Thursday, 6 November 2014

मोदी से क्यों नहीं सीखते मंत्री?

पंद्रह अगस्त को जब नरेंद्र मोदी लाल किले पर झंडा फहराने पहुंचे तो राजनीतिक विश्लेषकों ने उनके भाषण से बड़ी-बड़ी उम्मीदें बांधीं। उन्हें लगा कि जो व्यक्ति बरसों से यहां पहुँचने का सपना देख रहा था, वो अपने पहले भाषण में बड़े मुद्दे उठाएगा, देश को नए सपने दिखाएगा, नए वादे करेगा, अरबों-खरबों की योजनाओं की बात करेगा। मगर ये क्या? मोदी तो खुले में शौच बंद करने और साफ-सफाई पर ज़ोर देते नज़र आए।

ये कोई बहस का विषय ही नहीं है कि खुले में शौच बंद करने और साफ-सफाई का मुद्दा कोई छोटा विषय है। ये उतना ही गंभीर और महत्वपूर्ण विषय है जितना कि देश में विदेशी निवेश को बढ़ावा देना या लाखों बेरोजगारों को नौकरी देना या फिर महंगाई कम कर लोगों को राहत देना। लेकिन सवाल ये है इस बारे में प्रधानमंत्री को बोलने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई? क्या ये बात नीचे से शुरू नहीं होनी चाहिए थी?

हमारी शासन प्रणाली ब्रिटन के वेस्टमिंस्टर पद्धति पर आधारित है। प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल का प्रमुख होता है। यानी वो बराबरी में पहला या फर्स्ट अमंग इक्वल्स है। ये सही है कि समय के साथ-साथ प्रधानमंत्री की ताकत बढ़ती गई है। ये व्यक्ति विशेष पर भी निर्भर करता है। भारत के संदर्भ में ये बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सभी तरह के प्रधानमंत्री हुए हैं। कई ऐसे जिन्होंने अपनी ताकत का भरपूर इस्तेमाल किया और कुछ ऐसे भी जिन पर आरोप लगता रहा कि उन्होंने पद की गरिमा को घटाया।

मगर सवाल ये है जिस तरह से मोदी आम लोगों से जुड़ी छोटी-छोटी बातों की परवाह कर उन्हें राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उठा रहे हैं ऐसा करने में उनके मंत्रिमंडल के कुछ साथी क्यों पीछे रह जाते हैं। मोदी ने एक ऐसी ही बात दस्तावेज़ों को अटेस्ट करने को लेकर की। लाखों लोग हर रोज़ फोटोकॉपियों और हलफनामों को सत्यापित कराने के लिए राजपत्रित अधिकारियों की खोज में भटकते हैं। अब ऐसा करना जरूरी नहीं रहा।

आपमें से कितने हैं जिन्हें कभी रेलवे स्टेशन पर ऐसा कुली मिला हो जो रेल मंत्रालय की तय की गई दरों के हिसाब से आपका सामान गाड़ी तक पहुँचा दे? आप किसी बुजुर्ग को गाड़ी तक पहुँचाना चाह रहे हों और व्हील चेयर मिल जाए और कुली उचित दर पर पहुंचा सके? क्या भारत में ऐसा हो पाना मुमकिन है कि आप बिना कुली की मदद लिए और सीढ़ियां चढ़े सीधे गाड़ी तक चले जाएं? आपकी यात्रा का अचानक कार्यक्रम बने और आप चाहे कुछ अधिक पैसे ही देकर सही, कनफर्म बर्थ लेकर ट्रेन की यात्रा कर सकें?

रेल भवन में बैठ कर बुलेट ट्रेन की योजना बनाने वाले रेल मंत्री क्या इन विषयों पर ध्यान नहीं दे सकते? क्या वे अपने अधिकारियों से सख्ती से वो काम नहीं करा सकते जो उनका दायित्व है। ऐसा क्यों होता है कि त्यौहार के मौके पर स्टेशनों पर भगदड़ जैसे हालात बनते हैं और रेल मंत्रालय पहले से अधिक गाड़ियों की व्यवस्था नहीं कर सकता।

हाईवे पर टोल के लिए एक अच्छी व्यवस्था शुरू की गई है। ई-टोल से लोगों की दिक्कतों का हल होगा। मगर ये अभी शुरुआती व्यवस्था है। एनएचएआई 22, 28, 32 रुपए इस तरह से टोल की दरें क्यों रखता है, 20, 30, 35 रुपए आदि क्यों नहीं? छुट्टे पैसों को लेकर विवाद, उनके बदले चिप्स या टॉफी पकड़ना और समय की बर्बादी क्या एक छोटा सा कदम उठा कर नहीं रोकी जा सकती?

हममें से कितने लोग इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए बीएसएनल की सेवाएं लेने का जोखिम उठा सकते हैं? ऐसा नहीं है कि निजी कंपनियों की सेवाओं से लोग संतुष्ट हैं। मगर इसके अलावा विकल्प ही क्या बचा है। मोदी जिस डिजीटल इंडिया की बात कर रहे हैं उसे बीएसएनएल गांव-गांव तक कैसे पहुँचाएगा?


लोगों के जीवन में बड़ी बातों के बजाए छोटी-छोटी बातों का अधिक असर होता है। लोगों की शिकायतें बड़े मुद्दों के बजाए अपने आसपास आ रही कठिनाइयों को लेकर होती है। इन्हीं से सरकार और नेताओं के बारे में उनकी राय बनती है। यही राय चुनावों के वक्त ईवीएम के जरिए दिखती है। ऐसा नहीं है कि नेता ये बात जानते नहीं। मगर जानते हुए भी अंजान बन कर वो किसी और का नहीं, अपना ही नुकसान कर रहे होते हैं।