Tuesday, 20 December 2016

कैश लेस होने से डरना क्यों?

नोटबंदी के बाद से कैश लेस होने की बात चल रही है। मोदी सरकार का भी जोर अब कैश लेस या लेस कैश होने पर है। हालांकि सरकार से ये सवाल पूछा जा रहा है कि नोटबंदी का मकसद अगर लेस कैश भारत बनाना था तो सरकार ने इसकी ठीक से तैयारी क्यों नहीं की?सरकार ने बिना तैयारी के नोट बंदी की और वैसी ही हड़बड़ी लेस कैश या कैश लेस भारत बनाने में की जा रही है। इसी वजह से जो लोग नोट बंदी का विरोध कर रहे थे, धीरे-धीरे वो भी कैश लेस के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। हालांकि कैश लेस का विरोध करने वालों में एक तबका इसका सिर्फ विचारधारा के चलते विरोध कर रहा है। यानी सिर्फ इसलिए क्योंकि मोदी सरकार लेस कैश पर जोर दे रही है। 

जहां तक मेरे व्यक्तिगत अनुभव का प्रश्न है, मैं आठ नवंबर 2016 यानी नोट बंदी के पहले से ही कई साल से लेस कैश हूं। ऐसा नहीं है कि कैश का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करता। दफ्तर के बाहर झालमुड़ी खाकर चाय पीने से लेकर सब्जी खरीदने तक नकदी चाहिए होती थी। इसी तरह कार में सीएनजी डलवाने और ड्राइवर को तनख्वाह देने तक में नकद पैसा ही देता आया हूं। लेकिन इस तरह के छोटे-छोटे भुगतानों को छोड़ दें तो मेरा अधिकांश लेन-देन बिना नकदी के ही होता रहा है। बिजली, टेलीफोन के बिल, बच्चों के स्कूल की फीस, बीमा का प्रीमियम, राशन की खरीद, ट्रेन-हवाईजहाज के टिकट और यहां तक कि सिनेमा के टिकट भी या तो ऑनलाइन, क्रेडिट/डेबिट कार्ड या फिर चेक से करता आया हूँ। ऐसा करने की पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि ये बेहद सुविधाजनक है। घर बैठे ही लैपटॉप या पीसी पर माउस घुमाते हुए ये सारे काम आसानी से हो जाते हैं। 

लेकिन ऐसा नहीं है कि मैं लेसकैश रातों-रात हुआ। दरअसल, गाजियाबाद के जिस इलाके में रहता हूं वहां जरूरत की चीजें धीरे-धीरे बनी हैं। दक्षिण दिल्ली में रहने वालों के लिए यमुना पार के लोग दोयम दर्जे के हैं। मेरा घर तो यमुना से भी पार एक दूसरी नदी हिंडन के नजदीक है। इस लिहाज से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जब करीब तेरह साल पहले यहां रहने आया तो शुरुआत में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ा होगा। शुरू में घर के नजदीक कोई सब्जी की दुकान तक नहीं थी। सब्जी लेने के लिए मुझे करीब तीन किलोमीटर दूर या तो साहिबाबाद मंडी या फिर सेक्टर 16 के बाजार जाना होता था। बिजली का बिल जमा करने के लिए दो किलोमीटर दूर जाना होता था। नगर निगम का टैक्स हो या फिर कोई और भुगतान, हर बार घर से गाड़ी लेकर आना-जाना जिसमें समय और ईंधन दोनों की बर्बादी भी होती थी। दवाई खरीदनी हो या फिर राशन, हर चीज के लिए गाड़ी लेकर दौड़ लगानी होती थी। बीमे का प्रीमियम देने के लिए एजेंट के पास चेक लेकर जाना और ये याद रखना कि इसे कब देना है। घर में एलपीजी सिलिंडर के लिए भी भागना पड़ता था। ये सारे सिरदर्द होते थे। जाहिर है इनमें से अधिकांश काम के लिए नकदी चाहिए होती थी। घर पर कैश भी रखना पड़ता था। 

समय के साथ चीजें बदलती गईं। धीरे-धीरे ऑनलाइन पेमेंट की आदत डाली। बिजली का बिल ऑनलाइन देने लगा। बिजली देने वाली कंपनी यूपीपीसीएल की वेबसाइट पर ऑनलाइन पेमेंट करने में ट्रांजेक्शन चार्ज वगैरह लगता था। लेकिन बिजलीघर जाकर समय और ईंधन बरबाद करने की तुलना में मुझे ये ज्यादा ठीक लगा कि घर बैठ कर वेबसाइट पर क्रेडिट कार्ड से बिल चुकाया जाए। बीमे के प्रीमियम को क्रे़डिट कार्ड से भरते समय आज भी ट्रांजेक्शन चार्ज की नाम पर कई बार सौ-डेढ़ सौ रुपए तक लग जाते हैं। लेकिन इसकी तुलना अगर इस बात से करें कि क्रेडिट कार्ड पर उधार 50-55 दिन बाद चुकाना होता है और तब तक बैंक के बचत खाते में ही शायद ब्याज के रूप में उतना पैसा मिल जाता है तो बात बराबर ही होती है। बच्चों की फीस शुरू में चेक के जरिए देता था लेकिन नकद कभी नहीं दी। अब पेटीएम के जरिए बच्चों की फीस और बिजली का बिल चुका देता हूं। पेटीएम बिजली के बिल पर तो कभी-कभी कैशबैक भी देता है। सोसाइटी में पीएनजी आए काफी समय हो गया। आईजीएल की वेबसाइट पर बिल चुकाने में कभी परेशानी नहीं हुई। नगर निगम में हाऊस टैक्स हो या फिर नजदीक की किराना दुकान से राशन का सामान। कहीं पर ऑन लाइन पेमेंट होता है तो कहीं क्रेडिट कार्ड से। बीच में ग्रोफर से ऑन लाइन सब्जी भी मंगाई। लेकिन फिर ठीक नहीं लगा तो सामने के सब्जी वाले से ही नकद देकर ले आता हूं।

कैश लेस होने का एक अनुभव मेरे लिए बेहद अनूठा रहा। मुझे व्यक्तिगत काम से इंदौर जाना था। मैंने पेटीएम पर जेट एयरवेज की टिकट ली। उस पर मुझे कैश बैक मिला। ईटिकट मोबाइल पर आ गई। मोबाइल से ही ओला कैब बुक कराई जिसने एयरपोर्ट छोड़ा तो पहले से क्रेडिट कार्ड से डाली गई ओला मनी से उसका बिल अपने-आप चुका दिया गया। एयरपोर्ट पर क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर कॉफी ली। फिर इंदौर पहुँच कर भी ओला कैब ली। दिल्ली से इंदौर के पूरे सफर में वॉलेट सिर्फ एक बार निकाला। वो भी तब जब एयरपोर्ट पर मोबाइल पर ईटिकट दिखाते समय पहचान पत्र दिखाना होता है। दस साल पहले आप इस यात्रा की कल्पना कीजिए। तब नोटों की गड्डी लेकर पहले आप ट्रैवल एजेंट के पास जा कर टिकट लेते। फोन कर टैक्सी बुक कराते। एयरपोर्ट पर टैक्सी वाले को कैश देते। एयरपोर्ट पर कॉफी पीने के लिए बटुआ निकालते। इंदौर पहुंच कर फिर टैक्सी कर कैश देते। 

आठ नवंबर के बाद से मेरे लिए दुनिया बदल गई हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। कुछ साल पहले सोसाइटी में एक साथ कई फ्लैट में चोरी हुई थी। इसके बाद से घर में कैश रखना बिल्कुल बंद कर चुका था। आठ नवंबर को ऑफिस से घर आते समय कार में रेडियो पर प्रधानमंत्री का भाषण सुना और घर आते ही टटोला कि कितनी नकदी रखी है। पांच सौ और हजार के नोट में 8 हजार रुपए निकले। किराने वाले ने कहा कि चाहे तो नकदी उसके यहां जमा करा दें। मैंने थोड़े उसे दिए और बाकी इधर-उधर खर्च हो गए। दूध वाले ने कहा कि चेक से भुगतान कर सकते हैं। सब्जी वाले के साथ शुरुआत में दिक्कत आई। फिर कुछ समय उधार किया और बाद में नए नोट आने पर पुराना चुका कर सब्जी लेना शुरू कर दिया। आठ नवंबर के बाद से सिर्फ एक बार बैंक गया। चेक के एवज में 24 हजार रुपए निकाले। इसमें भी दो-दो हजार के दो नोट और बाकी सौ-सौ के नोट मिल गए तो काम चल गया। दफ्तर में खबर हो गई तो कई लोग सौ-सौ के नोट लेने आए। उन्हें खुल्ले देकर कुछ पुण्य भी कर लिया। नोट बंदी के बाद से सिर्फ दो बार एटीएम की लाइन में लगना पड़ा। वो भी सिर्फ असुरक्षा की भावना से ग्रसित हो कर कि अगर अचानक नकदी नहीं मिली तो क्या होगा। लेकिन बाद में एहसास हुआ कि ऐसा करने की जरूरत ही नहीं थी। दो शादियों में शगुन के लिए 500-500 रुपए के नए नोट भी देकर आया। चाहे इलाका हिंडन के नजदीक का हो लेकिन कैश लेस के मामले में दक्षिण दिल्ली से भी आगे है। अभी छुट्टी के दिन सोसाइटी के बाहर गोलगप्पे वाले ने भी पेटीएम से पैसे लिए और कुछ दिन पहले पेटीएम से भुगतान कर एलईडी बल्ब खरीदा।

हां ये जरूर है कि आठ नवंबर के बाद से खर्चों में थोड़ी कटौती हुई है। शुरू में नकदी खर्च करने से पहले कई बार सोचना पड़ता था। डर यही था कि अगर हाथ से नकदी चली गई तो फिर एटीएम की लाइन में लगना पड़ेगा। इस बीच मीडिया और सोशल मी़डिया पर कैश लेस और नकदी के बीच जोर शोर से बहस चल गई। कैश लेस के विरोधियों ने खूब डराया। कहा निजता का उल्लंघन होगा। उन मामलों की याद दिलाई जिनमें कई डेबिट कार्ड की सूचना हैक कर ली गई थी। कुछ ने यह कह कर उकसाया कि पेटीएम में चीनी कंपनी का पैसा लगा है और मास्टर-वीजा को मिलने वाला पैसा भी देश से बाहर चला जाता है। कुछ लोग क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर लगने वाले ट्रांजेक्शन शुल्क को ज्यादती मानते हैं। वहीं कुछ सिर्फ इसलिए विरोध करते हैं कि सरकार उन्हें कैश लेस या लेस कैश होने को क्यों कहती है। 

ऐसा नहीं है कि मुझे ऑनलाइन लेनदेन के खतरों का एहसास नहीं है। फिर ये सोचता हूं कि वैसे भी नौकरीपेशा लोगों की अधिकांश कमाई बैंकों में ही तो रखी जाती है। अगर अकाउंट हैक होने से किसी के पैसे गए तो घर से भी नकदी चोरी हुई है। बैंक से डिजीटल तरीके से पैसे चोरी होने पर तो फिर भी ट्रेल के जरिए चोर का पता लगने की संभावना होती है। मगर घर से चोरी गई नकदी कभी चोर या पुलिस से वापस मिली हो ऐसा कम ही होता है। करेंसी नोट भीग सकते हैं। होली के रंग में खराब हो सकते हैं। घर में आग लगने पर जल सकते हैं। बाढ़ आने पर बह सकते हैं। चोरों को सबसे पहले उन्हीं की तलाश होती है। 

फिर ये कोई नहीं कहता कि देश सौ फीसदी कैश लेस हो जाएगा। ऐसा होना असंभव है। भारत जैसे विविधिता वाले देश में जहां बड़ा तबका अब भी गरीबी रेखा के नीचे है और एक बड़ी आबादी ऐसे गांवों में रहती है जहां बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं, कैश लेस भारत की कल्पना बेमानी है। करोड़ों लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और अपनी रोजी-रोटी के लिए नकदी पर निर्भर है वहां लेस कैश का फार्मूला भी तब तक नहीं चल सकता जब तक इसके लिए बुनियादी ढांचा तैयार नहीं होता। इसीलिए नकदी कभी खत्म नहीं हो सकती। कम से कम निकट भविष्य में तो इसकी संभावना नहीं है। हां नकदी पर निर्भरता कम करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए तो अच्छा है ही। व्यक्तिगत तौर पर भी इसके फायदे ज्यादा हैं और नुकसान कम। इसलिए मैं तो लेस कैश के रास्ते पर काफी पहले ही निकल चुका हूं। नोट बंदी ने एक तरह से मेरे फैसले को मजबूती ही दी है। जो लोग इस रास्ते पर नहीं चलना चाहते उन्हें मेरी ओर से शुभकामनायें। 

Wednesday, 14 December 2016

नोट बंदी- लोहिया, इंदिरा और मोदी

"हम हिंदुस्तानी अपनी बरबादी से उतने दुखी नहीं हैं जितने कि दूसरे की बरबादी से खुश हैं।" संसद के गलियारों में एक अनुभवी सांसद ये सूत्र वाक्य नोट बंदी के संदर्भ में कहे गए। उनका ये मानना है कि चाहे गरीब और मजदूर तबका नोट बंदी के चलते बेरोजगारी, परेशानी और दूसरी दिक्कतों का सामना कर रहा हो मगर वो इस बात से खुश है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमीरों को न सिर्फ लाइन में लगा दिया बल्कि उनकी काली कमाई को दुनिया के सामने ला दिया। इन सांसद जैसे कई नेताओं का मानना है कि गरीब तबका इसी में खुश है कि कैसे पीएम ने अमीर-गरीब सबको एक ही लाइन में लगा दिया और जैसे एक-एक पैसे के लिए गरीब आदमी तरसता है, वैसे ही अमीर भी तरस रहे हैं।

इसे परपीड़ा से मिला आनंद कहा जा सकता है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या हमारा शोषित, दबा-कुचला वर्ग नोट बंदी को एक तरह का अघोषित अमीर-गरीब का वर्ग संघर्ष मान कर इसमें अपनी जीत देख रहा है। इसकी अधिक अच्छी व्याख्या तो समाजशास्त्री कर सकते हैं। लेकिन साठ के दशक में सोवियत संघ की जिन साम्यवादी नीतियों से प्रभावित होकर पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने वामपंथी समाजवाद के रास्ते पर ले जाने का प्रयास किया, क्या ये उसी दिशा में उठाया गया कदम है? कतई नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नजदीक से जानने का दावा करने वाले कुछ बीजेपी नेता उनके इस फैसले में प्रख्यात समाजवादी और नेहरु की नीतियों के विरोधी रहे राम मनोहर लोहिया की छाप जरूर देखते हैं। 

ये दूर की कौड़ी नहीं है। लोहिया के विचारों और मोदी के फैसलों में सामंजस्य के बारे में करीब से अध्ययन करने की आवश्यकता है अन्यथा नोटबंदी हो या फिर मोदी सरकार के गरीबों के हितों में लिए गए अन्य दूसरे फैसले, उनका निष्पक्ष और संतुलित विश्लेषण नहीं हो सकेगा। मिसाल के तौर पर देखें कि राम मनोहर लोहिया कहते थे- "सरकार को अमीरों की आय पर नहीं उनके खर्च पर टैक्स लगाना चाहिए। इससे जो पैसा बनेगा इससे एक सिंचाई योजना बना कर खेतों तक पानी पहुंचा दो। किसानों का विकास अपने-आप ही हो जाएगा।" कोई हैरानी नहीं है कि नोट बंदी के बाद आय कर कानून में संशोधन का जो बिल मोदी सरकार लाई है उसमें गरीब कल्याण कोष बनाने की बात कही गई है। इसमें काला धन छुपा कर रखने वालों को पचास फीसदी टैक्स देकर बाकी 25 फीसदी पैसा गरीब कल्याण कोष में चार साल सरकार के पास रखने का प्रस्ताव है। इस पर सरकार कोई ब्याज नहीं देगी और बिल में साफ कहा गया है कि इस रकम का इस्तेमाल गरीबों और किसानों की भलाई के लिए किया जाएगा। जबकि 25 फीसदी पैसा तुरंत लिया जा सकता है।

इसी तरह लोहिया संपत्ति के मोह के खिलाफ थे। उनका मानना था कि इससे देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढी है। वो अमीर और गरीब के बीच दीवार गिराने के पक्ष में रहे। उनका मानना था कि वंचितों की संख्या बहुत ज्यादा है और ऐसा करना उनके हक में होगा। लोहिया के समाजवाद को मानने वाले बीजेपी के हुकुम देव नारायण यादव जैसे खांटी नेता कहते हैं कि नोट बंदी का समर्थन देश के वो 85 फीसदी वंचित, गरीब, शोषित और पीड़ित और निम्न मध्य वर्ग के लोग कर रहे हैं जो अपना जीवन ईमानदारी की कमाई से गुजारते हैं। लेकिन पीएम मोदी की भ्रष्टाचार और काला धन विरोधी मुहिम के कामयाब होने के लिए ये जरूरी है कि पार्टी, सरकार और नौकरशाही का चेहरा बदले।

राजनीतिक हलकों में प्रधानमंत्री मोदी के नोट बंदी को इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ से जोड़ कर देखा जा रहा है। ये भी कहा जा रहा है कि चंद राजाओं के प्रिवीपर्स की मामूली रकम खत्म कर इंदिरा गांधी ने देश के एक बड़े हिस्से को ये संदेश देने में कामयाबी हासिल की थी कि राजे-रजवाड़े और जमींदारों के दिन देश में लद चुके हैं और अब गरीबों की भलाई के काम होंगे। इंदिरा ने इसे एक बड़े राजनीतिक नारे में बदल दिया। इसी तरह से बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला कर इंदिरा गांधी ने चुनावी कामयाबी हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाया था। तब कॉग्रेस ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के फैसले को गरीबों के हित में किया गया एक बड़ा फैसला बताया और वो जनता के बीच इसे लेकर गई। नोट बंदी के फैसले को भी इसी तरह गरीबों के हित में लिया गया फैसला परिभाषित करने और लोगों के बीच ले जाने में प्रधानमंत्री तो आगे हैं। मगर उनकी पार्टी पीछे रह गई। 

इसके पीछे एक और वजह मानी जा रही है। बीजेपी की पहचान मूल रूप से अगड़ी जातियों की पार्टी के रूप  में रही है। इनमें भी ब्राह्मण और बनिया जातियों की पार्टी के रूप में बीजेपी के विरोधी उसे पेश करते रहे हैं। लेकिन पिछड़े समाज से आने वाले नरेंद्र मोदी ने एक ही झटके में बीजेपी की इस पहचान को उखाड़ फेंका है। अब हालत ये है कि पारंपरिक समर्थक माने जाने वाला व्यापारी तबका नोट बंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित और नाराज है। जबकि बीजेपी के साथ अब तक सिर्फ हिंदुत्व के नाम पर जुड़ने वाला पिछड़ा वर्ग एक आर्थिक फैसले के चलते साथ खड़ा नजर आने लगा है। नरेंद्र मोदी सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के फैसलों की याद दिलाते दिख रहे हैं तो वहीं कुछ लोगों को उनमें लोहिया की समाजवादी सोच की झलक दिखने लगी है। एक समानता ये भी दिखती है कि जहां लोहिया देश में गैर कांग्रेसवाद के जनक माने जाते हैं वहीं नरेंद्र मोदी ने कॉग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया। 

Tuesday, 13 December 2016

नोट बंदी के सफर में आएंगे ये दो महत्वपूर्ण पड़ाव

नोट बंदी का एक महीना पूरा होने के बाद लोगो में इसके प्रति उत्साह और समर्थन में धीरे-धीरे कमी आने लगी है। इसकी बड़ी वजह लोगों के हाथ में नकदी न आना है। बैंकों के सामने लाइनें वैसी ही लगी हैं जैसी शुरुआत में थीं। एटीएम से नकदी निकालने की सीमा न हटना और बैंकों से लोगों को पैसा न मिल पाना लोगों की हताशा को बढ़ा रहा है। 

इस बीच, देश भर से नोट बंदी के छोटे उद्योग-धंधों, खेती-किसानी, रोजगार, व्यापार आदि पर विपरीत असर की खबरें तेजी से आने लगी हैं। शहरों से बड़ी संख्या में मजदूर और श्रमिक गांवों की ओर पलायन करने लगे हैं क्योंकि वो जहां काम करते हैं, वहां काम फिलहाल बंद कर दिया गया है। 

ऐसे छोटे व्यापारी जिनका कामकाज सिर्फ नकदी पर निर्भर है, बड़ी संख्या में बेरोजगार होने लगे हैं। इसी बीच, टेलीविजन पर करोड़ों की तादाद में 2000 रुपए के नए नोट की देश भर से बरामद होती तस्वीरों ने लोगों को विचलित कर दिया है। वो सोच रहे हैं कि जिस 2000 रुपए के सिर्फ एक नोट के लिए वो ठंड में ठिठुरते दिन-रात बैंकों और एटीएम के सामने लगे हैं, रसूखदार लोग इन नोटों की गड्डियों से खेल कर उनकी भावनाओं पर चोट कर रहे हैं। 

आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एलान के बाद लोगों की उम्मीदें बंधी थीं कि काले धन पर अंकुश लगेगा और जो लोग काले धंधे कर रहे हैं उन्हें सजा मिलेगी। इसी उम्मीद में लोगों ने तकलीफें झेलने के बावजूद पीएम का साथ दिया क्योंकि आज भी किसी दूसरे नेता की तुलना में उनकी साख लोगों के मन में बहुत ज्यादा है। लेकिन जैसा कहा जाता है कि आशा टूटने पर पहले निराशा होती है, जो जल्दी ही हताशा में बदल जाती है और इसकी परिणिति क्रोध में होती है। तो क्या नोट बंदी के नतीजों और असर से निराश और हताश लोग क्रोध की ओर बढ़ रहे हैं? 

फिलहाल तो इसका उत्तर न है। लेकिन अगर जल्दी ही नकदी का संकट दूर नहीं हुआ तो ये हताशा गुस्से का रूप भी ले सकती है। अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। खासतौर से उत्तर प्रदेश जैेसे बेहद महत्वपूर्ण राज्य में जहां अगले दो महीनों में चुनाव होने की संभावना है। साथ ही, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर मे भी चुनाव होने हैं। ऐसे में सबकी नजरें फिर प्रधानमंत्री पर टिक गई हैं कि वो लोगों के धैर्य और समर्थन का क्या जवाब देते हैं और उनकी आशा, हताशा में न बदले इसके लिए किन कदमों का एलान करते हैं। 

पहला पड़ाव

इस दृष्टिकोण से पहला पड़ाव बेहद महत्वपूर्ण है। संभावना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन या चार जनवरी को लखनऊ में एक बड़ी रैली करेंगे। पहले यह रैली 24 दिसंबर को परिवर्तन यात्राओं के समापन पर होनी थी। लेकिन नोटबंदी के बाद इसे टाल दिया गया। वजह ये है कि पुराने नोट बैंकों में जमा कराने की अंतिम तारीख 30 दिसंबर है। तब सरकार को ये अंदाजा लग जाएगा कि कितने पुराने नोट बैंकों में आए। इससे एक आकलन हो सकेगा कि सरकार के हाथ में कितना पैसा आएगा। 

इसी तरह काले धन को सफेद करने के लिए सरकार की नई गरीब कल्याण योजना के शुरुआती रुझान भी इस महीने के अंत तक मिल जाएंगे। यानी सरकार को औपचारिक रूप से ये पता चलेगा कि 8 नवंबर को जिस नोटबंदी का एलान किया गया था उसका जमीन पर क्या असर हुआ है। खुद प्रधानमंत्री ने भी लोगों से पचास दिन का समय मांगा था जिसकी मियाद इस महीने के अंत में पूरी हो जाएगी। ऐसे में माना जा रहा है कि जनवरी के पहले हफ्ते की रैली में प्रधानमंत्री कुछ महत्वपूर्ण एलान कर सकते हैं। 

ये किसानों के लिए बड़ी राहत के एलान भी हो सकते हैं। साथ ही मजदूरों के लिए भी जिन्हें कहा जा सकता है कि उनका वेतन सीधे बैंक खातों में पहुंचेगा ताकि बिचौलये उनकी गाढ़ी मेहनत की कमाई बीच में न खा सकें। नोट बंदी कर पीएम ने बीजेपी की पारंपरिक ब्राह्मण-बनिया पार्टी की छवि को हमेशा के लिए बदल दिया है। बीजेपी अब गरीबों की पार्टी बन कर उभर रही है। ऐसे में गरीबों के लिए पीएम के एलान पर सबकी नजरें रहेंगी। 

नोट बंदी को जबर्दस्त समर्थन देने वाले युवाओं के लिए भी प्रधानमंत्री कुछ घोषणाएं कर सकते हैं। ये माना जा रहा है कि पांच राज्यों में चुनाव फरवरी-मार्च में होंगे। ऐसे में पीएम की ये रैली बीजेपी के चुनावी भविष्य के लिए बेहद अहम होगी क्योंकि तब तक चुनाव कार्यक्रमों का एलान हो चुका होगा। 

दूसरा पड़ाव

प्रधानमंत्री के जो एलान लखनऊ में होंगे उन्हें कानूनी जामा पहनाने के लिए दूसरा पड़ाव भी बेहद महत्वपूर्ण है। ये है एक फरवरी जिस दिन वित्त मंत्री अरुण जेटली आम बजट पेश करेंगे। इस बार बजट फरवरी के अंतिम दिन के बजाए पहले दिन पेश किया जा रहा है। 

यह एक नई परंपरा है। इसके पीछे सोच ये है कि बजट को संसद की जल्दी मंजूरी मिले ताकि विकास कार्यों में तेजी आ सके। हालांकि नोट बंदी ने बजट के कार्यक्रम को झकझोर दिया है। सरकार को इस बजट में कई चीजों का ध्यान रखना है। जैसा शुरू में उल्लेख किया गया है कि नोट बंदी ने अर्थ व्यवस्था को चोट पहुँचाई है। आर्थिक विकास दर में मंदी, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, बेरोजगारी में बढोत्तरी, कृषि उत्पादन पर असर जैसे प्रभाव देखने को मिलेंगे।

 ऐसे में वित्त मंत्री के सामने बड़ी चुनौती देश को ये  विश्वास दिलाना होगा कि सब कुछ न सिर्फ ठीक है बल्कि भारत सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था का अपना स्थान बनाए रखेगा। उम्मीद है कि वित्त मंत्री मध्य वर्ग को भी आयकर में राहत दे सकते हैं। इसी तरह किसानों और मजदूरों के लिए भी वित्त मंत्री के बजट में कई सौगातें हो सकती हैं। ये ध्यान रहे कि बजट जिस समय पेश होगा तब आदर्श आचार संहिता लागू रहेगी। लेकिन अमूमन इसकी वजह से बजट घोषणाओं पर असर नहीं होता क्योंकि बजट पूरे देश के लिए होता है किसी एक या दो राज्य के लिए नहीं। किसी राज्य विशेष के लिए घोषणाओं से बचा जाता है।

अगले दो महीनों में पीएम और वित्त मंत्री के इन दो महत्वपूर्ण कदमों से नोट बंदी को लेकर अर्थ व्यवस्था पर पड़ने वाले असर को लेकर कई चीजें तय हो जाएंगी। जाहिर है इस बीच भी सरकार लोगों को राहत देने के लिए कदमों का एलान करती रहेगी। लेकिन बीजेपी नेताओं की उम्मीदें इन्हीं दो घटनाक्रमों पर टिकी हैं। इन्हीं से तय होगा कि लोगों का मूड कैसा रहेगा और नोट बंदी को लेकर चुनावों में ऊंट किस करवट बैठेगा।