Monday, 22 February 2010

कितना बदल गया इंदौर-2

"ऐसा हैगा. अपन तो शहर के बाहर का हैं. पर आप जिनी रोड पर चली रिया हो उन्हीं पे नाक की सीध में सीद्दा निकल जाओ. एबी रोड आ जावेगो."

कानों में मिश्री की तरह घुलती मालवी. अनजाने होकर भी उस अजनबी ने दिल जीत लिया. बात सही तो कही. अगर नाक की सीध में चलते रहोगे तो मंज़िल तक तो पहुँच ही जाना है. अब ये ज़रूर है कि नाक आँखों के साथ ही दायें-बायें घूमती रहती हैं. लेकिन इंदौरी नाक कई मंज़िल बताती है।

नमकीन की महक, मुंगेड़े, कचौरी और समोसे जिनके मसालों का कोई जोड़ नहीं, दिल्ली की तरह नहीं सिर्फ़ आलू ही आलू ढूंस कर भर दिए हों. दिल्ली से भी जो ढेरों पत्रकार मित्र इंदौर गए सबने खाने की जमकर तारीफ की. वैसे उन्हें खाने-पीने में ज़्यादा हाथ आज़माने का मौक़ा नहीं मिला. लेकिन जो मिला उसी में भरपूर चटखारे ले ले कर खाया-पिया और सच्चे दिल से इंदौरी खाने को दाद दी.

लेकिन ये नाक कुछ और भी सूंघती है. शहर के मेन रोडों के आस-पास शराब की दुकानें कुकुर मुत्तों की तरह उग आई हैं. यानी ठेके जमकर बाँटे जा रहे हैं. दुकानें खोली जा रही हैं. जो इंदौर में पहले नज़ारे आम नहीं थे अब दिन-दहाड़े दिखने लगे हैं. लोग शाम होते ही सड़क के किनारे ही देशी-विदेशी शराब खोल कर खड़े हो जाते हैं. ये नज़ारे शहर के सबसे पॉश इलाक़ों में भी दिखते हैं और ग़रीब इलाक़ों में भी.

इंदौर में ही था तब मनोहर लिंबोदियाजी ने बताया कि शायद राज्य के इतिहास में पहली बार हुआ है कि सिर्फ़ 63 दिनों में एक हत्या के मुकदमे का फैसला हो गया. मैंने उत्सुकता से पूछा किसकी हत्या किसका मुकदमा कैसा फैसला. उन्होंने बताया सिर्फ़ एक साल के बच्चे की एक सड़कछाप गुंडे ने गोली मार कर हत्या कर दी थी. पूरे शहर में हंगामा हुआ. सारे इंदौरी एकजुट हो गए. पुलिस अदालत सब पर दबाव पड़ा और इतनी जल्दी मामले का निपटारा हुआ और गुंडे को फांसी हो गई.

बात यूँ थी कि इस गुंडे ने पी शराब. शराब के नशे में धुत हो कर बोला आज तो किसी का खून करना है. तभी तो मोहल्ले में उसकी रंगदारी बनी रहती. निकला तो सामने दिखा एक मासूम जो अपने नाना की गोद में था. नाना घर के बाहर एक दुकान पर बैठे थे. गुंडे ने जाकर सीधे इस मासूम की कनपटी पर रखी रिवॉल्वर और नाना के रोके-रोके नहीं रूका. ट्रिगर दबाया और एक साल का बच्चा वहीं मर गया.

ऐसा नहीं है इंदौर में पहले अपराध नहीं होते थे. मिनी मुंबई वैसे ही नहीं कहलाता है इंदौर. लेकिन अब अपराधों की श्रेणियाँ बदलती दिख रही हैं. क्या इंदौर क्या भोपाल. सड़क चलती गाड़ी में युवती से बलात्कार जैसी सुर्खियाँ इंदौर-भोपाल के अखबारों में दिखे तो मध्य प्रदेश के हाल पर रोना ही आएगा न.

शराब के बढ़ते ठेके, मोहल्लों में गुंडागर्दी और रंगदारी के नाम पर मासूम का खून, सड़कों पर बलात्कार. ये सब नई संस्कृति है जो मालवा की संस्कृति से ज़रा भी मेल नहीं खाती. अपरिचित महिलाओं को भी आदर की नज़र से देखना या फिर कई बार तो नज़र उठा कर देखना भी नहीं. लगता है धीरे-धीरे सब खोता जा रहा है. बड़े लोगों से बात करो तो वो सीधा कसूर टेलीविज़न पर डाल देते हैं. लेकिन क्या कसूर सिर्फ़ टीवी का ही है या बात कुछ और है.

मालवा के बारे में कहते हैं "मालव धरती गहन गंभीर, पग-पग रोटी,डग-डग नीर" लेकिन मालवा की ज़मीन में पानी घटता जा रहा है. मुझे तो चिंता दूसरी बात की है. कहीं हमारी आँखों का पानी भी न घट जाए.