Friday, February 28, 2014

मोदी, मुस्लिम और माफ़ी!!!


राष्ट्रीय मुस्लिम मंच और बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चे के एक कार्यक्रम में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने बेहद प्रभावी भाषण दिया। बीजेपी और देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक तबके मुसलमानों के बीच के तनावपूर्ण रिश्तों को राजनाथ सिंह ने अपने ढंग से नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की। बीजेपी को लेकर उनकी आशंकाओं को दूर करने का प्रयास किया और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उनका समर्थन मांगा।
लेकिन मीडिया का पूरा ध्यान राजनाथ सिंह के माफ़ी वाले बयान पर रहा। ये स्वाभाविक भी है। क्योंकि एक बड़े तबके को लगता है कि जब तक बीजेपी मुसलमानों को लेकर अपने रवैये को नहीं बदलती, तब तक मुसलमान उस पर भरोसा नहीं कर सकते। बीजेपी और मुसलमानों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि पार्टी के कई बड़े नेता ये कहते मिल जाएंगे कि पार्टी चाहे सिर के बल खड़ी हो जाए, उसे मुसलमानों का वोट कभी नहीं मिल सकता। वहीं, कई मुस्लिम नेता भी ये कहते हैं कि बीजेपी चाहे कुछ कर ले, मुसलमान हमेशा उसी पार्टी को रणनीतिक ढंग से वोट करेगा जो बीजेपी को हरा सके।
क्या कभी ऐसा हो सकता है कि बीजेपी और मुसलमानों के बीच अविश्वास की ये खाई भर पाए? बीजेपी बीच-बीच में ऐसे संकेत देती भी है कि वो अपनी और से पूरी कोशिश कर रही है। लेकिन हकीकत यही है कि जब भी उसने ऐसी कोशिश की है, पार्टी पर हावी कट्टरपंथी खेमा उसे अपने कदम पीछे खींचने के लिए मजबूर कर देता है। राजनाथ सिंह के माफी वाले बयान के बाद पार्टी की ओर से दी गई सफाई को इसी तरह देखा जा रहा है। बीजेपी के उदारवादी नेता मानते हैं कि राजनाथ सिंह के बयान से न सिर्फ पार्टी ने मुसलमानों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था, बल्कि ऐसे संभावित सहयोगियों को भी इशारा किया था जो नरेंद्र मोदी की कट्टरपंथी छवि के कारण बीजेपी के साथ नहीं आना चाह रहे हैं।
मुसलमानों को साथ लेने की बीजेपी की कोशिशें इसलिए भी ज्यादा गंभीर नहीं दिखती हैं क्योंकि पार्टी चुनाव के वक्त ही उन्हें लुभाने का प्रयास करते दिखती है। बीजेपी के प्रति मुसलमानों के अविश्वास की एक बड़ी वजह बीजेपी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अटूट रिश्ते हैं। ये बात अलग है कि खुद आरएसएस मुसलमानों से रिश्तों को मधुर करने के प्रयास में लगा है। राजनाथ सिंह जिस कार्यक्रम में बोले, उसके आयोजकों में से एक राष्ट्रीय मुस्लिम मंच आरएसएस का ही एक अंग है।

आज इंडियन एक्सप्रेस में गुजरात बीजेपी की वापी इकाई का एक दिलचस्प विज्ञापन छपा है। इसमें तीन प्रमुख मुस्लिम शख्सियतों के बयानों का जिक्र कर देश भर के मुसलमानों से कहा गया है कि वो नरेंद्र मोदी पर भरोसा करें क्योंकि गुजरात में उनकी तरक्की हुई है। ये विज्ञापन और राजनाथ सिंह का माफी वाला बयान बताता है कि बीजेपी इस लोक सभा चुनाव के मद्देनज़र एक बार फिर मुसलमानों को लुभाने में लगी है। लेकिन इसके लिए वो कितनी गंभीर है, इसका संकेत शायद इस बात से भी मिले कि उसके उम्मीदवारों की सूची में कितने मुसलमान रहते हैं।

Wednesday, February 26, 2014

क्या है मोदीत्व?



अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो वो देश को कैसे चलाएंगे? बिगड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का उनका नुस्खा क्या है? महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, छुआछुत, सांप्रदायिकता, आतंकवाद जैसी समस्याओं से वो कैसे निपटेंगे? कृषि, मजदूर, ग्रामीणों, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी नीति, शासन व्यवस्था, प्रशासनिक ढांचा, संघीय ढांचा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर उनकी क्या सोच है?
इन तमाम विषयों पर नरेंद्र मोदी के विचारों की अभी सिर्फ झलक ही देखने को मिली हैं- देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रही उनकी रैलियों के भाषणों में या फिर हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान पर बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में उनके भाषण में। करीब सवा घंटे के इस भाषण में मोदी ने तमाम विषयों पर अपनी सोच की झलक दिखाई।
हालांकि बीजेपी का अपना घोषणापत्र आना अभी बाकी है। घोषणापत्र या संकल्प पत्र सामान्य तौर पर किसी भी पार्टी के लिए एक पवित्र ग्रंथ होना चाहिए क्योंकि चुनाव में जाने से पहले इसी के माध्यम से वो जनता से वादे करती है और जनता इसी के आधार पर उसे सरकार में भेजने या न भेजने का फैसला करती है। ये बात अलग है कि ज्यादातर पार्टियां अपने घोषणापत्रों में किए गए वादों को पूरा नहीं कर पाती।
बीजेपी का घोषणापत्र जब आएगा, तब आएगा। लेकिन नरेंद्र मोदी की सोच को सिलसिलेवार ढंग से पिरोना शुरू हो गया है। मोदी की इसी सोच को लेकर दिल्ली में कल एक पुस्तक मोदीत्व जारी की गई। व्यक्तिवादी राजनीति का विरोध करने वाली बीजेपी फिलहाल नमो नमो का जाप करने में व्यस्त है। इसीलिए उसे नरेंद्र मोदी के विचारों को मोदीत्व का नाम देने से परहेज नहीं है। ये नाम बीजेपी के लिए इसलिए भी अनुकूल है क्योंकि वो हिंदूत्व की राजनीति करती है और इसे एक राजनीतिक अवधारणा माना जाता है।
बहरहाल, इस पुस्तक में विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर नरेंद्र मोदी की सोच को संकलित किया गया है। शुरुआत धर्मनिरपेक्षता से ही की गई है। मोदी ने धर्मनिरपेक्षता को अपने ढंग से परिभाषित किया है और इसका अर्थ पहले भारत बताया है। सर्व धर्म समभाव से लेकर भगवदगीता में श्रीकृष्ण के उपदेश और महात्मा गांधी से लेकर ईसा मसीह तक सबका जिक्र कर ये बताया गया है कि देश सब धर्मों से ऊपर है। पुस्तक में सम्राट अशोक का उदहारण हैं जिन्होंने कुएँ बनाए ताकि बौद्ध या गैर बौद्ध सभी उनका प्रयोग कर सके। नेपोलियन के नेपोलीओनिक कोड का जिक्र कर बताया गया है कि गुजरात में उसका पालन किया जा रहा है जिसमें सरकारी नीतियों का लाभ बजाए किसी विशेष समुदाय को पहुंचाने के सभी नागरिकों को दिया जाता है।
मोदीत्व सरकार चलाने में आम लोगों की भागीदारी की बात करता है और न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन का सिद्धांत प्रतिपादित करता है। दिलचस्प बात ये है कि इस पुस्तक में इसके लिए ब्राजील के पोर्टो एलेगरे शहर की नगरपालिका में सहभागी बजट का उदहारण दिया गया है। दिल्ली में बनी आम आदमी पार्टी की सरकार भी यही उदाहरण देती थी और इसके द्वारा मोहल्ला सभाओं को अधिक अधिकार देने का विधेयक भी इसी उद्देश्य से लाया गया था। मोदीत्व स्कूलों के प्रबंधन के लिए ब्रिटन के विद्यालयों के प्रबंधन को रोल मॉडल मानता है जिसमें स्कूलों से जुड़े आम लोगों को प्रबंधन में हिस्सेदारी दी गई है। इससे मिलता-जुलता प्रयोग भी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने किया था।
मोदीत्व इशारा करता है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बने तो एयर इंडिया जैसे सफेद हाथी बंद हो सकते हैं। भारतीय रेल का चरणबद्ध ढंग से निजीकरण हो सकता है। बंदरगाहों, हवाईअड्डों, सड़कों के निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ सकती है क्योंकि मोदीत्व मानता है कि सरकार के व्यवसाय में होने का कोई मतलब नहीं है। इसके लिए मोदी के रोल मॉडल शेरशाह सूरी और ब्रिटन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर हैं। शेरशाह ने सन् 1556 में हुमांयू की मौत के बाद बिगड़ी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए कई उपाय किए जिनमें कारोबार में सरकार के दखल को कम करना भी शामिल था और इससे अर्थव्यवस्था सुधरी। वहीं थैचर ने 70 के दशक में सिक मैन ऑफ यूरोप के नाम से बदनाम ब्रिटन में प्रतियोगिता बढ़ा कर गैर मुख्य क्षेत्रों से सरकार के दखल को कम किया और इस तरह अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाईं।
मजबूत संघीय ढांचे की वकालत करते हुए मोदीत्व राज्यों को अधिक स्वायत्तता देने की बात करता है। इसके लिए मोदी के रोल मॉडल प्राचीन हिंदू और बौद्ध ग्रंथों के साथ मुगल बादशाह जहांगीर भी हैं जिन्होंने प्रांतों को स्वायत्तता देने के लिए कई सुधार किए थे।
वोट बैंक की राजनीति खत्म करने के लिए मोदीत्व बादशाह अकबर की बात करता है जिन्होंने कहा था कि अल्लाह ने उन्हें मुसलमान या हिंदुओं की नहीं बल्कि सारे भारतीयों की सेवा करने का निर्देश दिया है।
मोदीत्व के हिसाब से आतंकवाद को खत्म करने का एक तरीका पर्यटन को बढ़ाना भी हो सकता है। खेतों की उपज को सीधे फैक्ट्री तक पहुँचाने के तरीके विकसित करना, गांवों को गांव-शहर के रूप में विकसित करना ताकि शहरों के लिए पलायन कम हो सके, बूंद खेती यानी ड्राप इरीगेशन को मजबूत करना, आईटी उद्योग पर जोर देना, आम लोगों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए यूनिवर्सिटी को कैंपस से बाहर ले जाना जैसे सुझाव शामिल हैं।
मोदीत्व एक बार फिर कहता है कि गांवों में स्वच्छता के लिए जरूरी है कि देवालयों से पहले शौचालयों को तरजीह दी जाए। मंदिर बनाने के लिए लाखों रुपए खर्च होते हैं मगर बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके पास शौचालय बनाने के लिए पैसे नहीं हैं। मोदीत्व कहता है कि सरकार को बड़े पैमाने पर शौचालय बनाने चाहिएं।
कम्यूनिस्ट देशों की अवधारणा जनसमूह के द्वारा सामूहिक उत्पादन की प्रशंसा मोदीत्व में की गई है। इसके लिए चीन में डेंग जाइओपिंग के आर्थिक सुधारों का जिक्र भी किया गया है। मोदीत्व सार्वजनिक परियोजनाओं में जनता की भागीदारी की बात भी करता है।
इस पुस्तक में ये जोर दिया गया है जो भी विचार मोदी ने रखे हैं उन सभी को उन्होंने सफलतापूर्वक गुजरात में लागू किया है। यानी अगर उन्हें मौका मिलता है तो वो पूरे देश में इसे लागू कर सकते हैं।  


मोदी का मिशन 26



बीजेपी लोक सभा चुनाव के लिए 272+ के मिशन के साथ मैदान में उतरी है। यानी अपने बूते लोक सभा में बहुमत पाने का लक्ष्य। 1984 के चुनाव के बाद से किसी एक दल को लोक सभा में बहुमत नहीं मिला है। इसीलिए इस लक्ष्य को अगर असंभव नहीं तो बेहद कठिन ज़रूर माना जा रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भी बीजेपी 182 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई थी। ऐसे में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने एक बेहद कठिन लक्ष्य निर्धारित किया है।
लेकिन मोदी इस बड़े लक्ष्य के साथ एक छोटे मगर महत्वपूर्ण लक्ष्य के लिए भी काम कर रहे हैं। ये है मिशन 26 यानी गुजरात की सभी 26 लोक सभा सीटों को बीजेपी के खाते में डालना। अगर सितंबर 1996 से मार्च 1998 तक की अवधि छोड़ दें, तो गुजरात में बीजेपी मार्च 1995 से ही सत्ता में है। उत्तर भारत की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी के लिए ये एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। नरेंद्र मोदी सात अक्तूबर 2001 से लगातार मुख्यमंत्री बने हुए हैं।
गुजरात दंगों के बाद से नरेंद्र मोदी गुजराती अस्मिता की बात करते रहे हैं। उनका कोई भी बयान पहले पाँच करोड़ गुजराती और अब छह करोड़ गुजरातियों का जिक्र किए बिना पूरा नहीं होता है। अब इसी गुजराती अस्मिता को मोदी नए ढंग से परिभाषित करने में लगे हैं। यानी किसी गुजराती का देश का प्रधानमंत्री बनना।
इसी गुजराती अस्मिता को राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ पेश किया है। वो कहते रहे हैं कि सरदार पटेल के साथ अन्याय हुआ क्योंकि भारत के स्वतंत्र होने के बाद सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनना था। लेकिन उनकी जगह जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनवाया गया। मोरारजी देसाई ज़रूर ऐसे गुजराती थे जो दो साल तक प्रधानमंत्री रहे। लेकिन जनता पार्टी के अंदरूनी मतभेदों के चलते उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं मिला।
2007 के गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त बीजेपी ने आनन-फानन में लाल कृष्ण आडवाणी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। इस दलील के साथ कि लोक सभा में गुजरात का प्रतिनिधित्व करने वाले एक नेता को पीएम उम्मीदवार घोषित करने से विधानसभा चुनाव में बीजेपी को फायदा होगा। हालांकि कुछ पार्टी नेता दबी जुबान में कहते हैं कि असली मकसद ये था कि कहीं 2007 के चुनाव में जीतने के बाद नरेंद्र मोदी पीएम पद के दावेदार न हो जाएं। इसके बावजूद 2009 के लोक सभा चुनाव में गुजरात में बीजेपी 26 में से सिर्फ 15 सीटें ही जीत पाई थी।
2012 के विधानसभा चुनाव के प्रदर्शन के हिसाब से बीजेपी 22 लोक सभा सीटें जीतने की स्थिति में है। थोड़ा और ज़ोर लगाने से बीजेपी पाटन, दाहोद और बनासकांठा सीटें भी जीत कर ये आंकड़ा 25 तक पहुँचा सकती है। पार्टी इन्हीं कोशिशों में लगी है। मोदी से बगावत कर अलग पार्टी बनाने वाले केशूभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी का बीजेपी में विलय हो गया है। सोमवार को ही दो और कांग्रेसी विधायक ने विधानसभा से इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया। पिछले एक साल में सात कांग्रेस विधायक और एक सांसद बीजेपी में शामिल हो चुके हैं।
व्यक्तिगत तौर पर नरेंद्र मोदी के लिए ये जरूरी है कि बीजेपी गुजरात में अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करे। वो खुद भी गुजरात से ही लोक सभा का चुनाव लड़ने जा रहे हैं। संभावना है कि वो अहमदाबाद पूर्व या फिर वडोदरा से लोक सभा का चुनाव लड़ें। ज़ाहिर है मोदी के लिए मिशन 272+ की ही तरह गुजरात का मिशन 26 भी बेहद महत्वपूर्ण है।





गठबंधन की तलाश में जुटी बीजेपी



‘’बीजेपी मज़बूत होगी तो सहयोगी पार्टियां खुद ब खुद चली आएंगी।‘’ ये कहना था बीजेपी के शीर्ष रणनीतिकारों का। लेकिन चुनाव नजदीक आते ही पार्टी ने कई राज्यों में छोटे-छोटे गठबंधन करना शुरू कर दिया है। इन चुनाव पूर्व गठबंधनों की खास बात ये है कि बीजेपी मिल कर चुनाव लड़ना चाहती है। इन सहयोगी पार्टियों के साथ सीटों का बंटवारा करने में उसे दिक्कत नहीं है।

बीजेपी ने बिहार में रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के साथ सीटों के तालमेल की बात शुरू की है। पासवान की लाल प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ बात चल रही थी। लेकिन सीटों की संख्या और पसंद को लेकर बात अभी तक नहीं बन पाई है। इस बीच पासवान ने बीजेपी के साथ भी चर्चा शुरू की और बीजेपी ने पासवान को लेकर उत्साह दिखाया है। पासवान के साथ आने से नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत तौर पर भी फायदा होगा क्योंकि गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने वाले पासवान सबसे पहले मंत्री थे। राज्य में उनके करीब सात-आठ फीसदी वोट हैं।

असम में बीजेपी एक बार फिर असम गण परिषद के साथ चुनावी गठबंधन करना चाह रही है। पिछले लोक सभा चुनाव में इसी गठबंधन के चलते बीजेपी ने राज्य में चार सीटें जीती थीं। लेकिन एजीपी को सिर्फ एक सीट मिली थी। एजीपी को लगता है कि उसके वोट तो बीजेपी को ट्रांसफर हो जाते हैं मगर बीजेपी के वोट उसे नहीं मिल पाते। इसलिए वो तालमेल के लिए इच्छुक नहीं है। लेकिन बीजेपी का कहना है कि हाल में असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में नरेंद्र मोदी की रैलियों में जुटी भारी भीड़ बताती है कि वहां के लोग मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। इसीलिए एजीपी और बीजेपी साथ आ सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी कुछ छोटी-छोटी पार्टियों से तालमेल कर सकती है। महाराष्ट्र में शिवसेना, आरपीआई अठवले और स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के साथ महागठबंधन बन चुका है।

कोशिश है कांग्रेस विरोधी वोटों के बंटवारे को रोकने की। और पूरे देश में ये संदेश देने की भी कि मोदी को नेता घोषित करने के बावजूद बीजेपी खुद को सेक्यूलर कहने वाली कई पार्टियों के लिए अछूत नहीं है।



Thursday, January 09, 2014

पत्रकार या नेता?

नेता और पत्रकार का रिश्ता। राजनीति और पत्रकारिता का रिश्ता। जैसे फेवीकोल का मज़बूत जोड़। आसानी से टूटने वाला नहीं। 

स्वतंत्रता के आंदोलन में अख़बार निकालने वाले महापुरुष स्वाभाविक रूप से समाज में सक्रिय हुए और राजनीतिक दलों के साथ जुड़ कर देश सेवा करते रहे। आज़ादी के कुछ साल बाद तक राजनीति देश निर्माण का माध्यम रही और बड़े पत्रकार भी इससे जुड़ते रहे। 

लेकिन धीरे-धीरे समाज के साथ-साथ राजनीति में तमाम बुराइयाँ आती गईं और पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं रही। अब राजनीति व्यवसाय है और पत्रकारिता भी। पत्रकार अब भी राजनीति में आ रहे हैं। और आगे भी आते रहेंगे। 

Sunday, January 05, 2014

कैसे बना हमारा संविधान?

संविधान सभा की बैठक

हमारा संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है. ये रातों-रात नहीं बन गया. इसके लिए देश को आजादी दिलाने वाले बड़े-बड़े धुरंधरों ने करीब तीन साल तक कड़ी मेहनत की.

सन् 1946. ये तय हो चुका था कि अंग्रेज़ बोरिया-बिस्तर उठा कर जाने वाले हैं.

अंग्रेजों के कैबिनेट मिशन और भारतीय नेताओं के बीच कई दौर की बातचीत के बाद तय हुआ कि संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का गठन होगा.

प्रांतीय विधानसभाओं को संविधान सभा के सदस्यों को चुनने का अधिकार दिया गया. सामान्य सीटों पर कांग्रेस के सदस्यों ने भारी जीत हासिल की जबकि मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटें मुस्लिम लीग ने जीत लीं.

राजे-रजवाड़ों को भी अपने नुमाइंदे भेजने को कहा गया.

संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को दिल्ली में हुई.

लेकिन छह महीनों बाद सिंध, पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, बलूचिस्तान और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर राज्यों ने पाकिस्तान के लिए अपनी अलग संविधान सभा बना डाली.

इस तरह भारत की संविधान सभा में 271 सदस्य थे. मुस्लिम लीग के 28 सदस्य भी इसमें शामिल हुए और राजे-रजवाड़ों के 93 सदस्यों को नामांकित किया गया.

15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ. संविधान सभा देश की पहली संसद बनी.

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद इसके अध्यक्ष बने और बी एन राव संवैधानिक सलाहकार.

संविधान सभा ने दो साल 11 महीनों और 17 दिनों में 105 बैठकों में संविधान बनाया.

सभा ने 18 समितियाँ बनाईं जिन्होंने संविधान की अलग-अलग धाराओं पर काम किया.

फरवरी 1948 में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष चुना गया.

इसी कारण उन्हें संविधान का निर्माता कहा जाता है. ये बात अलग है कि संविधान को अमली-जामा पहनाने में बी एन राव की सबसे बड़ी भूमिका रही.

साथ ही, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, सी राजगोपालचारी, शरतचंद्र बोस, मौलाना आज़ाद, एस के सिन्हा, रफी अहमद किदवई, श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे कई बड़े नेताओं ने आपसी मतभेदों को ताक पर रख कर काम किया.

ये कांग्रेस की दूरदर्शी सोच थी कि संविधान सभा में बहुमत होने के बावजूद कई विरोधी दलों के नेताओं को शामिल किया.

26 नवंबर 1949 को संविधान को अंतिम रूप दिया गया. उस दिन संसद भवन के बाहर बारिश हो रही थी. इसे शुभ संकेत माना गया.

संविधान को 26 जनवरी 1950 को सुबह दस बजकर 18 मिनट पर लागू किया गया. उसके बाद संविधान सभा अस्थाई संसद बन गई और 1952 में संविधान के तहत चुनाव करा कर पहली संसद बनाई गई.

26 जनवरी का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि इसी दिन 1930 में कांग्रेस ने भारत के लिए पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी और इसे आज़ादी के दिन के रूप में मनाना शुरू कर दिया.

ये बात अलग है कि देश को आज़ाद करने का दिन यानी 15 अगस्त अंग्रेजों ने चुना लेकिन आज़ाद भारत ने यही ठीक समझा कि अपना संविधान अपने आज़ादी के दिन ही लागू किया जाए.





Wednesday, January 01, 2014

प्रकाश स्तंभ है हमारा संविधान

डॉक्टर बी आर अंबेडकर, संविधान के वास्तुकार


भारत के संविधान के 65 साल पूरे होने जा रहे हैं। इन वर्षों में भारत की सबसे बड़ी कामयाबी यही रही है कि इस संविधान के चलते उसने स्वयं को प्रजातांत्रिक मुल्क बना कर रखा है। आखिर क्या है इस संविधान की खास बातें।

 प्रजातंत्र अगर भारत का धर्म है तो संविधान उसका ग्रंथ। ये भारत के सारे नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है। जाति, वर्ग, धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं हो सकता। हर व्यक्ति को मौलिक अधिकार हासिल हैं। 

सबको सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, अपनी बात रखने का अधिकार, धर्म और उपासना की आज़ादी और प्रतिष्ठा और अवसर में समानता। यानी सब बराबर और समान।

पिछले साठ साल में भारत में प्रजातंत्र ने कई उतार-चढ़ाव देखे. लेकिन भारत अगर मज़ूबत प्रजातांत्रिक देश बना रहा है तो उसके पीछे हमारा लिखित संविधान ही है।

इस संविधान के तीन प्रमुख खंभे हैं- 
1. विधायिका. यानी संसद और विधानसभाएं। इनका काम है कानून बनाना। ये ज़रूरत पड़ने पर संविधान में संशोधन भी कर सकती हैं।
2.   न्यायपालिका यानी अदालतें। ये कानून के अनुसार न्याय करती हैं। मौलिक अधिकारों की रक्षा का काम इनके हवाले है।
3. कार्यपालिका यानी नौकरशाही। ये सरकारी अफसर जो कद, ओहदों और ज़िम्मेदारियों में अलग-अलग होते हैं, संविधान के मुताबिक सरकार चलाते हैं।

कहने को मीडिया को चौथा खंभा कहा जाता है। लेकिन संविधान में उसे अलग से अधिकार हासिल नहीं है। सिर्फ़ बोलने और विचारों की आजादी से ही मीडिया की आजादी को जोड़ा जाता है।

हमारे संविधान की कई खासियतें हैं जैसे

-हर व्यक्ति को वोट देने का अधिकार है।
- उसे संसदीय प्रणाली के तहत अपनी पसंद के नुमाइंदे और सरकार को चुनने की आज़ादी है।
- संघीय ढांचा देश की एकता और अखंडता की गारंटी देता है।
- केंद्र और राज्यों के रिश्तों को साफ़ कर दोनों को साथ-साथ बढ़ने के अधिकार दिए गए हैं।
-अदालतें आज़ाद हैं।
-राजा-महाराजाओं का नहीं, कानून का राज होगा।
-भारत मज़हबी मुल्क नहीं बल्कि पंथनिरपेक्ष रहेगा।
  
पिछले साठ साल में इस संविधान में कई बार बदलाव किए गए हैं।

- संविधान में संशोधन का अधिकार भी संविधान ने ही दिया है।
- अब तक 95 संशोधन हो चुके हैं।
- संविधान को लागू करने के एक साल के भीतर ही यानी 1951 में पहली बार संशोधन किया गया।
- बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे साफ करते हुए कहा कि बुनियादी ढांचे से छेड़-छाड़ किए बगैर संशोधन किया जाना चाहिए।
- बार-बार संविधान में संशोधन से तंग आकर दस साल पहले संविधान समीक्षा आयोग ही बना दिया गया था लेकिन उसकी सिफारिशें लागू नहीं की जा सकी हैं।

भारत आज विकसित देश होने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। हालांकि, आज भी गरीबी, अशिक्षा, असमानता, सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, जंगलराज जैसी समस्यायें हैं। फिर भी, बहुत लोगों को लगता है कि इस अंधेरे से निकलने में हमारा संविधान लाइट हाऊस की तरह दिशा दिखाने का काम करता रहेगा।




बिजली के फैसले पर भी सवाल

दिल्ली में सरकार बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने अपने एक और बड़े वादे को पूरा करने का दावा किया है। आप सरकार ने कल घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली दरों में पचास फीसदी कटौती करने का निर्णय किया।

लेकिन पानी की ही तरह बिजली के इस लोक लुभावन फैसले में भी बड़ा झोल है। 

आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र में लिखा गया है कि सरकार बनने के बाद चार महीनों के भीतर आम लोगों के बिजली के बिल आधे हों, इसके लिए तीन बड़े कदम उठाए जाएंगे। ये कदम बताए गए हैं- 

1. बिजली कंपनियों का तीन महीनों के भीतर ऑडिट पूरा करना।
2. बिजली के बिल ठीक कराना। इसके लिए एक महीने के भीतर पूरी दिल्ली में अभियान चलाना
3. बिजली के मीटरों की किसी निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराना। अगर मीटर तेज़ चलते पाए गए तो उस कंपनी के खिलाफ कार्रवाई करना।

लेकिन बजाए इन नीतिगत फैसलों को लागू करने के, आम आदमी पार्टी की सरकार ने शार्टकर्ट चुना। ताबड़तोड़ फैसलों करने के दबाव में आप सरकार ने वही कदम उठाए जो ऐसी पार्टियों की सरकारें उठाती हैं, जिन्हें वो भ्रष्ट कहती है। यानी सरकारी खजाने पर बोझ डाल कर सब्सिडी के ज़रिए बिजली के बिलों में कटौती।

गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र में कहीं नहीं लिखा गया है कि सब्सिडी के जरिए बिजली के बिलों में पचास फीसदी कटौती की जाएगी। लेकिन कुछ कर दिखाने की जल्दबाजी में आनन-फानन में सब्सिडी देने का एलान किया गया।

हर घर को सात सौ लीटर पानी हर रोज़ देने के वादे की तरह इस वादे को पूरा करने में कई कमियां साफ दिख रही हैं।

कल के फैसले के मुताबिक जिन घरों में दो सौ यूनिट खर्च होती है उन्हें प्रति यूनिट  2.70 रु के बजाए एक रुपए 95 पैसे देने होंगे। इस स्लैब में प्रति यूनिट दर 3.90 रु है मगर शीला दीक्षित सरकार ने पहले ही 1.20 रु की सब्सिडी दे रखी थी। यानी केजरीवाल सरकार ने अपनी ओर से पचहत्तर पैसे सब्सिडी बढ़ा दी है।

इसी तरह  200 से 400 यूनिट खपत करने वाले घरों को 5 रु प्रति यूनिट के बजाए 3.90 रु प्रति यूनिट देना होगा। इस स्लैब में प्रति यूनिट दर 5.80 रु है मगर शीला दीक्षित सरकार ने पहले ही 80 पैसे की सब्सिडी दे रखी थी। यानी केजरीवाल सरकार ने अपनी ओर से एक रुपए दस पैसे की सब्सिडी दी है।

अब सवाल ये है कि इससे फायदा किसे हुआ? जिन बिजली कंपनियों के खिलाफ मुहिम चला कर, मीटरों के कनेक्शन काट कर केजरीवाल जनता की आँखों के तारे बने, उनकी सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। क्योंकि सब्सिडी का पूरा बोझ सरकार के खजाने यानी करदाताओं की जेब से जाएगा। बिजली कंपनियों के ऑडिट के लिए सीएजी तैयार है मगर ये तब तक नहीं होगा जब तक उपराज्यपाल या राष्ट्रपति की ओर से सिफारिश नहीं की जाती।

केजरीवाल पर कम समय में ज्यादा करने का दबाव है। मगर इसके लिए उन्हें ईमानदारी और पारदर्शिता से कदम उठाने चाहिएं। उन्हें ये याद रखना चाहिए कि उनके फैसलों की आज चाहे मीडिया का एक बड़ा वर्ग उनकी पार्टी की जीत से सम्मोहित हो कर वाह-वाही कर रहा हो, मगर धीरे-धीरे ही सही, जब मीडिया के इस हिस्से की आँखों से पर्दा हटेगा, आप सरकार के फैसलों को भी कसौटी पर कसा जाएगा। और उन्हें आज नहीं तो कल आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा। बेहतर होगा वो इसकी आदत अभी से डाल लें। क्योंकि उनकी पार्टी को बहुत लंबा सफर तय करना है। अभी तो शुरुआत है।


Tuesday, December 31, 2013

मुफ़्त पानी पर उठे सवाल

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने चुनाव से पहले किए अपने वादे के मुताबिक मुफ्त पानी देने का फैसला कर दिया। अब जल्दी ही बिजली के बिलों में पचास फीसदी कटौती करने के अपने दूसरे वादे को भी पूरा करने जा रहे हैं। 

मैंने फेसबुक और ट्विटर पर पहले वादे यानी हर घर को सात सौ लीटर पानी देने के फैसले पर कुछ सवाल उठाए। ज़ाहिर है आम आदमी पार्टी के प्रति सहानुभूति रखने वाले कुछ लोगों को ये पसंद नहीं आया। 

मैंने आम आदमी पार्टी की वेबसाइट पर जाकर दिल्ली विधानसभा के लिए उसके संकल्प पत्र को भी खंगाला। इसमें कहा गया है कि "सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वह सात सौ लीटर प्रतिदिन तक पानी इस्तेमाल करने वाले जलमित्र परिवारों को पानी मुफ्त उपलब्ध कराएगी। जो परिवार इससे ज्यादा पानी इस्तेमाल करेगा उससे पूरा बिल लिया जाएगा। हर रोज़ एक हजार लीटर से ज्यादा पानी का इस्तेमाल करने वाले परिवारों पर महंगी दरें लागू की जाएंगी।"

अंग्रेजी में कहा जाता है कि "The Devil is in the Detail". आम आदमी से ये अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वो राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों के एक-एक बिंदुओं को पढ़ कर मत देने के बारे में निर्णय करें। बल्कि अधिकांश लोग अपना फैसला इस आधार पर भी तय करते हैं कि उनके बीच आकर नेता क्या वादा करते हैं।

दिल्ली में करीब बीस लाख परिवार ऐसे हैं जो अनधिकृत कालोनियों और झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहते हैं। मोटे तौर पर ये दिल्ली की करीब आधी आबादी है। इन इलाकों में पानी की सप्लाई के लिए पाइप लाइनें नहीं हैं। अधिकांश इलाकों में टैंकरों से पानी की सप्लाई होती है। और ये अपने पानी के लिए टैंकर माफिया पर निर्भर हैं। 

दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को इन इलाकों से भारी समर्थन मिला। पारंपरिक रूप से कांग्रेस के समर्थक माने जाने वाले इन इलाकों ने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को नहीं देखा बल्कि उसके चुनाव चिन्ह झाड़ू पर मुहर लगाई। इसके पीछे एक बड़ी वजह ये उम्मीद भी थी कि दिल्ली में अगर आप की सरकार बनी तो उन्हें सात सौ लीटर पानी हर रोज मुफ्त मिलेगा।

माना जा रहा है कि कल के फैसले का फायदा सिर्फ दस लाख परिवारों को ही होगा। जिन घरों में पानी के मीटर चालू हालत में उन्हें इसका फायदा मिलेगा। यानी ऐसे घर जहां पानी की मीटर तो लगे हैं मगर चालू हालत में नहीं हैं, वो इसका फायदा नहीं उठा पाएंगे। उनके लिए जरूरी है कि वो मीटरों को चालू करवाएं। साथ ही, अगर इस योजना का फायदा लेना है तो घरों में मीटर लगवाने होंगे। पर उसके लिए जरूरी है कि उन मोहल्लों में पाइप लाइनें बिछी हों और दिल्ली के बड़े हिस्से में ऐसा नहीं है।

इसमें भी अगर नई दिल्ली नगर पालिका और दिल्ली कैंट में रहने वाले परिवारों को हटा दें तो ये संख्या और कम हो जाएगी। हाउसिंग सोसाइटियों में रहने वाले परिवारों को भी इसका फायदा नहीं मिलेगा। 

उस पर तुर्रा ये कि यही परिवार अगर महीने में बीस हज़ार लीटर से ऊपर खर्च करने पर इन्हें न सिर्फ पूरे पानी का पैसा चुकाना पड़ेगा बल्कि दस फीसदी बढ़ी दर के हिसाब से भी पैसा देना होगा। 

तो ऐसे में सवाल उठता है कि मुफ्त पानी के फैसले से आखिर फायदा किसे मिला? 

Wednesday, April 17, 2013


Mobile journalism: the future is here

For Thomson Foundation alumnus Akhilesh Sharma a smartphone is indispensable. Ahead of this year’s summer course which covers smartphone reporting, he explains how he uses mobile technology in his work as a television journalist in India.
For a journalist, a smartphone is not a luxury but necessity. I recall earlier days of mobile telephony in India. In the early 1990s I was given a Nokia handset, which looked like a brick and must have weighed around 400g.
I used to cover local courts then and I remember that before the advent of the mobile phone, I used to rush out of the courtroom to look for a landline to contact the office about breaking news.

Call costs

At that time in India, mobile services were very costly: an outgoing call was about 18INR (US$0.33) per minute and incoming calls was half of that. So my seniors told me that I couldn’t use the phone unless the news was really big. But gone are those days. In India today the mobile call rates possibly lowest in the world.
My life with the smartphone began with a Blackberry. Initially it was mainly to access the office email. I used to send updates and file my stories. Then came Blackberry messenger, but the app world was still unknown to us.
There were some legal issues between Blackberry and the government of India, mainly over the access to the server. In the meanwhile, I was given an iPhone by the office and I completely forgot I had ever used a Blackberry.
My journalistic world now revolves around the iPhone. I use it to send emails and write my stories in Hindi.
Apps on the iPhone are a great help. I have dictionary and apps like Qik allow me to record video and send it to the office. It can be used to do live reporting too.
The iPhone camera is excellent. A colleague of mine recorded a small interview with the Prime Minister inside the Parliament on iPhone - normal TV cameras are not allowed in certain locations but mobile phones are - and sent it to the office. It was our exclusive and a scoop!

Social media

Social media apps like Facebook, Twitter and You Tube are an essential part of my reporting kit. Being a political reporter, it helps me a lot because many politicians these days are using social media to keep in touch.
Also, I have the apps of local broadcasters and newspapers that alert me with breaking news as and when it happens.
Apps like Google maps have made my navigation much easier. Then, there is voice recorder. On many occasions I have recorded my voiceover on it and mailed it to the office. The sound quality is excellent.
Smartphones like the iPhone come with in-built memory of 16GB and more. So one should not worry too much about the number of contacts or the video or photographs stored in the phone. Another thing is that contacts are synchronised with your mailbox. So if you were to lose the phone, your contacts are safe.
And, of course, there is Angry Birds and Temple Run. But, these two apps mean that as soon as I reach home, my kids take away the phone from me and the fight starts between them to capture it. So much for the smartphone!
Akhilesh Sharma is a senior political editor with NDTV India, a 24 hour Hindi news channel. A graduate of the Thomson Foundation’s 2000 summer course, he has spent the past 19 years working at various national and international news organisations including the BBC in London.