Wednesday, 1 October 2014

मोदी की अमेरिका यात्रा के मायने


हम भारतीयों के लिए घर की मुर्गी दाल बराबर है। घरेलू प्रतिभाओं की कदर तभी होती है जब वो विदेश में अपना जलवा दिखाए या फिर विदेशी उसका लोहा माने। ओलंपिक में मेडल जीता खिलाड़ी, विदेशी फिल्म फेस्टीवल में नाम कमाई कोई फिल्म या परदेश में योग या आध्यात्म का झंडा फहराने वाला कोई योगी या साधु, भारत में उनका सम्मान बढ़ जाता है।

नेताओं के साथ बात उलट है। विदेश में उनका सम्मान इस बात से तय होता है कि भारत में उनकी क्या हैसियत है। ये अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का नियम है। आज़ादी के आंदोलन के नायकों में से एक रहे जवाहर लाल नेहरू की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पहले से ही थी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन और पंचशील सिद्धांतों से वो एक अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी अलग-अलग कारणों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोकप्रिय रहे। उनके बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आता है जिन्हें अपनी उदार छवि, विदेशों में बसे भारतीयों और परमाणु परीक्षणों के चलते दुनिया भर में एक अलग पहचान मिली।

नरेंद्र मोदी का मामला थोड़ा अलग है। 2002 के गुजरात दंगों और उसके बाद उठे विवादों के चलते अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनका नाम बार-बार उछलता रहा। लेकिन उन्होंने गुजरात में निवेश बढ़ाने के लिए ग्लोबल समिट कर अपनी विवादास्पद छवि को बदलने की कोशिश की। अमेरिका और योरोप के कुछ देशों को छोड़ ज़्यादातर मुल्कों ने उनके साथ छुआछुत का रवैया खत्म कर दिया। जब लगा कि वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो योरोप के बचे-खुचे देशों में भी उनसे हाथ मिलाने की होड़ लग गई। लेकिन गुजरात दंगों की वजह से 2005 से ही उन्हें वीजा न देने वाला अमेरिका दूर ही खड़ा रहा।

मोदी के संदर्भ में अमेरिका ने अपना रवैया ऐन वक्त पर बदला। चुनाव के दौरान जब ये एहसास हुआ कि मोदी की लोकप्रियता उनके विरोधियों से बहुत ज़्यादा है तब दोस्ती का हाथ बढ़ाया। मोदी के प्रति असहिष्णु रवैया रखने वाली राजदूत को अचानक हटा दिया। जीतने के बाद राष्ट्रपति ओबामा ने दो बार फोन किया। जब ये तय हो गया कि वो अमेरिका आएंगे तब दो वरिष्ठ मंत्रियों ने उनसे दिल्ली जाकर मुलाकात की।

इसीलिए मोदी के अमेरिकी दौरे का जहां उनके अपने लिए व्यक्तिगत तौर पर महत्व था, वहीं अमेरिका ने भी इस मौके का इस्तेमाल रिश्तों की खटास को दूर करने और उनके साथ नई समझ को विकसित करने के लिए किया। अमूमन संयुक्त राष्ट्र आम सभा के संबोधन के लिए आने वाले राष्ट्र प्रमुखों के साथ राष्ट्रपति ओबामा की मुलाकात नहीं होती, लेकिन मोदी के लिए खासतौर से हाथ बढ़ाया गया।

मोदी से ओबामा ने दो बार मुलाकात की। दोनों बार उन्हें व्हाइट हाउस बुलाया गया। पहली बार डिनर पर और दूसरी बार प्रतिनिधि स्तर की बातचीत के लिए। अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने उन्हें लंच दिया। मेडिसन स्केवयर गार्डन पर मोदी के साथ मंच पर अमेरिकी कांग्रेस के कई सदस्य और सेनेटर दिखाई दिए।

ये आपसी समझ बढ़ाने की कवायद है। दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। अमेरिका डब्ल्यूटीओ पर भारत के रुख से नाखुश है तो मोदी नहीं चाहते कि अफगानिस्तान को लेकर अमेरिका जल्दबाजी में कोई फैसला करे। बिगड़ी अर्थव्यवस्था पटरी पर लाने के लिए मोदी को अमेरिकी निवेश की दरकार है तो वहीं अमेरिका को अपने यहां रोजगार बढ़ाने के लिए भारत में नए मौकों की। लेन-देन के इस कूटनीतिक खेल में आपसी हिस्सेदारी, नए रिश्ते, सहयोग जैसे मोटे-मोटे शब्द उछाल दिए जाते हैं। मगर ये जरूर है कि मोदी के लिए जिस तरह से अमेरिकी प्रशासन ने लाल कालीन बिछाया है, इसके पीछे बड़ी वजह भारत में उन्हें मिला जनता का अपार समर्थन और अगले पांच साल के लिए देश के सामने रखा विकास का एजेंडा है जिसमें अमेरिका को अपने लिए भी कारोबार की कई गुंजाइशें दिखती हैं।