Tuesday, 20 December 2016

कैश लेस होने से डरना क्यों?

नोटबंदी के बाद से कैश लेस होने की बात चल रही है। मोदी सरकार का भी जोर अब कैश लेस या लेस कैश होने पर है। हालांकि सरकार से ये सवाल पूछा जा रहा है कि नोटबंदी का मकसद अगर लेस कैश भारत बनाना था तो सरकार ने इसकी ठीक से तैयारी क्यों नहीं की?सरकार ने बिना तैयारी के नोट बंदी की और वैसी ही हड़बड़ी लेस कैश या कैश लेस भारत बनाने में की जा रही है। इसी वजह से जो लोग नोट बंदी का विरोध कर रहे थे, धीरे-धीरे वो भी कैश लेस के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। हालांकि कैश लेस का विरोध करने वालों में एक तबका इसका सिर्फ विचारधारा के चलते विरोध कर रहा है। यानी सिर्फ इसलिए क्योंकि मोदी सरकार लेस कैश पर जोर दे रही है। 

जहां तक मेरे व्यक्तिगत अनुभव का प्रश्न है, मैं आठ नवंबर 2016 यानी नोट बंदी के पहले से ही कई साल से लेस कैश हूं। ऐसा नहीं है कि कैश का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करता। दफ्तर के बाहर झालमुड़ी खाकर चाय पीने से लेकर सब्जी खरीदने तक नकदी चाहिए होती थी। इसी तरह कार में सीएनजी डलवाने और ड्राइवर को तनख्वाह देने तक में नकद पैसा ही देता आया हूं। लेकिन इस तरह के छोटे-छोटे भुगतानों को छोड़ दें तो मेरा अधिकांश लेन-देन बिना नकदी के ही होता रहा है। बिजली, टेलीफोन के बिल, बच्चों के स्कूल की फीस, बीमा का प्रीमियम, राशन की खरीद, ट्रेन-हवाईजहाज के टिकट और यहां तक कि सिनेमा के टिकट भी या तो ऑनलाइन, क्रेडिट/डेबिट कार्ड या फिर चेक से करता आया हूँ। ऐसा करने की पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि ये बेहद सुविधाजनक है। घर बैठे ही लैपटॉप या पीसी पर माउस घुमाते हुए ये सारे काम आसानी से हो जाते हैं। 

लेकिन ऐसा नहीं है कि मैं लेसकैश रातों-रात हुआ। दरअसल, गाजियाबाद के जिस इलाके में रहता हूं वहां जरूरत की चीजें धीरे-धीरे बनी हैं। दक्षिण दिल्ली में रहने वालों के लिए यमुना पार के लोग दोयम दर्जे के हैं। मेरा घर तो यमुना से भी पार एक दूसरी नदी हिंडन के नजदीक है। इस लिहाज से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जब करीब तेरह साल पहले यहां रहने आया तो शुरुआत में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ा होगा। शुरू में घर के नजदीक कोई सब्जी की दुकान तक नहीं थी। सब्जी लेने के लिए मुझे करीब तीन किलोमीटर दूर या तो साहिबाबाद मंडी या फिर सेक्टर 16 के बाजार जाना होता था। बिजली का बिल जमा करने के लिए दो किलोमीटर दूर जाना होता था। नगर निगम का टैक्स हो या फिर कोई और भुगतान, हर बार घर से गाड़ी लेकर आना-जाना जिसमें समय और ईंधन दोनों की बर्बादी भी होती थी। दवाई खरीदनी हो या फिर राशन, हर चीज के लिए गाड़ी लेकर दौड़ लगानी होती थी। बीमे का प्रीमियम देने के लिए एजेंट के पास चेक लेकर जाना और ये याद रखना कि इसे कब देना है। घर में एलपीजी सिलिंडर के लिए भी भागना पड़ता था। ये सारे सिरदर्द होते थे। जाहिर है इनमें से अधिकांश काम के लिए नकदी चाहिए होती थी। घर पर कैश भी रखना पड़ता था। 

समय के साथ चीजें बदलती गईं। धीरे-धीरे ऑनलाइन पेमेंट की आदत डाली। बिजली का बिल ऑनलाइन देने लगा। बिजली देने वाली कंपनी यूपीपीसीएल की वेबसाइट पर ऑनलाइन पेमेंट करने में ट्रांजेक्शन चार्ज वगैरह लगता था। लेकिन बिजलीघर जाकर समय और ईंधन बरबाद करने की तुलना में मुझे ये ज्यादा ठीक लगा कि घर बैठ कर वेबसाइट पर क्रेडिट कार्ड से बिल चुकाया जाए। बीमे के प्रीमियम को क्रे़डिट कार्ड से भरते समय आज भी ट्रांजेक्शन चार्ज की नाम पर कई बार सौ-डेढ़ सौ रुपए तक लग जाते हैं। लेकिन इसकी तुलना अगर इस बात से करें कि क्रेडिट कार्ड पर उधार 50-55 दिन बाद चुकाना होता है और तब तक बैंक के बचत खाते में ही शायद ब्याज के रूप में उतना पैसा मिल जाता है तो बात बराबर ही होती है। बच्चों की फीस शुरू में चेक के जरिए देता था लेकिन नकद कभी नहीं दी। अब पेटीएम के जरिए बच्चों की फीस और बिजली का बिल चुका देता हूं। पेटीएम बिजली के बिल पर तो कभी-कभी कैशबैक भी देता है। सोसाइटी में पीएनजी आए काफी समय हो गया। आईजीएल की वेबसाइट पर बिल चुकाने में कभी परेशानी नहीं हुई। नगर निगम में हाऊस टैक्स हो या फिर नजदीक की किराना दुकान से राशन का सामान। कहीं पर ऑन लाइन पेमेंट होता है तो कहीं क्रेडिट कार्ड से। बीच में ग्रोफर से ऑन लाइन सब्जी भी मंगाई। लेकिन फिर ठीक नहीं लगा तो सामने के सब्जी वाले से ही नकद देकर ले आता हूं।

कैश लेस होने का एक अनुभव मेरे लिए बेहद अनूठा रहा। मुझे व्यक्तिगत काम से इंदौर जाना था। मैंने पेटीएम पर जेट एयरवेज की टिकट ली। उस पर मुझे कैश बैक मिला। ईटिकट मोबाइल पर आ गई। मोबाइल से ही ओला कैब बुक कराई जिसने एयरपोर्ट छोड़ा तो पहले से क्रेडिट कार्ड से डाली गई ओला मनी से उसका बिल अपने-आप चुका दिया गया। एयरपोर्ट पर क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर कॉफी ली। फिर इंदौर पहुँच कर भी ओला कैब ली। दिल्ली से इंदौर के पूरे सफर में वॉलेट सिर्फ एक बार निकाला। वो भी तब जब एयरपोर्ट पर मोबाइल पर ईटिकट दिखाते समय पहचान पत्र दिखाना होता है। दस साल पहले आप इस यात्रा की कल्पना कीजिए। तब नोटों की गड्डी लेकर पहले आप ट्रैवल एजेंट के पास जा कर टिकट लेते। फोन कर टैक्सी बुक कराते। एयरपोर्ट पर टैक्सी वाले को कैश देते। एयरपोर्ट पर कॉफी पीने के लिए बटुआ निकालते। इंदौर पहुंच कर फिर टैक्सी कर कैश देते। 

आठ नवंबर के बाद से मेरे लिए दुनिया बदल गई हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। कुछ साल पहले सोसाइटी में एक साथ कई फ्लैट में चोरी हुई थी। इसके बाद से घर में कैश रखना बिल्कुल बंद कर चुका था। आठ नवंबर को ऑफिस से घर आते समय कार में रेडियो पर प्रधानमंत्री का भाषण सुना और घर आते ही टटोला कि कितनी नकदी रखी है। पांच सौ और हजार के नोट में 8 हजार रुपए निकले। किराने वाले ने कहा कि चाहे तो नकदी उसके यहां जमा करा दें। मैंने थोड़े उसे दिए और बाकी इधर-उधर खर्च हो गए। दूध वाले ने कहा कि चेक से भुगतान कर सकते हैं। सब्जी वाले के साथ शुरुआत में दिक्कत आई। फिर कुछ समय उधार किया और बाद में नए नोट आने पर पुराना चुका कर सब्जी लेना शुरू कर दिया। आठ नवंबर के बाद से सिर्फ एक बार बैंक गया। चेक के एवज में 24 हजार रुपए निकाले। इसमें भी दो-दो हजार के दो नोट और बाकी सौ-सौ के नोट मिल गए तो काम चल गया। दफ्तर में खबर हो गई तो कई लोग सौ-सौ के नोट लेने आए। उन्हें खुल्ले देकर कुछ पुण्य भी कर लिया। नोट बंदी के बाद से सिर्फ दो बार एटीएम की लाइन में लगना पड़ा। वो भी सिर्फ असुरक्षा की भावना से ग्रसित हो कर कि अगर अचानक नकदी नहीं मिली तो क्या होगा। लेकिन बाद में एहसास हुआ कि ऐसा करने की जरूरत ही नहीं थी। दो शादियों में शगुन के लिए 500-500 रुपए के नए नोट भी देकर आया। चाहे इलाका हिंडन के नजदीक का हो लेकिन कैश लेस के मामले में दक्षिण दिल्ली से भी आगे है। अभी छुट्टी के दिन सोसाइटी के बाहर गोलगप्पे वाले ने भी पेटीएम से पैसे लिए और कुछ दिन पहले पेटीएम से भुगतान कर एलईडी बल्ब खरीदा।

हां ये जरूर है कि आठ नवंबर के बाद से खर्चों में थोड़ी कटौती हुई है। शुरू में नकदी खर्च करने से पहले कई बार सोचना पड़ता था। डर यही था कि अगर हाथ से नकदी चली गई तो फिर एटीएम की लाइन में लगना पड़ेगा। इस बीच मीडिया और सोशल मी़डिया पर कैश लेस और नकदी के बीच जोर शोर से बहस चल गई। कैश लेस के विरोधियों ने खूब डराया। कहा निजता का उल्लंघन होगा। उन मामलों की याद दिलाई जिनमें कई डेबिट कार्ड की सूचना हैक कर ली गई थी। कुछ ने यह कह कर उकसाया कि पेटीएम में चीनी कंपनी का पैसा लगा है और मास्टर-वीजा को मिलने वाला पैसा भी देश से बाहर चला जाता है। कुछ लोग क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर लगने वाले ट्रांजेक्शन शुल्क को ज्यादती मानते हैं। वहीं कुछ सिर्फ इसलिए विरोध करते हैं कि सरकार उन्हें कैश लेस या लेस कैश होने को क्यों कहती है। 

ऐसा नहीं है कि मुझे ऑनलाइन लेनदेन के खतरों का एहसास नहीं है। फिर ये सोचता हूं कि वैसे भी नौकरीपेशा लोगों की अधिकांश कमाई बैंकों में ही तो रखी जाती है। अगर अकाउंट हैक होने से किसी के पैसे गए तो घर से भी नकदी चोरी हुई है। बैंक से डिजीटल तरीके से पैसे चोरी होने पर तो फिर भी ट्रेल के जरिए चोर का पता लगने की संभावना होती है। मगर घर से चोरी गई नकदी कभी चोर या पुलिस से वापस मिली हो ऐसा कम ही होता है। करेंसी नोट भीग सकते हैं। होली के रंग में खराब हो सकते हैं। घर में आग लगने पर जल सकते हैं। बाढ़ आने पर बह सकते हैं। चोरों को सबसे पहले उन्हीं की तलाश होती है। 

फिर ये कोई नहीं कहता कि देश सौ फीसदी कैश लेस हो जाएगा। ऐसा होना असंभव है। भारत जैसे विविधिता वाले देश में जहां बड़ा तबका अब भी गरीबी रेखा के नीचे है और एक बड़ी आबादी ऐसे गांवों में रहती है जहां बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं, कैश लेस भारत की कल्पना बेमानी है। करोड़ों लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और अपनी रोजी-रोटी के लिए नकदी पर निर्भर है वहां लेस कैश का फार्मूला भी तब तक नहीं चल सकता जब तक इसके लिए बुनियादी ढांचा तैयार नहीं होता। इसीलिए नकदी कभी खत्म नहीं हो सकती। कम से कम निकट भविष्य में तो इसकी संभावना नहीं है। हां नकदी पर निर्भरता कम करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए तो अच्छा है ही। व्यक्तिगत तौर पर भी इसके फायदे ज्यादा हैं और नुकसान कम। इसलिए मैं तो लेस कैश के रास्ते पर काफी पहले ही निकल चुका हूं। नोट बंदी ने एक तरह से मेरे फैसले को मजबूती ही दी है। जो लोग इस रास्ते पर नहीं चलना चाहते उन्हें मेरी ओर से शुभकामनायें।