Saturday, 17 July 2010

हो गई बात!!!

बड़ी धूम धाम से हमारे विदेश मंत्री पाकिस्तान गए थे.
अमन की आशा में.
मुंबई के ज़ख्म अब भी हरे हैं.
पाकिस्तान ने मुंबई के गुनहगारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. उल्टे वो समय-समय पर सबूत मांगता रहता है.
फिर भी, सैम अंकल के कहने पर हमारी सरकार हर बार घुटने टेकती है. हर बार बातचीत की पहल करती है.
अब हो गई तसल्ली. कैसे-कैसे झूठ बोले पाकिस्तान ने. जैसे बातचीत को सार्थक और सफल बनाने का जिम्मा सिर्फ भारत का है पाकिस्तान की शर्तों पर ही होगी बातचीत.
क्या बहाना बनाया है. कहा कृष्णा इस्लामाबाद में जितने वक्त रहे, पूरे वक्त भारत में अपने हुक्मरानों से फोन पर बतियाते रहे कि क्या करना है, क्या कहना है वगैरह-वगैरह.
शुक्र है, कुरैशी ने ये नहीं कहा कि कृष्णा नई दिल्ली के साथ-साथ वॉशिंगटन से भी फोन पर निर्देश लेते रहे. वो शायद इसलिए नहीं कहा क्योंकि वॉशिंगटन की लाइन व्यस्त रही होगी उनके फोन से. बीच-बीच में आईएसआई और पाकिस्तानी सेना के मिस्ड कॉल भी आते रहे होंगे. इन्हीं मिस्ड कॉल में से किसी एक का जवाब दिया होगा तो सेना ने बोला होगा बहुत हो गई बातचीत. सुना नहीं गृह सचिव जी के पिल्लई ने क्या कहा है. वो कहते हैं मुंबई हमलों के पीछे आईएसआई का हाथ है. फिर भी, बात कर रहे हो विदेश मंत्री से... छोड़ो ये बातचीत और उन्हें खाली हाथ दिल्ली रवाना करो.
यहां दिल्ली में तो लोग बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे थे. अमन की आशा में बड़ी-बड़ी बातें भी हो गईं. हर बार बातचीत शुरू होने पर इ्न्हें लगता है बस साठ साल का रंजिश भरा इतिहास अब दफ्न हो चुका है. अब तो अमन की नई इबारत लिखी जानी है. इस बार तो पक्का ही पाकिस्तान अपना रवैया बदल देगा. रही बात भारत की.... तो वो तो हम वाघा बॉर्डर पर इतनी मोमबत्तियां जलाएंगे कि उनकी लौ की आँच दिल्ली की कुर्सी तक पहुँच जाएगी. आखिर यही हमारा दबाव तो है असली वजह. जिसके चलते बार-बार दुत्कारे जाने के बाद भी भारत हर बार शांति का हाथ बढ़ा कर पहुँच जाता है इस्लामाबाद.

मुंबई हमले के गुनहगारों को पूरी पनाह दो. कश्मीर में पत्थर फेंको गैंग को पूरा समर्थन दो. माओवादियों को भी असला-बारूद पहुँचाओ. फिर हमारी कनपटी पर पिस्तौल लगा कर कहो चलो करो बातचीत... हर बार की तरह पहले कश्मीर और बलूचिस्तान पर कर लो बात.. आतंकवाद-आतंकवाद क्या होता है. हम भी तो हैं आतंकवाद को भुक्तभोगी. ये है पाकिस्तान का रवैया.

तो हमारी क्या मति मारी गई है. क्यों बार-बार पहुँच जाते हैं हमारी सरकार के आला लोग पाकिस्तान. देख लो चिदंबरम भी तो गए थे. लेकिन उनका विवेक शायद फिर भी ठीक रहा. दो टूक सुना आए पाकिस्तान को. कृष्णा के सामने भी कुरैशी की बकवास के बाद ज्यादा विकल्प नहीं बचे. वर्ना तो शायद फिर से कोई साझा बयान जारी कर देते बलूचिस्तान के ज़िक्र वाला जैसे शर्म अल शेख में करवाया था.

तो कब तक करेंगे हम ये अमन की पहल. क्या इस इलाके में शांति बनाए रखने का ठेका भारत ने ही ले रखा है. क्यों हम कमजोर दिखते हैं. अगर पाकिस्तान जैसे पिद्दी से मुल्क के सामने हमारी हवा खिसकती है तो किस बूते पर हम दुनिया का सरताज बनने का सपना पाल रहे हैं.

दस साल सोच कर देखो कि पाकिस्तान नाम का मुल्क इस दुनिया में है ही नहीं. सब बंद कर दो. बातचीत भी. और ज़रा पूरब की तरफ नज़र उठा कर देखो जहाँ बैठा है असली चुनौती देने वाला. सारी नीतियां चीन के बारे में हों, दोस्ती हो दोस्ती, दुश्मनी हो तो दुश्मनी.. लेकिन असली खेल वहीं से शुरू होगा.. या शायद हो भी चुका है.