Sunday, 28 February 2010

विपक्षी एकता- सरकार की परेशानी

It seems it was only yesterday. The results for the Lok Sabha elections were out and the Congress got more than 200 seats but fell short of the magic figure of 272.



But, today, it is behaving as if it has managed to get more than 300 seats. The budget presented by Pranab Mukharjee is one such example. It behaved in a manner as if there is no tomorrow and this government is going to last not for 5 but 50 years. What was more shocking that a party which came to power, promising better life for "aam aadmi" has done gross injustice to their interests.



Entire opposition walked out when Mr. Mukharjee announced that the government is restoring the duty cuts announced on petro products. Congress spokesmen and also some newspapers rediculed opposition's move by saying that it was undemocratic and also against the norms of parliamentary democracy.



I pity them. In democracy, it is right of the opposition parties to oppose the government on its wrong policies. It was not one political party but entire opposition which was united in opposing government's anti people move. I think the opposition was absolutely right in walking out of the house. If the biggest temple of democracy cannot protect interests of the aam aadmi then who will do it?



I also see a silver lining in the opposition unity. They may have come together keeping their own little political interests in mind, but as a pressure group they can force the government to rethink its decisions. Moreover, the parties which are part of the government are also opposing price hike.



Now there is a plan to hold one day long Bharat Band against the rise in the prices of the petroleum products. If it materalises, it would be a grand step in the direction of fortifying opposition unity and this will only increase problems for the government. Only then, I think the Congress can show some reasoning and stop behaving in an arrogant manner, in which they have been behaving since the day they came to power.

शौचालय किसके उपयोग के लिये?

वैसे मुझे लगता है कि मेरी हिंदी ठीक-ठाक है. लेकिन मैं एक टॉयलेट पर लगे इस नोटिस को समझ नहीं पाया हूँ. शौचालय सिर्फ कार्यालय उपयोग के लिये. क्या इसका मतलब यह है कि इस शौचालय में सिर्फ़ कार्यालय का ही काम हो सकता है या फिर कार्यालय के लोग ही इसका उपयोग कर सकते हैं. आप भी अपना दिमाग लगायें और मुझे बतायें कि इसका क्या मतलब है.

Monday, 22 February 2010

कितना बदल गया इंदौर-2

"ऐसा हैगा. अपन तो शहर के बाहर का हैं. पर आप जिनी रोड पर चली रिया हो उन्हीं पे नाक की सीध में सीद्दा निकल जाओ. एबी रोड आ जावेगो."

कानों में मिश्री की तरह घुलती मालवी. अनजाने होकर भी उस अजनबी ने दिल जीत लिया. बात सही तो कही. अगर नाक की सीध में चलते रहोगे तो मंज़िल तक तो पहुँच ही जाना है. अब ये ज़रूर है कि नाक आँखों के साथ ही दायें-बायें घूमती रहती हैं. लेकिन इंदौरी नाक कई मंज़िल बताती है।

नमकीन की महक, मुंगेड़े, कचौरी और समोसे जिनके मसालों का कोई जोड़ नहीं, दिल्ली की तरह नहीं सिर्फ़ आलू ही आलू ढूंस कर भर दिए हों. दिल्ली से भी जो ढेरों पत्रकार मित्र इंदौर गए सबने खाने की जमकर तारीफ की. वैसे उन्हें खाने-पीने में ज़्यादा हाथ आज़माने का मौक़ा नहीं मिला. लेकिन जो मिला उसी में भरपूर चटखारे ले ले कर खाया-पिया और सच्चे दिल से इंदौरी खाने को दाद दी.

लेकिन ये नाक कुछ और भी सूंघती है. शहर के मेन रोडों के आस-पास शराब की दुकानें कुकुर मुत्तों की तरह उग आई हैं. यानी ठेके जमकर बाँटे जा रहे हैं. दुकानें खोली जा रही हैं. जो इंदौर में पहले नज़ारे आम नहीं थे अब दिन-दहाड़े दिखने लगे हैं. लोग शाम होते ही सड़क के किनारे ही देशी-विदेशी शराब खोल कर खड़े हो जाते हैं. ये नज़ारे शहर के सबसे पॉश इलाक़ों में भी दिखते हैं और ग़रीब इलाक़ों में भी.

इंदौर में ही था तब मनोहर लिंबोदियाजी ने बताया कि शायद राज्य के इतिहास में पहली बार हुआ है कि सिर्फ़ 63 दिनों में एक हत्या के मुकदमे का फैसला हो गया. मैंने उत्सुकता से पूछा किसकी हत्या किसका मुकदमा कैसा फैसला. उन्होंने बताया सिर्फ़ एक साल के बच्चे की एक सड़कछाप गुंडे ने गोली मार कर हत्या कर दी थी. पूरे शहर में हंगामा हुआ. सारे इंदौरी एकजुट हो गए. पुलिस अदालत सब पर दबाव पड़ा और इतनी जल्दी मामले का निपटारा हुआ और गुंडे को फांसी हो गई.

बात यूँ थी कि इस गुंडे ने पी शराब. शराब के नशे में धुत हो कर बोला आज तो किसी का खून करना है. तभी तो मोहल्ले में उसकी रंगदारी बनी रहती. निकला तो सामने दिखा एक मासूम जो अपने नाना की गोद में था. नाना घर के बाहर एक दुकान पर बैठे थे. गुंडे ने जाकर सीधे इस मासूम की कनपटी पर रखी रिवॉल्वर और नाना के रोके-रोके नहीं रूका. ट्रिगर दबाया और एक साल का बच्चा वहीं मर गया.

ऐसा नहीं है इंदौर में पहले अपराध नहीं होते थे. मिनी मुंबई वैसे ही नहीं कहलाता है इंदौर. लेकिन अब अपराधों की श्रेणियाँ बदलती दिख रही हैं. क्या इंदौर क्या भोपाल. सड़क चलती गाड़ी में युवती से बलात्कार जैसी सुर्खियाँ इंदौर-भोपाल के अखबारों में दिखे तो मध्य प्रदेश के हाल पर रोना ही आएगा न.

शराब के बढ़ते ठेके, मोहल्लों में गुंडागर्दी और रंगदारी के नाम पर मासूम का खून, सड़कों पर बलात्कार. ये सब नई संस्कृति है जो मालवा की संस्कृति से ज़रा भी मेल नहीं खाती. अपरिचित महिलाओं को भी आदर की नज़र से देखना या फिर कई बार तो नज़र उठा कर देखना भी नहीं. लगता है धीरे-धीरे सब खोता जा रहा है. बड़े लोगों से बात करो तो वो सीधा कसूर टेलीविज़न पर डाल देते हैं. लेकिन क्या कसूर सिर्फ़ टीवी का ही है या बात कुछ और है.

मालवा के बारे में कहते हैं "मालव धरती गहन गंभीर, पग-पग रोटी,डग-डग नीर" लेकिन मालवा की ज़मीन में पानी घटता जा रहा है. मुझे तो चिंता दूसरी बात की है. कहीं हमारी आँखों का पानी भी न घट जाए.

Sunday, 21 February 2010

कितना बदल गया इंदौर-1

सर्राफ़े की गलियाँ, राजबाड़ा का आँगन सब कुछ है. सुबह-सुबह मंदिर की घंटियाँ हैं.सड़कों के किनारे लगे फूलों के ढेर हैं. अगरबत्तियों की खुशबू है. घर के बाहर ताज़ी सब्ज़ियों की आवाज़ लगाते मोबाइल वेजीटेबल शॉपकीपर. जिनके ठेलों पर मंडियों से आए ताज़े टमाटर, मटर, फूलगोभी,कोथमीर वगैरह-वगैरह अपनी खुशबू और ताज़गी से दूर से ही खींचते हैं.नगर सेवाओं के लिए लगी भीड़ और सड़कों पर चलते वक्त कंधे से कंधे टकराते हुए. बाइक चलाते लोग ऐसी सफाई से गाड़ी मोड़ते हैं कि हॉलीवुड का बड़ा से बड़ा स्टंटमैन भी शर्म से लाल हो जाए. लाल बत्तियों पर कारों की भीड़ के बीच दाँतों के बीच फंसे खाने के टुकड़े जैसे साइकल वाले. जो कब कहाँ घूम जाए इसकी भविष्यवाणी बड़े से बड़ा ज्योतिषी भी नहीं कर सकता.

ये मेरा इंदौर है. ये नज़ारे जो ऊपर बयां किए ये पंद्रह साल पहले के भी थे और आज के भी.

लेकिन इंदौर बदल गया है.

सड़कों पर अब फिएट कम और दूसरी बड़ी कंपनियों की बी सी ग्रेड की गाड़ियाँ ज़्यादा दिखती है्ं. एसयूवी का ज़माना आ गया है. अपनी औकात दिखाने के लिए लोग अब बड़ी गाड़ियों में घूमने लगे हैं. सड़कों को चौड़ा कर दिया गया है. लेकिन गाड़ियाँ इनमें नहीं समाती. इसलिए इनके बढ़ते आकार को जगह देने के लिए मोटर साइकल, स्कूटर और साइकल वालों को कभी फुटपाथ पर तो कभी नालियों में घुसना पड़ता है.

और आ गई है मॉल कल्चर. मैं जिस होटल में रूका था वो एक मॉल में बना है. पंद्रह साल पहले उस जगह क्या था मुझे पता नहीं. लेकिन कम से कम कोई मॉल तो नहीं था. मोबाइल का चार्जर खराब हो गया तो इसी मॉल में लेने के लिए जाना पड़ा. सुबह-सुबह ही लड़के-लड़कियों के जोड़े मॉल में अपनी हाज़िरी देने पहुँच गए थे. क्या इंदौर क्या दिल्ली. सारे मॉल की एक जैसी कहानी.

हाँ, लेकिन अब भी प्रेमियों के जोड़े बाइक या स्कूटर पर जोड़े बना कर ही घूमते हैं. जैसे पहले घूमा करते थे. जोड़े मतलब ये नहीं कि प्रेमी बाइक चला रहा है और पीछे बैठी नकाबपोश प्रेमिका का दुपट्टा हवा में लहलहा रहा हो. बल्कि प्रेमी अपनी बाइक पर और प्रेमिका अपने स्कूटर पर. दोनों जोड़े बना कर सड़क पर चलते हैं. फिर कहीं, छप्पन दुकान या किसी मॉल के अगल-बगल में सड़क के किनारे गाड़ियां लगा कर गपशप की फिर निकल लिए जोड़े बना कर अपने-अपने घर.

ये इंदौर है. बदल गया है. लेकिन इसका बदला रंग-ढंग देखना हो तो एबी रोड पर बने बायपास पर जाइए. नई-नई टाउनशिप बन रही हैं. मिल का जो इलाका रात में सुनसान हो जाता था और जहाँ लोग जाने से घबराते थे, अब हॉट प्रापर्टी का ठिकाना है. एक बैडरूम, दो बैडरूम, डुप्ले सब कुछ मिल रहा है. शहर की पहचान बदल गई है. सड़कों पर लगे होर्डिंग में अब प्रापर्टी के विज्ञापन ज्यादा हैं. ये मध्य प्रदेश का एज्यूकेशन हब है. इसलिए पहले की तरह तमाम तरह की शिक्षा जिसमें कंप्यूटर, ज्योतिष, व्यक्तित्व निखारने से लेकर टीवी एंकरिंग के होर्डिंग भी दिख जाते हैं. लेकिन प्रापर्टी के विज्ञापनों ने सबको ढंक लिया है.

बड़े-बड़े चौराहे, लाल बत्तियों पर रुकते लोग, चौड़ी पक्की और मज़बूत सड़कें. अब गाड़ियों में चलते वक्त ज़्यादा दचके नहीं लगते. वाकई बदल गया है इंदौर.

लेकिन लोगों की गर्मजोशी पहले की तरह बरकरार है. हर कोई तपाक से मिलता है. प्रेम से बात करता है. दिल्ली की तरह तू-तड़ाक नहीं बल्कि पुलिसवाला भी आदर से बात करेगा. साब-साब से नीचे कोई बात नहीं. 'यार अपन तो इंदोरी है' कहने वालों की कमी नहीं. हर कोई हर तरह से मदद करने को तैयार. पोहे-जलेबी, दाल-बाफले की पेशकश करने वाले मिल जाएंगे. शहर के लोगों की प्रोफाइल चाहे बदली हो. अब बाहर से ज्यादा लोग आ रहे हैं. फिर भी, इंदौर के मिज़ाज़ में कोई तब्दीली नहीं.

भगवान करे. मॉल और प्रापर्टी की इस अंधी दौड़ में हमारी इंदौरी कल्चर बची रहे.

Monday, 15 February 2010

मेरी पहली कविता

मैं शून्य में देखता हुआ...
निर्विकार, निरंतर..
कभी हाथों की लकीरों को...
अपने मस्तिष्क पटल पर...
इन्हें इधर से उधर खींचता हुआ...
ये यहां से वहां चली जाये...
तो सुनहरा भविष्य दिखे...
लकीरें बेहद गहरी हैं...
न इधर जाती हैं न उधर...
वर्षों से हाथों पर जमी हैं...
जैसे ज़िद्दी धूल जो फर्श से मिटती नहीं...
विचार, आचार, व्यवहार...
सब इससे ही बंधे हैं...
कभी आता है गुस्सा...
तो कभी दया भी आती है...
लेकिन आत्मदया कायरता की निशानी है...
इसलिए अब छोड़ दिया है इस बारे में सोचना...
लकीरों को इधर से उधर हिलाना...

Sunday, 14 February 2010

लो कर लो बात!

मनमोहन सिंह सीधे-सच्चे और सरल दिल के व्यक्ति हैं. वो पेशे से नेता नहीं नौकरशाह हैं. लिहाज़ा वो बिना लाग-लपेट कर खुले और संतुलित ढंग से अपनी बातें सामने रखते हैं. लेकिन बतौर प्रधानमंत्री उनकी अपनी कुछ महत्वाकांक्षायें भी हैं. वो सच्चे देशभक्त हैं और चाहते हैं कि उन्हें भारत को विकसित देशों की श्रेणी में रखने के लक्ष्य को पूरा करने वाले व्यक्ति के तौर पर याद रखा जाए.

लेकिन उन्हें लक्ष्य को पूरा करने में भारत के मौजूदा हाल में तीन समस्यायें नज़र आती हैं. वो हैं ऊर्जा (बिजली), शिक्षा और पाकिस्तान. ऊर्जा के लिए तो उन्होंने अमेरिका के साथ परमाणु करार कर लिया. शिक्षा के क्षेत्र में चूंकि पिछले पाँच साल में अर्जुन सिंह के रहते कुछ नहीं कर पाए इसलिए दूसरी पारी में कमान सौंपी है तेज़-तर्रार कपिल सिब्बल को. सिब्बल उनके बेहद करीबी हैं. वो इतनी तेज़ी से भागे कि कहने लगे कि मैंने पूरे पाँच साल का काम सिर्फ 100 दिन में कर लिया अब बाकी दिनों में क्या करना है.

लेकिन पाकिस्तान के मसले पर मनमोहन सिंह चाह कर भी बहुत कुछ नहीं कर पाए हैं. कोशिश बहुत की थी. मुंबई हमलों में पाकिस्तान का सीधा हाथ होने के बावजूद शर्म अल शेख में साझा बयान जारी कर दिया. कह दिया कि बातचीत शुरू की जाएगी. यहां तक कि पहली बार किसी साझा बयान में बलूचिस्तान का ज़िक्र आया. पाकिस्तान ने इसे अपनी जीत बताया.

शर्म अल शेख की शर्म को महसूस करते ही थोड़ी बहुत सफाई दे कर मामले को रफा-दफा कर दिया गया. अब हालत ये है कि पाकिस्तान से बातचीत का पक्ष न रखने वाले एम के नारायणन को रिटायर कर दिया गया है और शर्म अल शेख के साझा बयान को ड्राफ्टिंग की गलती बताने वाले शिवशंकर मेनन को नया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बना दिया गया है.फिर समय का चक्र तेज़ी से घूमा. मंत्रियों के बयान आए और सचिव स्तर की बातचीत शुरू करने की घोषणा भी कर दी गई. अब ये 25 फरवरी को दिल्ली में होनी है.

भारत कहता रहा है कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन पर चलने वाली आतंकवादी गतिविधियों पर रोक नहीं लगता और मु्ंबई हमलों के लिए ज़िम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं करता तब तक बातचीत का कोई मतलब नहीं है. भारत ने बातचीत शुरू करने की घोषणा ऐसे वक्त कि जब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में आतंकवादियों ने भारत के खिलाफ तथाकथित जेहाद जारी रखने का एलान किया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय दबाव की वजह से भारत बातचीत के लिए मजबूर हो रहा है. लाल कृष्ण आडवाणी ने तो सीधे अमेरिका का नाम लिया और कहा कि अमेरिकी दबाव के चलते भारत बातचीत कर रहा है.

अब भारत कह रहा है आतंकवाद पर बातचीत होगी. पाकिस्तान कहता है कश्मीर पर बातचीत होगी. चिदंबरम कहते हैं पीओके भारत का हिस्सा है और वहां गए लड़कों के वापस आने पर सरकार को कोई एतराज़ नहीं है. शिवशंकर मेनन ने एनएसए बनने से तीन दिन पहले लिखे एक लेख में कहा कि बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

सही बात है. हम कहते हैं आतंकवाद पर बात करो. पाकिस्तान कहता है कश्मीर पर बात करो. तो बातचीत क्या होगी. ज़ाहिर है धरती के बढ़ते तापमान या बीटी बैंगन पर तो हम बात करने से रहे. भारत और पाकिस्तान के बीच ये विवाद के विषय नहीं हैं. असली विवाद है सीमा का.

लेकिन विपक्षी दलों को चिंता सता रही है कि भारत कहीं अपनी सीमा पर ही समझौता न कर बैठे. मनमोहन सिंह की तारीफ तो वो भी करते हैं लेकिन उन्हें डर लगता है कि कहीं जम्मू-कश्मीर, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और जम्मू के मुस्लिम बहुल इलाकों के साझा प्रशासन की बात मंजूर न कर ली जाए. बीजेपी कहती है इस दिशा में कोशिशें चल रही हैं. कश्मीर को ऑटोनॉमी देने की बात करने वाली जस्टिस सगीर अहमद की रिपोर्ट पहले ही मंगवा ली गई है. उसका ये भी आरोप है कि इस रिपोर्ट को आनन-फानन में बनाया गया और इस पर समिति के सदस्यों से राय तक नहीं ली गई.

सरकार कहती है बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं है. लेकिन बीजेपी का मानना है कि बातचीत न करना भी विकल्प है. यानी यथास्थिति बनाए रखना. सरकार को डर ये था कि मुंबई हमलों के बाद अगर कोई आतंकवादी हमला होता है और पाकिस्तान से बातचीत न हो रही हो तो फिर सैनिक कार्रवाई की धमकी देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता. कम से कम बातचीत अगर कर रहे हो तो उसे बंद करने की धमकी तो दे ही सकते हैं. यानी सरकार भी ये मानती है कि पाकिस्तान से बातचीत हो या न हो, भारत में आतंकवादी गतिविधियों पर रोक-थाम करना बेहद मुश्किल काम है क्योंकि पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व में न तो कोई दम है और न ही कोई इच्छा शक्ति कि वो भारत के खिलाफ हो रहे हमलों को रोके.

और अब पुणे में जर्मन बेकरी पर हो गया है बम विस्फोट. बातचीत शुरू होने से पहले ही. कुछ जानकार कह रहे हैं ये बातचीत को रोकने के लिेए किया गया है. यानी आतंकवादी भी नहीं चाहते हैं कि भारत पाकिस्तान बातचीत करें. शक की सुई लश्कर ए तैय्यबा पर है क्योंकि डेविड हेडली पुणे में रेकी करके गया था. विस्फोट के तरीके और विस्फोटकों के इस्तेमाल पर भी लश्कर की छाप दिख रही है. यानी फिर से पाकिस्तान पर उंगुली उठेगी. फिर सवाल उठेगा क्या हासिल होगा बातचीत करके.

इसलिए राहुल गांधी की एक बात बड़ी अच्छी लगी. कई बार वो दिमाग से नहीं दिल से बोलते हैं. उन्होंने कहा कि हम पाकिस्तान को बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं. उसकी ज़रूरत नहीं है. बिलकुल सही बात है. पाकिस्तान हमारे लिए अब दस साल पुरानी कहानी है. अब हमें पाकिस्तान की नहीं चीन की बात करनी चाहिए. बात करना है तो कर लो. लेकिन ये बात ध्यान में रख कर कि पाकिस्तान हमारी बराबरी पर नहीं है. हमारी उससे होड़ नहीं है. वो पड़ोस का एक नादान बच्चा है जो कई बार पार्किंग में खड़ी गाड़ी पर स्क्रेच कर चला जाता है तो कभी वाइपर तोड़ देता है. बच्चे से क्या बात करनी. उसकी शरारतों के लिए उसके बाप से बात करनी चाहिए. लेकिन उसके बाप हमें भी बच्चा ही मानते हैं और इसीलिए हमें पहली ज़रूरत उसके बाप से आंख से आंख मिला कर बात करने की हिम्मत पैदा करने की है. सुन रहे हैं अंकल सैम.

Saturday, 13 February 2010

माई नेम इज़- ?

शाहरूख खान जीत गए. शिवसेना हार गई.
Shahrukh Sena defeats Shiv Sena.
बहुत अच्छा हुआ. पहले राहुल गांधी ने शिवसेना को हराया. फिर शाहरूख खान ने भी निपटा दिया.
वो तो बीच में शरद पवार चले गए थे शिवसेना को ऑक्सीजन देने के लिए. नहीं तो राहुल बाबा के दौरे के बाद तो शिवसेना पूरी तरह से ठंडी पड़ गई थी.
रही सही कसर शिवसेना ने माई नेम इज़ खान का विरोध कर पूरी कर ली. ज़बर्दस्त पब्लिसिटी मिली है भाई. शिवसेना को भी और शाहरूख खान की फिल्म को भी. फेसबुक पर भाई लोगों ने ग्रुप बना डाले. शाहरूख खान की फिल्म देखो और शिवसेना को मुँह तोड़ जवाब दो. चैनल्स पर सुबह से शाम तक शाहरूख खान की फिल्म के अलावा कुछ भी नहीं चला. इतना प्रचार मिला कि पूछो मत. अगर प्रोड्यूसर 200 करोड़ रुपए भी खर्चा करता तो भी इतनी पब्लिसिटी नहीं मिल सकती थी. फेस बुक पर कई लोग कह रहे हैं कि वो फिल्म इसलिए देखने गए क्योंकि शिवसेना को मुँह तोड़ जवाब देना था. वैसे दिल्ली में तो ये कोई मुद्दा था ही नहीं. और अगर महाराष्ट्र सरकार ने जैसे सुरक्षा मुहैया कराई और शिवसैनिकों को गिरफ्तार किया उसके बाद शुक्रवार दोपहर होते-होते मुंबई के सभी मल्टीप्लेक्सेस में भी ये फिल्म शुरू हो गई.

दरअसल, ये शिवसेना का रौब नहीं मल्टीप्लेक्सेस और डिस्ट्रीब्यूटर्स का डर है जो रातों-रात शिवसेना या मनसे को ज़बर्दस्त पब्लिसिटी दिला देता है. रही-सही कसर शरद पवार जैसे लोग पूरा कर देते हैं जो ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की हिफाजत की भीख माँगने बाल ठाकरे के पास चले जाते हैं. वैसे ये साफ हो गया है कि अगर सरकार चाहे तो इन गैर कानूनी सरकारों से निपटा जा सकता है. इस बार अगर सुरक्षा के चलते माई नेम... चल गई तो कोई वजह नहीं है कि अगली बार ऐसा होने पर बजाए शिवसेना और मनसे की धमकियों के आगे झुकने के सुरक्षा के पर्याप्त इंतज़ाम दे कर फिल्में दिखाई जाएं.

रही बात, फिल्म की तो न तो मैं शाहरूख खान का कोई प्रशंसक हूँ और न ये मानता हूँ कि उन्हें कोई अच्छा अभिनय आता है. इसलिए भैय्या मैं तो 200 रुपए खर्च कर फिल्म देखने नहीं जाऊँगा. जिन्हें जाना है जाएं. लेकिन कम से कम हमें बख्श दें. भारत जैसे बड़े मुल्क में और भी कई बड़े मुद्दे हैं जिन पर मीडिया का ध्यान जाना चाहिए. एक फिल्म रिलीज़ होने या न होने से किसी की दुनिया बदलने वाली नहीं है.

Monday, 8 February 2010

कम चीनी खाओ

राष्ट्रवादी का कहना है कि चीनी न खाने से आज तक कोई नहीं मरा. हाँ खाने में ज्यादा चीनी और नमक ज़हर के समान है. वो ये भी कहता है कि सौंदर्य प्रसाधन के सामनों के दामों में बढोत्तरी हो रही है इस पर कोई सवाल क्यों नहीं उठाता. सिर्फ़ चीनी की बात ही क्यों करते हो.

राष्ट्रवादी कृषि मंत्री शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का मुख पत्र है. इससे पहले भी वह कई मामलों खासतौर से जब कांग्रेसी पवार की बुराई कर रहे थे, तब उनके बचाव में कड़ी भाषा का इस्तेमाल कर चुका है. तब एनसीपी के लोगों ने कहा कि इस अखबार में प्रकाशित बातों को उनसे न जोड़ा जाए.

अब अगर कांग्रेस संदेश में कुछ छपा हो और उसे कांग्रेस की राय न मानी जाए खासतौर से संपादकीय में तो बहुत मुश्किल हो जाएगी. ऐसे ही कमल संदेश का संपादकीय हो या फिर पांचजन्य का संपादकीय. इन्हें बीजेपी और आरएसएस के विचार ही माने जाएंगे. तो फिर राष्ट्रवादी के विचार एनसीपी के विचार क्यों नहीं.

अब बात चीनी कम खाने की या न खाने की. ये तो बाबा रामदेव से लेकर बड़े से बड़ा डॉक्टर भी कह देगा कि ज्यादा चीनी नहीं खानी चाहिए. हमारे मध्य प्रदेश में न तो बाबा रामदेव की सुनी जाती है और न किसी डॉक्टर की. चाय में चीनी नहीं बल्कि चीनी में चाय होती है. लोग चीनी खा-खा कर डाइबिटीज़ के शिकार भी हो रहे हैं. किसी ज़माने में गुड खाने का चलन था. चाय में भी गुड डाला जाता था. वह इतना हानिकारक नहीं होता था. लेकिन अब सब कुछ चीनी से ही बनता है. घर में वार-त्यौहार पर बनने वाली मिठाइयाँ हों रोज़ पीने के लिए दूध-चाय. चीनी के बिना काम नहीं चलता. और इस बार तो गुड़ ने चीनी को नीचा दिखा दिया. गुड के दाम भी इतने बढ़ गए थे कि थोड़े समय पहले तक चीनी को पिघलाकर गुड़ बनाया जा रहा था.

सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री के दाम भी बढ़ रहे हैं. ये हमारी मूलभूत आवश्यकताओँ में से नहीं है. कम से कम मेरे लिए तो नहीं. नहाने के साबुन, टूथपेस्ट, सिर पर लगाने के तेल, शैंपू वगैरह के दाम न बढ़े तो मेरे जैसे आदमी का काम चल जाएगा. हाँ अगर दूसरी चीज़ों दाम बढ़े तो हमारे घर का बजट फिर बिगड़ सकता है.

लेकिन भाई राष्ट्रवादी. कुछ चीज़ें होती हैं जिन्हें सरकारी भाषा में एसेंशियल कमोडिटीज़ यानी आवश्यक वस्तुयें कहा जाता है. चीनी इसी में आती है. सौंदर्य प्रसाधन नहीं. वैसे अगर पवार साहब की चली तो वो जल्दी ही सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री के दाम बढ़ने की भविष्यवाणी भी कर सकते हैं.

और जो लाखों टन चीनी कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली कंपनियों को बेची जा रही है और जिसकी मांग बढ़ने के कारण (अब गर्मियाँ आ रही हैं तो माँग तो बढ़ेगी ही) और आपूर्ति के पहले से ही कम होने के कारण आने वाले महीनों में हालात और बिगड़ेगे. हाँ, राष्ट्रवादी के संपादक एक दूसरा संपादकीय लिख कर कम से कम अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से चीनी न खाने की अपील कर सकते हैं. या इसे एनसीपी के संविधान में जोड़ा जा सकता है कि एनसीपी का कार्यकर्ता बनने के लिए ज़रूरी है कि आप चीनी न खाते हों और शायद दाल, चावल, गेहूँ, दूध वगैरह कुछ भी नहीं क्योंकि ये सब भी महँगे हो रहे हैं. पता नहीं जीने के लिए इन्हें खाना क्यों ज़रूरी है.

Sunday, 7 February 2010

मैं वापस आ गया

मेरा ब्लैकबेरी चोरी हो गया इसलिए पुराने ब्लॉग मेरी कही का यूज़रनेम और पासवर्ड भी याद नहीं रहा। पुराना ब्लॉग भी एक्टीवेट नहीं हो रहा था। इसलिए अब नये ईमेल आई और पासवर्ड से ब्लॉगिंग दोबारा शुरू कर रहा हूं। अगर आपके पास सुझाव हों किस तरह से पुराने ब्लॉग का कंटेंट मैं इस ब्लॉग पर लगा सकता हूं तो कृपया ज़रूर बतायें।