदान में बने हुए हैं। बुजुर्ग नेताओं को लोक सभा चुनाव के मैदान से हटाने में पार्टी को पहली कामयाबी मध्य प्रदेश में मिली है। वहां 84 साल के कैलाश जोशी ने काफी मान-मनौव्वल के बाद पार्टी की इस विनती को मान लिया है और सार्वजनिक रूप से एलान किया है कि वो लोक सभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे।

बीजेपी के उम्मीदवारों की पहली सूची में शांता कुमार का नाम हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा सीट से घोषित भी हो चुका है। वहीं लाल कृष्ण आडवाणी इस बात पर निराशा जता चुके हैं कि पहली सूची में उनका नाम नहीं आया। वो सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वो गांधीनगर से ही चुनाव लड़ना चाहते हैं।


इसी तरह मुरली मनोहर जोशी पिछले एक साल से मीडिया में चल रही उन खबरों से परेशान हैं जिनके मुताबिक नरेंद्र मोदी उनकी सीट बनारस से चुनाव लड़ सकते हैं। आठ मार्च को केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से इन खबरों का खंडन करने को भी कहा। मगर आरएसएस के दखल के एक दिन बाद तेवर ठंडे हो गए और कहा कि पार्टी का फैसला मानेंगे। उन्हें भरोसा दिया गया है कि अगर मोदी बनारस से चुनाव लड़ने का फैसला करेंगे तो उन्हें कानपुर से टिकट दिया जाएगा।


राजनाथ सिंह गाजियाबाद छोड़ कर लखनऊ जाना चाहते हैं और इसी बात से वहां के मौजूदा सांसद लालजी टंडन नाराज हो गए हैं। उन्होंने कहा कि वो सिर्फ मोदी के लिए सीट छोड़ सकते हैं। राजनाथ के लखनऊ से लड़ने की संभावना को उन्होंने काल्पनिक कह कर खारिज कर दिया और कहा है कि उनसे किसी ने इस बारे में बात नहीं की है। हालांकि वो ये भी कहते हैं कि पार्टी जो तय करेगी, उसे मानेंगे। जबकि तमाम विरोध के बावजूद बीजेपी ने बी सी खंडूरी को उत्तराखंड से लोक सभा चुनावों में उतारने का मन बनाया है।



जब पार्टी ने फैसला किया कि बुजुर्ग नेता लोक सभा के चुनाव न लड़ें, तब उनके प्रति अनादर की बात नहीं रही। बल्कि इसे किसी भी राजनीतिक पार्टी में बदलाव की स्वाभाविक प्रक्रिया के तौर पर देखा गया। बीजेपी इस चुनाव में बार-बार युवा मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित करने की बात कह रही है। ज़ाहिर है युवा मतदाताओं का रुझान किसी बुजुर्ग उम्मीदवार के बजाए नए खून की तरफ ज़्यादा होगा। लेकिन अनुभव को नज़रअंदाज़ करना भी किसी पार्टी की अंदरूनी सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है। बीजेपी में पिछले एक हफ्ते से चली आ रही उठा-पटक को देख कर तो यही लगता है।

Sunday, March 09, 2014

केजरीवाल पर कविता


 इंडिया टुडे के कार्यक्रम में अरविंद केजरीवाल चार्टर प्लेन से पहुँचे। वहां उन्हें कई खट्टे-मीठे अनुभव हुए। पर सबसे मज़ेदार रहा दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार का कविता पाठ।
यूट्यूब पर तो आपने इसका वीडियो देखा होगा, मैंने सोचा मैं ये कविता यहां लिखता चलूं। यहां ये बताना जरूरी है कि ये कविता नीरज कुमार ने नहीं लिखी है। बल्कि उन जैसे लाखों लोगों के पास एसएमएस, व्हाट्स एप, फेसबुक या ट्विटर के जरिए आई। उन्हीं माध्यमों से जिनके जरिए केजरीवाल ने अपनी आम आदमी पार्टी का प्रचार-प्रसार किया है। अर्ज है-

कसम से बहुत याद आओगे तुम केजरीवाल
वो तेरा मेट्रो में जाना
वो रुक-रुक कर नज़ाकत से खांसना
वो तेरा नीली मारूति वैगन आर का दीवानापन
वो करीने से मफलर का लपेटना
वो बात-बात पर धरने पर बैठना
वो रोज़-रोज़ प्रेस कांफ्रेंस करना
वो नटखटपन
वो हर बात पर ज़िद करना
वो गिरगिट सा रंग बदलना
वो जनता का बिजली-पानी करना
वो पूरी दुनिया को चोर बताना
वो झाड़ू मारते-मारते खुद कचरा हो जाना
याद रहेगा केजरीवाल, कसम से तुम बहुत याद आओगे
टाटा स्टील से भाग गए
सरकारी नौकरी से भाग गए
आमरण अनशन से भाग गए
जनता के डर से भाग गए
मुख्यमंत्री पद से भाग गए
इतना भागते क्यों हो भाई
भाग-भाग कर भाग पार्ट टू बनाना है क्या
एक झाडू की औसत उम्र चालीस-पैंतालीस दिन होती है
केजरीवाल तुमने तो ये साबित कर दिया
मफलर वाली ठंड में आए
और ठंड में ही चले गए
एक गर्मी तो देख लेते यार


महिला दिवस पर मोदी की चाय


आठ मार्च का अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर नरेंद्र मोदी चाय की चुस्कियों के बीच देश-विदेश में महिलाओं से रूबरू हुए। नई दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय पर आयोजित दो घंटे के इस कार्यक्रम में महिलाओं से घिरे बैठे मोदी ने महिला सशक्तीकरण के बारे में अपनी राय रखी और सवालों के जवाब दिए। इस कार्यक्रम की खास बात ये थी कि लाइव टीवी के माध्यम से नरेंद्र मोदी 500 शहरों में 1500 स्थानों पर एक साथ एक ही वक्त मौजूद रहे। पाँच महाद्वीपों और 15 देशों में अलग-अलग जगहों पर मोदी एक साथ पहुँचे। वाशिंगटन, लंदन, फ्रैंकफर्ट, सिडनी और नैरोबी जैसे कई शहरों में भी। चुनाव प्रचार के लिए तकनीक के इस्तेमाल का ये एक बेहतरीन नमूना है।

एक तरफ बीजेपी के दिल्ली के नेताओं में टिकटों के बंटवारे, अपनी सीटों, संभावित सहयोगियों और गठबंधनों को लेकर आपसी मार-काट मची है। लोक सभा की एक-एक सीट के लिए आपस में झगड़ रहे हैं और अपनी छवि चमकाने के चक्कर में पार्टी की अंदरूनी कलह को सतह पर ला रहे हैं। पार्टी विद ए डिफ्रेंस के बजाए पार्टी विद डिफ्रेंसेज की पुरानी टैग लाइन को दोबारा याद दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में इन सबसे दूर नरेंद्र मोदी अपने जीवन की सबसे कठिन लड़ाई को जनता के बीच सीधे ले जा रहे हैं। रैलियों और तकनीक के माध्यम से आम लोगों से सीधा संवाद स्थापित कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में पार्टी के भीतर उन्होंने अपना कद ऊँचा कर लिया है और दिल्ली के नेता उनके सामने अचानक बौने लगने लगे हैं।

चाय पे चर्चा के दो घंटे के कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी ने पहले अपनी बात रखी और फिर देश-विदेश से महिलाओं के अपनी सुरक्षा, समाज में स्थान, बराबरी का दर्जा, महिलाओं के लिए बने कानूनों जैसे दसियों सवालों के जवाब दिए। मोदी ने आधी आबादी की आजादी की वकालत की। शिक्षा, कैरियर, जीवन साथी और परिवार चुनने की आजादी। महिलाओं की शिक्षा की जरूरत पर महात्मा गांधी की बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि जब एक महिला शिक्षित होती है तो दो परिवार नहीं दो पीढ़ियां शिक्षित हो जाती हैं। महिला सुरक्षा बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि पुलिस बल में महिलाओं की संख्या बढ़ाई जाए। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए नरेंद्र मोदी ने संसद में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण के लिए लंबे समय से लटके महिला आरक्षण बिल को तुरंत पास करने की मांग भी की है।

पिछले तीन विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी को गुजरात में महिलाओं का जबर्दस्त समर्थन मिला है। इसी को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने हाल के विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी महिला और युवा मतदाताओं पर खास जोर दिया और उसे इसका फायदा भी मिला। राजस्थान में बीजेपी ने वसुंधरा राजे को ही आगे रखा और चुनावों में ऐतिहासिक जीत हासिल की। छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश में सस्ते दामों पर गेहूं-चावल की योजनाओं के ज़रिए महिलाओं को लुभाया। बढ़ती महंगाई से बिगड़ते घर के बजट को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा। एलपीजी सिलिंडरों में कटौती और केरोसीन के बढ़े दाम इन चुनावों में बड़ा मुद्दे बने और महिलाओं ने इनके लिए केंद्र की यूपीए सरकार को जिम्मेदार मानते हुए बीजेपी को बड़ी संख्या में वोट दिया। दिल्ली में निर्भया कांड ने महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को केंद्र में ला दिया और कांग्रेस को इसका खमियाज़ा भी भुगतना पड़ा।

बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि किसी भी परिवार में ये फैसला करने में कि वोट किसे देना है, घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति की राय अहम होती आई है। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। शहरों में परिवार छोटे होते जा रहे हैं। संयुक्त परिवारों की परंपरा खत्म हो रही है। किसी भी शहर के एक छोटे परिवार जिसमें माता-पिता काम पर जाते हैं और पुत्र-पुत्री कॉलेज, वहां सभी संवेदनशील फैसलों में घर की स्त्री की बड़ी भूमिका हो गई है। लिहाजा कोशिश ये हो कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर पूरा ध्यान रहे ताकि मतदान के दिन उस परिवार के वोट अपने खाते में लेने में दिक्कत न आए।

इसके लिए बीजेपी ने महंगाई और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर खास ध्यान देने का फैसला किया है। चाय पे चर्चा के दौरान नरेंद्र मोदी ने महिला सुरक्षा के नाम पर बने एक हजार करोड़ रुपए के निर्भया फंड से एक पैसा भी खर्च करने के लिए मोदी ने यूपीए सरकार को आड़े हाथों लिया। इसी तरह 181 नंबर के हैल्पलाइन बंद होने का भी जिक्र किया जहां काम कर रही महिला कर्मचारियों को पैसा नहीं दिया गया। अपने चुनावी घोषणा पत्र और विजन डाक्यूमेंट में भी बीजेपी महिलाओं पर खास ध्यान देगी। मोदी ने कहा है कि पार्टी का लक्ष्य आज़ादी के 75 साल पूरे होने पर 2022 तक हर घर में बिजली, पानी और शिक्षा की सुविधा पहुँचाना है।


जब महिला मतदाताओं का प्रश्न आता है तो उन्हें लुभाने में कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं रहना चाहता। व्यक्तिगत छवि के चलते कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी दोनों ही महिलाओं में बेहद लोकप्रिय हैं। शायद इसीलिए बीजेपी ठोस मुद्दों और वादों के साथ मैदान में उतरी है ताकि महिला मतदाताओं का साथ ले सके और मोदी ने आगे रह कर इसकी कमान अपने हाथों में ली है।