Wednesday, 1 January 2014

बिजली के फैसले पर भी सवाल

दिल्ली में सरकार बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने अपने एक और बड़े वादे को पूरा करने का दावा किया है। आप सरकार ने कल घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली दरों में पचास फीसदी कटौती करने का निर्णय किया।

लेकिन पानी की ही तरह बिजली के इस लोक लुभावन फैसले में भी बड़ा झोल है। 

आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र में लिखा गया है कि सरकार बनने के बाद चार महीनों के भीतर आम लोगों के बिजली के बिल आधे हों, इसके लिए तीन बड़े कदम उठाए जाएंगे। ये कदम बताए गए हैं- 

1. बिजली कंपनियों का तीन महीनों के भीतर ऑडिट पूरा करना।
2. बिजली के बिल ठीक कराना। इसके लिए एक महीने के भीतर पूरी दिल्ली में अभियान चलाना
3. बिजली के मीटरों की किसी निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराना। अगर मीटर तेज़ चलते पाए गए तो उस कंपनी के खिलाफ कार्रवाई करना।

लेकिन बजाए इन नीतिगत फैसलों को लागू करने के, आम आदमी पार्टी की सरकार ने शार्टकर्ट चुना। ताबड़तोड़ फैसलों करने के दबाव में आप सरकार ने वही कदम उठाए जो ऐसी पार्टियों की सरकारें उठाती हैं, जिन्हें वो भ्रष्ट कहती है। यानी सरकारी खजाने पर बोझ डाल कर सब्सिडी के ज़रिए बिजली के बिलों में कटौती।

गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र में कहीं नहीं लिखा गया है कि सब्सिडी के जरिए बिजली के बिलों में पचास फीसदी कटौती की जाएगी। लेकिन कुछ कर दिखाने की जल्दबाजी में आनन-फानन में सब्सिडी देने का एलान किया गया।

हर घर को सात सौ लीटर पानी हर रोज़ देने के वादे की तरह इस वादे को पूरा करने में कई कमियां साफ दिख रही हैं।

कल के फैसले के मुताबिक जिन घरों में दो सौ यूनिट खर्च होती है उन्हें प्रति यूनिट  2.70 रु के बजाए एक रुपए 95 पैसे देने होंगे। इस स्लैब में प्रति यूनिट दर 3.90 रु है मगर शीला दीक्षित सरकार ने पहले ही 1.20 रु की सब्सिडी दे रखी थी। यानी केजरीवाल सरकार ने अपनी ओर से पचहत्तर पैसे सब्सिडी बढ़ा दी है।

इसी तरह  200 से 400 यूनिट खपत करने वाले घरों को 5 रु प्रति यूनिट के बजाए 3.90 रु प्रति यूनिट देना होगा। इस स्लैब में प्रति यूनिट दर 5.80 रु है मगर शीला दीक्षित सरकार ने पहले ही 80 पैसे की सब्सिडी दे रखी थी। यानी केजरीवाल सरकार ने अपनी ओर से एक रुपए दस पैसे की सब्सिडी दी है।

अब सवाल ये है कि इससे फायदा किसे हुआ? जिन बिजली कंपनियों के खिलाफ मुहिम चला कर, मीटरों के कनेक्शन काट कर केजरीवाल जनता की आँखों के तारे बने, उनकी सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। क्योंकि सब्सिडी का पूरा बोझ सरकार के खजाने यानी करदाताओं की जेब से जाएगा। बिजली कंपनियों के ऑडिट के लिए सीएजी तैयार है मगर ये तब तक नहीं होगा जब तक उपराज्यपाल या राष्ट्रपति की ओर से सिफारिश नहीं की जाती।

केजरीवाल पर कम समय में ज्यादा करने का दबाव है। मगर इसके लिए उन्हें ईमानदारी और पारदर्शिता से कदम उठाने चाहिएं। उन्हें ये याद रखना चाहिए कि उनके फैसलों की आज चाहे मीडिया का एक बड़ा वर्ग उनकी पार्टी की जीत से सम्मोहित हो कर वाह-वाही कर रहा हो, मगर धीरे-धीरे ही सही, जब मीडिया के इस हिस्से की आँखों से पर्दा हटेगा, आप सरकार के फैसलों को भी कसौटी पर कसा जाएगा। और उन्हें आज नहीं तो कल आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा। बेहतर होगा वो इसकी आदत अभी से डाल लें। क्योंकि उनकी पार्टी को बहुत लंबा सफर तय करना है। अभी तो शुरुआत है।