Monday, 31 March 2014

सबसे बड़ा रुपैया!


क्या है इस लोक सभा चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा? विकास, महंगाई, भ्रष्टाचार, खस्ता अर्थव्यवस्था, सांप्रदायिकता, अशिक्षा, बेरोजगारी या फिर कुछ और? प्रमुख नेताओं के भाषणों में इन सारे मुद्दों का जिक्र बार-बार हो रहा है। अपनी पहली चुनावी रैली में सोनिया गांधी ने कहा कि कांग्रेस ने गंगा-जमुनी तहज़ीब को मजबूत किया है जबकि बीजेपी नफरत की राजनीति कर देश को कमजोर कर रही है। वहीं नरेंद्र मोदी यूपीए सरकार की नाकामियों का जिक्र कर विकास को बड़ा मुद्दा बनाना चाह रहे हैं।

तो क्या बीजेपी ने हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों को ताक पर रख दिया है? उत्तर प्रदेश में कई रैलियों को संबोधित कर चुके नरेंद्र मोदी ने एक बार भी अयोध्या में राम मंदिर का जिक्र नहीं किया। जम्मू-कश्मीर में अपनी रैली में मोदी ने धारा 370 पर नए सिरे से बहस की मांग की थी। उनके भाषणों से समान नागरिक संहिता का मुद्दा भी गायब है। राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता वो तीन मुद्दे हैं जिनसे बीजेपी के कट्टर हिंदुत्व की पहचान होती है। लेकिन 1998 में सरकार बनाने के साथ ही बीजेपी इन्हें ताक पर रखती आई है और इस बार भी ऐसा ही हो रहा है।

इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख पत्र पांचजन्य में एक सर्वे प्रकाशित हुआ है। इसके मुताबिक अधिकांश लोगों को राम मंदिर नहीं विकास चाहिए। सर्वे कहता है कि लोग रोजगार, बिजली, पानी, सड़क, अस्पताल, बिजली और सस्ता अनाज चाहते हैं। लोगों से पूछा गया था कि रोज़मर्रा की जिंदगी में उनके लिए क्या जरूरी है और इसका यही जवाब मिला। शायद इसी से इशारा मिलता है कि बीजेपी इस चुनाव में हिंदुत्व के मुद्दों पर ध्यान क्यों नहीं दे रही है।

तीन अप्रैल को बीजेपी का घोषणापत्र जारी होगा। घोषणापत्र तैयार करने वाले नेताओं ने संकेत दिया है सबसे ज्यादा ध्यान अर्थ व्यवस्था पर दिया जाएगा। बिगड़ी अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए आधारभूत ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश को प्रोत्साहन करने का वादा होगा। युवाओं के लिए रोजगार मुहैया कराने का वादा होगा। महंगाई की मार झेल रहे मध्य और निम्न वर्ग के लिए करों में सुधार का वादा होगा। सरसरी तौर पर राम मंदिर का जिक्र किया जाएगा। इस बारे में वही वादा होगा जो 2009 में किया गया था यानी आपसी बातचीत या अदालत के फैसले के जरिए इस विवाद का समाधान।

2014 के चुनाव को मुद्दा विहीन चुनाव कहा जा रहा है मगर ऐसा है नहीं। इस चुनाव में महंगाई और रोजगार बड़े मुद्दे बन कर उभर रहे हैं। ये ऐसा पहला चुनाव नहीं है जहां देश की अर्थ व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा बन गई है। इससे पहले के कई चुनावों में भी लोगों के जीवन को बेहतर बनाने या फिर गरीबी हटाने जैसे वादे कर राजनीतिक दलों ने कामयाबी हासिल की हैं। कांग्रेस ने पिछला चुनाव तो आम आदमी के नाम पर ही जीता था।

लेकिन बीजेपी के लिए ये चुनाव अपने से छिटक गए मध्य वर्ग को फिर पास लाने का है। शहरी इलाकों में इस वर्ग की कांग्रेस से नाराजगी को भुनाने, दस करोड़ नए युवा वोटरों को रोजगार के मुद्दे पर साथ लाने और ग्रामीण क्षेत्रों में तरक्की का लाभ पहुँचाने का वादा कर बीजेपी मैदान में उतरी है। इसीलिए नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में बार-बार गुजरात और अन्य बीजेपी शासित राज्यों में हो रहे विकास की बात करते हैं। पार्टी ने आर्थिक मोर्चे पर वाजपेयी सरकार और यूपीए सरकार की तुलना करने वाले आँकड़े भी जारी किए हैं। इनके जरिए बीजेपी ने ये साबित करने की कोशिश की है कि वाजपेयी सरकार एक मजबूत अर्थ व्यवस्था छोड़ कर गई थी लेकिन यूपीए ने उसे पटरी से उतार दिया। पिछले दो दिनों में बीजेपी ने अलग-अलग शहरों में प्रेस कांफ्रेंस कर वित्त मंत्री पी चिदंबरम पर हमला बोला है। जाहिर है बीजेपी की कोशिश अर्थ व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को बड़े चुनावी मुद्दे बनाने की है।

वैसे तो आंकड़ों के मायाजाल से भरपूर अर्थ व्यवस्था एक ऐसा विषय है जो चुनाव के लिहाज से बेहद रूखा माना जाना चाहिए। खासतौर से भारत जैसे देश में जहां उम्मीदवार की जाति और धर्म पहले पूछा जाता है पार्टी और विचारधारा बाद में। अर्थ व्यवस्था कोई भावनात्मक मुद्दा भी नहीं है। मगर रोटी, कपड़ा और मकान  इंसान की बुनियादी जरूरत है। शायद इसीलिए कहते भी हैं सबसे बड़ा रुपैया!
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Saturday, 29 March 2014

अपनों से ही जूझता बीजेपी नेतृत्व


क्या ये ऐसी पार्टी है जो वाकई दस साल बाद सत्ता के नजदीक पहुँचती दिखाई दे रही है? बीजेपी में पिछले तीन हफ्तों में मचा घमासान तो कम से कम इस बात का सबूत नहीं देता। टिकटों को लेकर मारा-मारी, विरोध, खींचतान, पार्टी नेताओं के पुतले जलाना, नए नेताओं और गठबंधनों को लेकर विरोध को सार्वजनिक करना। एक-दूसरे के खिलाफ बयान देना। उप प्रधानमंत्री पद के लिए दो-दो दावेदारों के नाम आगे करना। या फिर ये सब घमासान सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि बीजेपी सत्ता के नजदीक पहुँचती दिख रही है और हर शख्स सत्ता की बंदरबाट में अपना हिस्सा चाहता है?

बीजेपी में इस वक्त फ्री फॉर ऑल क्यों है? ऐसा क्यों लग रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व कमजोर पड़ रहा है? क्यों पार्टी के नेता आगे निकलने के चक्कर में एक-दूसरे के पैरों पर अपने पैर रख रहे हैं? अगर सरकार बनने से पहले ही आपसी लड़ाई का ये हाल है तो सरकार बनने पर क्या होगा? क्या मंत्री बनने और मंत्रालयों के बंटवारे के लिए पार्टी के नेता एक दूसरे के सिर कलम नहीं कर देंगे?

दरअसल इसके लिए बीजेपी के बुनियादी चरित्र को समझना होगा। कैडर आधारित राजनीतिक दल वो चाहे लेफ्ट पार्टियां हो या फिर बीजेपी, सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत पर आगे बढ़ती हैं। पहले जनसंघ और अब बीजेपी, कभी भी एक व्यक्ति का निर्विवाद रूप से नेतृत्व न तो रहा है और न ही रह सकता है। बीजेपी की डोर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हाथों में है। ये जरूर है कि बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और पार्टी में नंबर एक के स्थान पर रहे। मगर संतुलन बनाए रखने के लिए लाल कृष्ण आडवाणी को नंबर दो की जगह दी गई। इसी तरह अब जबकि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया है, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह जोड़ी के रूप में उनके साथ दिखाई देते हैं।

लेकिन मोदी सर्वशक्तिशाली न हो जाएं इसके लिए लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज जैसे नेताओं की नाराजगी को पार्टी नजर अंदाज कर देती है ताकि आडवाणी-सुषमा की जोड़ी मोदी के बराबर संतुलन बना कर रख सके। लेकिन बीजेपी में क्या दूसरे नेताओं को भी वही स्थान या ताकत हासिल है जो आडवाणी और सुषमा को है? क्या पार्टी के दूसरे नेता भी अपनी नाराजगी सार्वजनिक कर अनुशासन की लक्ष्मण रेखा पार न करने के आरोप से बच सकते हैं? शायद ऐसा नहीं है।
जेडीयू से बीजेपी में आए साबिर अली का पार्टी के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने सार्वजनिक रूप से ट्विटर पर विरोध किया। तर्क दिया जा सकता है कि श्रीरामुलु को बीजेपी में शामिल करने का विरोध सुषमा स्वराज ने भी ट्विटर पर दिया था इसलिए नकवी ने क्या गलत किया। लेकिन नकवी ने दाऊद इब्राहीम का नाम बीजेपी से जोड़ कर चुनाव के वक्त पार्टी का जबर्दस्त नुकसान कर डाला। शायद इसीलिए बीजेपी का एक धड़ा साबिर अली के साथ उनके खिलाफ भी कार्रवाई के पक्ष में है। ये जरूर है कि साबिर अली ने खुद ही अपनी सदस्यता को होल्ड पर रखने की बात कह कर पार्टी को राहत दे दी है।

तेरह सितंबर 2013 को नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था। तब राजनीतिक जानकारों ने संभावना व्यक्त की थी तेरह सितंबर के पहले की बीजेपी और तेरह सितंबर के बाद की बीजेपी में जमीन-आसमान का फर्क होगा क्योंकि नेतृत्व का मसला हल होने के बाद से अंदरूनी विरोध, आपसी लड़ाई-झगड़े अब सार्वजनिक नहीं होंगे, पार्टी के नेताओं के काम करने के तरीके में बदलाव आएगा, सब एकजुट होकर दस साल से सत्ता का वनवास झेल रही पार्टी को सरकार में लाने के लिए काम करेंगे। लेकिन पिछले तीन हफ्तों के कलह ने पार्टी को सत्ता की दौड़ में पीछे धकेल दिया है। कमजोर दिखता नेतृत्व, जिसे पार्टी के भीतर से ही चुनौती मिल रही हो, क्या बीजेपी के मिशन 272 को पूरा कर पाएगा?

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Friday, 28 March 2014

मोदी या फिर कोई नहीं

लोक सभा चुनाव के लिए पहला वोट डलने में अभी ग्यारह दिन बाकी हैं और नतीजे 16 मई को आएंगे। मगर बीजेपी और सहयोगी पार्टियों में आवाज़ें उठनी शुरू हो गई हैं कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो उप प्रधानमंत्री कौन बनेगा। जबकि विपक्ष पार्टियां चुटकी ले रही हैं कि पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा इस बात के लिए सक्रिय है कि पार्टी की किसी सूरत में 160-170 से ज़्यादा सीटें न आ पाएं ताकि नरेंद्र मोदी की जगह लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज या राजनाथ सिंह जैसे किसी नेता को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल सके। बीजेपी के बारे में कहा जा रहा है कि उसमें दो धड़े हैं। एक 170 ग्रुप जो चाहता है पार्टी की सीटें 170 के ऊपर न जाएँ ताकि मोदी की जगह कोई और पीएम बन सके। दूसरा 270 ग्रुप। जो मोदी को प्रधानमंत्री बनाना चाहता है।

जाहिर है ये सब काल्पनिक प्रश्न हैं। लेकिन राजनीति में कुछ भी हो सकता है। इसीलिए बीजेपी के भीतर भी मोदी विरोधी अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। बीजेपी में ये आरोप भी लग रहे हैं कि कुछ नेता चाहते हैं कि पार्टी की सीटें अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में आईं 180 सीटों से ऊपर न जाए ताकि मोदी प्रधानमंत्री न बन सकें। इन आरोपों की पुष्टि के लिए ये दलीलें दी जा रही हैं कि कुछ नेताओं के दबाव में पार्टी ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर गलत टिकट बांटे हैं ताकि वहां पार्टी की संभावनाओं को चोट पहुँचाई जा सके।

इसी तरह उप प्रधानमंत्री पद को लेकर भी दावे शुरू हो गए हैं। दिल्ली के नेताओं में नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाने वाले अरुण जेटली अमृतसर से चुनाव मैदान में हैं और उनकी पहली ही सभा में बीजेपी की सहयोगी पार्टी अकाली दल के मुखिया सरदार प्रकाश सिंह बादल ने कह दिया कि जेटली वित्त मंत्री बनने के साथ-साथ उप प्रधानमंत्री भी बनेंगे। हालांकि जेटली ने बादल के इस बयान को चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषणों जैसा ही बता कर ज्यादा तूल न देने की बात कही। इसी बीच, मध्य प्रदेश के विदिशा से चुनाव लड़ रहीं सुषमा स्वराज के बारे में पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के भतीजे और शिवराज सिंह चौहान सरकार में मंत्री सुरेंद्र पटवा ने यही बात कह दी।

इन तमाम बयानों से बीजेपी के विरोधियों को खिल्ली उड़ाने का मौका मिला है। तो वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भौंहें तन गई हैं। बीजेपी में टिकटों को लेकर चल रही खींचतान पर संघ पहले ही नाराज़गी जता चुका है। लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज और जसवंत सिंह को लेकर संघ ने अपना रुख भी साफ कर दिया था।

अब खबरों के मुताबिक आरएसएस ने साफ कर दिया है कि बीजेपी में या तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री होंगे या फिर कोई नहीं होगा। वैसे तो संघ को भरोसा है कि बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियां बहुमत के नजदीक पहुँचेंगे। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो बीजेपी सरकार बनाने के लिए मोदी की जगह किसी और को प्रधानमंत्री बनाने के लिए नए सहयोगियों की तलाश नहीं करेगी। संघ की और से ये भी कहा गया है कि अगर बीजेपी की सीटें उम्मीद के अनुसार नहीं आती हैं तो सरकार बनाना या फिर विपक्ष में बैठना ये भी मोदी खुद ही तय करेंगे।


जाहिर है संघ की ओर से ये संकेत उन तमाम नेताओं के लिए है जिनकी अपनी महत्वाकांक्षाएँ ज़ोर मार रही हैं। संघ को बड़े पैमाने पर भितरघात का डर भी सता रहा है और टिकट बंटवारे से ये बात साफ भी हो रही है। संघ इस बात से भी चिंतित है कि मोदी के पक्ष में बना माहौल कहीं इन आशंकाओं के चलते न बिगड़ जाए कि ज़रूरत पड़ने पर बीजेपी उनकी जगह किसी और नेता को भी प्रधानमंत्री बना सकती है। इसीलिए ये बात स्पष्ट कर दी गई है। लेकिन इसके बावजूद इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मोदी को रोकने के लिए बीजेपी के भीतर ही चल रहीं कोशिशें रुक जाएंगी।
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Thursday, 27 March 2014

क्यों बरसे मोदी केजरीवाल पर?


दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान से ठीक पहले चाँदनी चौक पर नरेंद्र मोदी ने की थी एक जनसभा। इसमें पहली बार उन्होंने आम आदमी पार्टी के बारे में कुछ शब्द कहे थे। अरविंद केजरीवाल का नाम लिए बगैर कहा था कि जिन लोगों ने अण्णा हजारे जैसे संत को धोखा दे दिया दिल्ली की जनता उन पर भरोसा न करे। बीजेपी के रणनीतिकार आम आदमी पार्टी को दिल्ली के चुनाव में ज़्यादा गंभीरता से नहीं ले रहे थे। शायद यही वजह है कि मोदी ने भी अपने भाषणों में केजरीवाल  और उनकी पार्टी को ज्यादा तरजीह नहीं दी थी।

लेकिन आम आदमी पार्टी को नज़रअंदाज़ करने का खमियाज़ा बीजेपी को भुगतना पड़ा। बड़ी संख्या में युवाओं और मध्य वर्ग ने झाड़ू को वोट दिया। आम आदमी पार्टी को मिली ऐतिहासिक कामयाबी ने बीजेपी के समीकरण बिगाड़ दिए। केजरीवाल की पार्टी ने बीजेपी को दिल्ली में सत्ता में आने से रोक दिया। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मिली बीजेपी की कामयाबी को भुला कर मीडिया दिन-रात केजरीवाल के गुणगान में लग गया। ये बात अलग है कि केजरीवाल ने दिल्ली में 49 दिन की सरकार जिस तरह चलाई और इस्तीफा दिया उससे दिल्ली में उन्हें वोट देने वाले एक बड़े तबके की नाराजगी झेलनी पड़ी।

अरविंद केजरीवाल एक बार फिर सुर्खियों में हैं। पूरे देश में उनकी पार्टी ने तीन सौ से ज़्यादा उम्मीदवार लोक सभा चुनाव के लिए ख़ड़े कर दिए हैं। कई जगहों पर उनके उम्मीदवारों की साफ-सुथरी छवि मतदाताओं को इस पार्टी की ओर आकर्षित कर रही है। दिल्ली में सरकार छोड़ने पर केजरीवाल लोगों को सफाई दे रहे हैं। जनमत सर्वेक्षणों में नरेंद्र मोदी की जीत की भविष्यवाणी को देखते हुए केजरीवाल ने उन्हें अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया है। गुजरात में रोड शो कर मोदी पर तीखे हमले किए। उनसे किसानों की आत्महत्या से लेकर अडानी उद्योग समूह को फायदा पहुँचाने जैसे 16 सवाल पूछे। रही-सही कसर बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर कर पूरी कर दी। इस तरह वो एक बार फिर मीडिया की सुर्खियों में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गए हैं।

जो नरेंद्र मोदी चाँदनी चौक की अपनी चुनावी सभा के बाद से ही अरविंद केजरीवाल पर चुप थे, उन्होंने चार महीने बाद जम्मू में लोक सभा की अपनी पहली चुनावी सभा में केजरीवाल पर हमला कर ही चुनाव अभियान की शुरुआत की। केजरीवाल को पाकिस्तान का एजेंट बता कर उन्होंने उनकी राष्ट्र भक्ति पर सवाल खड़ा कर दिया। शाम को दिल्ली में भी केजरीवाल पर उनका हमला जारी रहा, जहां सरकार छोड़ने के लिए उन्होंने केजरीवाल को आड़े हाथों लिया और कांग्रेस के साथ सांठ-गांठ का आरोप लगाया। इसी तरह गुजरात सरकार ने केजरीवाल के सवालों के जवाब में 16 पन्नों का बयान जारी कर हर आरोप का सिलसिलेवार ढंग से जवाब दिया है।

बीजेपी के रणनीतिकारों का कहना है कि मोदी ने केजरीवाल पर सोची-समझी रणनीति के तहत निशाना साधा है। पिछले दो महीनों से केजरीवाल के निशाने पर कांग्रेस का कथित भ्रष्टाचार नहीं बल्कि मोदी के गुजरात का कथित विकास मॉडल है। वो पूरे देश में घूम-घूम कर मोदी के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं और गुजरात में विकास के दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं। बीजेपी का मानना है कि ऐसा करके वो कांग्रेस की ही मदद कर रहे हैं क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोप और सरकार विरोधी लहर झेल रही कांग्रेस की लोगों में अब वो साख नहीं बची है कि लोग उसकी बातों को गंभीरता से लें। इसीलिए कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को आगे किया है। बीजेपी इस आरोप के समर्थन में ये दलील भी देती है कि खुद केजरीवाल मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन अमेठी में उनकी पार्टी ने राहुल गांधी के खिलाफ कुमार विश्वास के तौर पर एक कमजोर उम्मीदवार मैदान में उतारा है और रायबरेली में सोनिया गांधी के खिलाफ अभी तक उम्मीदवार के नाम का एलान नहीं किया है।

बीजेपी के रणनीतिकार मानते हैं कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार की नाकामी के बावजूद दिल्ली के बाहर कई बड़े शहरों में युवा और मध्य वर्ग में इसके प्रति अब भी एक किस्म का आकर्षण बरकरार है। इसीलिए नरेंद्र मोदी को केजरीवाल पर हमला कर इस वर्ग के सामने उनकी हकीकत सामने रखनी पड़ी है ताकि वोट डालते समय उन्हें अपना मन बनाने में आसानी रहे। मोदी की रणनीति केजरीवाल की पार्टी को कांग्रेस की बी टीम दिखाने की भी है ताकि लोगों को ये समझा सकें कि केजरीवाल को वोट देने का मतलब कांग्रेस को ही वोट देना है। जाहिर है बनारस में केजरीवाल से मुकाबला कर रहे मोदी अपने विरोधी को अब हल्के में नहीं ले रहे, ये बात कम से कम उनके कल के हमलों से साफ हो जाती है। पर देखना होगा कि अगर कांग्रेस बनारस में उनके खिलाफ कोई मजबूत उम्मीदवार उतारती है, तो क्या तब भी मोदी केजरीवाल पर ही हमला करते रहेंगे? या केजरीवाल पर उनके हमले सिर्फ बनारस तक ही सीमित रहेंगे?
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Wednesday, 26 March 2014

जसवंत का मोदीत्व और नमो-नमो


जसवंत सिंह बगावत कर चुके हैं। राजस्थान के बाड़मेर से उन्होंने बीजेपी के अधिकृत प्रत्याक्षी कर्नल सोनाराम चौधरी के खिलाफ पर्चा भर दिया है। बीजेपी अभी छोड़ी नहीं है। इस इंतज़ार में हैं कि पार्टी उन्हें निकाले। उधर, बीजेपी इस इंतज़ार में है कि नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख और समय निकले। उसके बाद ही उन्हें पार्टी से निकाला जाए।

जसवंत सिंह को लेकर राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज ने बयान दिए हैं। राजनाथ सिंह ने कहा कि जसवंत पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं लेकिन उन्हें टिकट न देने का फैसला बताते समय उनसे खेद व्यक्त किया था। जेटली कह चुके हैं कि पार्टी में नेताओं को नहीं सुनने की आदत डालनी होगी। वहीं सुषमा ने कह दिया है कि उन्हें इस फैसले से दुःख है और केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में ये फैसला नहीं हुआ था।

उधर, जसवंत का बीजेपी नेताओं पर हमला जारी है। राजनाथ सिंह और वसुंधरा राजे को उन्होंने गद्दार बताया है। जेटली को महत्वाकांक्षी नेता करार दिया है। जसवंत सिंह पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर हमला करने में भी पीछे नहीं रहे हैं। बीजेपी में चल रहे नमो-नमो के जाप को उन्होंने आपातकाल की मानसिकता से जोड़ा है।

जसवंत सिंह ने कहा है कि ये जो नमो, नमो निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू हुई है, ये मुझे 1975 की याद दिलाता है। इसमें अहंकार ज़्यादा है। पार्टी जिस तरह से एक ही व्यक्ति पर केंद्रित कर रही है ये ठीक नहीं है। प्रजातंत्र में ये काम नहीं कर सकता।

ये टिकट न मिलने के बाद बगावत कर चुके जसवंत सिंह के बोल हैं। जाहिर है उन्हें टिकट न मिलने से पीड़ा हुई है। यही दर्द इन बयानों के जरिए बाहर निकल रहा है। लेकिन सवाल ये उठता है कि अगर उन्हें टिकट मिल जाता तो क्या तब भी उनके यही बोल रहते?

शायद नहीं। इसका इशारा सिटीज़न फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) द्वारा नरेंद्र मोदी की नीतियों पर जारी पुस्तक मोदीत्व- विकास और आशावाद का मूल मंत्र से मिलता है। सिर्फ एक महीने पहले यानी 25 फरवरी को दिल्ली के चिन्मय मिशन ऑडिटोरियम में जारी इस पुस्तक की भूमिका सुब्रह्रामण्यम स्वामी, किरण बेदी के साथ जसवंत सिंह ने भी लिखी है। पुस्तक के मुख पृष्ठ पर मोदी के फोटो के नीचे भूमिका लिखने वालों के नाम लिखे हैं और जसवंत सिंह का नाम सबसे ऊपर है।

अब ज़रा देखें कि जसवंत सिंह क्या लिखते हैं? जसवंत सिंह लिखते हैं 2014 हमारे लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष है- बदलाव का, रूपांतरण का, राजनीतिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में। अंक 14 के भारतीय संस्कृति में रहस्यात्मक महत्व को रेखांकित करते हुए जसवंत लिखते हैं कि समुद्र मंथन से 14 रत्न निकाले गए, भगवान श्रीराम भी 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या आए। इसी तरह 2014 बदलाव का वर्ष होगा, जिसके लिए लंबे समय से देश आस लगाए बैठा है।

जसवंत सिंह आगे पुस्तक में उल्लेखित नरेंद्र मोदी के नारों का जिक्र करते हैं जो 14 उद्धरणों से प्रेरित हैं। जसवंत सिंह लिखते हैं कि प्रत्येक उद्धरण एक विचार का प्रतीक है, जिसे अगर सही ढंग से लागू किया जाए तो भारत को बदलने में मदद मिल सकती है। श्री मोदी ने न सिर्फ इन मुद्दों पर बात की है, उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान बहुत प्रभावी ढंग से वहां उन्हें लागू भी किया है।

यानी जसवंत सिंह को मोदी के नाम से निकली अवधारणा मोदीत्व से परहेज़ नहीं दिखता है। बल्कि वो इसे भारत को बदलने में मददगार भी मानते हैं। वही जसवंत सिंह अब शिकायत कर रहे हैं कि बीजेपी में हो रहा नमो-नमो उन्हें आपातकाल की याद दिला रहा है और पार्टी व्यक्तिकेंद्रित होती जा रही है।
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केजरीवाल को मोदी का जवाब


बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने के अरविंद केजरीवाल के एलान के तुरंत बाद मोदी सरकार ने केजरीवाल के तमाम आरोपों का सिलसिलेवार जवाब दिया है। केजरीवाल अपनी हर सभा में अब सिर्फ नरेंद्र मोदी पर ही निशाना साध रहे हैं। गुजरात यात्रा के दौरान भी केजरीवाल ने मोदी से 16 सवाल पूछे थे। इसी सिलसिले में वो मोदी से मिलना भी चाहते थे लेकिन उन्हें समय नहीं मिला।

कल देर रात नरेंद्र मोदी के कार्यालय से सोलह पन्नों का जवाब जारी किया गया। इसमें गुजरात सरकार ने अरविंद केजरीवाल के आरोपों का सिलसिलेवार जवाब दिया है। गुजरात सरकार ने कहा है कि केजरीवाल बेबुनियाद और तथ्यों से परे आरोप लगा रहे हैं।

गैस कीमतों पर गुजरात सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे पर बीजेपी की राय शुरू से साफ रही है। यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली स्टैंडिग कमेटी ने अप्रैल 2014 से गैस कीमतें बढ़ाने के फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा था। गुजरात के ऊर्जा मंत्री सौरभ पटेल ने गैस कीमतें बढ़ाने का विरोध किया था। बयान में कहा गया है कि दरअसल ऐसे आरोप लगा कर केजरीवाल अधिक दामों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों से गैस आयात की वकालत कर हैं। इसीलिए उन पर अमेरिका का एजेंट होने का आरोप लगाया जाता है। रिलायंस का सिर्फ दस फीसदी हिस्सा है जबकि सरकारी कंपनी ओएनजीसी का 80 फीसदी।

इस बयान में अरविंद केजरीवाल पर पलटवार भी किया गया है। केजरीवाल से पूछा गया है कि वो ये बताएं कि उनकी पार्टी ने अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाप्टर घोटाले में एफआईआर की मांग क्यों नहीं की जिसमें सोनिया गांधी सीधे तौर पर शामिल हैं। क्या ऐसा केजरीवाल की सोनिया और एनएसी से नजदीकी और गठबंधन के चलते नहीं किया गया।

गुजरात की कृषि वृद्धि दर पर लगाए गए केजरीवाल के आरोपों को भी गलत बताया गया है। मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि योजना आयोग के मुताबिक नरेंद्र मोदी की अगुवाई में गुजरात में पिछले एक दशक में कृषि वृद्धि दर 11 फीसदी रही है। केजरीवाल ने झूठे आंकड़े बता कर गुमराह किया।
शिक्षा के क्षेत्र में तरक्की के मोदी के दावों को झूठा बताने के केजरीवाल के आरोपों का भी खंडन किया गया है। बयान के मुताबिक जब मोदी मुख्यमंत्री बने तब ड्राप आउट रेट 20 फीसदी था अब ये घट कर दो फीसदी रह गया है।

केजरीवाल ये आरोप लगाते रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने अडानी उद्योग समूह को फायदा पहुँचाया। इस पर बयान में कहा गया है कि मोदी की अगुवाई में गुजरात में सभी उद्योग-धंधे फले-फूले हैं। सिर्फ अडानी ही नहीं, सब उद्योगों को फायदा मिला। अडानी का सिर्फ गुजरात ही नहीं अन्य राज्यों में भी निवेश। अडानी समूह का गुजरात में कुल निवेश का सिर्फ 35 फीसदी है। जहां तक भूमि अधिग्रहण नीति का सवाल है, गुजरात की भूमि अधिग्रहण नीति की सुप्रीम कोर्ट ने भी तारीफ की है।

केजरीवाल आरोप लगाते रहे हैं कि गुजरात में 800 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। इस पर बयान में कहा गया है कि ये दिलचस्प है कि केजरीवाल राहुल गांधी की ही तरह ये मामला उठा रहे हैं। बयान के मुताबिक गुजरात में किसानों की आत्महत्या के मामले नहीं हैं। महाराष्ट्र और आँध्र प्रदेश दो कांग्रेस शासित राज्यों में सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं।

केजरीवाल पर पलटवार करते हुए कहा गया है कि बेहतर होगा कि केजरीवाल ये बताएं कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने क्या किया। बलात्कार बढ़ते रहे और नस्लभेद के आधार पर अपराध होते रहे। यहां तक कि उनके मंत्री भी नस्लभेद में शामिल रहे। आप की सरकार के दौरान सिर्फ 23 दिनों में ठंड की वजह से 174 लोगों की मौत हो गई। यहां तक कि ठंड से मरने वाले लोगों के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी दखल देना पड़ा।

केजरीवाल मोदी पर ये भी आरोप लगाते हैं कि उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर समझौता किया है। खासतौर से मोदी सरकार के दो मंत्रियों पुरूषोत्तम सोलंकी और बाबूभाई बोखारिया के मामलों का ज़िक्र किया जाता है। इस पर मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि सोलंकी के खिलाफ कोई चार्जशीट नहीं है। जबकि बाबूभाई बोखरिया के खिलाफ सज़ा पर ऊंची अदालत से रोक लगा दी गई है।

कच्छ के सिख किसानों के मुद्दे पर गुजरात सरकार का कहना है कि पंजाब और हरियाणा से आए 454 सिख परिवारों के पास अब भी जमीन है। जबकि केजरीवाल गैरकानूनी ढंग से खेती की जमीन खरीदने वाले रियल एस्टेट माफिया की मदद कर रहे हैं। गांधीधाम, भुज और मूंदड़ा के आसपास फर्जी किसान बन कर इस माफिया ने खेती की जमीन खऱीदी है। पंद्रह से बीस हजार करोड़ रुपए के इस गोरखधंधे में फर्जी किसानों का साथ देकर केजरीवाल भी शामिल हैं।


बिजली, बेरोजगारी, नर्मदा का पानी किसानों के बजाए कारखानों को दिए जाने, सौर ऊर्जा की दरों, स्वास्थ्य के आंकड़ों, गुजरात के छोटे और मंझौले उद्योगों जैसे मुद्दों पर लगाए गए केजरीवाल के आरोपों का भी इस बयान में सिलसिलेवार ढंग से जवाब दिया गया है।
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Tuesday, 25 March 2014

तारे ज़मीं पर


हर चुनाव की तरह इस बार भी राजनीतिक पार्टियों ने फिल्मी सितारों और बड़े क्रिकेट खिलाड़ियों को चुनाव मैदान में उतारा है। कुछ खुल कर प्रचार कर रहे हैं तो कई अलग-अलग पार्टियों के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। पहले भी कई फिल्मी सितारे चुन कर लोक सभा में पहुँचते रहे हैं। मगर संसद में उनके प्रदर्शन के बारे में अगर बात करें, कुछ सितारों को छोड़ बाकी सब ने निराश ही किया है।

संसद में उपस्थिति हो, क्षेत्र की समस्याओं को उठाना, सांसद निधि का ठीक से इस्तेमाल या फिर क्षेत्र के दौरे कर लोगों से संपर्क रखना, अधिकांश फिल्मी सितारे इसमें नाकाम रहते हैं। 2004 के लोक सभा चुनाव में मैदान में उतरे गोविंदा और धर्मेंद्र इसके उदाहरण हैं। गोविंदा ने कांग्रेस के टिकट पर बीजेपी के दिग्गज राम नाईक को मुंबई उत्तर से हराया। इसी तरह बीजेपी के टिकट पर धर्मेंद्र ने बीकानेर में चुनाव जीता। लेकिन कुछ समय बाद हालात ये बने कि मुंबई उत्तर और बीकानेर दोनों जगहों के लोगों को अपने प्रतिनिधियों की तलाश के लिए पोस्टर लगाने पड़े।

उत्तर भारत के फिल्मी सितारों के साथ ये ज्यादा बड़ी समस्या है। दक्षिण भारत में फिल्मी सितारे राजनीति में घुल-मिल जाते हैं। एन टी रामाराव, एम जी रामचंद्र, जयललिता और हाल ही में राजनीति में आए चिरंजीवी। ये तमाम फिल्मी सितारे जनता के बीच जाकर जनता के ही हो जाते हैं। जबकि बॉलीवुड के सभी सितारों के साथ ऐसा नहीं है। उत्तर भारत में जनता का दिल जीतने वाला एक ही बड़ा सितारा लोगों को याद है वो है सुनील दत्त और वो इसलिए क्योंकि राजनीति में आने के बाद वो लोगों के ही होकर रह गए।

इस बार बीजेपी ने हेमा मालिनी, किरन खेर, बप्पी लाहिरी, बाबुल सुप्रियो, परेश रावल, मनोज तिवारी, शत्रुघ्न सिन्हा और जॉय बनर्जी को लोक सभा चुनाव में उतारा है। कांग्रेस ने राज बब्बर, नगमा, रवि किशन को टिकट दिया है। आम आदमी पार्टी ने गुल पनाग को मैदान में उतारा है तो तृणमूल कांग्रेस ने फिल्मी सितारों की लाइन लगा दी है। कांग्रेस ने क्रिकेटर मोहम्मद अज़हरूद्दीन और मोहम्मद कैफ को भी टिकट दिया है। किरण खेर पर चंडीगढ़ में बाहरी होने का आरोप लग रहा है। बीजेपी के कार्यकर्ता ही उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं हेमा मालिनी को अभी तक अपने चुनाव क्षेत्र मथुरा जाने की फुर्सत नहीं मिली है। गाजियाबाद में राज बब्बर को भी बाहरी उम्मीदवार होने की वजह से दिक्कतें आ रही हैं। वहीं मेरठ से उतरीं नगमा को कांग्रेसी कार्यकर्ता और विधायक ही परेशान कर रहे हैं।

फिल्म अभिनेत्री रेखा भी एक बड़ा उदाहरण है जिन्हें सचिन तेंदुलकर के साथ राज्य सभा में मनोनीत किया गया था। रेखा और सचिन दोनों ही एक या दो बार ही संसद आए हैं। दोनों की सांसद निधि का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ है।

रूपहले पर्दे पर दिखने वाले सितारे जब लोगों को अपने बीच दिखते हैं तो उनके प्रति एक स्वाभाविक आकर्षण पैदा होता है। गाहे-बगाहे ये सितारे प्रचार करते हुए भी दिख जाते हैं और लोग इन्हें देखने के लिए जमा हो जाते हैं। मुंबई में बाकायदा ऐसी कई एजेंसियां हैं जो राजनीतिक दलों से पैसे लेकर प्रचार के लिए फिल्मी सितारों का इंतज़ाम करती हैं। इंडिया शाइनिंग के वक्त 2004 में बीजेपी ने ऐसे ही ढेरों फिल्मी सितारों का इस्तेमाल प्रचार में किया था और कांग्रेस ने 2009 में। राजनीतिक दलों की दिक्कत ये है कि उन्हें हर हाल में चुनाव जीतना है। उन्हें लगता है कि फिल्मी सितारों की चकाचौंध से प्रभावित होकर लोग उन्हें वोट देंगे। इसके चक्कर में राजनीतिक दल वर्षों से अपने लिए काम करते आ रहे समर्पित कार्यकर्ताओं की भी उपेक्षा कर देते हैं।

लेकिन हकीकत यही है कि राजनीतिक दलों की विचार धारा और मुद्दों से दूर, जनता की समस्याओं से कटे ये सितारे प्रवासी पक्षियों की तरह ही होते हैं जो पाँच साल में एक बार नजर आते हैं। जोश में आकर लोग इन्हें वोट देते हैं और फिर पाँच साल पछताते हैं। इसीलिए राजनीतिक विश्लेषक पिछले अनुभवों को ध्यान में रख कर ये भी कहते हैं कि उस क्षेत्र की जनता के लिए फिल्मी सितारों को चुनने से बेहतर यही होगा कि वो खांटी नेताओं को ही चुनें।
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Monday, 24 March 2014

अमित शाह की अग्निपरीक्षा


बात तब की है जब नितिन गडकरी बीजेपी अध्यक्ष थे और उनका फिर अध्यक्ष बनना करीब-करीब तय था। पार्टी महासचिव रविशंकर प्रसाद को एस एस अहलूवालिया के बाद राज्य सभा उपनेता बना दिया गया था। एक व्यक्ति-एक पद सिद्धांत के आधार पर उन्होंने महासचिव पद छोड़ा और गडकरी की टीम में उनकी जगह नए महासचिव के आने के कयास लगने लगे। बहुत कुरेदने पर पता चला कि गडकरी की टीम में आने वाले नए महासचिव होंगे अमित शाह।

हालांकि तब ऐसा नहीं हो पाया। जनवरी 2013 में गडकरी फिर अध्यक्ष नहीं बन सके। राजनाथ सिंह ने पार्टी की कमान संभाली। अमित शाह को महासचिव बनाया गया और उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई। इसी के साथ तय हो गया था कि नरेंद्र मोदी न सिर्फ बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, बल्कि उत्तर प्रदेश से भी चुनाव लड़ेंगे।

बीजेपी के लिए पंद्रह साल से बंजर पड़ी उत्तर प्रदेश की धरती पर कमल खिलाना आसान काम नहीं है। खासतौर से ऐसे व्यक्ति के लिए तो नहीं जिसने गुजरात के बाहर काम न किया हो। गुजरात के पिछले तीन विधानसभा चुनावों में अमित शाह ने बतौर रणनीतिकार अपनी छाप छोड़ी है। राज्य में उम्मीदवारों के चयन से लेकर मुद्दे तय करने तक सब में शाह की बड़ी भूमिका रही है। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक जब उन्हें गुजरात से दूर रहने को कहा गया तो उन्होंने उसका इस्तेमाल दिल्ली में रह कर मोदी के लिए जमीन तैयार करने में किया।

अमित शाह पिछले दस महीनों से उत्तर प्रदेश में लगे हुए हैं। आज जनमत सर्वेक्षणों में भविष्यवाणी की जा रही है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी कम से कम चालीस सीटें जीत सकती है। ऐसा होता है या नहीं, ये कह पाना अभी मुश्किल है लेकिन ये तय है कि अमित शाह के उत्तर प्रदेश में जाने के बाद वहाँ नरेंद्र मोदी के पक्ष में अलग तरह का माहौल बनना ज़रूर शुरू हुआ है।

यूपी का प्रभारी बनने के बाद अमित शाह ने राज्य का दौरा शुरु किया। वो सभी 62 जिलों में जा चुके हैं। इन दौरों में शाह ने कार्यकर्ताओं और नेताओं से व्यक्तिगत तौर पर मिलना शुरू किया। शाह रात को किसी होटल या गेस्ट हाऊस में रुकने के बजाए कार्यकर्ताओं के घरों में ही रुकते थे। इस तरह उन्होंने जमीनी स्तर पर संवाद कायम किया। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की टीम खड़ी की। नेताओं-कार्यकर्ताओं को नसीहत दी कि मोदी के नाम को घर-घर तक पहुँचाएं। वो ये कहते रहे कि चुनाव मोदी के नाम पर ही लड़ा जाएगा। मोदी की रैलियों को कामयाब बनाने के लिए सबको साथ लिया। नतीजा ये रहा कि उत्तर प्रदेश में मोदी की हर रैली पिछली रैली से बड़ी हुई।

लेकिन उम्मीदवारों के चयन में देरी और कुछ उम्मीदवारों के गलत चयन के कारण शाह के फैसलों पर सवाल उठने लगे हैं। जगदंबिका पाल को कांग्रेस से लाकर डुमरियागंज से, एस पी सिंह बघेल को बीएसपी से लाकर फिरोजाबाद से और धर्मेंद्र कुशवाहा को समाजवादी पार्टी से लाकर आंवला से टिकट देना, स्थानीय कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रहा है। बिजनौर में ऐन वक्त पर उम्मीदवार बदलना पड़ा है। कई सीटों पर उम्मीदवारों के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं और कई बड़े नेताओं ने मुंह फुला लिया है। ये भी कहा गया है कि टिकट बंटवारे में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के आगे अमित शाह की नहीं चल सकी।

लेकिन शाह के करीबियों का कहना है कि टिकट बांटने में जानबूझकर देरी की गई ताकि ज्यादा असंतोष न भड़के। राज्य में लंबे समय बाद बीजेपी के पक्ष में माहौल बना है और कई नेता चाहते हैं कि उन्हें चुनाव लड़ने का मौका मिले। अमित शाह कहते हैं कि सपा-बसपा कई साल पहले अपने उम्मीदवार घोषित कर देते हैं। लेकिन ऐन वक्त पर बदल भी देते हैं। बीजेपी और कांग्रेस ऐसा नहीं कर सकते, इसलिए टिकटों में देरी स्वाभाविक है। बाहर से उम्मीदवार लाने के सवाल पर अमित शाह कहते हैं कि ये संख्या ज्यादा नहीं है। और ऐसे ही लोगों को प्राथमिकता दी गई है जो विवादित नहीं हैं और अपनी सीटों पर जीत सकते हैं।

नरेंद्र मोदी को बनारस से चुनाव मैदान में उतारना अमित शाह का सबसे बड़ा दांव है। पूर्वांचल में पस्त पड़ी बीजेपी को इससे नई जान मिलने की संभावना है। इलाके की 27 सीटों पर बीजेपी की नजरें हैं। पार्टी की कोशिश मोदी की उम्मीदवारी से बिहार तक फायदा उठाने की है। बनारस से मोदी को लड़ाना हिंदुत्व के समर्थकों को संदेश देना भी है। मोदी ने अपनी रैलियों में एक बार भी राम मंदिर का जिक्र नहीं किया है। अमित शाह जरूर अयोध्या गये और वहां राम मंदिर निर्माण की बात कही। पर उसके बाद से उन्होंने एक बार भी राम मंदिर की बात नहीं की।


मोदी के लिए व्यक्तिगत तौर पर उत्तर प्रदेश बेहद महत्वपूर्ण है। वो जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना तभी पूरा हो सकता है जब यूपी से पार्टी को नब्बे के दशक जैसी कामयाबी मिले। इसीलिए उन्होंने अपने बेहद करीबी अमित शाह को राज्य की जिम्मेदार दी है। अगर यहां कामयाबी मिलती है तो शाह भविष्य के लिए पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी संभालने के लिए अपनी जगह पक्की कर लेंगे।
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Sunday, 23 March 2014

‘असली बीजेपी, नकली बीजेपी’

76 साल की उम्र में बाड़मेर से चुनाव लड़ने के इच्छुक जसवंत सिंह अचानक बेहद भावुक हो गए। मीडिया से बात करते वक्त उनकी आँखें छलछला आईं। जसवंत सिंह कहने लगे कि अभी जो कुछ हो रहा है, वास्तव में यही अंतर है असली और नकली बीजेपी में। बीजेपी पर एक किस्म का अतिक्रमण हो गया है। तो ये अतिक्रमण क्यों होने दिया गया है। ये वैचारिक अतिक्रमण है। जसवंत सिंह ने ये बयान जयपुर पहुंच कर दिया। बाड़मेर से उन्हें बीजेपी का टिकट नहीं मिला है।

19 अगस्त 2009 को शिमला के एक पाँच सितारा होटल में भी जसवंत सिंह की आँखें इसी तरह भर आई थीं। उस दिन भी उन्होंने बीजेपी के बारे में कुछ इसी तरह की बातें की थीं। उस दिन उन्हें बीजेपी से निकाल दिया गया था। वजह ये थी कि उन्होंने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना पर लिखी किताब में देश के विभाजन के लिए जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल पर उंगुली उठाई थी।  

2009 की हार के बाद लाल कृष्ण आडवाणी के घर हुई बैठक में जसवंत सिंह ने हार के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की थी। उन्होंने परिणाम और पुरस्कार के बीच संबंध रखने का सुझाव दिया था। माना गया कि उनका इशारा अरुण जेटली की ओर था जो 2009 के प्रचार के प्रभारी थे मगर हार के बाद उन्हें राज्य सभा में विपक्ष का नेता बना दिया गया था।

सवाल ये उठता है कि जसवंत सिंह बीजेपी के बारे में सवाल तभी क्यों पूछते हैं जब चीजें उनके मन मुताबिक नहीं होतीं। 1996 और 1998 से लेकर 2004 तक जसवंत सिंह अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वाजपेयी, आडवाणी के बाद तीसरे नंबर पर रहे। तमाम बड़े फैसलों में उनकी बड़ी भूमिका रही। लेकिन सरकार पर पकड़ बना कर रखने वाले जसवंत सिंह 2004 में हार के बाद से पार्टी पर पकड़ नहीं बना पाए। अपने गृह राज्य राजस्थान में वसुंधरा राजे से उनका टकराव होने लगा। वाजपेयी के करीबी माने जाने वाले जसवंत आडवाणी के नजदीक हो गए। जिन्ना विवाद में उन्होंने आडवाणी का साथ दिया। संघ ने उन्हें कभी पसंद नहीं किया।

इस बार वसुंधरा ज्यादा ताकतवर होकर सामने आई हैं। राजस्थान में बीजेपी को ऐतिहासिक बहुमत मिला है। वसुंधरा पार्टी की उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जो नरेंद्र मोदी के समर्थन में सबसे पहले खुल कर आगे आए हैं। मध्य प्रदेश की तुलना में वसुंधरा ने राजस्थान चुनाव में मोदी से खूब प्रचार करवाया और जब जीतीं तो मोदी को श्रेय देने में कंजूसी भी नहीं बरती। लोक सभा चुनाव के लिए एक-एक सीट पर उम्मीदवार तय करने का एक ही पैमाना रखा- जीत। जब जसवंत सिंह की बात आई तो उन्हें बाड़मेर के बजाए जोधपुर से उम्मीदवार बनने का प्रस्ताव दिया। लेकिन जाहिर है कि जोधपुर राजघराने से रिश्तेदारी के चलते जसवंत वहां से नहीं खड़े हो सकते थे। जब पार्टी ने जसवंत को बाड़मेर से खड़ा करने पर जोर दिया तो उनकी ओर से साफ किया गया कि पार्टी सोच ले उसे राजस्थान में एक सीट चाहिए या चौबीस।

राजस्थान बीजेपी का मानना है कि जाट नेता कर्नल सोनाराम चौधरी को टिकट देना ज्यादा जरूरी है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट बीजेपी की ओर आने लगे थे। लेकिन यूपीए सरकार ने जैसे ही जाट आरक्षण की बात की है, उनका रुख एक बार फिर कांग्रेस और अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोक दल की तरफ होता दिख रहा है। एक ताकतवर जाट नेता को मैदान में उतारने से सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी संदेश जाता है। आरएसएस साफ कर चुका था कि उम्रदराज नेताओं की जगह नए खून को इस चुनाव में मौका दिया जाए। रही बात जसवंत सिंह की, तो उनके बेटे मानवेंद्र एक बार लोक सभा सांसद रह चुके हैं। अभी बाड़मेर जिले से ही पार्टी विधायक हैं। पार्टी नेता जसवंत सिंह को उनके साथी यशवंत सिन्हा की याद भी दिला रहे हैं जो इस बार अपने बेटे को झारखंड की हजारीबाग सीट से टिकट दिला कर चुनावी राजनीति से दूर हो गए हैं।


तो क्या इसीलिए जसवंत सिंह को अचानक असली बीजेपी और नकली बीजेपी नजर आने लगी है। पार्टी पर वैचारिक अतिक्रमण दिखने लगा है। उनके समर्थक अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के फोटो के बीच छपे नरेंद्र मोदी के फोटो को मिटाने लगे हैं। ऐन चुनावों के वक्त बगावती तेवर दिखाने के पीछे एक उम्मीद ये भी है कि बीजेपी के अंदरुनी झगड़ों के सामने आने से पार्टी के पक्ष में बना माहौल बिगड़े। बीजेपी में कुछ लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अगर जसवंत सिंह को बाड़मेर से टिकट मिल जाता तो क्या फिर भी वो असली-नकली बीजेपी की बात करते। शिमला चिंतन बैठक के समय जब उन्हें बीजेपी से निकाला गया और जब आडवाणी के कहने पर उनकी वापसी हुई, तब वो असली बीजेपी था या फिर नकली? और पार्टी पर हो रहे वैचारिक अतिक्रमण के बारे में उनका मुंह तभी क्यों खुला जब उनका टिकट कट गया?
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Saturday, 22 March 2014

झाड़ू यानी नोटा?


चुनावों में एक नया चलन शुरू हुआ है। नोटा का। यानी नन ऑफ द अबव (ऊपर दिए गए में से कोई नहीं) का। इलैक्ट्रानिंग वोटिंग मशीन यानी ईवीएम में सबसे नीचे नोटा का एक अलग बटन लगाया गया है। जो मतदाता किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहते हैं, वो ये बटन दबा सकते हैं।

इस वोट का चुनाव परिणामों पर कोई असर नहीं होता। यानी अगर किसी चुनाव में नोटा को सबसे ज़्यादा वोट मिल भी जाएं तो नोटा को नहीं बल्कि दूसरे नंबर पर आए उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाएगा। उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने के फार्मूले में भी इनकी गिनती नहीं होती है। तो सवाल ये है कि कोई मतदाता अपने घर से चिलचिलाती धूप में निकल कर मतदान केंद्र पर घंटों लंबी लाइन में लगने के बाद नोटा को वोट देकर क्यों आएगा? लेकिन कई लोग ऐसा कर रहे हैं।

हाल के विधानसभा चुनाव में पहली बार नोटा बटन का इस्तेमाल किया गया। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के साढ़े ग्यारह करोड़ मतदाताओं में से 15 लाख ने नोटा का बटन दबाया। यानी सिर्फ सवा फीसदी वोटरों ने। ये कोई बहुत बड़ी संख्या नहीं है। लेकिन माना जा रहा है कि दिल्ली में कांग्रेस से नाराज़ कई वोटरों ने नोटा का बटन दबा कर उसे नुकसान पहुँचाया। इसी तरह छत्तीसगढ़ के माओवादी प्रभावित इलाकों में लोगों ने बड़ी संख्या में नोटा का बटन दबा कर राजनीतिक पार्टियों के प्रति अपना अविश्वास व्यक्त किया।

नोटा का बटन दबाने वाले ज्यादातर लोग वो हैं जिनका मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास उठ चुका है। कांग्रेस हो या बीजेपी या फिर अन्य कोई प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक दल, ये लोग इन्हें अपना समर्थन नहीं देना चाहते। छत्तीसगढ़ में माओवादियों के असर वाले इलाकों में बड़ी संख्या में नोटा को डले वोट ये दिखाते हैं। दिल्ली में अगर आम आदमी पार्टी मैदान में नहीं होती, तो शायद यहां नोटा को ज़्यादा वोट मिले होते। यानी कांग्रेस और बीजेपी से नाराज ऐसे लोग जो नोटा का बटन दबाना चाहते थे, उन्होंने इसके बजाए झाड़ू को वोट देना बेहतर समझा।


तो क्या आम आदमी पार्टी एक ऐसे माध्यम के रूप में उभर रही है जिसके जरिए लोग अपना गुस्सा निकाल सकते हैं? सब चोर हैं, ये कहने वाले कई लोग समाज में हैं। व्यवस्था के प्रति गुस्सा रखने वाले लोग इस बात से नहीं हिचकिचाते कि उन्हें घर से चलकर मतदान केंद्रों में जा कर भी एक ऐसे बटन को दबाना है जिससे कुछ नहीं होने वाला। नकारात्मक मतदान देश या समाज को सही दिशा नहीं दे सकता। नोटा इसी का संकेत है। कई लोगों के लिए नोटा को वोट देना आम आदमी पार्टी को वोट देने जैसा ही गया है। जिससे कुछ बदलने वाला नहीं, मगर व्यवस्था के प्रति अपने गुस्से का ज़रूर इज़हार किया जा सकता है। 
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कहां गए हनुमान?


जसवंत सिंह और हरिन पाठक दोनों में एक समानता है। दोनों हनुमान कहे जाते हैं। जसवंत सिंह अटल बिहारी वाजपेयी के हनुमान तो हरिन पाठक लाल कृष्ण आडवाणी के हनुमान। एनडीए की छह साल की सरकार में हर संकट में वाजपेयी को जसवंत सिंह याद आते थे। इसी तरह, आडवाणी की गांधी नगर सीट के सारे काम पास की अहमदाबाद पूर्व सीट से सांसद हरिन पाठक करते थे। लेकिन इस लोक सभा चुनाव में जसवंत सिंह का टिकट कट चुका है और हरिन पाठक के सिर पर तलवार लटक रही है।

आडवाणी के रूठने के पीछे माना गया कि वो पार्टी पर पाठक के टिकट के लिए दबाव बना रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह ने आडवाणी से कहा कि वो गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ने के लिए मान जाएं। जहां तक पाठक के टिकट का सवाल है, पार्टी इस पर विचार करेगी। लेकिन नरेंद्र मोदी हरिन पाठक के टिकट के लिए तैयार नहीं हैं। 2009 के चुनाव में भी मोदी पाठक का टिकट काटने पर अड़ गए थे। तब भी आडवाणी की बेहद सख्ती के बाद ही उन्हें टिकट मिल पाया था।

लेकिन दूसरे हनुमान जसवंत सिंह के लिए पार्टी में इस तरह का दबाव डालने वाले नेता अब कोई नहीं है. यही वजह रही कि बगावत की धमकी देने के बावजूद बीजेपी ने बाड़मेर से हाल ही में कांग्रेस से आए कर्नल सोनाराम चौधरी को टिकट दे दिया। वसुंधरा ने इस बहाने एक तीर से दो निशाने साध लिए। एक तो राज्य की राजनीति में जसवंत के रूप में सत्ता का दूसरा केंद्र बनने से रोक दिया, दूसरा जाट वोटों को साथ लेने के लिए सोनाराम चौधरी के रूप में एक बड़ा संदेश दे दिया।

ये वही जसवंत सिंह हैं जिन्हें अपनी तेरह दिन की सरकार में शामिल करने के मुद्दे पर अटल बिहारी वाजपेयी आरएसएस के सामने आ गए थे। पोखरण में परमाणु परीक्षणों के बाद लगे आर्थिक प्रतिबंधों पर दुनिया भर में भारत का पक्ष रखने के लिए वाजपेयी ने उन्हें ही आगे किया था। संकट घरेलू मोर्चे पर हो या विदेशी मोर्चे पर, जसवंत सिंह ही आगे आया करते थे। कंधार में विमान अपहरण के बाद बंधक यात्रियों को छुड़वाने के बदले आतंकवादियों को अपने साथ विमान में ले जाने पर जसवंत सिंह की तीखी आलोचना हुई पर उन्होंने इसे सह लिया।

सरकार से हटने के बाद भी विवाद उनका पीछा करते रहे। अपनी दो पुस्तकों के ज़रिए उन्होंने बेहद तीखे विवाद खड़े कर दिए। उन्होंने कहा कि जब पी वी नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे तब प्रधानमंत्री कार्यालय में एक जासूस था जो अमेरिका को खुफिया जानकारियां देता था। बाद में वो इससे मुकर गए। जिन्ना पर लिखी दूसरी किताब में उन्होंने विभाजन के लिए सरदार पटेल की नीतियों को जिम्मेदार बता दिया। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में इस किताब पर पाबंदी लगा दी और बीजेपी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया।

हालांकि बाद में लाल कृष्ण आडवाणी के बीच-बचाव करने पर वो पार्टी में वापस आए। एनडीए ने उन्हें उपराष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार भी बनाया। उनके बेटे मानवेंद्र सिंह को विधानसभा का टिकट भी दिया और वो जीते। लेकिन एक बार फिर बीजेपी और जसवंत सिंह के रास्ते अलग-अलग होते दिख रहे हैं।

दरअसल, बीजेपी में अब कमान दूसरी पीढ़ी के हाथों में आ गई है। इस लोक सभा चुनाव में बंटे टिकट इस बात की पुष्टि कर रहे हैं। पार्टी में हो रहे अधिकांश फैसले नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी जैसे नेता मिल कर रहे हैं। आरएसएस इनमें बड़ी भूमिका निभा रहा है।

2004 में हार के बाद मुंबई में हुए पार्टी के राष्ट्रीय परिषद के अधिवेशन में अटल बिहारी वाजपेयी ने लाल कृष्ण आडवाणी और प्रमोद महाजन को आगे कर कहा था कि ये राम-लक्ष्मण हैं। तब तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष एम वेंकैया नायडू ने खुद को इनका हनुमान बताया था।  लेकिन बीजेपी में अब ये समय पुराने हनुमानों को भूल, नए हनुमान ढूंढने का है।
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Friday, 21 March 2014

बीजेपी के सागर में बनता टापू


आखिरकार आडवाणी मान गए। मानना ही था। कोई रूठता भी इसीलिए है ताकि उसे मनाया जाए और तभी वो माने। रूठने-मनाने का ये सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। लेकिन इस बार आडवाणी ने जो मोहरे इस्तेमाल किए, उससे आने वाले दिनों के लिए बीजेपी के संभावित अंदरूनी खतरों की झलक मिलने लगी है। मोदी के नेतृत्व को पार्टी के भीतर से मिल सकने वाली संभावित चुनौतियाँ।

आडवाणी का विदिशा के नजदीक की भोपाल सीट पर जाने की इच्छा प्रकट करना बहुत कुछ कह जाता है। विदिशा से सुषमा स्वराज पार्टी की प्रत्याशी हैं। नरेंद्र मोदी से उनका छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। गठबंधनों को लेकर सुषमा अपनी नाराजगी ट्विटर के माध्यम से सार्वजनिक कर चुकी हैं। मोदी की उम्मीदवारी घोषित होने से पहले आडवाणी के नेतृत्व की वो बार-बार चर्चा करती रहीं। गुजरात और मध्य प्रदेश की मिलती सीमाएं, विदिशा-भोपाल की नजदीकियां और आडवाणी-सुषमा की करीबियां। यहीं पर खड़े मिलते हैं सुषमा-आडवाणी के करीबी कर्नाटक के अनंत कुमार जो मध्य प्रदेश के स्थाई प्रभारी कहे जाते हैं। और इन सबके बीच हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान।

आडवाणी उन्हें मोदी के बराबर खड़ा करने की लगातार कोशिश करते रहे हैं। पहले ये दिखाने का प्रयास कि मोदी शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह की ही तरह बीजेपी के एक मुख्यमंत्री हैं। मोदी संसदीय बोर्ड में आने लगे तो आडवाणी ने जिद पकड़ ली कि चौहान को भी लाया जाए ताकि मोदी की तुलना चौहान से ही होती रहे और प्रधानमंत्री की दावेदारी के लिए मोदी का नाम न आए। लेकिन आरएसएस ने इन तमाम मंसूबों पर पानी फेर दिया।

एमपी में शानदार जीत दिलाने के बाद चौहान का कद पार्टी में ऊँचा हुआ है। वो स्वाभाविक रूप से पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी के लिए दावेदार बनते हैं। लेकिन हो कुछ अलग रहा है। चौहान के कंधे पर रख कर बंदूक चलाई जा रही है। मध्य प्रदेश को मोदी विरोध का गढ़ बनाने की कोशिश हो रही है। ऐसा संदेश दिया जा रहा है कि बीजेपी में मोदी का विरोध करने वालों को सिर्फ मध्य प्रदेश में ही शरण मिल सकती है। यानी मध्य प्रदेश को बीजेपी के समुद्र में मोदी विरोध का टापू बनाने की कोशिश हो रही है। जो शिवराज सिंह चौहान लोक सभा चुनाव में सभी 29 सीटें जीतने की बात कहते हैं, उनके बारे में ये प्रचारित किया जा रहा है कि उम्मीदवारों का चयन जानबूझकर इस तरह से किया गया कि पार्टी 15-16 से ज्यादा सीटें न जीत सके।

जाहिर है इससे नुकसान शिवराज सिंह चौहान का ही हो रहा है। पार्टी के भीतर उन्हें मोदी के सामने खड़ा करने की कोशिशें आगे चल कर उन्हें नुकसान पहुँचा सकती हैं। हालांकि खुद चौहान इन बातों को समझते हैं। विधानसभा चुनाव के दौरान वो बार-बार कहते रहे कि वो प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं और मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए काम करेंगे। इन सवालों से तंग आकर उन्होंने दिसंबर के बाद से कोई इंटरव्यू ही नहीं दिया है। उनके करीबी ये कहते हैं कि जब आडवाणी की ओर से ही ये संदेश आए कि वो भोपाल से लड़ना चाहते हैं तो फिर ऐसे में वो कैसे मना कर सकते थे। उनके करीबी पूछते हैं कि क्या बीजेपी का कोई ऐसा मुख्यमंत्री है जो आडवाणी के आग्रह को न माने?

इसके बावजूद संदेश यही जा रहा है कि चौहान मोदी विरोधियों के इशारों पर खेल रहे हैं। व्यक्तिगत तौर पर चौहान की महत्वाकांक्षाएं जोर नहीं मार रही हैं। वो जानते हैं कि उम्र उनके साथ है। उनके सामने चुनौती मध्य प्रदेश में अगले पाँच साल बेहतर काम कर दिखाना है ताकि आने वाले वक्त में वो मोदी के बाद पार्टी की कमान संभालने के लिए बेहतर ढंग से दावेदारी पेश कर सकें। संघ के स्तर पर ये बात मानी गई है कि शिवराज में नेतृत्व की बेहतर संभावनाएं हैं। संगठन में वो स्वाभाविक रूप से मोदी के बाद नंबर दो के रूप में उभर सकते हैं.

शिवराज को कुछ सबक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी सीखने होंगे। नीतीश कुमार भी बीजेपी में मोदी का विरोध करने वाले नेताओं के बहकावे में आ गए। उन्हें लगा कि उन्हें साथ लेकर वो मोदी को रोक सकेंगे। लेकिन हुआ इसका उल्टा। बीजेपी में मोदी विरोधी तो हाशिए पर गए ही, बिहार में बीजेपी से अलग होने के बाद नीतीश कुमार मुसीबत में फंसते दिख रहे हैं। तमाम जनमत सर्वेक्षणों में संभावना व्यक्त की जा रही है कि नीतीश कुमार की पार्टी लोक सभा चुनाव में तीसरे नंबर पर रहेगी जबकि बीजेपी पहले। अगर ऐसा होता है तो लोक सभा चुनाव के बाद उनकी सरकार पर भी संकट आ सकता है।


क्षेत्रीय क्षत्रपों के उभार के इस युग में इन क्षत्रपों को अपनी महत्वाकांक्षाओं को अपने राज्यों की जनता की आकांक्षाओं के सामने नहीं लाना चाहिए। इनमें टकराव राज्य के हितों में नहीं होता। ये वो दौर है जब राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कुछ क्षत्रप विपरीत विचारधारा के केंद्र से हाथ मिलाने में भी संकोच नहीं करते। जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस इसका उदाहरण है जो वाजपेयी मंत्रिमंडल में शामिल थी। फिर यहां तो परिवार की ही बात है।
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