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Tuesday, January 27, 2026

गोवा की गर्मी से पिघली भारत-कनाडा के रिश्तों की बर्फ़

भारत और कनाडा के बीच जमी कूटनीतिक बर्फ़ आख़िरकार पिघलती दिख रही है। गोवा के तट की उमस भरी गर्मी ने रिश्तों में जमी ठंडक को मात दे दी है। गोवा में 'इंडिया एनर्जी वीक' के दौरान रिश्तों में आई यह गर्माहट साफ़ महसूस की गई। भारत और कनाडा ने कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी का द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने का संकल्प लिया है। यह सौदा आर्थिक समझदारी का एक बेहतरीन उदाहरण है। कनाडा ने भारत की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए निर्यात बढ़ाने का वादा किया है, जबकि भारत बदले में रिफ़ाइंड पेट्रोलियम उत्पाद कनाडा को देगा। लेकिन इसे सिर्फ तेल और गैस का सौदा मानना ग़लती होगी। यह मुलाकात एक नई व्यावहारिक शुरुआत है, जो ख़तरनाक कूटनीतिक चुप्पी को ख़त्म कर रही है। नवंबर 2025 में व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीईपीए) की बातचीत फिर से शुरू होने के बाद, अब यह गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रही है। मार्च की शुरुआत में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के भारत दौरे की योजना है। यूरेनियम, महत्वपूर्ण खनिजों या क्रिटिकल मिनरल, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और ऊर्जा पर होने वाले संभावित समझौते यह बताते हैं कि दोनों देश बीते वक़्त की भरपाई करने के लिए कितने उत्सुक हैं। सिर्फ़ तीन साल पहले, 2023 में, रिश्ते पूरी तरह बिखर गए थे। कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों का हाथ होने के आरोप लगाकर कूटनीतिक भूचाल ला दिया था। राजनयिकों का निष्कासन हुआ, वीज़ा पर रोक लगी और व्यापार की बातचीत ठप हो गईं। हालांकि, 2025 में मार्क कार्नी की चुनावी जीत ने माहौल बदल दिया। जी-7 और जी-20 सम्मेलनों में उच्च-स्तरीय बातचीत ने पुरानी शिकायतों की जगह नई रणनीतियों को दे दी। इस सुलह के पीछे भावुकता नहीं, बल्कि ठोस भू-राजनीति और व्यावहारिकता है। ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिकी टैरिफ़ का डर और महत्वपूर्ण खनिजों पर चीन की मज़बूत पकड़ जैसी वैश्विक चुनौतियों ने भारत और कनाडा को एक-दूसरे के क़रीब ला दिया है। कनाडा के लिए इसके फ़ायदे साफ़ हैं। अमेरिका से मिल रही टैरिफ की धमकियों के बीच उसे अपने व्यापार को फैलाने की सख़्त ज़रूरत है। भारत, कनाडा के ऊर्जा संसाधनों के लिए एक बड़ा बाज़ार है। साल 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य बड़ा ज़रूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं लगता। भारत के लिए भी समीकरण बिल्कुल स्पष्ट हैं। 7% से अधिक की विकास दर बनाए रखने के लिए भारत को भरोसेमंद साझेदार की ज़रूरत है, ताकि अस्थिर मध्य पूर्व और रूस पर निर्भरता कम की जा सके। कनाडा का यूरेनियम भारत के परमाणु ऊर्जा लक्ष्यों के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि एलएनजी साल 2070 के नेट-जीरो लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक ज़रूरी पुल का काम करेगी। हालांकि, रिश्तों की यह नई शुरुआत अभी नाज़ुक दौर में है। बीते कुछ सालों की कड़वाहट पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। भारत की दोस्ती के साथ एक शर्त जुड़ी है और वह है सुरक्षा चिंताओं को लेकर ठोस कार्रवाई। भारत उम्मीद करता है कि कनाडा अपनी धरती पर भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगाएगा और राजनीति से प्रेरित बयानबाज़ी की जगह सबूत आधारित जाँच को तरजीह देगा। जब तक धमकियों का सिलसिला नहीं थमता, व्यापार पूरी तरह नहीं फल-फूल सकता। गोवा में दोनों देशों ने साबित कर दिया कि वे साथ मिलकर कारोबार कर सकते हैं; अब चुनौती दुनिया के सामने यह साबित करने की है कि वे एक-दूसरे पर भरोसा भी कर सकते हैं।