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Thursday, January 22, 2026

आर्कटिक डील या आर्ट ऑफ़ डील?


यूरोप और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर के बादल जितनी तेज़ी से उमड़े थे उतनी ही तेज़ी से गायब भी‌ हो‌ ग ए। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के दौरान, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को ख़रीदने की अपनी ज़िद अचानक छोड़ दी और अपने यूरोपीय सहयोगियों पर टैरिफ़ लगाने की धमकी भी वापस ले ली। इसके बजाय, उन्होंने नैटो के साथ एक नई "फ़्यूचर डील" या फ्रेमवर्क के एलान के साथ सब कुछ शांत कर दिया।

पिछले कुछ हफ़्तों से माहौल काफ़ी गर्म था। ट्रम्प लगातार डेनमार्क के इस स्वायत्त क्षेत्र पर अमेरिकी नियंत्रण की माँग कर रहे थे। उन्होंने इसे आर्कटिक सुरक्षा और रूस-चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए 'अस्तित्व की ज़रूरत' बताया था। अपनी बात मनवाने के लिए उन्होंने अमेरिका की आर्थिक ताकत का पूरा इस्तेमाल किया और धमकी दी थी कि अगर डेनमार्क और सात अन्य यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड के सौदे पर बात नहीं की, तो उन पर 10% से लेकर 25% तक का टैरिफ़ लगा दिया जाएगा।

यूरोप का जवाब भी बिल्कुल सख़्त था। यूरोपीय संसद की व्यापार समिति ने अमेरिका के साथ एक अहम व्यापार समझौते को रोक दिया और साफ़ संदेश दिया कि वे इस तरह की आर्थिक ज़ोर-ज़बरदस्ती के आगे नहीं झुकेंगे। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के अधिकारियों ने भी दो-टूक कह दिया कि उनकी संप्रभुता बिकाऊ नहीं है। लेकिन, नाटो महासचिव मार्क रट के साथ ट्रम्प की मुलाकात के कुछ ही घंटों बाद यह गतिरोध टूट गया। बैठक के बाद, राष्ट्रपति ने 'ट्रुथ सोशल' पर पोस्ट किया कि ग्रीनलैंड और पूरे आर्कटिक क्षेत्र को लेकर एक "फ़्रेमवर्क" या ढाँचा तैयार कर लिया गया है। उन्होंने तुरंत टैरिफ़ की धमकी वापस ले ली और इस नए समझौते को रक्षा, खनिजों और सुरक्षा पर सहयोग की एक नई शुरुआत बताया। अब शायद ग्रीनलैंड को ख़रीदने के बजाय वहाँ अमेरिकी सेना को बेस बनाने के ज़्यादा अधिकार मिल सकते हैं।

जो लोग ट्रम्प की राजनीति को नहीं समझते, उन्हें यह एक हताशा भरा यू-टर्न लग सकता है। उनके राजनीतिक विरोधी उनका मज़ाक उड़ाते हुए इसे TACO या Trump Always Chickens Out (ट्रंप हमेशा डर जाते हैं) कहते हैं, लेकिन मंझे हुए जानकार इसे ट्रम्प की 'आर्ट ऑफ़ डील' का ही एक हिस्सा मानते हैं। यह उनका पुराना तरीका है: पहले बहुत बड़ी माँग रखो (जैसे ग्रीनलैंड का पूरा मालिकाना हक़), फिर सामने वाले को डराने के लिए भारी धमकियाँ दो, और फिर बाद में ज़बरदस्त विरोध होने पर थोड़ा पीछे हट जाओ, ताकि समझौता किया जा सके। ट्रम्प ने संकट पैदा किया जिसे केवल वही सुलझा सकते थे। जब संस्थागत स्तर पर विरोध हुआ, तो उन्होंने एक धुँधले से "फ़्रेमवर्क" का सहारा लिया, जिससे वे अपनी जीत का दावा भी कर सकें और बिना ग्रीनलैंड खरीदे भी वहाँ अमेरिका का प्रभाव बढ़ा सकें।

हालाँकि, इस नाटकीयता के पीछे एक ठोस रणनीतिक सोच भी है। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प की दीवानगी बेवजह नहीं है। यह द्वीप अमेरिकी मिसाइल सुरक्षा के लिए बहुत अहम है। इसके अलावा, ग्रीनलैंड में छिपे 'रेयर अर्थ मिनरल्स' (दुर्लभ खनिज) अमेरिका को चीन की सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकते हैं, जो आज की तकनीक और हथियारों के लिए बेहद ज़रूरी है। जैसे-जैसे बर्फ़ पिघल रही है, वहाँ नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और यह इलाका वैश्विक प्रतिस्पर्धा का नया अखाड़ा बनता जा रहा है।

कुल मिलाकर, यह पूरा किस्सा ट्रम्प की विदेश नीति का एक बेहतरीन उदाहरण है। वे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आर्थिक दबाव का इस्तेमाल करते हैं और अस्थिरता को एक हथियार की तरह प्रयोग करते हैं ताकि उनके विरोधी और दोस्त, दोनों ही हमेशा उलझन में रहें। भले ही फ़िलहाल टैरिफ़ का ख़तरा टल गया हो और ग्रीनलैंड बिका न हो, लेकिन इस घटना ने साफ़ कर दिया है कि आर्कटिक पर वर्चस्व की असली लड़ाई तो अब शुरू हुई है। ट्रम्प ने भले ही सीधे तौर पर द्वीप नहीं खरीदा, लेकिन उन्होंने यूरोप को अपनी शर्तों पर बातचीत करने के लिए मजबूर ज़रूर कर दिया।