Saturday, 13 February 2010

माई नेम इज़- ?

शाहरूख खान जीत गए. शिवसेना हार गई.
Shahrukh Sena defeats Shiv Sena.
बहुत अच्छा हुआ. पहले राहुल गांधी ने शिवसेना को हराया. फिर शाहरूख खान ने भी निपटा दिया.
वो तो बीच में शरद पवार चले गए थे शिवसेना को ऑक्सीजन देने के लिए. नहीं तो राहुल बाबा के दौरे के बाद तो शिवसेना पूरी तरह से ठंडी पड़ गई थी.
रही सही कसर शिवसेना ने माई नेम इज़ खान का विरोध कर पूरी कर ली. ज़बर्दस्त पब्लिसिटी मिली है भाई. शिवसेना को भी और शाहरूख खान की फिल्म को भी. फेसबुक पर भाई लोगों ने ग्रुप बना डाले. शाहरूख खान की फिल्म देखो और शिवसेना को मुँह तोड़ जवाब दो. चैनल्स पर सुबह से शाम तक शाहरूख खान की फिल्म के अलावा कुछ भी नहीं चला. इतना प्रचार मिला कि पूछो मत. अगर प्रोड्यूसर 200 करोड़ रुपए भी खर्चा करता तो भी इतनी पब्लिसिटी नहीं मिल सकती थी. फेस बुक पर कई लोग कह रहे हैं कि वो फिल्म इसलिए देखने गए क्योंकि शिवसेना को मुँह तोड़ जवाब देना था. वैसे दिल्ली में तो ये कोई मुद्दा था ही नहीं. और अगर महाराष्ट्र सरकार ने जैसे सुरक्षा मुहैया कराई और शिवसैनिकों को गिरफ्तार किया उसके बाद शुक्रवार दोपहर होते-होते मुंबई के सभी मल्टीप्लेक्सेस में भी ये फिल्म शुरू हो गई.

दरअसल, ये शिवसेना का रौब नहीं मल्टीप्लेक्सेस और डिस्ट्रीब्यूटर्स का डर है जो रातों-रात शिवसेना या मनसे को ज़बर्दस्त पब्लिसिटी दिला देता है. रही-सही कसर शरद पवार जैसे लोग पूरा कर देते हैं जो ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की हिफाजत की भीख माँगने बाल ठाकरे के पास चले जाते हैं. वैसे ये साफ हो गया है कि अगर सरकार चाहे तो इन गैर कानूनी सरकारों से निपटा जा सकता है. इस बार अगर सुरक्षा के चलते माई नेम... चल गई तो कोई वजह नहीं है कि अगली बार ऐसा होने पर बजाए शिवसेना और मनसे की धमकियों के आगे झुकने के सुरक्षा के पर्याप्त इंतज़ाम दे कर फिल्में दिखाई जाएं.

रही बात, फिल्म की तो न तो मैं शाहरूख खान का कोई प्रशंसक हूँ और न ये मानता हूँ कि उन्हें कोई अच्छा अभिनय आता है. इसलिए भैय्या मैं तो 200 रुपए खर्च कर फिल्म देखने नहीं जाऊँगा. जिन्हें जाना है जाएं. लेकिन कम से कम हमें बख्श दें. भारत जैसे बड़े मुल्क में और भी कई बड़े मुद्दे हैं जिन पर मीडिया का ध्यान जाना चाहिए. एक फिल्म रिलीज़ होने या न होने से किसी की दुनिया बदलने वाली नहीं है.