Monday, March 24, 2014

अमित शाह की अग्निपरीक्षा


बात तब की है जब नितिन गडकरी बीजेपी अध्यक्ष थे और उनका फिर अध्यक्ष बनना करीब-करीब तय था। पार्टी महासचिव रविशंकर प्रसाद को एस एस अहलूवालिया के बाद राज्य सभा उपनेता बना दिया गया था। एक व्यक्ति-एक पद सिद्धांत के आधार पर उन्होंने महासचिव पद छोड़ा और गडकरी की टीम में उनकी जगह नए महासचिव के आने के कयास लगने लगे। बहुत कुरेदने पर पता चला कि गडकरी की टीम में आने वाले नए महासचिव होंगे अमित शाह।

हालांकि तब ऐसा नहीं हो पाया। जनवरी 2013 में गडकरी फिर अध्यक्ष नहीं बन सके। राजनाथ सिंह ने पार्टी की कमान संभाली। अमित शाह को महासचिव बनाया गया और उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई। इसी के साथ तय हो गया था कि नरेंद्र मोदी न सिर्फ बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, बल्कि उत्तर प्रदेश से भी चुनाव लड़ेंगे।

बीजेपी के लिए पंद्रह साल से बंजर पड़ी उत्तर प्रदेश की धरती पर कमल खिलाना आसान काम नहीं है। खासतौर से ऐसे व्यक्ति के लिए तो नहीं जिसने गुजरात के बाहर काम न किया हो। गुजरात के पिछले तीन विधानसभा चुनावों में अमित शाह ने बतौर रणनीतिकार अपनी छाप छोड़ी है। राज्य में उम्मीदवारों के चयन से लेकर मुद्दे तय करने तक सब में शाह की बड़ी भूमिका रही है। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक जब उन्हें गुजरात से दूर रहने को कहा गया तो उन्होंने उसका इस्तेमाल दिल्ली में रह कर मोदी के लिए जमीन तैयार करने में किया।

अमित शाह पिछले दस महीनों से उत्तर प्रदेश में लगे हुए हैं। आज जनमत सर्वेक्षणों में भविष्यवाणी की जा रही है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी कम से कम चालीस सीटें जीत सकती है। ऐसा होता है या नहीं, ये कह पाना अभी मुश्किल है लेकिन ये तय है कि अमित शाह के उत्तर प्रदेश में जाने के बाद वहाँ नरेंद्र मोदी के पक्ष में अलग तरह का माहौल बनना ज़रूर शुरू हुआ है।

यूपी का प्रभारी बनने के बाद अमित शाह ने राज्य का दौरा शुरु किया। वो सभी 62 जिलों में जा चुके हैं। इन दौरों में शाह ने कार्यकर्ताओं और नेताओं से व्यक्तिगत तौर पर मिलना शुरू किया। शाह रात को किसी होटल या गेस्ट हाऊस में रुकने के बजाए कार्यकर्ताओं के घरों में ही रुकते थे। इस तरह उन्होंने जमीनी स्तर पर संवाद कायम किया। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की टीम खड़ी की। नेताओं-कार्यकर्ताओं को नसीहत दी कि मोदी के नाम को घर-घर तक पहुँचाएं। वो ये कहते रहे कि चुनाव मोदी के नाम पर ही लड़ा जाएगा। मोदी की रैलियों को कामयाब बनाने के लिए सबको साथ लिया। नतीजा ये रहा कि उत्तर प्रदेश में मोदी की हर रैली पिछली रैली से बड़ी हुई।

लेकिन उम्मीदवारों के चयन में देरी और कुछ उम्मीदवारों के गलत चयन के कारण शाह के फैसलों पर सवाल उठने लगे हैं। जगदंबिका पाल को कांग्रेस से लाकर डुमरियागंज से, एस पी सिंह बघेल को बीएसपी से लाकर फिरोजाबाद से और धर्मेंद्र कुशवाहा को समाजवादी पार्टी से लाकर आंवला से टिकट देना, स्थानीय कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रहा है। बिजनौर में ऐन वक्त पर उम्मीदवार बदलना पड़ा है। कई सीटों पर उम्मीदवारों के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं और कई बड़े नेताओं ने मुंह फुला लिया है। ये भी कहा गया है कि टिकट बंटवारे में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के आगे अमित शाह की नहीं चल सकी।

लेकिन शाह के करीबियों का कहना है कि टिकट बांटने में जानबूझकर देरी की गई ताकि ज्यादा असंतोष न भड़के। राज्य में लंबे समय बाद बीजेपी के पक्ष में माहौल बना है और कई नेता चाहते हैं कि उन्हें चुनाव लड़ने का मौका मिले। अमित शाह कहते हैं कि सपा-बसपा कई साल पहले अपने उम्मीदवार घोषित कर देते हैं। लेकिन ऐन वक्त पर बदल भी देते हैं। बीजेपी और कांग्रेस ऐसा नहीं कर सकते, इसलिए टिकटों में देरी स्वाभाविक है। बाहर से उम्मीदवार लाने के सवाल पर अमित शाह कहते हैं कि ये संख्या ज्यादा नहीं है। और ऐसे ही लोगों को प्राथमिकता दी गई है जो विवादित नहीं हैं और अपनी सीटों पर जीत सकते हैं।

नरेंद्र मोदी को बनारस से चुनाव मैदान में उतारना अमित शाह का सबसे बड़ा दांव है। पूर्वांचल में पस्त पड़ी बीजेपी को इससे नई जान मिलने की संभावना है। इलाके की 27 सीटों पर बीजेपी की नजरें हैं। पार्टी की कोशिश मोदी की उम्मीदवारी से बिहार तक फायदा उठाने की है। बनारस से मोदी को लड़ाना हिंदुत्व के समर्थकों को संदेश देना भी है। मोदी ने अपनी रैलियों में एक बार भी राम मंदिर का जिक्र नहीं किया है। अमित शाह जरूर अयोध्या गये और वहां राम मंदिर निर्माण की बात कही। पर उसके बाद से उन्होंने एक बार भी राम मंदिर की बात नहीं की।


मोदी के लिए व्यक्तिगत तौर पर उत्तर प्रदेश बेहद महत्वपूर्ण है। वो जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना तभी पूरा हो सकता है जब यूपी से पार्टी को नब्बे के दशक जैसी कामयाबी मिले। इसीलिए उन्होंने अपने बेहद करीबी अमित शाह को राज्य की जिम्मेदार दी है। अगर यहां कामयाबी मिलती है तो शाह भविष्य के लिए पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी संभालने के लिए अपनी जगह पक्की कर लेंगे।
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Sunday, March 23, 2014

‘असली बीजेपी, नकली बीजेपी’

76 साल की उम्र में बाड़मेर से चुनाव लड़ने के इच्छुक जसवंत सिंह अचानक बेहद भावुक हो गए। मीडिया से बात करते वक्त उनकी आँखें छलछला आईं। जसवंत सिंह कहने लगे कि अभी जो कुछ हो रहा है, वास्तव में यही अंतर है असली और नकली बीजेपी में। बीजेपी पर एक किस्म का अतिक्रमण हो गया है। तो ये अतिक्रमण क्यों होने दिया गया है। ये वैचारिक अतिक्रमण है। जसवंत सिंह ने ये बयान जयपुर पहुंच कर दिया। बाड़मेर से उन्हें बीजेपी का टिकट नहीं मिला है।

19 अगस्त 2009 को शिमला के एक पाँच सितारा होटल में भी जसवंत सिंह की आँखें इसी तरह भर आई थीं। उस दिन भी उन्होंने बीजेपी के बारे में कुछ इसी तरह की बातें की थीं। उस दिन उन्हें बीजेपी से निकाल दिया गया था। वजह ये थी कि उन्होंने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना पर लिखी किताब में देश के विभाजन के लिए जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल पर उंगुली उठाई थी।  

2009 की हार के बाद लाल कृष्ण आडवाणी के घर हुई बैठक में जसवंत सिंह ने हार के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की थी। उन्होंने परिणाम और पुरस्कार के बीच संबंध रखने का सुझाव दिया था। माना गया कि उनका इशारा अरुण जेटली की ओर था जो 2009 के प्रचार के प्रभारी थे मगर हार के बाद उन्हें राज्य सभा में विपक्ष का नेता बना दिया गया था।

सवाल ये उठता है कि जसवंत सिंह बीजेपी के बारे में सवाल तभी क्यों पूछते हैं जब चीजें उनके मन मुताबिक नहीं होतीं। 1996 और 1998 से लेकर 2004 तक जसवंत सिंह अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वाजपेयी, आडवाणी के बाद तीसरे नंबर पर रहे। तमाम बड़े फैसलों में उनकी बड़ी भूमिका रही। लेकिन सरकार पर पकड़ बना कर रखने वाले जसवंत सिंह 2004 में हार के बाद से पार्टी पर पकड़ नहीं बना पाए। अपने गृह राज्य राजस्थान में वसुंधरा राजे से उनका टकराव होने लगा। वाजपेयी के करीबी माने जाने वाले जसवंत आडवाणी के नजदीक हो गए। जिन्ना विवाद में उन्होंने आडवाणी का साथ दिया। संघ ने उन्हें कभी पसंद नहीं किया।

इस बार वसुंधरा ज्यादा ताकतवर होकर सामने आई हैं। राजस्थान में बीजेपी को ऐतिहासिक बहुमत मिला है। वसुंधरा पार्टी की उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जो नरेंद्र मोदी के समर्थन में सबसे पहले खुल कर आगे आए हैं। मध्य प्रदेश की तुलना में वसुंधरा ने राजस्थान चुनाव में मोदी से खूब प्रचार करवाया और जब जीतीं तो मोदी को श्रेय देने में कंजूसी भी नहीं बरती। लोक सभा चुनाव के लिए एक-एक सीट पर उम्मीदवार तय करने का एक ही पैमाना रखा- जीत। जब जसवंत सिंह की बात आई तो उन्हें बाड़मेर के बजाए जोधपुर से उम्मीदवार बनने का प्रस्ताव दिया। लेकिन जाहिर है कि जोधपुर राजघराने से रिश्तेदारी के चलते जसवंत वहां से नहीं खड़े हो सकते थे। जब पार्टी ने जसवंत को बाड़मेर से खड़ा करने पर जोर दिया तो उनकी ओर से साफ किया गया कि पार्टी सोच ले उसे राजस्थान में एक सीट चाहिए या चौबीस।

राजस्थान बीजेपी का मानना है कि जाट नेता कर्नल सोनाराम चौधरी को टिकट देना ज्यादा जरूरी है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट बीजेपी की ओर आने लगे थे। लेकिन यूपीए सरकार ने जैसे ही जाट आरक्षण की बात की है, उनका रुख एक बार फिर कांग्रेस और अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोक दल की तरफ होता दिख रहा है। एक ताकतवर जाट नेता को मैदान में उतारने से सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी संदेश जाता है। आरएसएस साफ कर चुका था कि उम्रदराज नेताओं की जगह नए खून को इस चुनाव में मौका दिया जाए। रही बात जसवंत सिंह की, तो उनके बेटे मानवेंद्र एक बार लोक सभा सांसद रह चुके हैं। अभी बाड़मेर जिले से ही पार्टी विधायक हैं। पार्टी नेता जसवंत सिंह को उनके साथी यशवंत सिन्हा की याद भी दिला रहे हैं जो इस बार अपने बेटे को झारखंड की हजारीबाग सीट से टिकट दिला कर चुनावी राजनीति से दूर हो गए हैं।


तो क्या इसीलिए जसवंत सिंह को अचानक असली बीजेपी और नकली बीजेपी नजर आने लगी है। पार्टी पर वैचारिक अतिक्रमण दिखने लगा है। उनके समर्थक अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के फोटो के बीच छपे नरेंद्र मोदी के फोटो को मिटाने लगे हैं। ऐन चुनावों के वक्त बगावती तेवर दिखाने के पीछे एक उम्मीद ये भी है कि बीजेपी के अंदरुनी झगड़ों के सामने आने से पार्टी के पक्ष में बना माहौल बिगड़े। बीजेपी में कुछ लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अगर जसवंत सिंह को बाड़मेर से टिकट मिल जाता तो क्या फिर भी वो असली-नकली बीजेपी की बात करते। शिमला चिंतन बैठक के समय जब उन्हें बीजेपी से निकाला गया और जब आडवाणी के कहने पर उनकी वापसी हुई, तब वो असली बीजेपी था या फिर नकली? और पार्टी पर हो रहे वैचारिक अतिक्रमण के बारे में उनका मुंह तभी क्यों खुला जब उनका टिकट कट गया?
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Saturday, March 22, 2014

झाड़ू यानी नोटा?


चुनावों में एक नया चलन शुरू हुआ है। नोटा का। यानी नन ऑफ द अबव (ऊपर दिए गए में से कोई नहीं) का। इलैक्ट्रानिंग वोटिंग मशीन यानी ईवीएम में सबसे नीचे नोटा का एक अलग बटन लगाया गया है। जो मतदाता किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहते हैं, वो ये बटन दबा सकते हैं।

इस वोट का चुनाव परिणामों पर कोई असर नहीं होता। यानी अगर किसी चुनाव में नोटा को सबसे ज़्यादा वोट मिल भी जाएं तो नोटा को नहीं बल्कि दूसरे नंबर पर आए उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाएगा। उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने के फार्मूले में भी इनकी गिनती नहीं होती है। तो सवाल ये है कि कोई मतदाता अपने घर से चिलचिलाती धूप में निकल कर मतदान केंद्र पर घंटों लंबी लाइन में लगने के बाद नोटा को वोट देकर क्यों आएगा? लेकिन कई लोग ऐसा कर रहे हैं।

हाल के विधानसभा चुनाव में पहली बार नोटा बटन का इस्तेमाल किया गया। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के साढ़े ग्यारह करोड़ मतदाताओं में से 15 लाख ने नोटा का बटन दबाया। यानी सिर्फ सवा फीसदी वोटरों ने। ये कोई बहुत बड़ी संख्या नहीं है। लेकिन माना जा रहा है कि दिल्ली में कांग्रेस से नाराज़ कई वोटरों ने नोटा का बटन दबा कर उसे नुकसान पहुँचाया। इसी तरह छत्तीसगढ़ के माओवादी प्रभावित इलाकों में लोगों ने बड़ी संख्या में नोटा का बटन दबा कर राजनीतिक पार्टियों के प्रति अपना अविश्वास व्यक्त किया।

नोटा का बटन दबाने वाले ज्यादातर लोग वो हैं जिनका मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास उठ चुका है। कांग्रेस हो या बीजेपी या फिर अन्य कोई प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक दल, ये लोग इन्हें अपना समर्थन नहीं देना चाहते। छत्तीसगढ़ में माओवादियों के असर वाले इलाकों में बड़ी संख्या में नोटा को डले वोट ये दिखाते हैं। दिल्ली में अगर आम आदमी पार्टी मैदान में नहीं होती, तो शायद यहां नोटा को ज़्यादा वोट मिले होते। यानी कांग्रेस और बीजेपी से नाराज ऐसे लोग जो नोटा का बटन दबाना चाहते थे, उन्होंने इसके बजाए झाड़ू को वोट देना बेहतर समझा।


तो क्या आम आदमी पार्टी एक ऐसे माध्यम के रूप में उभर रही है जिसके जरिए लोग अपना गुस्सा निकाल सकते हैं? सब चोर हैं, ये कहने वाले कई लोग समाज में हैं। व्यवस्था के प्रति गुस्सा रखने वाले लोग इस बात से नहीं हिचकिचाते कि उन्हें घर से चलकर मतदान केंद्रों में जा कर भी एक ऐसे बटन को दबाना है जिससे कुछ नहीं होने वाला। नकारात्मक मतदान देश या समाज को सही दिशा नहीं दे सकता। नोटा इसी का संकेत है। कई लोगों के लिए नोटा को वोट देना आम आदमी पार्टी को वोट देने जैसा ही गया है। जिससे कुछ बदलने वाला नहीं, मगर व्यवस्था के प्रति अपने गुस्से का ज़रूर इज़हार किया जा सकता है। 
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कहां गए हनुमान?


जसवंत सिंह और हरिन पाठक दोनों में एक समानता है। दोनों हनुमान कहे जाते हैं। जसवंत सिंह अटल बिहारी वाजपेयी के हनुमान तो हरिन पाठक लाल कृष्ण आडवाणी के हनुमान। एनडीए की छह साल की सरकार में हर संकट में वाजपेयी को जसवंत सिंह याद आते थे। इसी तरह, आडवाणी की गांधी नगर सीट के सारे काम पास की अहमदाबाद पूर्व सीट से सांसद हरिन पाठक करते थे। लेकिन इस लोक सभा चुनाव में जसवंत सिंह का टिकट कट चुका है और हरिन पाठक के सिर पर तलवार लटक रही है।

आडवाणी के रूठने के पीछे माना गया कि वो पार्टी पर पाठक के टिकट के लिए दबाव बना रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह ने आडवाणी से कहा कि वो गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ने के लिए मान जाएं। जहां तक पाठक के टिकट का सवाल है, पार्टी इस पर विचार करेगी। लेकिन नरेंद्र मोदी हरिन पाठक के टिकट के लिए तैयार नहीं हैं। 2009 के चुनाव में भी मोदी पाठक का टिकट काटने पर अड़ गए थे। तब भी आडवाणी की बेहद सख्ती के बाद ही उन्हें टिकट मिल पाया था।

लेकिन दूसरे हनुमान जसवंत सिंह के लिए पार्टी में इस तरह का दबाव डालने वाले नेता अब कोई नहीं है. यही वजह रही कि बगावत की धमकी देने के बावजूद बीजेपी ने बाड़मेर से हाल ही में कांग्रेस से आए कर्नल सोनाराम चौधरी को टिकट दे दिया। वसुंधरा ने इस बहाने एक तीर से दो निशाने साध लिए। एक तो राज्य की राजनीति में जसवंत के रूप में सत्ता का दूसरा केंद्र बनने से रोक दिया, दूसरा जाट वोटों को साथ लेने के लिए सोनाराम चौधरी के रूप में एक बड़ा संदेश दे दिया।

ये वही जसवंत सिंह हैं जिन्हें अपनी तेरह दिन की सरकार में शामिल करने के मुद्दे पर अटल बिहारी वाजपेयी आरएसएस के सामने आ गए थे। पोखरण में परमाणु परीक्षणों के बाद लगे आर्थिक प्रतिबंधों पर दुनिया भर में भारत का पक्ष रखने के लिए वाजपेयी ने उन्हें ही आगे किया था। संकट घरेलू मोर्चे पर हो या विदेशी मोर्चे पर, जसवंत सिंह ही आगे आया करते थे। कंधार में विमान अपहरण के बाद बंधक यात्रियों को छुड़वाने के बदले आतंकवादियों को अपने साथ विमान में ले जाने पर जसवंत सिंह की तीखी आलोचना हुई पर उन्होंने इसे सह लिया।

सरकार से हटने के बाद भी विवाद उनका पीछा करते रहे। अपनी दो पुस्तकों के ज़रिए उन्होंने बेहद तीखे विवाद खड़े कर दिए। उन्होंने कहा कि जब पी वी नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे तब प्रधानमंत्री कार्यालय में एक जासूस था जो अमेरिका को खुफिया जानकारियां देता था। बाद में वो इससे मुकर गए। जिन्ना पर लिखी दूसरी किताब में उन्होंने विभाजन के लिए सरदार पटेल की नीतियों को जिम्मेदार बता दिया। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में इस किताब पर पाबंदी लगा दी और बीजेपी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया।

हालांकि बाद में लाल कृष्ण आडवाणी के बीच-बचाव करने पर वो पार्टी में वापस आए। एनडीए ने उन्हें उपराष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार भी बनाया। उनके बेटे मानवेंद्र सिंह को विधानसभा का टिकट भी दिया और वो जीते। लेकिन एक बार फिर बीजेपी और जसवंत सिंह के रास्ते अलग-अलग होते दिख रहे हैं।

दरअसल, बीजेपी में अब कमान दूसरी पीढ़ी के हाथों में आ गई है। इस लोक सभा चुनाव में बंटे टिकट इस बात की पुष्टि कर रहे हैं। पार्टी में हो रहे अधिकांश फैसले नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी जैसे नेता मिल कर रहे हैं। आरएसएस इनमें बड़ी भूमिका निभा रहा है।

2004 में हार के बाद मुंबई में हुए पार्टी के राष्ट्रीय परिषद के अधिवेशन में अटल बिहारी वाजपेयी ने लाल कृष्ण आडवाणी और प्रमोद महाजन को आगे कर कहा था कि ये राम-लक्ष्मण हैं। तब तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष एम वेंकैया नायडू ने खुद को इनका हनुमान बताया था।  लेकिन बीजेपी में अब ये समय पुराने हनुमानों को भूल, नए हनुमान ढूंढने का है।
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Friday, March 21, 2014

बीजेपी के सागर में बनता टापू


आखिरकार आडवाणी मान गए। मानना ही था। कोई रूठता भी इसीलिए है ताकि उसे मनाया जाए और तभी वो माने। रूठने-मनाने का ये सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। लेकिन इस बार आडवाणी ने जो मोहरे इस्तेमाल किए, उससे आने वाले दिनों के लिए बीजेपी के संभावित अंदरूनी खतरों की झलक मिलने लगी है। मोदी के नेतृत्व को पार्टी के भीतर से मिल सकने वाली संभावित चुनौतियाँ।

आडवाणी का विदिशा के नजदीक की भोपाल सीट पर जाने की इच्छा प्रकट करना बहुत कुछ कह जाता है। विदिशा से सुषमा स्वराज पार्टी की प्रत्याशी हैं। नरेंद्र मोदी से उनका छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। गठबंधनों को लेकर सुषमा अपनी नाराजगी ट्विटर के माध्यम से सार्वजनिक कर चुकी हैं। मोदी की उम्मीदवारी घोषित होने से पहले आडवाणी के नेतृत्व की वो बार-बार चर्चा करती रहीं। गुजरात और मध्य प्रदेश की मिलती सीमाएं, विदिशा-भोपाल की नजदीकियां और आडवाणी-सुषमा की करीबियां। यहीं पर खड़े मिलते हैं सुषमा-आडवाणी के करीबी कर्नाटक के अनंत कुमार जो मध्य प्रदेश के स्थाई प्रभारी कहे जाते हैं। और इन सबके बीच हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान।

आडवाणी उन्हें मोदी के बराबर खड़ा करने की लगातार कोशिश करते रहे हैं। पहले ये दिखाने का प्रयास कि मोदी शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह की ही तरह बीजेपी के एक मुख्यमंत्री हैं। मोदी संसदीय बोर्ड में आने लगे तो आडवाणी ने जिद पकड़ ली कि चौहान को भी लाया जाए ताकि मोदी की तुलना चौहान से ही होती रहे और प्रधानमंत्री की दावेदारी के लिए मोदी का नाम न आए। लेकिन आरएसएस ने इन तमाम मंसूबों पर पानी फेर दिया।

एमपी में शानदार जीत दिलाने के बाद चौहान का कद पार्टी में ऊँचा हुआ है। वो स्वाभाविक रूप से पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी के लिए दावेदार बनते हैं। लेकिन हो कुछ अलग रहा है। चौहान के कंधे पर रख कर बंदूक चलाई जा रही है। मध्य प्रदेश को मोदी विरोध का गढ़ बनाने की कोशिश हो रही है। ऐसा संदेश दिया जा रहा है कि बीजेपी में मोदी का विरोध करने वालों को सिर्फ मध्य प्रदेश में ही शरण मिल सकती है। यानी मध्य प्रदेश को बीजेपी के समुद्र में मोदी विरोध का टापू बनाने की कोशिश हो रही है। जो शिवराज सिंह चौहान लोक सभा चुनाव में सभी 29 सीटें जीतने की बात कहते हैं, उनके बारे में ये प्रचारित किया जा रहा है कि उम्मीदवारों का चयन जानबूझकर इस तरह से किया गया कि पार्टी 15-16 से ज्यादा सीटें न जीत सके।

जाहिर है इससे नुकसान शिवराज सिंह चौहान का ही हो रहा है। पार्टी के भीतर उन्हें मोदी के सामने खड़ा करने की कोशिशें आगे चल कर उन्हें नुकसान पहुँचा सकती हैं। हालांकि खुद चौहान इन बातों को समझते हैं। विधानसभा चुनाव के दौरान वो बार-बार कहते रहे कि वो प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं और मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए काम करेंगे। इन सवालों से तंग आकर उन्होंने दिसंबर के बाद से कोई इंटरव्यू ही नहीं दिया है। उनके करीबी ये कहते हैं कि जब आडवाणी की ओर से ही ये संदेश आए कि वो भोपाल से लड़ना चाहते हैं तो फिर ऐसे में वो कैसे मना कर सकते थे। उनके करीबी पूछते हैं कि क्या बीजेपी का कोई ऐसा मुख्यमंत्री है जो आडवाणी के आग्रह को न माने?

इसके बावजूद संदेश यही जा रहा है कि चौहान मोदी विरोधियों के इशारों पर खेल रहे हैं। व्यक्तिगत तौर पर चौहान की महत्वाकांक्षाएं जोर नहीं मार रही हैं। वो जानते हैं कि उम्र उनके साथ है। उनके सामने चुनौती मध्य प्रदेश में अगले पाँच साल बेहतर काम कर दिखाना है ताकि आने वाले वक्त में वो मोदी के बाद पार्टी की कमान संभालने के लिए बेहतर ढंग से दावेदारी पेश कर सकें। संघ के स्तर पर ये बात मानी गई है कि शिवराज में नेतृत्व की बेहतर संभावनाएं हैं। संगठन में वो स्वाभाविक रूप से मोदी के बाद नंबर दो के रूप में उभर सकते हैं.

शिवराज को कुछ सबक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी सीखने होंगे। नीतीश कुमार भी बीजेपी में मोदी का विरोध करने वाले नेताओं के बहकावे में आ गए। उन्हें लगा कि उन्हें साथ लेकर वो मोदी को रोक सकेंगे। लेकिन हुआ इसका उल्टा। बीजेपी में मोदी विरोधी तो हाशिए पर गए ही, बिहार में बीजेपी से अलग होने के बाद नीतीश कुमार मुसीबत में फंसते दिख रहे हैं। तमाम जनमत सर्वेक्षणों में संभावना व्यक्त की जा रही है कि नीतीश कुमार की पार्टी लोक सभा चुनाव में तीसरे नंबर पर रहेगी जबकि बीजेपी पहले। अगर ऐसा होता है तो लोक सभा चुनाव के बाद उनकी सरकार पर भी संकट आ सकता है।


क्षेत्रीय क्षत्रपों के उभार के इस युग में इन क्षत्रपों को अपनी महत्वाकांक्षाओं को अपने राज्यों की जनता की आकांक्षाओं के सामने नहीं लाना चाहिए। इनमें टकराव राज्य के हितों में नहीं होता। ये वो दौर है जब राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कुछ क्षत्रप विपरीत विचारधारा के केंद्र से हाथ मिलाने में भी संकोच नहीं करते। जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस इसका उदाहरण है जो वाजपेयी मंत्रिमंडल में शामिल थी। फिर यहां तो परिवार की ही बात है।
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Thursday, March 20, 2014

आडवाणी: अथक रथी से अथक हठी तक

बीजेपी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर रूठे हैं। पिछले नौ महीनों में ऐसा तीसरी बार हुआ। एक बार फिर उन्हें मनाने का वही सिलसिला शुरू हुआ है। सुबह से उनसे मिलने के लिए बीजेपी के बड़े नेताओं का ताँता लगा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बड़े नेताओं ने भी उनसे फ़ोन पर बात की। 

आडवाणी से मिलने वाले तमाम नेता उनसे एक ही गुज़ारिश कर रहे हैं कि वो गांधीनगर से ही चुनाव लड़ें और इस बारे में पार्टी का फ़ैसला मानें। लेकिन आडवाणी इसके लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। कल संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति की बैठक के बाद पार्टी के फ़ैसले की जानकारी देने के लिए आडवाणी से मिलने गए सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी को भी उन्होंने साफ़ कर दिया कि उनकी पहली पसंद भोपाल है।

जबकि २८ फ़रवरी को गांधीनगर गए आडवाणी ने वहाँ साफ़ कर दिया था कि वो वहीं से चुनाव लड़ना चाहते हैं। ये बात उन्होंने टीवी कैमरों पर कही। तब तक बीजेपी की पहली सूची आ चुकी थी और उसमें आडवाणी का नाम नहीं था। वो चाहते थे कि पहली सूची में ही गांधीनगर से उनका नाम घोषित कर दिया जाए। लेकिन उनका नाम न पहली में आया और न दूसरी में। छठी सूची में नाम आना उन्हें अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल लगा। 

आडवाणी के क़रीबी हरिन पाठक का नाम भी नहीं आया। २००९ में पाठक के नाम पर आडवाणी और मोदी आमने-सामने आए थे। तब आडवाणी के दबाव में मोदी को अपने पैर पीछे खींचने पड़े। इस बार भी ऐसा ही कुछ होता दिख रहा है। आडवाणी को मनाने के लिए एक ये रास्ता भी तलाशा जा रहा है।

आडवाणी को ये एहसास है कि अगर वो गांधीनगर छोड़कर भोपाल जाते हैं तो ये मोदी के लिए बेहद नुक़सानदायक होगा क्योंकि इसका मतलब होगा कि भितरघात से आशंकित होकर वो अपनी सीट बदल रहे हैं। इसी कारण से मोदी भी आडवाणी को गांधीनगर से ही चुनाव लड़ने के लिए मनाते हुए दिखना चाहते हैं। इस बीच संघ ने भी साफ़ कर दिया है कि आडवाणी के भोपाल से लड़ने में कोई तुक नहीं है और उन्हें पार्टी का फ़ैसला मानना होगा। संघ ने ये भी कहा है कि चुनाव के वक़्त ऐसे विवाद नहीं होने चाहिएं।

आडवाणी का हठ अब बीजेपी के गले की फाँस बन गया है। पार्टी की कमान पहली पीढ़ी के हाथ से निकल कर दूसरी पीढ़ी के हाथों में चली गई है। बुज़ुर्ग नेता इस चुनाव को आख़िरी मौक़ा मानकर मैदान में उतरने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। पर पार्टी में सवाल ये पूछा जा रहा है कि आडवाणी आख़िर चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं? क्योंकि पार्टी मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पहले ही घोषित कर चुकी है और इस पर कोई समझौता नहीं होगा। 

ज़ाहिर है आडवाणी फिर मानेंगे लेकिन उनके रूठने और मनाने की क़वायद हर बार पार्टी की छवि पर दाग लगा जाती है और इस बार भी ऐसा ही हो रहा है। बीजेपी को ज़्यादा नुक़सान इसलिए भी है क्योंकि आडवाणी चुनाव के दौरान नाराज़ हुए हैं। 
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Wednesday, March 19, 2014

यूपी में डगमगाती बीजेपी की नैय्या


हर चुनाव से पहले देश के सबसे राज्य उत्तर प्रदेश में बीजेपी के प्रदर्शन को लेकर बढ़-चढ़ कर दावे किए जाते हैं। राज्य के नेताओं का पता नहीं, मगर केंद्र के नेता इस खुशफहमी में रहते हैं कि पार्टी 90 के दशक के सुनहरे दौर में वापस जा रही है। चाहे विधानसभा हो या लोक सभा, हर चुनाव से पहले दावा किया जाता है कि बीजेपी के पास उसका कोर वोट बैंक यानी अगड़े वापस आ रहे हैं और गैर यादव पिछड़ों और गैर जाटव दलितों के समर्थन से बीजेपी खोई ताकत दोबारा हासिल कर लेगी। लेकिन नतीजे आने के साथ ही ये भ्रम टूट जाता है।

2004 के लोक सभा चुनाव में बीजेपी ने जादुई रणनीतिकार माने जाने वाले प्रमोद महाजन को यूपी की कमान सौंपी। मगर वो नाकाम साबित हुए। 2009 के लोकसभा चुनाव में अरुण जेटली भी कोई करिश्मा नहीं दिखा सके। पिछले विधानसभा चुनाव में संगठन पर पकड़ रखने वाले संजय जोशी को नितिन गडकरी ने कमान दी। मगर बीजेपी की सीटें घट गईं। इस बार नरेंद्र मोदी के दायें हाथ अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया गया है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी उत्तर प्रदेश से ही हैं। राज्य में मोदी को लेकर कार्यकर्ताओं में जबर्दस्त उत्साह है। आम लोगों में उन्हें लेकर दिलचस्पी है। यूपी में मोदी की सभी रैलियों में भारी संख्या में भीड़ जुटी है। मगर उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही पार्टी हवा से उतर कर जमीन पर आती नजर आ रही है।

यूपी-बिहार के बारे में हमेशा कहा जाता है कि चुनाव से पहले चाहे जिस पार्टी या नेता की हवा हो, मगर जमीनी स्तर पर आकलन तभी हो सकता है जब सभी पार्टियों के उम्मीदवारों के नामों का एलान हो जाए। उत्तर प्रदेश के लिए बीजेपी ने 15 मार्च को 53 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की और उसके बाद से ही पचास से ज्यादा सीटें जीत लेने के उसके दावों की पोल खुलने लगी है। उम्मीदवारों के खिलाफ कार्यकर्ताओं का गुस्सा सड़कों पर दिखने लगा है। बीजेपी नेताओं को एक बार फिर उसी भितरघात की आशंकाएं सताने लगी हैं जिसकी शिकार पार्टी पिछले दो दशकों से होती आई है।

बीजेपी कार्यकर्ताओं को ये समझ में नहीं आ रहा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह गाजियाबाद से लखनऊ क्यों गए? और गाजियाबाद से फिर बाहरी उम्मीदवार जनरल वीके सिंह को क्यों उतारा जा रहा है? जनरल वी के सिंह को सैनिकों के परिवार वालों की बहुलता वाली रोहतक या झुंझुनु जैसी सीट से टिकट क्यों नहीं दिया गया? बीजेपी कार्यकर्ता हैरान हैं कि पिछले पाँच साल से संसद के भीतर और टेलीविजन स्टुडियों मोदी और बीजेपी के खिलाफ आग उगलने वाले जगदंबिका पाल को पार्टी डुमरियागंज से टिकट देने पर क्यों आमादा है। दो बार विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद केशरीनाथ त्रिपाठी का नाम इलाहाबाद से क्यों लिया जा रहा है। पहली बार विधानसभा चुनाव जीतने वाले कलराज मिश्र को देवरिया से टिकट देने के खिलाफ पार्टी कार्यकर्ता सड़कों पर हैं। बिजनौर से एडवोकेट राजेंद्र सिंह को टिकट देने के खिलाफ कार्यकर्ताओं में गुस्सा है। यहां तक कि जनरल वी के सिंह के खिलाफ भी गाजियाबाद में नारेबाजी हो रही है।

अमित शाह पार्टी की बैठकों में नेताओं-कार्यकर्ताओं से कहते रहे हैं कि उम्मीदवार चाहे कोई हो, लेकिन पार्टी को ये कहना है कि हर सीट पर मोदी ही उम्मीदवार हैं। जाहिर है बीजेपी की रणनीति सिर्फ मोदी के नाम पर ही वोट मांगने की है। लेकिन खुद मोदी कहते हैं कि हवा चाहे कितनी ही तेज़ चल रही हो, अगर ट्यूब पकड़ कर खड़े हो जाएं तो अपने-आप हवा नहीं भर जाती। यानी मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाना ही पड़ेगा। सवाल ये है कि क्या यूपी का मतदाता मोदी को वोट देने के नाम पर खुद चलकर मतदान केंद्र तक जाएगा? या फिर उम्मीदवारों के चयन से नाराज बीजेपी कार्यकर्ता उन्हें मतदान केंद्र तक लाएंगे?


बीजेपी के लिए अब भी यूपी में उम्मीद की एक ही किरण बची है। वो ये कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता हर बूथ को संभालेंगे और बीजेपी और मोदी के पक्ष में वोटरों को बूथ तक लाएंगे। लेकिन इतना तय है कि उम्मीदवारों के चयन में देरी और गलतियों ने बीजेपी को राज्य में बहुत करारा झटका जरूर दिया है।
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Tuesday, March 18, 2014

पवार कभी गरम कभी नरम


देश के सबसे खांटी राजनेताओं में से हैं शरद पवार। उनके मन की थाह पाना असंभव है। हर तरफ से कांग्रेस के लिए आ रही बुरी खबरों के बावजूद पवार कांग्रेस के साथ बने हुए हैं। तमाम उठापटक के बावजूद उनकी पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी ने महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ लोक सभा चुनावों के लिए सीटों का बंटवारा कर लिया है। लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकार पवार के सार्वजनिक बयानों के मतलब ढूंढते रहते हैं क्योंकि कभी वो कांग्रेस पर गरम होते हैं तो कभी नरम।

एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में पवार ने कहा है कि 2002 के दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता है। पवार ने कहा कि जब अदालत ने कुछ कहा है तो हमें इसे स्वीकार करना चाहिए। इस मुद्दे को क्यों उठाया जा रहा है। महत्वपूर्ण बात ये है कि गुजरात दंगों पर पवार का बयान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के पीटीआई को दिए इंटरव्यू के बाद आया है। इसमें राहुल ने कहा था कि एसआईटी की रिपोर्ट पर जानकारों द्वारा कई सवाल उठाए गए हैं और निचली अदालत के फैसले पर अभी बड़ी अदालतों की मुहर लगनी बाकी है। हालांकि पवार ने ये भी कहा है कि बतौर मुख्यमंत्री दंगों के लिए मोदी की जिम्मेदारी बनती है और उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

मोदी और दंगों को लेकर पवार इससे मिलती-जुलती बात कुछ समय पहले भी कह चुके हैं। लेकिन बाद में पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चे की बैठक में उन्होंने गुजरात दंगों को लेकर मोदी पर तीखा हमला किया था। जबकि आठ दिसंबर को चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद पवार ने कांग्रेस आलाकमान की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। तब पवार ने आरोप लगाया था कि गैरसरकारी संगठन हावी होते जा रहे हैं। माना गया कि ये सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद पर निशाना है।

वैसे इस सबके बावजूद पवार ये स्पष्ट करते हैं कि वो यूपीए के ही साथ रहेंगे। चुनाव से पहले भी और चुनाव के बाद भी। लेकिन राजनीतिक गलियारों में मोदी के प्रति नरमी बरतने वाले पवार के बयानों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सवाल ये पूछा जा रहा है कि पवार मोदी और कांग्रेस पर कभी गरम तो कभी नरम क्यों होते हैं।


जहां तक प्रधानमंत्री बनने की पवार की महत्वाकांक्षा का सवाल है, अभी तक उनकी ओर से इस पर पूर्ण विराम नहीं लगाया गया है। वैसे पवार कहते हैं कि उनकी पार्टी की इतनी ताकत नहीं है जिसके चलते वे प्रधानमंत्री बन सकें। ये ज़रूर है कि पवार इस बार लोक सभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और वो राज्य सभा के जरिए संसद में पहुँच गए हैं। महाराष्ट्र के राजनेताओं के बारे में ये बात मशहूर है कि वे चाहे किसी पार्टी में हों, मगर आपस में पक्की दोस्ती होती है। महाराष्ट्र बीजेपी के कुछ नेताओं के बारे में हल्के अंदाज में यहां तक कहा जाता है कि प्रधानमंत्री पद के लिए उनके उम्मीदवार नरेंद्र मोदी नहीं बल्कि शरद पवार हैं। ये पवार की शख्सियत और राजनीतिक विरोधियों में उनकी लोकप्रियता का पैमाना भी हो सकता है। बहरहाल पवार के कभी गरम तो कभी नरम रुख का राज यही लगता है कि भविष्य के लिए अपने दरवाजे सबके लिए खुल रखो।
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Monday, March 17, 2014

'कम बोला, काम बोला' वाक़ई?

कांग्रेस में चुनाव से पहले अजीब होड़ लगी है। चुनाव न लड़ने की होड़। कई दिग्गज नेताओं ने अलग-अलग कारण बताते हुए चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। ताज़ा नाम सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी का है जिनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है और इस कारण वो संभवतः लुधियाना से चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।

कांग्रेस में चुनाव से पहले एक और होड़ लगी है। पार्टी के ख़िलाफ़ बने माहौल का ठीकरा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर फोड़ने की। सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का ठीक से जवाब न देने के लिए उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है। टूजी घोटाले की जाँच कर प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पी चिदंबरम को क्लीन चिट देने वाली विवादास्पद संयुक्त जाँच समिति यानी जेपीसी के अध्यक्ष रहे पी सी चाको ने सार्वजनिक रूप से कहा भी है कि प्रधानमंत्री सरकार की कामयाबियों के बारे लोगों को ठीक से नहीं बता सके।

ये संभवतः पहली बार है जब चुनाव होने से पहले ही सत्तारूढ़ दल हथियार डालता दिख रहा है। चुनाव के परिणामों की प्रतीक्षा किए बग़ैर ही संभावित हार के लिए बलि का बकरा भी ढूँढा जाने लगा है। प्रधानमंत्री पर धीरे-धीरे शुरू हुए इन हमलों के पीछे यही वजह मानी जा सकती है। लेकिन कांग्रेस की समस्या ये है कि वहाँ समस्याओं का ईमानदारी से विश्लेषण नहीं होता।

इसमें कोई शक नहीं कि 2004 की जीत का सेहरा सोनिया गांधी के सिर बँधता है। उन्होंने 1999 में पार्टी को मिली सबसे कम सीटों के झटके से पार्टी को उबार कर सत्ता तक पहुँचाया। गठबंधनों के प्रति पार्टी की झिझक को तोड़ा। ख़ुद प्रधानमंत्री बनने के बजाए साफ़ छवि के मनमोहन सिंह को ये ज़िम्मेदारी देकर सबको हैरान कर दिया। ये भी सही है कि 2009 में मिली जीत का सेहरा सोनिया गांधी नहीं बल्कि मनमोहन सिंह के सिर बँधता है। आर्थिक मंदी से देश को उबार कर और अमेरिका के साथ परमाणु समझौता कर शहरी मिडल क्लास का दिल जीता। किसानों के क़र्ज़ माफ़ कर और मनरेगा जैसी लोकलुभावन योजनाओं से ग्रामीण इलाक़ों में पार्टी को मज़बूत किया।

लेकिन 2009 के बाद से ही कांग्रेस और सरकार की लोकप्रियता ढलान पर है। एक के बाद एक सामने आए घोटालों ने छवि धूमिल कर दी। कमरतोड़ महँगाई, घटती विकास दर, बढ़ती महँगाई दर, लचर विदेश नीति जैसी नाकामियों से लोगों का भरोसा टूटने लगा है।

पर इस सबके लिए अकेले मनमोहन सिंह को ज़िम्मेदार ठहरा कर कांग्रेस अध्यक्ष के वफ़ादार नेता अन्याय कर रहे हैं। मीठा मीठा गप और कड़वा कड़वा थू नहीं हो सकता। ऐसे कई नेता मिल जाते हैं जो कहते हैं कि मनमोहन सिंह को बदल दिया जाना चाहिए था। सत्ता के दो केंद्रों के प्रयोग को नाकाम बताने वाले कुछ नेताओं के बयान यही इशारा करते हैं। कुछ कांग्रेसी मनमोहन सिंह पर संवादहीनता का आरोप भी लगाते हैं। पर यूपीए एक में भी प्रधानमंत्री कम ही बोलते थे।

कुल मिला कर कोशिश ये दिखती है कि यूपीए टू की नाकामियों से सोनिया और राहुल गांधी को बचा कर अलग दिखा जाए। ये कोशिश भी कि अगर 2014 में नतीजे ख़िलाफ़ हों तो कांग्रेस प्रचार की अगुवाई कर रहे राहुल को दोष न दिया जाए। लेकिन कांग्रेस को अगर पटरी पर रहना है तो उसे अपनी असली समस्या की ओर ध्यान देना होगा।

Sunday, March 16, 2014

'जन-जन मोदी, घर-घर मोदी'



नरेंद्र मोदी के बनारस से चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ ही ये सस्पेंस खत्म हो गया कि वो उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ेंगे या नहीं। दिलचस्प बात ये है कि मीडिया में चाहे इसे लेकर सस्पेंस बना रहा हो, लेकिन ख़ुद नरेंद्र मोदी ये फ़ैसला पिछले साल जुलाई में ही कर चुके थे। पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं को ये जानकारी दे ै दी गई थी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व से भी विचार-विमर्श कर लिया गया था। 

दरअसल, योजना ये थी कि मोदी गुजरात में लाल कृष्ण आडवाणी की सीट गांधीनगर से और उत्तर प्रदेश में मुरली मनोहर जोशी की सीट बनारस से चुनाव लड़ेंगे। इन दोनों ही वरिष्ठतम नेताओं को राज्य सभा भेजा जाना था। ताकि पार्टी में मोदी के नेतृत्व को लेकर कोई भ्रम नहीं रहे। लेकिन ये योजना सिरे नहीं चढ़ सकी। आडवाणी-जोशी दोनों ही इस बात के लिए तैयार नहीं हुए कि वे लोक सभा चुनाव न लड़ें। संघ भी इन दोनों नेताओं पर एक सीमा से अधिक दबाव बनाने के लिए तैयार नहीं हुआ। नतीजा ये है कि जोशी ने मोदी के लिए बनारस की सीट तो ख़ाली की, मगर उन्हें कानपुर भेजना पड़ा। इसी तरह आडवाणी गांधीनगर से ही लड़ने पर अड़े हैं लिहाज़ा मोदी पास की अहमदाबाद पूर्व सीट से चुनाव लड़ेंगे।

मोदी के सिपहसलार अमित शाह उत्तर प्रदेश में पार्टी को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। राज्य भर घूम कर और तमाम लोगों से मिल कर उन्होंने ये फ़ीडबैक दिया कि मोदी के नाम पर राज्य में बीजेपी को ज़बर्दस्त समर्थन मिल रहा है। मोदी की विकास और हिंदुत्व की छवि राज्य में बरसों से चली आ रही जातिगत राजनीति पर भारी पड़ रही है। मोदी का पिछड़े वर्ग का होना, बीजेपी के लिए अधिक लाभकारी हो रहा है क्योंकि पिछड़े वर्ग में ये संदेश जा रहा है कि पहली बार बीजेपी के माध्यम से देश में एक मज़बूत व्यक्ति उनके वर्ग से प्रधानमंत्री बनने जा रहा है। अमित शाह का ये भी सुझाव था कि अगर मोदी यूपी से लड़ते हैं तो इसका फ़ायदा पूरे पूर्वांचल में मिलेगा। 

वैसे उत्तर प्रदेश के लिए बीजेपी की ५३ उम्मीदवारों की पहली सूची में जातिगत समीकरणों का ख़ास ध्यान रखा गया है। संघ के हिसाब से आठ प्रांतों में विभाजित यूपी के लिए बीजेपी की सूची में ये ज़ोर है कि आस-पास की सीटों पर टिकट देते समय उम्मीदवार की जाति का ध्यान रखा जाए ताकि संतुलन बना रहे। अमित शाह राज्य के पार्टी नेताओं को ये कहते रहे हैं कि चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा और इसलिए लोगों को ये संदेश दिया जाए कि हर सीट पर मोदी ही चुनाव लड़ रहे हैं। यूपी में बीजेपी ने किसी दूसरे दल से गठबंधन नहीं किया है। न ही कुछ छोटे दलों के साथ तालमेल हो पाया है। इसकी भरपाई के लिए पार्टी दूसरे दलों से कुछ ताक़तवर नेताओं को अपने साथ लाकर टिकट दे रही है। बड़ी संख्या में विधायकों को भी टिकट दिया गया है। इस सबके बावजूद यूपी में बीजेपी के प्रचार का पूरा फ़ोकस नरेंद्र मोदी पर ही रहेगा। 

कोई हैरानी नहीं है कि मोदी की बनारस रैली के वक़्त शुरू हुआ 'हर-हर मोदी, घर-घर मोदी' का बीजेपी का नारा अब पूरे उत्तर प्रदेश में 'जन-जन मोदी, घर-घर मोदी' के रूप में गूँज रहा है।