Sunday, 28 March 2010

मजहदी-बिरजू होते रहेंगे

देहरादून से ननद की बेटी की शादी में दिल्ली आई थी मजहदी.
करोलबाग से रिश्तेदार के घर होने के बाद बल्लीमारान वापस जा रहे थे.
राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर आगे खड़ी थी मजहदी.
अचानक धक्का लगा.
नीचे पटरियों पर गिर गई.

बिरजू काम की तलाश में अपना घर-बार छोड़ कर दिल्ली आया था.
जहांगीरपुरी में रुका था अपने किसी परिचित के पास.
राजीव चौक पर मेट्रो पकड़ने गया.
किसी ने कहा जल्दी जाओ मेट्रो छूट जाएगी.
भागा तो खुद को संभाल नहीं पाया.
पैर फिसला, संतुलन बिगड़ा और सामने खड़ी एक लड़की के साथ पटरियों पर गिर गया.
केंद्रीय सचिवालय से आ रही मेट्रो ने लड़की और बिरजू को चपेट में ले लिया.
दोनों के पैर कट गए.

अब हम जानते हैं कि ये लड़की मजहदी थी जो बिरजू के साथ मेट्रो की पटरियों पर गिर गई.
आज दैनिक भास्कर में इसकी विस्तृत ख़बर छपी है धनंजय कुमार नाम के संवाददाता की.
घटना परसों की है. कल के अख़बारों में भी छपी. लेकिन कोई रिपोर्टर इसे प्रेम प्रसंग का नतीजा बता रहा था तो कोई एक तरफा मुहब्बत की दास्तां का दुखत अंत भी.

न बिरजू मजहदी को जानता है और न ही मजहदी बिरजू को.

पत्रकारिता के स्तर पर टिप्पणी करने का मेरा कोई मकसद नहीं है क्योंकि ऐसे विषयों पर कई ज्ञानी लोग दिन-रात बड़े-बड़े होटलों से लेकर चाय की दुकान तक भाषण देते रहते हैं. इनमें से ज़्यादातर के चैनल्स और अख़बारों में वही सब कुछ दिखता और छपता है जिसके खिलाफ वो बोलते हैं.

मुझे तो दुख है इस हादसे पर.

दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के लिए, सड़कों से ट्रैफिक कम करने के लिए मेट्रो लाई गई.
मेट्रो ने वाकई दिल्ली की जीवन शैली बदल दी है. अब कई लोग दफ्तर जाने के लिए कार का नहीं बल्कि मेट्रो का सहारा लेते हैं.
ये समय बचाती है. ऊर्जा बचाती है. सफर आरामदेह बनाती है. ताकि ट्रैफिक के शोर-गुल से बच कर आरामदेह एयरकंडीशन्ड कोच में सफर कर आप जब दफ्तर पहुंचे तो शांत दिमाग से अपने दिन और काम की शुरुआत कर सकें.
डीयू की दौड़ लगाने वाले हज़ारों स्टुडेंट्स के लिए मेट्रो वरदान साबित हुई है. कामकाजी महिलाओं के लिए भी जहां वो बस में मनचलों की नज़रों और छेड़छाड़ से बचते हुए आरक्षित सीट पर बैठ कर सफर करती हैं.
एक नई मेट्रो कल्चर भी विकसित हुई है. मैंने अभी तक कुल दो बार मेट्रो का सफर किया है. मैंने देखा कि किस तरह से ज़्यादातर लड़के-लड़कियां अपने मोबाइल फोन या आईपोड का हैंड्स फ्री कानों में लगा कर या तो गाने सुनते रहते हैं या फिर जोड़े बना कर दीन-दुनिया से बेखबर आपस में बातचीत में मशगूल रहते हैं.
महिलाओं और बुजुर्गों को सीट मांगनी नहीं पड़ती है बल्कि कुछ ठीढ नौजवानों को छोड़ ज़्यादातर खुद ही उठ कर उन्हें अपनी सीट ऑफर कर देते हैं.
लेकिन इस कल्चर में एक बड़ी कमी दिखाई देती है. अगर ऐसा न होता तो मजहदी बिरजू की दुर्घटना नहीं हुई होती.
बिरजू ने जब पूछा कि जहांगीरपुरी की मेट्रो कब और कहां से जाएगी तो बताने वाले को शायद ये बताने का वक्त नहीं मिला कि एक मेट्रो छूट भी जाए तो दूसरी थोड़ी देर  में आ जाएगी. इसका वक्त नोटिस बोर्ड पर लिखा है. मेट्रो समय पर चलती है. अगर एक में भीड़ हो तो आप दूसरी मेट्रो का इंतजा़र कर सकते हैं. उसमें निश्चित तौर पर जगह मिल जाएगी.
मेट्रो का इंतजार करने के लिए ज़रूरी नहीं है कि पीली लाइन पार कर बिल्कुल पटरियों से सट कर खड़े हों. पीली लाइन पटरियों से कम से कम आधा मीटर दूर होती है. यात्रियों को इस लाइन के पीछे ही खड़े होना चाहिए.
ये बातें कौन सिखाएगा. ज़िम्मेदारी तो मेट्रो की ही है. आधी दिल्ली को चाहे अब मेट्रो की सवारी की आदत पड़ गई हो लेकिन अब भी बाहर से आने वाले बड़े लोग हैं जो शायद पहली बार मेट्रो में सफर कर रहे हों.
इन लोगों को जानकारी देने के लिए क्या इंतज़ाम किया है मेट्रो ने.
मैं अपना ही किस्सा बताता हूं. मुझे विकासपुरी जाना था. मैंने मेट्रो की वेबसाइट पर जाकर रूट पता करने की कोशिश की कि वसुंधरा गाजियाबाद से विकासपुरी जाने के लिए कौन सा रास्ता बेहतर होगा या कहां से मेट्रो पकड़नी होगी.
मुझे कोई जानकारी नहीं मिली. फिर अपने सिटी ब्यूरो के एक सहयोगी को फोन कर पूछा तब उसने बताया कि आनंद विहार से जाना बेहतर होगा. सीधे गाड़ी विकासपुरी जाएगी और रास्ते में कहीं बदलना नहीं है.
आनंद विहार मेट्रो स्टेशन पर पार्किंग न करें ये सलाह भी दे दी लिहाजा मैंने पैसेफिक मॉल पर 20 रुपए देकर गाड़ी खड़ी की.
स्टेशन पर गया तो रूट देखना चाहता था लेकिन टिकट के लिए लंबी लाइन लगी थी इसलिए पहले उसी में लग गया. टिकट के काउंटर पर लिखा था यहां पूछताछ मना है.
फिर भी, मैंने उससे पूछा. उसने गुस्से में देख कर कहा आप इतने रुपए का टिकट ले लीजिए और गाड़ी सीधे विकासपुरी ही जाएगी.
लंदन में मेट्रो जिसे ट्यूब कहते हैं का अनुभव बिलकुल अलग है.
वहां वेबसाइट पर बसों पर और ट्यूब स्टेशनों पर हर जगह मैप मिल जाएगा. पॉकेट मैप जिसे आप लेकर जेब में घूम सकते हैं.
टिकट के लिए लंबी लाइन लगने का मतलब ही नहीं है. स्टेशन पर वेंडिग मशीन लगी होती हैं जिनसे आप क्रेडिट या डेबिट कार्ड से पूरे दिन का, अलग-अलग ज़ोन का, या पूरे सप्ताह का और पूरे महीने का भी पास ले सकते हैं.
यहां टिकट लेने जाएंगे तो छुट्टे पैसे भी मांगते हैं. वहां पर छुट्टे पैसे देने के लिए मशीन भी लगी हुई है.
हर तरफ मौजूद सिक्यूरिटी गार्ड आपकी मदद करते हैं. आपको अगर रास्ता समझ न आए तो किसी सहयात्री से पूछ सकते हैं. मुस्कान के साथ लोग आपकी मदद कर देंगे.
स्टेशन पर यलो लाइन के पीछे खड़े होने के लिए बार-बार एनाउंसमेंट होता है. गाड़ी आती है कहा जाता है माइंड द गैप जो वहां के युवाओं के लिए टीशर्ट पर लिखवाने का एक स्लोगन भी बन गया है.
ट्यूब की फ्रिकवेंसी भी पीक आवर्स पर हर एक मिनट पर है और ऑफ पीक आवर्स में दो से चार मिनट.
इनमें से कुछ चीज़ें दिल्ली मेट्रो में भी है. गार्ड यहां भी प्लेटफॉर्म पर तैनात हैं जो लोगों को पटरियों से दूर खड़े रहने के लिए कहते हैं. एनाउंसमेंट यहां भी होता है. तो फिर ऐसे हादसे क्यों होते हैं.
क्यों टिकट काउंटर पर लिखा है पूछताछ मना है. क्यों टिकट के लिए लगती हैं लंबी लाइनें. क्यों ऑटोमैटिक वेंडिग मशीन नहीं लगाई गई हैं स्टेशनों पर. क्यों मेट्रो का ज़्यादातर हिस्सा ओवरग्राउंड है अंडरग्राउंड नहीं.
दिल्ली का लैंड स्केप बदनुमा कर दिया है ओवरग्राउंड मेट्रो ने. सड़कों पर आने-जाने वालों का जीवन मुहाल हुआ वो अलग क्योंकि एक-एक डेढ़-डेढ़ साल से सड़कों पर मेट्रो का काम चल रहा है.
अंडर ग्राउंड मेट्रो को बढ़ावा क्यों नहीं दिया सरकार ने. क्यों सिर्फ़ लुटेन्स ज़ोन में है अंडर ग्राउंड मेट्रो. क्या इसलिए कि वहां रहने वाले और हिंदुस्तान के आकाओं को  ज़मीन के ऊपर भड़भड़ाती निकलती मेट्रो नागवार गुजरती. या धरोहर के नाम पर सैंकड़ों एकड़ जमीन पर रहने वाले कुछ सौ विशिष्ट परिवारों को अपनी सुविधा बाकी कीड़े-मकोड़ों की तुलना में ज़्यादा ज़रूरी लगती है.
ये कुछ तकलीफदेह सवाल हैं.
मैं मेट्रो का बहुत बड़ा पक्षधर हूं. मैं चाहता हूं कि मेट्रो मेरे घर वसुंधरा के पास भी आए ताकि मैं अपनी गाड़ी घर पर खड़ी कर मेट्रो से ही दफ्तर आऊ-जाऊं.  लेकिन यात्रियों की सुविधाओं और उनकी जागरूकता को बढ़ाने के लिए जब तक मेट्रो कड़े कदम नहीं उठाता तब तक मजहदी और बिरजू जैसे हादसे होते रहेंगे.