Sunday, 21 February 2010

कितना बदल गया इंदौर-1

सर्राफ़े की गलियाँ, राजबाड़ा का आँगन सब कुछ है. सुबह-सुबह मंदिर की घंटियाँ हैं.सड़कों के किनारे लगे फूलों के ढेर हैं. अगरबत्तियों की खुशबू है. घर के बाहर ताज़ी सब्ज़ियों की आवाज़ लगाते मोबाइल वेजीटेबल शॉपकीपर. जिनके ठेलों पर मंडियों से आए ताज़े टमाटर, मटर, फूलगोभी,कोथमीर वगैरह-वगैरह अपनी खुशबू और ताज़गी से दूर से ही खींचते हैं.नगर सेवाओं के लिए लगी भीड़ और सड़कों पर चलते वक्त कंधे से कंधे टकराते हुए. बाइक चलाते लोग ऐसी सफाई से गाड़ी मोड़ते हैं कि हॉलीवुड का बड़ा से बड़ा स्टंटमैन भी शर्म से लाल हो जाए. लाल बत्तियों पर कारों की भीड़ के बीच दाँतों के बीच फंसे खाने के टुकड़े जैसे साइकल वाले. जो कब कहाँ घूम जाए इसकी भविष्यवाणी बड़े से बड़ा ज्योतिषी भी नहीं कर सकता.

ये मेरा इंदौर है. ये नज़ारे जो ऊपर बयां किए ये पंद्रह साल पहले के भी थे और आज के भी.

लेकिन इंदौर बदल गया है.

सड़कों पर अब फिएट कम और दूसरी बड़ी कंपनियों की बी सी ग्रेड की गाड़ियाँ ज़्यादा दिखती है्ं. एसयूवी का ज़माना आ गया है. अपनी औकात दिखाने के लिए लोग अब बड़ी गाड़ियों में घूमने लगे हैं. सड़कों को चौड़ा कर दिया गया है. लेकिन गाड़ियाँ इनमें नहीं समाती. इसलिए इनके बढ़ते आकार को जगह देने के लिए मोटर साइकल, स्कूटर और साइकल वालों को कभी फुटपाथ पर तो कभी नालियों में घुसना पड़ता है.

और आ गई है मॉल कल्चर. मैं जिस होटल में रूका था वो एक मॉल में बना है. पंद्रह साल पहले उस जगह क्या था मुझे पता नहीं. लेकिन कम से कम कोई मॉल तो नहीं था. मोबाइल का चार्जर खराब हो गया तो इसी मॉल में लेने के लिए जाना पड़ा. सुबह-सुबह ही लड़के-लड़कियों के जोड़े मॉल में अपनी हाज़िरी देने पहुँच गए थे. क्या इंदौर क्या दिल्ली. सारे मॉल की एक जैसी कहानी.

हाँ, लेकिन अब भी प्रेमियों के जोड़े बाइक या स्कूटर पर जोड़े बना कर ही घूमते हैं. जैसे पहले घूमा करते थे. जोड़े मतलब ये नहीं कि प्रेमी बाइक चला रहा है और पीछे बैठी नकाबपोश प्रेमिका का दुपट्टा हवा में लहलहा रहा हो. बल्कि प्रेमी अपनी बाइक पर और प्रेमिका अपने स्कूटर पर. दोनों जोड़े बना कर सड़क पर चलते हैं. फिर कहीं, छप्पन दुकान या किसी मॉल के अगल-बगल में सड़क के किनारे गाड़ियां लगा कर गपशप की फिर निकल लिए जोड़े बना कर अपने-अपने घर.

ये इंदौर है. बदल गया है. लेकिन इसका बदला रंग-ढंग देखना हो तो एबी रोड पर बने बायपास पर जाइए. नई-नई टाउनशिप बन रही हैं. मिल का जो इलाका रात में सुनसान हो जाता था और जहाँ लोग जाने से घबराते थे, अब हॉट प्रापर्टी का ठिकाना है. एक बैडरूम, दो बैडरूम, डुप्ले सब कुछ मिल रहा है. शहर की पहचान बदल गई है. सड़कों पर लगे होर्डिंग में अब प्रापर्टी के विज्ञापन ज्यादा हैं. ये मध्य प्रदेश का एज्यूकेशन हब है. इसलिए पहले की तरह तमाम तरह की शिक्षा जिसमें कंप्यूटर, ज्योतिष, व्यक्तित्व निखारने से लेकर टीवी एंकरिंग के होर्डिंग भी दिख जाते हैं. लेकिन प्रापर्टी के विज्ञापनों ने सबको ढंक लिया है.

बड़े-बड़े चौराहे, लाल बत्तियों पर रुकते लोग, चौड़ी पक्की और मज़बूत सड़कें. अब गाड़ियों में चलते वक्त ज़्यादा दचके नहीं लगते. वाकई बदल गया है इंदौर.

लेकिन लोगों की गर्मजोशी पहले की तरह बरकरार है. हर कोई तपाक से मिलता है. प्रेम से बात करता है. दिल्ली की तरह तू-तड़ाक नहीं बल्कि पुलिसवाला भी आदर से बात करेगा. साब-साब से नीचे कोई बात नहीं. 'यार अपन तो इंदोरी है' कहने वालों की कमी नहीं. हर कोई हर तरह से मदद करने को तैयार. पोहे-जलेबी, दाल-बाफले की पेशकश करने वाले मिल जाएंगे. शहर के लोगों की प्रोफाइल चाहे बदली हो. अब बाहर से ज्यादा लोग आ रहे हैं. फिर भी, इंदौर के मिज़ाज़ में कोई तब्दीली नहीं.

भगवान करे. मॉल और प्रापर्टी की इस अंधी दौड़ में हमारी इंदौरी कल्चर बची रहे.